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निष्पक्ष पत्रकारिता क्या है?

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निष्पक्ष पत्रकारिता क्या है?
07 Oct 2021
5 min read
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पत्रकार कौन है? पत्रकारिता क्या है? आधुनिक युग में पत्रकारिता को भी पैसा कमाने के ज़रिये के रूप में देखा जाने लगा है। पहले भी स्थिति कुछ उत्तम नहीं थी लेकिन अब बद से बदतर ज़रूर होती जा रही। पत्रकार वह है जो कोई खबर को बिना तोड़ मरोड़ कर, निष्पक्ष और सटीक जानकारी  को आम जन तक पहुँचाये। उसकी कलम से लिखी खबर जनहित में हो।

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पत्रकार कौन है? पत्रकारिता क्या है? आधुनिक युग में पत्रकारिता को भी पैसा कमाने के ज़रिये के रूप में देखा जाने लगा है। पहले भी स्थिति कुछ उत्तम नहीं थी लेकिन अब बद से बदतर ज़रूर होती जा रही। पत्रकार वह है जो कोई खबर को बिना तोड़ मरोड़ कर, निष्पक्ष और सटीक जानकारी  को आम जन तक पहुँचाये। उसकी कलम से लिखी खबर जनहित में हो। लेकिन अब पत्रकारों की स्थिति ठीक नही, सत्ता बदलने के साथ-साथ पत्रकार की कलम में निष्पक्ष होने की कला अब मरती दिख रही है। ये लोकतंत्र के लिए घातक है। जागरूक आम-जन को अखबार पढ़ते समय चाटूकारिता स्पष्ठ रूप से समझ आती है। कुछ गिने-चुने न्यूज़ चैनल ने तो मानो पत्रकारिता की हत्या कर दी हो। 24 घण्टे न्यूज़ आपको सुनाई देगी कुछ तो खुद से बनाई भी जाती हैं। रोज न्यूज़ रूम में बैठे पत्रकार प्राइम टाइम शो में किसी विशेष उद्देश्य से बैठे होते हैं। कुछ काफी शोर मचाते हैं कुछ काफी नरम रहते हैं। उन्हें देखने वाली जनता के दिमाग को रोज भ्रमित किया जाता है। सत्ता में जो सरकार रहती है पत्रकार उसी की चाटूकारिता करने पर विवश होते हैं। ऐसा ना करने पर पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। अब तो सरकार पर सवाल उठाने पर देशद्रोही घोसित कर दिया जाता है। बहुत कम पत्रकार पत्रकारिता की राह चुनते है। वही चाटूकारिता करने पर फायदे के अतिरिक्त और कुछ नही, केवल पत्रकार के जगह अपको सत्ता का दलाल घोसित कर दिया जाएगा। मनुष्य का स्वभाव है की वह पहले अपने स्वार्थ के में बारे सोचता है और ऐसे पत्रकार सही मायने में देशद्रोही हैं। हकीकत तो ये है कि पत्रकारिता रोजगार नही बल्कि एक उपाधि है, जो खुद से पहले देशहित के बारे में विचार करे। जिसकी कलम बिकाऊ ना हो, उसने सच्चाई लिखने, बोलने का संकल्प लिया हो। जो निस्पक्ष हो, सटीक हो। यही एक पत्रकार की देशभक्ति है। पारदर्शिता, जवाबदेही भी अब समाप्त हो चुकी है। क्योंकि ना तो अब पत्रकार तीखे सवाल कर सकता है और ना ही जवाब मांग सकता है। वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स के मुताबिक 180 देशों में से हम 142वीं रैंक पर है। यही हमारी कमज़ोरी है। जिस देश में पत्रकार चाटुकार हों तो फिर किसकी और किस बात पर सवाल जवाब हो? चौथे स्तंभ का निर्माण तीनों स्तम्भों की प्रहरी के लिए किया गया था ना की चाटूकारिता के लिए। ऐसे में आम-जन करे तो क्या करे? नागरिक धर्म आजमायें और जागरूक रहें। निष्पक्ष का अर्थ है कि पत्रकार किसी भी खबर का तर्क दोनों तरफ से जनता तक पहुँचाये, और उसमें पत्रकार के खुद के विचार की बू नहीं आनी चाहिए। पत्रकार आखिर लिखकर, बोलकर खबरों को लोगों तक पहुँचता है। लिखना और बोलना भी एक तरह की कला है, उदारण के तौर पर यदि आज तेज़ बारिश हो रही है, इस खबर को बताने के तरह-तरह तरीके हो सकते हैं। लेकिन जब ख़बरों में तथ्य ही गायब हो जाएं तो समझ लीजिये पत्रिकारिता की दुर्गति होने लगती है। हाल ही में हमने सुशांतसिंह राजपूत की आत्म-हत्या की खबरों में काफी उतार-चढ़ाव देखे थे, कैसे पत्रकारों ने कानून अपने हाथ में लेकर स्वयं ही फैसला दे दिया था। आखिर सच सबके सामने है, रिया चक्रवर्ती को अभी तक कानून के तरफ से आरोपी नहीं साबित किया जा सका है। लेकिन पत्रकारों के जरिये इस तरह की खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के कारण जीते-जागते इंसान को डिप्रेस किया गया। पत्रकारिता में भी अब व्यवसाय ने अपनी प्रबलता स्थापित कर दी है। टीआरपी का चक्कर बाबू-भैया हर मीडिया चैनलों के सर चढ़ कर बोल रहा है। भले चाहें पत्रकारिता सूली पर क्यों न चढ़ जाये। ऐसा नहीं है कि अब पत्रकारिता नहीं की जा रही, लेकिन उससे ज्यादा पत्रकारिता का दिखावा किया जा रहा। पत्रिकारिता का यह बदलता स्वरुप नकारात्मकता को अपनी तरफ खींच रहा हैं, कहीं न कहीं हम सब इसे महसूस कर सकते हैं। मीडिया चैनलों को देखने वालों के मुताबिक अब हम यह बता सकते है कि इस चैनल को देखने वाला सत्ता का समर्थक है, या इस चैनल को देखने वाला विपक्ष का समर्थक है। और यहीं साबित हो जाता है कि निष्पक्ष पत्रकारिता का अंत हो रहा है। इससे हम कैसे उभर सकते हैं? हमें पहचानने की जरूरत होगी, खबरों की पड़ताल करनी होगी। अब ख़बरों को सुनने, पढ़ने वालों की एक और जिम्मेदारी होगी, उन्हें तय करना होगा कि जो खबर वह सुन रहे या पढ़ रहे हैं वह निष्पक्ष है या नहीं। पत्रकार को देश हित में कार्य करना चाहिए न की सत्ता या अपने स्वयं के हित में, यही एक मात्र विकल्प है की हम पत्रकारिता को पूर्ण रूप से मरने से बचा सकते हैं।