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Startup Initiative

“NOBLE CAUSE” की अनूठी पहल

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“NOBLE CAUSE” की अनूठी पहल

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Post Highlights

इस कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। शायद ही ऐसा कोई होगा जो इस महामारी की चपेट में ना आया हो। साल 2020 तो बस दर्द और कभी न भूलने वाली यादें दे गया है। कोरोना के चलते न जाने कितने लोगों ने अपना रोजगार गंवाया तो किसी ने अपनी जान। मौत का सिलसिला तो जैसे चलता ही रहा। लोगों को मरने के बाद दाह संस्कार तक नसीब नहीं हुआ। लोगों ने अपने परिजनों के शव को या तो पानी में बहाया या वायरस के डर से दफना दिया गया। ये मंज़र सुन कर ही मन दहल जाता है। तब एक शख्स ने इस परेशानी से निजात पाने के लिए कुछ ऐसा कर दिखाया जिस वजह से आज लोग उनकी सोच को सलाम कर रहे हैं।

इस कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। शायद ही ऐसा कोई होगा जो इस महामारी की चपेट में ना आया हो। साल 2020 तो बस दर्द और कभी न भूलने वाली यादें दे गया है। कोरोना के चलते न जाने कितने लोगों ने अपना रोजगार गंवाया तो किसी ने अपनी जान। मौत का सिलसिला तो जैसे चलता ही रहा। लोगों को मरने के बाद दाह संस्कार तक नसीब नहीं हुआ। लोगों ने अपने परिजनों के शव को या तो पानी में बहाया या वायरस के डर से दफना दिया गया। ये मंज़र सुन कर ही मन दहल जाता है। तब एक शख्स ने इस परेशानी से निजात पाने के लिए कुछ ऐसा कर दिखाया जिस वजह से आज लोग उनकी सोच को सलाम कर रहे हैं।

 उस शख्स का नाम है हरजिंदर सिंह चीमा। हरजिंदर सिंह मोहाली स्थित कंपनी ‘चीमा बॉयलर्स लिमिटेड‘ के चेयरमैन हैं। वह बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए ‘बॉयलर्स’ बनाते हैं।

 कोरोना महामारी के कारण, लोगों का बुरा हाल देखकर उन्हें लगा कि उन्हें समाज के लिए कुछ करना चाहिए। इसलिए उन्होंने दाह-संस्कार के लिए एक नया सिस्टम बनाने का फैसला किया। सबसे पहले उन्होंने यह समझा कि सामान्य तौर पर दाह-संस्कार के लिए जो तरीका इस्तेमाल होता है, उसमें क्या परेशानियां हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी तकनीक पर काम किया। वह कहते हैं कि इस काम के लिए उन्हें आईआईटी रोपड़ से पूरी मदद मिली।

72 वर्षीय हरजिंदर सिंह ने दाह-संस्कार के लिए जो शवदाह गृह बनाया है, उसे उन्होंने “NOBLE CAUSE” नाम दिया। इसके लिए उन्हें तकनीकी सहायता आईआईटी रोपड़ से मिली। हरजिंदर सिंह बताते हैं, “सबसे पहले हमने तय किया कि हम ऐसा सिस्टम बनाएंगे, जो इको-फ्रेंडली हो और जिसे जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सके। इस शवदाह गृह को बनाने की प्रेरणा हमें ‘विक स्टोव‘ से मिली है, जो धुआंरहित होती है। हमने शवदाह गृह बनाने के लिए ‘स्टेनलेस स्टील’ का इस्तेमाल किया है और इसे इस तरह से बनाया गया है कि इसमें कम समय में ही दाह-संस्कार हो जाए।”

उन्होंने अप्रैल 2021 से इस तकनीक पर काम शुरू किया था और आईआईटी रोपड़ की मदद से, मई 2021 तक काम पूरा कर लिया।

“NOBLE CAUSE”, एक कार्ट के आकार का शवदाह गृह है, जिसमें पहिए लगे हैं। इसे जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सकता है। आईआईटी रोपड़ के प्रोफेसर, डॉ. हरप्रीत सिंह बताते हैं, “इस में शव को जलने में कम समय लगता है। साथ ही, सामान्य से काफी कम लकड़ियों की जरूरत होती है, क्योंकि इसमें दोनों तरफ लगी स्टील की प्लेट हीट लॉस नहीं होने देती हैं। इसमें नीचे की तरफ एक ट्रे भी लगी हुई है, जिसमें राख इकट्ठी होती है।”

हरजिंदर सिंह कहते हैं कि अभी भी लोग इलेक्ट्रिक शवदाह गृह इस्तेमाल करने में हिचकिचाते हैं। ऐसे में, “NOBLE CAUSE” उनकी परेशानी दूर कर सकती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। “इसे रोटरी क्लब, मंदिरों, गुरुद्वारों आदि द्वारा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। जहाँ भी जगह की कमी हो, वहां पर इसकी मदद से अपनों को अंतिम विदाई दी जा सकती है,” उन्होंने कहा।

इस तकनीक के तैयार होने के बाद, सबसे पहले एक शवदाह गृह मोहाली के श्मशान घाट में लगाया गया। यहां पर इस शवदाह गृह को अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। श्मशान घाट के सेवादार कहते हैं कि उन्हें चीमा बायलर कंपनी ने दाह-संस्कार के लिए यह शवदाह गृह दिया। लेकिन इस्तेमाल के बाद पता चला कि यह सामान्य तरीके से काफी बेहतर है। कोरोना काल में इतने सारे दाह-संस्कार हो रहे थे कि प्रदूषण भी बढ़ने लगा था। लेकिन इसमें दाह संस्कार करने पर लकड़ी पूरे तरीके से जलती है और धुंआ कम से कम निकलता है। साथ ही, सामान्य तरीके से दाह-संस्कार करने में लगभग चार क्विंटल लकड़ियां लगती हैं, लेकिन इसमें ढाई क्विंटल में ही काम हो जाता है।

सामान्य तरीके से दाह-संस्कार पूरा होने में लगभग छह घंटे लगते हैं। लेकिन इसमें तीन-चार घंटों में ही प्रक्रिया हो जाती है। स्वर्गवासी व्यक्ति के परिवारजन चाहें, तो उसी दिन आकर फूल चुन सकते हैं और राख ले जा सकते हैं। कोरोना महामारी के समय में यह इनोवेशन बहुत ही कारगर है। क्योंकि लोगों को शव का अंतिम संस्कार करने तक के लिए जगह नहीं मिल रही है। ऐसे में, आप कहीं भी खुली जगह में “NOBLE CAUSE” को लगाकर सम्मानपूर्वक अपनों को विदाई दे सकते हैं।

हरजिंदर सिंह जी की पहल हमारे समाज के लिए एक उदाहरण है। अगर आप इस उम्मीद में बैठे हैं कि एक दिन कोई चमत्कार होगा तो आपको बता दें कि वो चमत्कार हम लोगों की सोच से ही होगा। अगर आप के पास भी कोई ऐसी सोच है, जो समाज को और पर्यावरण को बेहतर बना सकती है तो उसे बस खुद तक ही सीमित न रखें।

अगर आप के पास भी कोई ऐसी सोच है, जो समाज को और पर्यावरण को बेहतर बना सकती है तो उसे बस खुद तक ही सीमित न रखें, हम तक पहुंचाएं। 

इस कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। शायद ही ऐसा कोई होगा जो इस महामारी की चपेट में ना आया हो। साल 2020 तो बस दर्द और कभी न भूलने वाली यादें दे गया है। कोरोना के चलते न जाने कितने लोगों ने अपना रोजगार गंवाया तो किसी ने अपनी जान। मौत का सिलसिला तो जैसे चलता ही रहा। लोगों को मरने के बाद दाह संस्कार तक नसीब नहीं हुआ। लोगों ने अपने परिजनों के शव को या तो पानी में बहाया या वायरस के डर से दफना दिया गया। ये मंज़र सुन कर ही मन दहल जाता है। तब एक शख्स ने इस परेशानी से निजात पाने के लिए कुछ ऐसा कर दिखाया जिस वजह से आज लोग उनकी सोच को सलाम कर रहे हैं।

 उस शख्स का नाम है हरजिंदर सिंह चीमा। हरजिंदर सिंह मोहाली स्थित कंपनी ‘चीमा बॉयलर्स लिमिटेड‘ के चेयरमैन हैं। वह बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए ‘बॉयलर्स’ बनाते हैं।

 कोरोना महामारी के कारण, लोगों का बुरा हाल देखकर उन्हें लगा कि उन्हें समाज के लिए कुछ करना चाहिए। इसलिए उन्होंने दाह-संस्कार के लिए एक नया सिस्टम बनाने का फैसला किया। सबसे पहले उन्होंने यह समझा कि सामान्य तौर पर दाह-संस्कार के लिए जो तरीका इस्तेमाल होता है, उसमें क्या परेशानियां हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी तकनीक पर काम किया। वह कहते हैं कि इस काम के लिए उन्हें आईआईटी रोपड़ से पूरी मदद मिली।

72 वर्षीय हरजिंदर सिंह ने दाह-संस्कार के लिए जो शवदाह गृह बनाया है, उसे उन्होंने “NOBLE CAUSE” नाम दिया। इसके लिए उन्हें तकनीकी सहायता आईआईटी रोपड़ से मिली। हरजिंदर सिंह बताते हैं, “सबसे पहले हमने तय किया कि हम ऐसा सिस्टम बनाएंगे, जो इको-फ्रेंडली हो और जिसे जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सके। इस शवदाह गृह को बनाने की प्रेरणा हमें ‘विक स्टोव‘ से मिली है, जो धुआंरहित होती है। हमने शवदाह गृह बनाने के लिए ‘स्टेनलेस स्टील’ का इस्तेमाल किया है और इसे इस तरह से बनाया गया है कि इसमें कम समय में ही दाह-संस्कार हो जाए।”

उन्होंने अप्रैल 2021 से इस तकनीक पर काम शुरू किया था और आईआईटी रोपड़ की मदद से, मई 2021 तक काम पूरा कर लिया।

“NOBLE CAUSE”, एक कार्ट के आकार का शवदाह गृह है, जिसमें पहिए लगे हैं। इसे जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सकता है। आईआईटी रोपड़ के प्रोफेसर, डॉ. हरप्रीत सिंह बताते हैं, “इस में शव को जलने में कम समय लगता है। साथ ही, सामान्य से काफी कम लकड़ियों की जरूरत होती है, क्योंकि इसमें दोनों तरफ लगी स्टील की प्लेट हीट लॉस नहीं होने देती हैं। इसमें नीचे की तरफ एक ट्रे भी लगी हुई है, जिसमें राख इकट्ठी होती है।”

हरजिंदर सिंह कहते हैं कि अभी भी लोग इलेक्ट्रिक शवदाह गृह इस्तेमाल करने में हिचकिचाते हैं। ऐसे में, “NOBLE CAUSE” उनकी परेशानी दूर कर सकती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। “इसे रोटरी क्लब, मंदिरों, गुरुद्वारों आदि द्वारा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। जहाँ भी जगह की कमी हो, वहां पर इसकी मदद से अपनों को अंतिम विदाई दी जा सकती है,” उन्होंने कहा।

इस तकनीक के तैयार होने के बाद, सबसे पहले एक शवदाह गृह मोहाली के श्मशान घाट में लगाया गया। यहां पर इस शवदाह गृह को अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। श्मशान घाट के सेवादार कहते हैं कि उन्हें चीमा बायलर कंपनी ने दाह-संस्कार के लिए यह शवदाह गृह दिया। लेकिन इस्तेमाल के बाद पता चला कि यह सामान्य तरीके से काफी बेहतर है। कोरोना काल में इतने सारे दाह-संस्कार हो रहे थे कि प्रदूषण भी बढ़ने लगा था। लेकिन इसमें दाह संस्कार करने पर लकड़ी पूरे तरीके से जलती है और धुंआ कम से कम निकलता है। साथ ही, सामान्य तरीके से दाह-संस्कार करने में लगभग चार क्विंटल लकड़ियां लगती हैं, लेकिन इसमें ढाई क्विंटल में ही काम हो जाता है।

सामान्य तरीके से दाह-संस्कार पूरा होने में लगभग छह घंटे लगते हैं। लेकिन इसमें तीन-चार घंटों में ही प्रक्रिया हो जाती है। स्वर्गवासी व्यक्ति के परिवारजन चाहें, तो उसी दिन आकर फूल चुन सकते हैं और राख ले जा सकते हैं। कोरोना महामारी के समय में यह इनोवेशन बहुत ही कारगर है। क्योंकि लोगों को शव का अंतिम संस्कार करने तक के लिए जगह नहीं मिल रही है। ऐसे में, आप कहीं भी खुली जगह में “NOBLE CAUSE” को लगाकर सम्मानपूर्वक अपनों को विदाई दे सकते हैं।

हरजिंदर सिंह जी की पहल हमारे समाज के लिए एक उदाहरण है। अगर आप इस उम्मीद में बैठे हैं कि एक दिन कोई चमत्कार होगा तो आपको बता दें कि वो चमत्कार हम लोगों की सोच से ही होगा। अगर आप के पास भी कोई ऐसी सोच है, जो समाज को और पर्यावरण को बेहतर बना सकती है तो उसे बस खुद तक ही सीमित न रखें।

अगर आप के पास भी कोई ऐसी सोच है, जो समाज को और पर्यावरण को बेहतर बना सकती है तो उसे बस खुद तक ही सीमित न रखें, हम तक पहुंचाएं। 




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