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आजादी का अमृत महोत्सव : आजाद-ए-हिन्द चंद्रशेखर आजाद 

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आजादी का अमृत महोत्सव : आजाद-ए-हिन्द चंद्रशेखर आजाद 
02 Aug 2022
8 min read

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आगामी 15 अगस्त 2022 को आजादी का 75वां वर्ष 75th year of independence पूर्ण हो जाएगा और इसी आजादी के वर्षों के जश्न का नाम है “आजादी का अमृत महोत्सव” Azadi Ka Amrit Mahotsav देशभर में यह जश्न एक त्यौहार की तरह मनाया जा रहा है। आजादी का अमृत महोत्सव मनाने का उद्देश्य लोगों को स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और त्याग के बारे में जानकारी देना है। इसी दिशा में हम भी आपको भारत को आज़ादी दिलाने वाले वीर सेनानियों की वीरगाथा से रूबरू करायेंगें। इस कड़ी में हमने कल सरदार भगत सिंह Sardar Bhagat Singh के बारे में आपको बताया था। आज हम इस कड़ी को आगे बढ़ायेंगे और आपको चद्रशेखर आज़ाद Chandrashekhar Azad के बारे में बताएंगें।

भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ में हुआ था। चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश साम्राज्य के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। भारतीय स्वतंत्रता के सबसे महान शहीदों में से एक हैं चंद्रशेखर आजाद, वह भारत माता के सच्चे सपूत थे, जिन्हें किसी से कोई भय नहीं था। उनकी बहादुरी को हमेशा भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास  History of India's freedom struggle में याद रखा जाएगा। वह चंद्रा भील आदिवासी बच्चों के साथ बड़े हुए। वह बचपन से ही काफी फुर्तीले थे, उनकी मां उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थी, जिसके लिए आजाद को बनारस के काशी विद्यापीठ Kashi Vidyapeeth of Banaras भेजा। वहां वह राष्ट्रवाद से परिचित हुए और वह एक स्वतंत्रता सेनानी बन गए।

सन 1919 में जलियांवाला बाग Jallianwala Bagh की घटना से वह बेहद परेशान थे। वह सिर्फ 13 साल के थे, जब वह 1920 में महात्मा गांधी Mahatma Gandhi द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने इस तरह के आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और 16 साल की उम्र में उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। जब पुलिस ने उनसे उनका नाम पूछा तो उन्होंने खुद को 'आजाद' और अपने पिता को 'स्वतंत्र' बताया। आजाद के साहस को देखकर मजिस्ट्रेट आग बबूला हो गया और उसे कोड़े मारने का आदेश दिया। वह इतने निडर थे कि उस समय भी आजाद ने मुस्कुराते हुए सजा को कबूल किया। साल 1922 में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया था। जिसके बाद उनकी राष्ट्रवादी भावना और अपने देश को स्वतंत्र देखने के सपने को बड़ा झटका लगा। इस घटना के बाद वह पहले से अधिक आक्रामक हो गए और समझ गया कि इस तरह के अहिंसक आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य को नहीं हिला पाएंगे।

इसके बाद अंग्रेजों से लड़ाई करने के लिए चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क Alfred Park में सुखदेव Sukhdev और अपने एक अन्य साथियों के साथ बैठकर आगामी योजना बना रहे थे। इस बात की जानकारी अंग्रेजों को पहले से ही मिल गई थी। जिसके कारण अचानक अंग्रेज पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। आजाद ने अपने साथियों को वहां से भगा दिया और अकेले अंग्रेजों से लोहा लगने लगे। इस लड़ाई में पुलिस की गोलियों से आजाद बुरी तरह घायल हो गए थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी। इसीलिए अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी। भारतमाता के इस महान सपूत को हम दिल से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

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