मेक इन इंडिया 2026: भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की पूरी कहानी

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मेक इन इंडिया 2026: भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की पूरी कहानी
29 Sep 2026
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मेक इन इंडिया की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को हुई थी। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन के क्षेत्र में दुनिया का एक प्रमुख केंद्र बनाना था। आज, अपनी शुरुआत के 12 साल बाद, मेक इन इंडिया भारत के औद्योगिक और विनिर्माण विकास की एक महत्वपूर्ण पहल बन चुका है।

समय के साथ मेक इन इंडिया का दायरा केवल भारत में सामान बनाने तक सीमित नहीं रहा। अब इसका ध्यान देश में ज्यादा से ज्यादा वैल्यू जोड़ने, नई तकनीक विकसित करने, मजबूत सप्लाई चेन तैयार करने, बेहतर औद्योगिक बुनियादी ढांचा बनाने, निर्यात बढ़ाने और युवाओं को जरूरी कौशल देने पर भी है। इसका उद्देश्य ऐसी औद्योगिक क्षमता तैयार करना है, जो लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था और विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बना सके।

वर्तमान में मेक इन इंडिया के तहत 27 क्षेत्र शामिल हैं। इनमें 15 विनिर्माण क्षेत्र और 12 सेवा क्षेत्र हैं। सरकार ने विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई अन्य योजनाओं और कार्यक्रमों को भी इससे जोड़ा है। इनमें प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना, पीएम गतिशक्ति, नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम और इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक जैसी पहल शामिल हैं।

इन योजनाओं का उद्देश्य कंपनियों के लिए भारत में उत्पादन करना आसान बनाना और देश में एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना है।

मेक इन इंडिया के प्रभाव को कई प्रमुख उद्योगों में देखा जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन निर्माण के साथ-साथ ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल्स, स्टील, रक्षा उपकरण और रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़े उत्पादों के उत्पादन में भी महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है।

भारत अब केवल पारंपरिक विनिर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहता। देश सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, एडवांस्ड मैटेरियल्स और विशेष मशीनरी जैसे तकनीकी रूप से उन्नत क्षेत्रों में भी अपनी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। इससे भारत के लिए न केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका मजबूत करने के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

मेक इन इंडिया: भारत के विनिर्माण क्षेत्र का स्वरूप कैसे बदल रहा है Make in India: How the landscape of India's manufacturing sector is changing.

मेक इन इंडिया का दायरा सिर्फ ज्यादा उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं रहा। Make in India Has Evolved Beyond Manufacturing More Products

शुरुआत में मेक इन इंडिया Make in India का मुख्य उद्देश्य देश में निवेश आकर्षित करना और कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना था। लेकिन पिछले 12 वर्षों में इस पहल का दायरा काफी बढ़ गया है। अब इसका उद्देश्य केवल ज्यादा उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि देश में एक मजबूत और पूरी तरह विकसित मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना भी है।

आज भारत का जोर ऐसे एंड-टू-एंड औद्योगिक इकोसिस्टम को विकसित करने पर है, जिसमें किसी उत्पाद को तैयार करने के हर चरण में देश की भूमिका बढ़े। इसका मतलब केवल तैयार उत्पाद को असेंबल करना नहीं है। इसमें उसके कंपोनेंट्स, सब-असेंबली, मशीनरी, टूल्स और दूसरे जरूरी सामान का उत्पादन भी भारत में करना शामिल है।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब किसी उत्पाद की सप्लाई चेन के अधिक हिस्से देश के अंदर होते हैं, तो मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम ज्यादा मजबूत बनता है। इससे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में होने वाली अचानक रुकावटों का असर कम किया जा सकता है। साथ ही, देश की छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए नए कारोबार और सप्लाई के अवसर भी पैदा होते हैं।

सरकार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, संशोधित राष्ट्रीय लेखा प्रणाली के तहत 2022-23 से 2025-26 के बीच मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 10.88% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई। इसी तरह, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी IIP में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का उत्पादन अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 7% बढ़ा।

इलेक्ट्रॉनिक्स मेक इन इंडिया की बड़ी सफलता की कहानी बन गया है। Electronics Has Become a Major Make in India Success Story

भारत के बदलते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का सबसे स्पष्ट उदाहरण इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग है। पिछले एक दशक से अधिक समय में इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता और निर्यात दोनों में बड़ा विस्तार हुआ है।

2014-15 में भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन करीब ₹1.9 लाख करोड़ का था। यह आंकड़ा बढ़कर 2025-26 में लगभग ₹13.11 लाख करोड़ हो गया। यानी इस अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग सात गुना बढ़ा है।

इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2014-15 में भारत से इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात लगभग ₹38,000 करोड़ था, जो बढ़कर 2025-26 में करीब ₹4.24 लाख करोड़ हो गया।

यह बदलाव बताता है कि भारत धीरे-धीरे केवल घरेलू जरूरतों के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद बनाने वाले बाजार से आगे बढ़कर वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का हिस्सा बन रहा है।

मोबाइल फोन निर्माण में तेजी से हुआ विस्तार। Mobile-Phone Manufacturing Has Expanded Rapidly

मोबाइल फोन निर्माण ने भारत के मैन्युफैक्चरिंग बदलाव में विशेष भूमिका निभाई है। देश में मोबाइल फोन का उत्पादन 2014-15 में लगभग ₹18,000-18,900 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में करीब ₹6.27-6.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया।

आज भारत मात्रा के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग देश है। मोबाइल फोन के निर्यात में भी पिछले वर्षों में तेज वृद्धि हुई है। 2025-26 में मोबाइल फोन का निर्यात करीब ₹2.59 लाख करोड़ रहा, जबकि 2014-15 में यह लगभग ₹1,500 करोड़ था।

भारत में मोबाइल फोन का इकोसिस्टम भी पहले की तुलना में काफी मजबूत हुआ है। देश अब केवल तैयार मोबाइल फोन की असेंबली तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन के कई सब-असेंबली और कंपोनेंट्स के निर्माण पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 40 से अधिक बड़े कंपोनेंट निर्माताओं ने भारत में अपना कारोबार शुरू किया है या अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार किया है। इसके साथ ही Tier-2, Tier-3 और Tier-4 सप्लायर्स का नेटवर्क भी बढ़ रहा है। इससे बड़ी कंपनियों के साथ छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयों के लिए भी नए अवसर बन रहे हैं।

अब अगली चुनौती घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ाना है। The Next Challenge Is Greater Domestic Value Addition

इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में तेजी का यह मतलब नहीं है कि हर कंपोनेंट अभी भारत में ही बनाया जा रहा है। सरकारी और उद्योग से जुड़े अनुमान बताते हैं कि वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू वैल्यू एडिशन लगभग 18-20% है।

इसलिए मैन्युफैक्चरिंग के अगले चरण में भारत के लिए घरेलू उत्पादन को और गहरा करना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, सेमीकंडक्टर्स, जरूरी मैटेरियल्स, मशीनरी और अन्य औद्योगिक इनपुट का देश में उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।

इसी दिशा में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट निर्माण योजना Electronics Components Manufacturing Scheme और सेमीकंडक्टर से जुड़े कार्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। इन पहलों का उद्देश्य केवल तैयार इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की असेंबली बढ़ाना नहीं है, बल्कि पूरी मैन्युफैक्चरिंग चेन को भारत में मजबूत बनाना है।

ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में कई क्षेत्रों में हो रहा है विस्तार। Automobile Manufacturing Is Expanding Across Multiple Segments

ऑटोमोबाइल उद्योग भारत की मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण आधार है। देश में वाहनों के उत्पादन के साथ-साथ ऑटो कंपोनेंट्स का एक बड़ा घरेलू इकोसिस्टम भी विकसित हुआ है।

भारत ने 2024-25 में लगभग 3.103 करोड़ वाहनों का उत्पादन किया। यह संख्या 2014-15 की तुलना में करीब 33% अधिक है।

अगर 2020-21 से तुलना करें, तो पैसेंजर व्हीकल और कमर्शियल व्हीकल उत्पादन में लगभग 65% की वृद्धि हुई। इसी अवधि में थ्री-व्हीलर उत्पादन 71% और टू-व्हीलर उत्पादन 30% बढ़ा।

भारत में ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है। यह नेटवर्क पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भी महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहा है।

इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग ने ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। सरकार की नीतियों में अब इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी, बैटरी, मोटर और अन्य जरूरी कंपोनेंट्स के निर्माण पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए लागू PLI योजना के तहत मार्च 2026 तक ₹44,326 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ था, सरकारी आंकड़ों के अनुसार।

इससे स्पष्ट है कि भारत में ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य केवल ज्यादा वाहन बनाने तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, मोटर, एडवांस्ड कंपोनेंट्स और नई ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी भी इस क्षेत्र की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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फार्मास्युटिकल्स और मेडिकल डिवाइसेज भारत के औद्योगिक आधार को मजबूत कर रहे हैं। Pharmaceuticals and Medical Devices Strengthen India's Industrial Base

भारत का फार्मास्युटिकल्स सेक्टर लंबे समय से देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था और निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। दवाओं के उत्पादन में भारत की मजबूत स्थिति ने इस क्षेत्र को देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का एक प्रमुख आधार बनाया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भारत के फार्मास्युटिकल्स सेक्टर का वार्षिक टर्नओवर करीब ₹5.08 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसी अवधि में फार्मास्युटिकल्स का निर्यात लगभग ₹2.63 लाख करोड़ रहा।

भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता अब केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। मेडिकल डिवाइसेज का घरेलू उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में मेडिकल डिवाइसेज का उत्पादन 2019-20 में करीब ₹28,000 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में लगभग ₹41,500 करोड़ हो गया।

मेडिकल डिवाइसेज का निर्माण एक तकनीकी रूप से जटिल क्षेत्र है। इसमें इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैटेरियल्स, सटीक मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी कंट्रोल जैसी कई क्षमताओं की जरूरत होती है। इसलिए इस क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ने से केवल मेडिकल उपकरणों का बाजार ही मजबूत नहीं होता, बल्कि देश में कई तरह की तकनीकी और औद्योगिक क्षमताएं भी विकसित होती हैं।

इससे भारत को ऐसे औद्योगिक इकोसिस्टम को विकसित करने में मदद मिल सकती है, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियां, सप्लायर्स और तकनीकी संस्थान एक-दूसरे से जुड़कर काम कर सकें।

स्टील और रक्षा क्षेत्र रणनीतिक मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती ताकत दिखाते हैं। Steel and Defence Show the Growth of Strategic Manufacturing

स्टील उद्योग भारत के औद्योगिक विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है। देश में स्टील उत्पादन क्षमता में पिछले वर्षों के दौरान काफी विस्तार हुआ है।

भारत का क्रूड स्टील उत्पादन 2014-15 में 81.7 मिलियन टन था। यह बढ़कर 2025-26 में 170 मिलियन टन हो गया। स्टील की बढ़ती उत्पादन क्षमता का असर कई दूसरे उद्योगों पर भी पड़ता है।

स्टील का इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर, इंजीनियरिंग और रक्षा जैसे कई क्षेत्रों में होता है। इसलिए घरेलू स्टील उत्पादन बढ़ने से देश के कई अन्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों को भी जरूरी कच्चा माल उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।

रक्षा निर्माण पर बढ़ता ध्यान। Growing Focus on Defence Manufacturing

भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग रणनीति में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। सरकार घरेलू स्तर पर रक्षा उपकरणों के उत्पादन के साथ-साथ इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाने पर भी जोर दे रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यह 2024-25 में दर्ज ₹1.54 लाख करोड़ के मुकाबले अधिक है।

रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में कुल रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 24% रही। इसी वित्त वर्ष में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया।

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का उद्देश्य केवल ज्यादा रक्षा उपकरण भारत में बनाना नहीं है। इसके साथ डिजाइन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और विशेष प्रकार के कंपोनेंट्स से जुड़ी तकनीकी क्षमताओं को विकसित करना भी महत्वपूर्ण है।

इस तरह रक्षा मैन्युफैक्चरिंग भारत के लिए एक ऐसा क्षेत्र बन रहा है, जहां उत्पादन के साथ-साथ नई तकनीक और विशेषज्ञता विकसित करने के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

असेंबली से आगे बढ़कर टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की ओर भारत। From Assembly to Technology Development

भारत की मैन्युफैक्चरिंग यात्रा में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि देश अब केवल उत्पादों की असेंबली और निर्माण क्षमता बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रहा है। इसके साथ ही देश में नई तकनीक विकसित करने और महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी पर अपनी क्षमता बनाने पर भी जोर बढ़ रहा है।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से इसका एक अच्छा उदाहरण मिलता है। ISRO और सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL), चंडीगढ़ ने अंतरिक्ष क्षेत्र में इस्तेमाल के लिए VIKRAM3201 और KALPANA3201 नाम के 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर विकसित किए हैं।

ISRO के अनुसार, VIKRAM3201 भारत में पूरी तरह विकसित पहला 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर है, जिसे लॉन्च व्हीकल के कठिन पर्यावरणीय हालात में इस्तेमाल के लिए योग्य बनाया गया है। इसका निर्माण SCL की 180nm सेमीकंडक्टर फैसिलिटी में किया गया।

यह उदाहरण भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में हो रहे एक बड़े बदलाव को दिखाता है। अब लक्ष्य केवल किसी उत्पाद को भारत में बनाना नहीं है, बल्कि इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, विशेष इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और महत्वपूर्ण तकनीकों को देश के भीतर विकसित करना भी है।

अगर ऐसी तकनीकी क्षमताएं आगे बढ़ती हैं, तो भारत के लिए हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर्स, एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी भूमिका मजबूत करने के अवसर बढ़ सकते हैं।

सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में तेज विस्तार। Solar Manufacturing Capacity Has Expanded Sharply

रिन्यूएबल एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग भी भारत के औद्योगिक विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। खासतौर पर सोलर सेक्टर में उत्पादन क्षमता में पिछले एक दशक से अधिक समय में तेज वृद्धि हुई है।

भारत में सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 2014 में 2.3 GW थी। यह बढ़कर जून 2026 तक 192 GW हो गई। इसी अवधि में सोलर सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता करीब 1.2 GW से बढ़कर लगभग 30 GW हो गई।

सोलर मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार केवल भारत में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इसका संबंध सप्लाई चेन सिक्योरिटी से भी है। सोलर मॉड्यूल और सेल भारत के बढ़ते क्लीन एनर्जी सेक्टर के महत्वपूर्ण इनपुट हैं। इनका घरेलू उत्पादन बढ़ने से देश को रिन्यूएबल एनर्जी के लिए जरूरी औद्योगिक आधार मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, सोलर मैन्युफैक्चरिंग की अगली चुनौती पूरी सप्लाई चेन को और मजबूत करना है। इसके लिए अपस्ट्रीम मैटेरियल्स, सोलर सेल, विशेष मशीनरी और अन्य जरूरी कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

इससे भारत केवल सोलर मॉड्यूल बनाने वाला देश नहीं, बल्कि रिन्यूएबल एनर्जी की पूरी मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन में अपनी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजनाएं औद्योगिक विस्तार को बढ़ावा दे रही हैं। Production Linked Incentive Schemes Are Supporting Industrial Expansion

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना मेक इन इंडिया को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख सरकारी पहलों में से एक बन गई है। इसका उद्देश्य कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने और नई मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

PLI योजना के तहत 14 अलग-अलग सेक्टर शामिल हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स, ऑटोमोबाइल, सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल, स्पेशलिटी स्टील और टेक्सटाइल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं।

इस योजना में कंपनियों को उनके उत्पादन और निवेश से जुड़े निर्धारित लक्ष्यों के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो कंपनियां भारत में जितना निर्धारित अतिरिक्त उत्पादन और संबंधित प्रदर्शन हासिल करती हैं, उन्हें उसी के आधार पर इंसेंटिव मिल सकता है। इससे कंपनियों को देश में नई फैक्ट्रियां लगाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और मैन्युफैक्चरिंग में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 तक PLI योजनाओं के तहत करीब ₹2.6 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ था। इन योजनाओं से लगभग ₹23.8 लाख करोड़ का उत्पादन और बिक्री हुई। इसी अवधि में ₹15.5 लाख करोड़ से अधिक का निर्यात दर्ज किया गया और करीब 14.6 लाख नौकरियों को समर्थन मिला।

ये आंकड़े PLI योजना से जुड़े निवेश और उत्पादन के बड़े स्तर को दिखाते हैं। हालांकि, लंबे समय में इस योजना की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इससे जुड़े उद्योग कितनी मजबूत और टिकाऊ मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित कर पाते हैं। इसके साथ घरेलू सप्लायर्स, तकनीक, कुशल श्रम और निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना भी जरूरी होगा।

रणनीतिक मैन्युफैक्चरिंग अब नए क्षेत्रों में पहुंच रही है। Strategic Manufacturing Is Moving Into New Areas

भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति अब ऐसे क्षेत्रों तक भी पहुंच रही है, जिन्हें भविष्य की औद्योगिक मजबूती और सप्लाई चेन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

सरकार की विभिन्न पहलों में अब सेमीकंडक्टर्स, रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, स्पेशलिटी स्टील और इंडस्ट्रियल पार्क्स जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

रेयर-अर्थ मैग्नेट्स का बढ़ता महत्व। Growing Importance of Rare-Earth Magnets

रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स आधुनिक तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के लिए महत्वपूर्ण सामग्री हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में किया जाता है।

भारत में इस क्षेत्र में तकनीकी क्षमता विकसित करने के लिए मार्च 2026 में हैदराबाद स्थित ARCI में नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (Nd-Fe-B) परमानेंट मैग्नेट्स का एक पायलट प्लांट स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य तकनीक की जांच, उत्पादन प्रक्रिया के विकास और उद्योग के साथ सहयोग को आगे बढ़ाना है।

सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पर जोर। Focus on Semiconductor Manufacturing

सेमीकंडक्टर भी भारत की रणनीतिक मैन्युफैक्चरिंग प्राथमिकताओं में शामिल हैं। आज सेमीकंडक्टर्स का इस्तेमाल कारों, मोबाइल और टेलीकॉम उपकरणों से लेकर डिफेंस सिस्टम और औद्योगिक मशीनरी तक कई क्षेत्रों में होता है।

इसलिए भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन और इससे जुड़े इकोसिस्टम को मजबूत करने से कई अलग-अलग उद्योगों को फायदा हो सकता है। इससे देश को महत्वपूर्ण तकनीकों और जरूरी औद्योगिक सामग्रियों के लिए बाहरी सप्लाई पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

भारत की व्यापक मैन्युफैक्चरिंग रणनीति अब केवल तैयार उत्पादों का उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें ऐसी महत्वपूर्ण तकनीकों और सामग्रियों को देश में विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जिनका इस्तेमाल कई अलग-अलग उद्योगों में होता है।

मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की जरूरी नींव है। Infrastructure Is Essential to the Manufacturing Ecosystem

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को विकसित करने के लिए केवल फैक्ट्रियां बनाना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को औद्योगिक जमीन, सड़कें, बंदरगाह, बिजली, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, कुशल कर्मचारी और समय पर सरकारी मंजूरियां भी चाहिए होती हैं।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत में औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश से जुड़ी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए कई पहल की गई हैं।

इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक का विस्तार। Expansion of the India Industrial Land Bank

इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक निवेशकों को देश में उपलब्ध औद्योगिक जमीन और औद्योगिक क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 तक इस प्लेटफॉर्म पर करीब 4,220 इंडस्ट्रियल पार्क मैप किए जा चुके थे, जो लगभग 6.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे। इनमें से करीब 1.33 लाख हेक्टेयर जमीन भविष्य में औद्योगिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध थी।

इसके अलावा, लगभग 272 प्लग-एंड-प्ले इंडस्ट्रियल पार्क भी संचालन में थे। ऐसे पार्कों में कंपनियों को पहले से उपलब्ध कुछ जरूरी सुविधाओं के कारण नई औद्योगिक इकाई स्थापित करने में आसानी हो सकती है।

नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम से मंजूरियों की प्रक्रिया आसान। National Single Window System Simplifies Approvals

नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) भी भारत के कारोबारी और औद्योगिक इकोसिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य निवेशकों को अलग-अलग सरकारी विभागों से मिलने वाली मंजूरियों की जानकारी और आवेदन प्रक्रिया को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध कराना है।

नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, NSWS के जरिए 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 327 से अधिक केंद्रीय मंजूरियों और 3,452 राज्य स्तरीय मंजूरियों तक पहुंच उपलब्ध है।

निवेशकों के लिए औद्योगिक जमीन की जानकारी आसानी से उपलब्ध होना और अलग-अलग मंजूरियों की प्रक्रिया को सरल बनाना नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने में आने वाली कुछ प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक चुनौतियों को कम कर सकता है।

इस तरह PLI योजनाएं, रणनीतिक तकनीकों पर ध्यान, औद्योगिक जमीन और डिजिटल मंजूरी व्यवस्था मिलकर भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को अधिक संगठित और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में योगदान दे रही हैं।

पीएम गतिशक्ति और बेहतर सप्लाई चेन कनेक्टिविटी। PM GatiShakti and Supply-Chain Connectivity

मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धा में लॉजिस्टिक्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। Manufacturing Competitiveness Is Closely Connected With Logistics

भारत में मैन्युफैक्चरिंग को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केवल फैक्ट्री और उत्पादन क्षमता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। लॉजिस्टिक्स और बेहतर कनेक्टिविटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। अगर किसी फैक्ट्री से सामान को बंदरगाह, गोदाम, बाजार या दूसरे राज्यों तक पहुंचाने में ज्यादा समय और खर्च लगे, तो इससे कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पीएम गतिशक्ति को शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग परिवहन और इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क की योजना के बीच बेहतर तालमेल बनाना है। इसके तहत सड़क, रेलवे, बंदरगाह, एयरपोर्ट और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी योजनाओं को एकीकृत तरीके से देखने पर जोर दिया जाता है।

फैक्ट्रियों को बंदरगाहों, वेयरहाउस, हाईवे, रेलवे और प्रमुख बाजारों से बेहतर तरीके से जोड़ने से सामान की आवाजाही आसान हो सकती है। इससे लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कुछ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनने वाली कंपनियों के लिए केवल उत्पादन लागत कम होना ही महत्वपूर्ण नहीं है। समय पर डिलीवरी, परिवहन की विश्वसनीयता और सप्लाई की निरंतरता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति में अब औद्योगिक नीतियों के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स के विकास को भी महत्व दिया जा रहा है।

कौशल विकास और रोजगार का बढ़ता महत्व। The Importance of Skills and Employment

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के विस्तार के साथ अलग-अलग स्तर के तकनीकी कौशल वाले कर्मचारियों की मांग भी बढ़ती है। आधुनिक उत्पादन इकाइयों में केवल सामान्य श्रमिकों की जरूरत नहीं होती। कई कामों के लिए विशेष तकनीकी ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

2026 की सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर देश की GDP में लगभग 16-17% योगदान देता है और 2.7 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है।

मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार का स्वरूप भी धीरे-धीरे बदल रहा है। आधुनिक फैक्ट्रियों में टेक्नीशियन, इंजीनियर, क्वालिटी-कंट्रोल विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स, मशीन ऑपरेटर, सप्लाई-चेन विशेषज्ञ और मेंटेनेंस कर्मचारी जैसे कई प्रकार के कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है।

इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इसका एक उदाहरण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम करीब 25 लाख नौकरियों को समर्थन देता है। इनमें से लगभग 12 लाख रोजगार मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े हैं।

जैसे-जैसे फैक्ट्रियों में ऑटोमेशन, डिजिटल सिस्टम और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे ऐसे कर्मचारियों की जरूरत भी बढ़ेगी, जो इन तकनीकों को समझकर प्रभावी तरीके से चला सकें। इसलिए भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्य को पूरा करने के लिए स्किल डेवलपमेंट और तकनीकी प्रशिक्षण महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

“मेड इन इंडिया” से “भारत में डिजाइन और विकास” की ओर बढ़ता कदम। From “Made in India” to “Designed and Developed in India”

मेक इन इंडिया से जुड़े लंबे समय के बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है सिर्फ असेंबली से आगे बढ़कर घरेलू तकनीकी और औद्योगिक क्षमता विकसित करना।

किसी तैयार उत्पाद को भारत में बनाना मैन्युफैक्चरिंग का एक चरण है। लेकिन अगर उसी उत्पाद के कंपोनेंट्स भी देश में बनाए जाएं, उसकी तकनीक भारत में विकसित हो, उत्पाद का डिजाइन देश में तैयार किया जाए, उसे बनाने वाली मशीनरी का निर्माण भी भारत में हो और स्थानीय सप्लायर्स का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाए, तो यह औद्योगिकीकरण के ज्यादा गहरे स्तर को दर्शाता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में यह बदलाव विशेष रूप से देखा जा सकता है। भारत ने शुरुआत में तैयार इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण और असेंबली पर जोर दिया। अब देश सब-असेंबली, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, मैटेरियल्स, टूल्स और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों का घरेलू निर्माण बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसी तरह के बदलाव ऑटोमोबाइल, रक्षा, रिन्यूएबल एनर्जी, फार्मास्युटिकल्स और एडवांस्ड इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहे हैं।

इस बदलाव का व्यापक उद्देश्य भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को केवल उत्पादन की मात्रा तक सीमित न रखना, बल्कि तकनीक, डिजाइन, इंजीनियरिंग, कंपोनेंट निर्माण और सप्लाई चेन में देश की घरेलू क्षमता को मजबूत करना है। इससे भारत के लिए वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में अधिक व्यापक भूमिका निभाने के अवसर बन सकते हैं।

अगली पारी को तय करने वाली प्रमुख चुनौतियां। Challenges That Will Shape the Next Phase

पिछले 12 वर्षों में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने काफी प्रगति की है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि देश की औद्योगिक यात्रा पूरी हो गई है। आने वाले वर्षों में भारत को मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को और मजबूत बनाने के लिए लगातार कई क्षेत्रों में सुधार करना होगा।

इनमें उत्पादकता बढ़ाना, रिसर्च और डेवलपमेंट, घरेलू वैल्यू एडिशन, कर्मचारियों के कौशल, इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक तकनीकों तक पहुंच जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में भी कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। दुनिया की कंपनियां किसी देश में उत्पादन का फैसला केवल लागत के आधार पर नहीं करतीं। उत्पाद की गुणवत्ता, तकनीक, व्यापार नीतियां, सप्लाई चेन की विश्वसनीयता और समय पर डिलीवरी जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।

मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन में MSMEs की भागीदारी बढ़ाना। Increasing MSME Participation in Manufacturing Supply Chains

भारत की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के साथ MSMEs यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की भागीदारी बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।

छोटी कंपनियां बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए कंपोनेंट्स, मशीनरी, तकनीकी सेवाएं और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध करा सकती हैं। इससे घरेलू सप्लाई चेन मजबूत हो सकती है और छोटे कारोबारों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

हालांकि, कई MSMEs को बड़े औद्योगिक नेटवर्क का हिस्सा बनने के लिए बेहतर तकनीक, वित्तीय सहायता, कुशल कर्मचारियों और बाजार तक पहुंच की जरूरत हो सकती है।

इसलिए भारत में मैन्युफैक्चरिंग को केवल असेंबली आधारित विकास से आगे ले जाने के लिए पूरे औद्योगिक इकोसिस्टम में लगातार निवेश करना जरूरी होगा।

मेक इन इंडिया भारत की वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग भूमिका को कैसे बदल सकता है। What Make in India Could Mean for India's Global Manufacturing Role

2014 के बाद भारत में मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी जो तस्वीर सामने आई है, वह केवल फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ने की कहानी नहीं है। इसके पीछे उत्पादन क्षमता, तकनीक, घरेलू सप्लाई चेन और निर्यात क्षमता को विकसित करने की व्यापक प्रक्रिया भी शामिल है।

इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में काफी तेजी आई है। ऑटोमोबाइल और फार्मास्युटिकल्स सेक्टर का भी विस्तार हुआ है। भारत का स्टील उत्पादन 2014-15 के बाद दोगुने से अधिक हो चुका है। रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। इसी तरह सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में भी तेज वृद्धि हुई है।

इसके साथ ही सरकार का ध्यान सेमीकंडक्टर, रेयर-अर्थ मैटेरियल्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और अन्य एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले क्षेत्रों पर बढ़ रहा है।

इन सभी बदलावों से संकेत मिलता है कि भारत ऐसी औद्योगिक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो एक तरफ देश के बड़े घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा कर सके और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए भी उत्पादन कर सके।

भारत में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के बढ़ने का असर वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। एक बड़ा घरेलू सप्लायर नेटवर्क, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बढ़ती उत्पादन क्षमता भारत को अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन में अपनी भागीदारी बढ़ाने के लिए आधार प्रदान कर सकती है।

निष्कर्ष: मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण। Conclusion: A Broader Manufacturing Vision

मेक इन इंडिया की शुरुआत के 12 साल बाद भारत की मैन्युफैक्चरिंग यात्रा केवल देश में ज्यादा सामान बनाने के लक्ष्य से आगे बढ़ चुकी है। अब ज्यादा जोर क्षमता विकसित करने पर है। इसमें कंपोनेंट्स और मशीनरी से लेकर तकनीक, कौशल, इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन तक कई क्षेत्र शामिल हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल्स, स्टील, रक्षा और सोलर मैन्युफैक्चरिंग के आंकड़े बताते हैं कि इन क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता का काफी विस्तार हुआ है। दूसरी ओर, सेमीकंडक्टर्स, रेयर-अर्थ मैटेरियल्स, इंडस्ट्रियल पार्क्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से जुड़ी पहल भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अगली दिशा को दिखाती हैं।

लंबे समय में मेक इन इंडिया का महत्व इस बात से तय होगा कि भारत अपनी बढ़ती उत्पादन क्षमता को कितनी मजबूती से घरेलू वैल्यू एडिशन, तकनीकी क्षमता, निर्यात और उत्पादक रोजगार में बदल पाता है।

भारत के लिए अगला चरण केवल ज्यादा उत्पाद बनाने का नहीं है। इसका लक्ष्य ऐसा औद्योगिक इकोसिस्टम तैयार करना है, जो भारत में ही उन्नत उत्पादों को डिजाइन, विकसित, निर्मित और वैश्विक बाजारों में निर्यात करने की क्षमता रखे।

यही व्यापक बदलाव आने वाले वर्षों में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की दिशा और वैश्विक भूमिका को आकार देने में महत्वपूर्ण हो सकता है।