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भारत की आजादी में 'तहरीक-ए-रेशमी रुमाल’ का योगदान

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भारत की आजादी में 'तहरीक-ए-रेशमी रुमाल’ का योगदान
05 Aug 2022
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देश की आजादी के लिए अनेक वीर सपूतों brave sons  ने अपने प्राणों की आहुति दी है। अनेक वीर ऐसे भी गुजरे हैं जो अपने तरीके से आंदोलन movement मजबूत करते रहे। देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए इस आंदोलन में जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। भारत की आजादी के इस आंदोलन में विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्था world famous Islamic educational institution दारुल उलूम देवबंद Darul Uloom Deoband के योगदान को भी कम नहीं आंका जा सकता।

यहां से शुरू हुआ 'तहरीक-ए-रेशमी रुमाल' Tehreek-e-Reshmi Rumal ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। इसके तहत रुमाल पर गुप्त संदेश secret message लिखकर इधर से उधर भेजे जाते थे, ऐसा इस लिये किया जाता था जिससे अंग्रेजी फौज English army को आंदोलन के तहत की जाने वाली गतिविधियों की खबर नहीं लग सके। ईस्ट इंडिया कंपनी East India Company के सहारे हिंदुस्तान को अपना गुलाम बनाकर हिंदुस्तानियों पर जुल्मों-सितम करने वाले अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल फेंकने के लिए जिन लोगों ने अपनी जवानी, परिवार family, जान-माल life and property न्योछावर कर दी, वे न हिंदू थे न मुसलमान और न ही सिख, वह तो बस हिंदुस्तानी थे।

जिनका आजाद हिंदुस्तान की हवाओं में सांस लेने वाला हर व्यक्ति हमेशा ऋणी रहेगा और जब-जब आजाद हिंदुस्तान की बात आएगी तब-तब उनका नाम भी जरूर जबान पर आएगा। हिंदुस्तान के उन्हीं सपूतों में से एक नाम है मौलाना महमूद हसन देवबंदी  Maulana Mahmud Hasan Deobandi जिनको शेखुल हिंद Shekhul Hind लकब से भी जाना जाता है। उन्होंने तहरीक रेशमी रुमाल शुरू कर अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए थे।

तहरीक रेशमी रुमाल शुरू कर जंग-ए-आजादी Jung-e -Azadi में अहम भूमिका निभाने वाले मौलाना महमूद हसन देवबंदी शेखुल हिंद का जन्म सन 1851 में दारुल उलूम देवबंद के संस्थापक सदस्य मौलाना जुल्फिकार अली देवबंदी  Maulana Zulfikar Ali Deobandi के यहां रायबरेली Rae Bareli में हुआ था। शेखुल हिंद की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका रही, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

दारुल उलूम देवबंद के मोहतमित अबुल कासिम नोमानी कहते हैं कि देश की आजादी में दारुल देवबंद का अहम रोल रहा है। उन्‍होंने बताया कि देश को अंग्रेजों के चंगुल व देशवासियों को अंग्रेजों के जुल्मों सितम से बचाने का दर्द दिल में लेकर 1901 में शेखुल हिंद अपने साथियों के साथ मिलकर कोशिश कर रहे थे। 

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