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पूरी दुनियां को ढोलक की थाप पर नचाता है अमरोहा

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पूरी दुनियां को ढोलक की थाप पर नचाता है अमरोहा
25 Jun 2022
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अमरोहा शहर Amroha City की परम्परागत कारीगरी दूर-दूर तक बहुचर्चित है, जो अमरोहा को एक अलग पहचान देती है। अमरोहा के आम और रुहा के बाद अगर कुछ है तो वह है,अमरोहा की ढोलक Amroha Dholak । अमरोहा शहर के दिल में बजते ढोलक के सुर ताल और ज़िंदादिली से आज भी चल रहा ढोलक का व्यवसाय कैसे फल फूल रहा है। कुछ अन्य कार्य भी व्यावसायिक तौर पर महत्वपूर्ण है,जैसे की हाथ से करघा बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना और चीनी मिलिंग शामिल हैं। द्वितीयक हैं कालीन निर्माण,लकड़ी के हस्तशिल्प और ढोलक निर्माण  जानकारी के मुताबिक अमरोहा से हर साल करीब 6 करोड़ रुपये की ढोलक का निर्यात होता है यहां की ढोलक की मांग कई देशों में है. इस जिले में ढोलक बनाने की छोटी-बड़ी 300 से अधिक यूनिट हुआ करती थी, जो अब घटकर 200 रह गई हैं यहां करीब 10 हजार लोग इस कारोबार से जुड़े हैं।

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ढोलक की थाप beat of drum सुनते ही सभी के पैर थिरकने लगते हैं ढोलक की आवाज माहौल में एक नई ऊर्जा का संचार Transmission of energy करती है इसकी थाप पर डांस करने के लिए नृत्य कला में पारंगत होने की जरूरत नहीं होती तभी तो हर किसी के मन को लुभाता है इसका शोर सभी पर अपना जादू चलाने वाली ढोलक यूपी के अमरोहा के हुनरमंद कारीगरों Skilled Craftsmen of Amroha द्वारा तैयार की जाती है आज हम आपको अमरोहा की ढोलक से जुड़ी कुछ बातें बताएंगे

शायर नगरी अमरोहा, जहाँ जॉन एलिया John Elia जैसे बड़े शायर का जन्म हुआ। आज़ादी के पश्चात् कुछ ने रास्ता बदली कर ली। कहने का मतलब कुछ लोग पाकिस्तान चले गए। मुरादाबाद के नज़दीक बसा शहर अमरोहा, उत्तर पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक छोटा सा शहर है। अमरोहा शहर Amroha City को इसका नाम आम यानि आम और रूहा से मिला है, जो यहाँ की एक किस्म की मछली है, जो यहाँ बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। 

अगर आप उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों से जुड़ी वहां की खासियत और ऐतिहासिक जानकारियों Historical Information को जानने में दिलचस्पी रखते हैं, तो यह जानकारी आपको जरूर अच्छी लगेगी यूपी में आज भी ऐसे अनगिनत किस्से दफन हैं, जिनके बारे में शायद आप जानते भी नहीं होंगे इनमें मुगलकालीन किस्से Mughal era tales भी शामिल हैं ये किस्से उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहर historic monuments हैं यूपी के जिलों की खास बात यह है कि हर जिले की एक अलग विशेषता है, जो सभी जिलों को एक-दूसरे से अलग पहचान देती है ।

इसी क्रम में आज हम अमरोहा के बारे में बात करेंगे अमरोहा ढोलक के शहर City of Amroha Dholak से जाना जाता है अमरोहा में ढोलक का कारोबार सदियों पुराना है यहां की ढोलक और तबले अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी अपना जादू बिखेरते हैं आज जानेंगे अमरोहा के इस उद्योग से जुड़ी हर एक दिलचस्प बात। 

छोटे से शहर का बड़ा हुनर Small Town Big Talent 

यूपी का छोटा सा शहर अमरोहा पूरे विश्व में एक अलग पहचान रखता है, वजह है यहां की ढोलक यहां होने वाले इस वाद्य यंत्र के निर्माण से इसकी ख्याति दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है यहां के हुनरमंद कारीगरों की वजह से अमरोहा मुख्य रूप से ढोलक और तबला निर्माण के लिए मशहूर है अमरोहा से ये वाद्य यंत्र पूरे देश में यहां तक कि विदेशों में भी भेजे जाते हैं अमरोहा के कुछ उद्योगों में सूत और कपड़ों, हथकरघा, मिट्टी के बर्तन बनाना और खांडसारी उद्योग Yarn and clothing, handloom, pottery making and khandsari industries शामिल हैं इसके अलावा कालीन निर्माण, लकड़ी पर नक्काशी और ढोलक निर्माण Carpet making, wood carving and dholak making भी शामिल हैं।

अमरोहा में ढोलक के कारोबार की वजह Reason for Dholak business in Amroha

अमरोहा के ढोल पूरे देश में खासे मशहूर है होली पर तो देशभर के लोग अमरोहा के ढोल की थाप पर एक साथ नाचते गाते हैं यहां का ढोल सामाजिक पर्वों पर आपसी प्रेम और सद्भाव को देशभर में फैलाता है संकरी गलियों में बसा अमरोहा वैसे तो छोटे-छोटे उद्योगों को अपने में समेटे हुए है, लेकिन यहां की ढोलक की थाप बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक अपनी धाक जमाने में पीछे नहीं रही है।

आम के बाग की बहुतायत होने की वजह से अमरोहा में ढोलक कारोबार का जन्म हुआ यहां कि फैक्ट्री में बनने वाली ढोलकों की बात और उनका अंदाज बड़ा निराला है यहां पर कुछ ऐसी ढोलक बनाई जाती हैं, जो पूरे देश में कहीं नहीं मिलती यहां मुख्य रूप से ढोलक और तबला बनाने वाले हुनरमंद कारीगर काम करते हैं।

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सभी को लुभाती है ढोलक की थाप The beat of the dholak captivates everyone

ढोलक गायन और नृत्य के साथ बजाया जाने वाला एक प्रमुख वाद्य यंत्र है पुराने समय में ढोलक का प्रयोग पूजा, प्रार्थना और नृत्य गान में ही नहीं, बल्कि दुश्मनों पर प्रहार, खूंखार जानवरों को भगाने, चेतावनी देने के लिए भी किया जाता था पहले के समय में जातीय संगीत मंडली, डांस, जश्न और श्रम प्रतियोगिता में ताल और उत्साहपूर्ण माहौल बनाने के लिए ढोल का सहारा लिया जाता है।

बड़े, बूढ़े और बच्चे कोई भी हो ढोलक की थाप सुनते ही सभी के पैर थिरकने लगते हैं ढोलक की आवाज माहौल में एक नई ऊर्जा का संचार करता है इसकी थाप पर डांस करने के लिए नृत्य कला में पारंगत होने की जरूरत नहीं होती तभी तो हर किसी के मन को लुभाता है इसका शोर ।

ढोलक बिना हर जश्न है अधूरा Every celebration is incomplete without Dholak

हिंदू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से गहरा नाता रहा है इस सनातन धर्म करे मुताबिक, ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है भारत में गीत संगीत की परंपरा अनंतकाल से रही है हमारे वेदों, पुराणों और इतिहास में इसके प्रमाण भी मिलते हैं चार वेदों में से एक सामवेद में गेय वैदिक ऋचाओं का संग्रह है।

वहीं, हिंदुस्तान में शादी हो या फिर कोई तीज-त्योहार बिना ढोलक की थाप के पूरा नहीं होता है यह भी कहा जा सकता है कि खुशियों में जब तक ढोलक की थाप सुनाई नहीं दे, तब तक यह खुशी अधूरी सी रहती है कई जगह तो ऐसा भी होता है कि गांवों में एक घर में ढोलक होती है और वह पूरे गांव के लोगों के काम आती है। 

ढोलक निर्माण Dholak making

ढोलक एक ऐसावाद्य यन्त्र  है, जो लगभग सभी के घरों में मिल ही जाता है । पुराने समय में तो ढोलक रखना समाज में आपको संगीत प्रेमी और अमीरी की नज़र से देखा जाता था। परन्तु जैसे-जैसे सामज मॉर्डन होता चला गया, लोगों में इसके प्रति उत्साह कम हो गया है। पर कहते हैं न सब कुछ यूँ भी खत्म नहीं हो जाता, जहाँ बहुत से लोग किसी चीज को खत्म करने में लगे होते हैं वहीँ बहुत से लोग उन चीजों को जिन्दा रखने में लगे होते हैं। बाकी परिणाम तो समाज के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। 

ढोलक दो सिर वाला हाथ का ढोल है, जो एक लोक ताल वाद्य है। यंत्र की लंबाई लगभग 45 सेमी और चौड़ाई 27 सेमी है और व्यापक रूप से छोटे-छोटे मोहल्ला कार्यक्रम ,कव्वाली, कीर्तन, लावणी और भांगड़ा में उपयोग किया जाता है। इसके लिए बकरी की खाल की आवयश्कता पड़ती है जबकि बड़ा ड्रमहेड कम पिच के लिए भैंस की खाल से बना होता है। ढोलक का शरीर या खोल शीशम या आम की लकड़ी से बना होता है। बड़ी झिल्ली, जिसे छड़ी से बजाया जाता है, में एक यौगिक (स्याही) लगाया जाता है, जो पिच को कम करने और ध्वनि उत्पन्न करने में मदद करता है। छोटे ड्रमहेड Small Drumhead को बाएं हाथ से बजाया जाता है, जो एक उच्च पिच पैदा करता है। बजाते  समय तनाव मुक्त करने के लिए एक कपास की रस्सी की लेस और स्क्रू-टर्नबकल Screw-Turnbuckle का उपयोग किया जाता है। बारीक ट्यूनिंग प्राप्त करने के लिए स्टील के छल्ले या खूंटे को लेस के अंदर घुमाया जाता है। ढोलक को तीन तरह से बजाय जा सकता है - वादक  की गोद में, खड़े होकर, या फर्श पर बैठते समय एक घुटने से दबा कर।

ऐसे बनाई जाती है ढोलक This is how dholak is made

ढोलक आम, शीशम, सागौन या नीम की लकड़ी से बनाई जाती है एक ढोलक को बनाने में 5 से 6 दिन का समय लगता है इसकी शुरुआत लकड़ी की कटाई से होती है कटाई के बाद उसकी छिलाई की जाती है छिलाई के बाद मशीन में डालकर, उसकी सतह को समतल किया जाता है इसके बाद ढोलक को पोला करके उसे संपूर्ण ढांचे का रूप दिया जाता है लकड़ी के दोनों खोखले सिरों पर बकरे की खाल Goat skin डोरियों से कसी जाती है इस डोरी में छल्ले रहते हैं, जो ढोलक का स्वर मिलाने में काम आते हैं।

ढांचे में डालने के बाद इसके रंगाई-पुताई Paintwork से लेकर सुर-ताल के लिए फाइनल टच दिया जाता है सूत की रस्सी Cotton Rope के के जरिए इसको खींचकर कसा जाता है हाांकि, अब वक्त के साथ धीरे-धीरे ढोलक का स्वरूप बदल रहा है, अब सूत की रस्सियों की जगह नट-बोल्ट लगी ढोलक भी खूब बिकती है पेशेवर ढोलक वादक आज भी ज्यादातर डोरियों वाली ढोलक का ही इस्तेमाल करते हैं उनके अनुसार, जो संगीत रस्सी वाली ढोलक Rope Dholak में आता है, वो नट-बोल्ट वाली ढोलक Nut-Bolt Dholak से नहीं आता है

कई देशों में है अमरोहा की ढोलक की मांग Amroha's dholak is in demand in many countries

गांवों में फाग नृत्यों में इनका खासतौर पर उपयोग होता है अमरोहा की ढोलक की मांग दूर-दूर तक है हर साल अमरोहा में करीब 50 करोड़ का कारोबार ढोलक से होता है जानकारी के मुताबिक अमरोहा से हर साल करीब 6 करोड़ रुपये की ढोलक का निर्यात होता है यहां की ढोलक की मांग कई देशों में है. इस जिले में ढोलक बनाने की छोटी-बड़ी 300 से अधिक यूनिट हुआ करती थी, जो अब घटकर 200 रह गई हैं यहां करीब 10 हजार लोग इस कारोबार से जुड़े हैं।

होली के समय देशभर में होती है ज्यादा डिमांड There is more demand across the country during Holi

होली के रंग में सराबोर होकर देशभर के लोग यहां के ढोल की थाप पर एकसाथ नाचते गाते हैं यही वजह है कि होली से पहले लगभग सभी राज्यों से ढोल की डिमांड बढ़ जाती है होली से दो ढाई माह पहले से ही देशभर के व्यापारी बड़े आर्डर देकर ढोल तैयार कराते हैं होली के रंग में रंगने से पहले तक यहां के कारोबारी देशभर में ढोल की आपूर्ति करने में लगे रहते हैं छोटी ढोलक तो अब विदेशों तक पहुंच रही है लेकिन, भांगड़ा के काम आने वाला बड़ा ढोल देश के अधिकांश राज्यों में इस्तेमाल हो रहा है।

होली का त्योहार Festival Of Holi नजदीक आते ही ढोल कारोबारियों को फुर्सत नहीं मिलती सालभर लकड़ी का अन्य काम करने वाले कारोबारी इस समय दोगुनी मेहनत के साथ ढोल तैयार करते हैं, क्योंकि पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल और जम्मू कश्मीर Punjab, Delhi, Haryana, Madhya Pradesh, Gujarat, Maharashtra, Bengal and Jammu and Kashmir तक अमरोहा का ढोल पहुंचता है धीमी गति की ध्वनि के लिए अलग ढोल तैयार किया जाता है, तो भांगड़ा के लिए अलग वहीं, ढोल कारोबारी डीजे के बढ़ते प्रचलन से आहत हैं डीजे हमारी संस्कृति से लोगों को दूर कर रहा है, लेकिन फोक डांस के शौकीन आज भी ढोल ही पसंद करते हैं।

कई विपरित परिस्थियों की मार झेल चुका है यह कारोबार This business has been hit by many circumstances

पेड़ों की कटाई पर रोक और आम-शीशम की लकड़ी के महंगे होने से ढोलक उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गया शीशम और आम की लकड़ी पर प्रतिबंध की वजह से पूर्वांचल के सैकड़ों ढोलक कारखाने बंद हो चुके हैं पहले ढोलक कारोबारियों के लिए सरकार की ओर से लकड़ी का कोटा निर्धारित था, जिससे कोई परेशानी नहीं होती थी बाद में लकड़ी का कोटा भी खत्म कर दिया गया 

यह मुमकिन हुआ है पोपलर की लकड़ी के कारण यहां हर दिन करीब 100 क्विंटल पोपलर की लकड़ी Quintal Poplar Wood से ढोलक और दूसरे वाद्य यंत्र तैयार होते हैं एक क्विंटल लकड़ी से करीब 1.25 लाख रुपये की कीमत की ढोलक, ढोल, तबला, बैंजो, चमेली, कांगो, चांगो, डमरू, खंजरी, मारवाज और मुगलिया ड्रम Dhol, Tabla, Banjo, Jasmine, Congo, Chango, Damru, Khanjri, Marwaz and Mughaliya Drums तैयार होते हैं।

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फिर लौट रही इस कारोबार की रौनक The beauty of this business is returning again

पोपलर का विकल्प मिलने के बाद कारखाने अब धीरे-धीरे फिर खुलने लग गए हैं अब हालात तेजी से सुधर रहे हैं पोपलर पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लिहाजा यह आसानी से उपलब्ध हो जाती है किसान भी बड़ी मात्रा में पोपलर के पेड़ तैयार कर रहे हैं इससे कई तरह के फायदे हुए हैं जैसे कि कारखानों से जुड़े लोगों को लकड़ी मिल रही है किसान भी लाभ कमा रहे हैं और पर्यावरण संरक्षण Environment protection भी हो रहा है पोपलर से ढोलक और दूसरे वाद्य यंत्र बनाए जा रहे हैं।

अमरोहा और उसके आसपास के क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में यह उपलब्ध है इसकी कीमत शीशम और आम की लकड़ी से आधी है यही वजह है कि अन्य जिलों के बंद कारखाने अब अमरोहा में शिफ्ट हो रहे हैं हुनरमंद कारीगर और कारोबार को मजबूती और तरक्की देने के लिए यूपी सरकार ने अमरोहा के ढोलक करोबार को एक जनपद एक उत्पाद में भी शामिल कर रखा है।

अमरोहा के नामकरण के दिलचस्प किस्से Interesting Tales Of Naming Amroha

अमरोहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सोत नदी के किनारे स्थित एक पुराना नगर है इसके इस नाम को लेकर कई किस्से कहानियां प्रचलित है अमरोहा फलों के राजा आम के बागों और मछली  के लिए मशहूर है ऐसा माना जाता है, जब जनरल शारफुद्दीन General Sharfuddin यहां आए थे, तब स्थानीय लोगों ने उनके स्वागत में उन्हें आम और रोहू मछलियां भेंट के तौर पर दी यहां मछली की एक प्रजाति रोहू बहुतायत में पाई जाती है वहीं, अमरोहा की स्थापना आज से लगभग 3 हजार साल पहले हस्तिनापुर के राजा अमरजिद अमरोहा Raja Amarjid Amroha ने की थी संभवत: उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम अमरोहा पड़ा अमरोहा को प्राचीन समय में अंबिका नगर Ambika Nagar कहा जाता था जो कि दिल्ली के राजा पृथ्वीराज की बहन अंबीरानी के नाम पर पड़ा था।