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Entrepreneurship Sustainability

अमरोहा और ढोलक ताल

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अमरोहा और ढोलक ताल

Amroha-and-Dholak-Taal

Post Highlights

कुछ अन्य कार्य भी व्यावसायिक तौर पर महत्वपूर्ण है, जैसे की हाथ से करघा बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना और चीनी मिलिंग शामिल हैं। द्वितीयक हैं कालीन निर्माण, लकड़ी के हस्तशिल्प और ढोलक निर्माण। अमरोहा शहर की परम्परागत कारीगरी दूर-दूर तक बहुचर्चित है, जो अमरोहा को एक अलग पहचान देती है। अमरोहा के आम और रुहा के बाद अगर कुछ है तो वह है, अमरोहा की ढोलक। अमरोहा शहर के दिल में बजते ढोलक के सुर ताल और ज़िंदादिली से आज भी चल रहा ढोलक का व्यवसाय कैसे फल फूल रहा है।  जहाँ कई और भी व्यवसाय हैं जैसे कि हाथ से करघा बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना और चीनी मिलिंग शामिल हैं। 

शायर नगरी अमरोहा, जहाँ जॉन एलिया जैसे बड़े शायर का जन्म हुआ। आज़ादी के पश्चात् कुछ ने रास्ता बदली कर ली। कहने का मतलब कुछ लोग पाकिस्तान चले गए। मुरादाबाद के नज़दीक बसा शहर अमरोहा, उत्तर पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक छोटा सा शहर है। अमरोहा शहर को इसका नाम आम यानि आम और रूहा से मिला है, जो यहाँ की एक किस्म की मछली है, जो यहाँ बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। 

यह छोटा सा शहर वास्तव में ढोलक और तबला बनाने का केंद्र है। यहाँ के ढोलक और तबला बहुत दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। कई छोटे पैमाने की निर्माण इकाइयाँ हैं, जो ढोलक और अन्य टक्कर उपकरणों का उत्पादन करती हैं। वे आम और शीशम के पेड़ों की लकड़ी का उपयोग कई आकार और आकार के खोखले ब्लॉकों को तराशने के लिए करते हैं, जिन्हें बाद में उपकरण बनाने के लिए जानवरों की खाल, ज्यादातर बकरियों की खाल से लगाया जाता है। परन्तु हमारी कोशिश ये रहनी चाहिए कि, जो जानवर अपनी ज़िन्दगी पूरी कर चुके हों, उनकी खाल का इतेमाल होना चाहिए। मगर जिस तरह पूरे देश में नॉन-वेज की खपत बढ़ी है, उसके चलते इन सब चीजों की कमी नहीं पड़ती। ये लोग अपनी इस कारीगरी को व इन उपकरणों को देश भर में वितरित करते हैं और सभी प्रमुख स्थानों पर निर्यात भी करते हैं। अमरोहा के कुछ उद्योगों में कपास और वस्त्र और सूती कपड़े का लघु उत्पादन, हाथ से करघा बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना और चीनी मिलिंग शामिल हैं। द्वितीयक हैं कालीन निर्माण, लकड़ी के हस्तशिल्प। 

जिले में परम्परागत तकनीकी से बनती आ रहीं ढोलक, लकड़ी आधारित ड्रम यंत्र (ढोलक) का उत्पादन करने वाली लगभग 300 छोटी इकाइयाँ हैं, जो 1000 से अधिक कारीगरों को रोजगार प्रदान करती हैं। ढोलक को छड़ी या हाथों से बजाया जाता है। सामाजिक विकास के कारण, इस अद्वितीय संगीत वाद्ययंत्र का दायरा विस्तृत हो गया है। इन व्यवसायों के बारे में हम एक एक कर समझते हैं। 

ढोलक निर्माण- ढोलक एक ऐसा उपकरण है, जो लगभग सभी के घरों में मिल ही जाती है। पुराने समय में तो ढोलक रखना समाज में आपको संगीत प्रेमी और अमीरी की नज़र से देखा जाता था। परन्तु जैसे-जैसे सामज मॉर्डन होता चला गया, लोगों में इसके प्रति उत्साह कम हो गया है। पर कहते हैं न सब कुछ यूँ भी खत्म नहीं हो जाता, जहाँ बहुत से लोग किसी चीज को खत्म करने में लगे होते हैं वहीँ बहुत से लोग उन चीजों को जिन्दा रखने में लगे होते हैं। बाकी परिणाम तो समाज के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। 

ढोलक दो सिर वाला हाथ का ढोल है, जो एक लोक ताल वाद्य है। यंत्र की लंबाई लगभग 45 सेमी और चौड़ाई 27 सेमी है और व्यापक रूप से छोटे-छोटे मोहल्ला कार्यक्रम ,कव्वाली, कीर्तन, लावणी और भांगड़ा में उपयोग किया जाता है। इसके लिए बकरी की खाल की आवयश्कता पड़ती है जबकि बड़ा ड्रमहेड कम पिच के लिए भैंस की खाल से बना होता है। ढोलक का शरीर या खोल शीशम या आम की लकड़ी से बना होता है। बड़ी झिल्ली, जिसे छड़ी से बजाया जाता है, में एक यौगिक (स्याही) लगाया जाता है, जो पिच को कम करने और ध्वनि उत्पन्न करने में मदद करता है। छोटे ड्रमहेड को बाएं हाथ से बजाया जाता है, जो एक उच्च पिच पैदा करता है। खेलते समय तनाव मुक्त करने के लिए एक कपास की रस्सी की लेस और स्क्रू-टर्नबकल का उपयोग किया जाता है। बारीक ट्यूनिंग प्राप्त करने के लिए स्टील के छल्ले या खूंटे को लेस के अंदर घुमाया जाता है। ढोलक को तीन तरह से खेला जा सकता है - खिलाड़ी की गोद में, खड़े होकर, या फर्श पर बैठते समय एक घुटने से दबा कर।

कपास और वस्त्र और सूती कपड़े का लघु उत्पादन- सूती कपड़े का उद्योग वैसे तो पूरे भारत में एक प्रचलित कार्य है क्योंकि यह एक ऐसा कपड़ा होता है, जो कि गर्मियों और सर्दियों दोनों ही ऋतुओं में पहन सकते हैं। कपास की खेती होती है, जिससे ये कपड़ा बनता है। अमरोहा में इस व्यवसाय की भी क़वायत आज भी है। तथा ढोलक में लगने वाली रस्सी भी कपास की ही होती है, जो ढोलक में तनाव तथा ढिलाव बनाये रखती है जिससे ढोलक अपनी मधुर ताल बरकार रख पाती हैं। 

 

शायर नगरी अमरोहा, जहाँ जॉन एलिया जैसे बड़े शायर का जन्म हुआ। आज़ादी के पश्चात् कुछ ने रास्ता बदली कर ली। कहने का मतलब कुछ लोग पाकिस्तान चले गए। मुरादाबाद के नज़दीक बसा शहर अमरोहा, उत्तर पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक छोटा सा शहर है। अमरोहा शहर को इसका नाम आम यानि आम और रूहा से मिला है, जो यहाँ की एक किस्म की मछली है, जो यहाँ बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। 

यह छोटा सा शहर वास्तव में ढोलक और तबला बनाने का केंद्र है। यहाँ के ढोलक और तबला बहुत दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। कई छोटे पैमाने की निर्माण इकाइयाँ हैं, जो ढोलक और अन्य टक्कर उपकरणों का उत्पादन करती हैं। वे आम और शीशम के पेड़ों की लकड़ी का उपयोग कई आकार और आकार के खोखले ब्लॉकों को तराशने के लिए करते हैं, जिन्हें बाद में उपकरण बनाने के लिए जानवरों की खाल, ज्यादातर बकरियों की खाल से लगाया जाता है। परन्तु हमारी कोशिश ये रहनी चाहिए कि, जो जानवर अपनी ज़िन्दगी पूरी कर चुके हों, उनकी खाल का इतेमाल होना चाहिए। मगर जिस तरह पूरे देश में नॉन-वेज की खपत बढ़ी है, उसके चलते इन सब चीजों की कमी नहीं पड़ती। ये लोग अपनी इस कारीगरी को व इन उपकरणों को देश भर में वितरित करते हैं और सभी प्रमुख स्थानों पर निर्यात भी करते हैं। अमरोहा के कुछ उद्योगों में कपास और वस्त्र और सूती कपड़े का लघु उत्पादन, हाथ से करघा बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना और चीनी मिलिंग शामिल हैं। द्वितीयक हैं कालीन निर्माण, लकड़ी के हस्तशिल्प। 

जिले में परम्परागत तकनीकी से बनती आ रहीं ढोलक, लकड़ी आधारित ड्रम यंत्र (ढोलक) का उत्पादन करने वाली लगभग 300 छोटी इकाइयाँ हैं, जो 1000 से अधिक कारीगरों को रोजगार प्रदान करती हैं। ढोलक को छड़ी या हाथों से बजाया जाता है। सामाजिक विकास के कारण, इस अद्वितीय संगीत वाद्ययंत्र का दायरा विस्तृत हो गया है। इन व्यवसायों के बारे में हम एक एक कर समझते हैं। 

ढोलक निर्माण- ढोलक एक ऐसा उपकरण है, जो लगभग सभी के घरों में मिल ही जाती है। पुराने समय में तो ढोलक रखना समाज में आपको संगीत प्रेमी और अमीरी की नज़र से देखा जाता था। परन्तु जैसे-जैसे सामज मॉर्डन होता चला गया, लोगों में इसके प्रति उत्साह कम हो गया है। पर कहते हैं न सब कुछ यूँ भी खत्म नहीं हो जाता, जहाँ बहुत से लोग किसी चीज को खत्म करने में लगे होते हैं वहीँ बहुत से लोग उन चीजों को जिन्दा रखने में लगे होते हैं। बाकी परिणाम तो समाज के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। 

ढोलक दो सिर वाला हाथ का ढोल है, जो एक लोक ताल वाद्य है। यंत्र की लंबाई लगभग 45 सेमी और चौड़ाई 27 सेमी है और व्यापक रूप से छोटे-छोटे मोहल्ला कार्यक्रम ,कव्वाली, कीर्तन, लावणी और भांगड़ा में उपयोग किया जाता है। इसके लिए बकरी की खाल की आवयश्कता पड़ती है जबकि बड़ा ड्रमहेड कम पिच के लिए भैंस की खाल से बना होता है। ढोलक का शरीर या खोल शीशम या आम की लकड़ी से बना होता है। बड़ी झिल्ली, जिसे छड़ी से बजाया जाता है, में एक यौगिक (स्याही) लगाया जाता है, जो पिच को कम करने और ध्वनि उत्पन्न करने में मदद करता है। छोटे ड्रमहेड को बाएं हाथ से बजाया जाता है, जो एक उच्च पिच पैदा करता है। खेलते समय तनाव मुक्त करने के लिए एक कपास की रस्सी की लेस और स्क्रू-टर्नबकल का उपयोग किया जाता है। बारीक ट्यूनिंग प्राप्त करने के लिए स्टील के छल्ले या खूंटे को लेस के अंदर घुमाया जाता है। ढोलक को तीन तरह से खेला जा सकता है - खिलाड़ी की गोद में, खड़े होकर, या फर्श पर बैठते समय एक घुटने से दबा कर।

कपास और वस्त्र और सूती कपड़े का लघु उत्पादन- सूती कपड़े का उद्योग वैसे तो पूरे भारत में एक प्रचलित कार्य है क्योंकि यह एक ऐसा कपड़ा होता है, जो कि गर्मियों और सर्दियों दोनों ही ऋतुओं में पहन सकते हैं। कपास की खेती होती है, जिससे ये कपड़ा बनता है। अमरोहा में इस व्यवसाय की भी क़वायत आज भी है। तथा ढोलक में लगने वाली रस्सी भी कपास की ही होती है, जो ढोलक में तनाव तथा ढिलाव बनाये रखती है जिससे ढोलक अपनी मधुर ताल बरकार रख पाती हैं। 

 




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