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बिटिया का सम्मान, आपकी पहचान-राष्ट्रीय बालिका दिवस  

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बिटिया का सम्मान, आपकी पहचान-राष्ट्रीय बालिका दिवस  
24 Jan 2022
8 min read
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महाभारत में द्रौपदी पाँच पांडवों की पत्नी थी वो इसलिए क्यूँकि एक कथा के अनुसार उसे पाँच गुण वाले पति चाहिए थे, पाँचों पांडव देवताओं के अंश थे और बहुत सारे नियति के कारणों से ऐसी दैवीय  परिस्थिति बनीं, ख़ैर यह उस युग की बात है। कुछ वर्षों पहले भारत के एक गाँव में एक स्त्री का विवाह एक ही परिवार के पुरुषों से किया गया लेकिन यहाँ की परिस्थिति अलग है।इस गाँव में कन्याओं को जन्म लेते ही मार दिया जाता था इसलिए विवाह योग्य कन्याएँ बचती ही नही, इसलिए एक कन्या के साथ एक ही परिवार के भाइयों का विवाह कर दिया जाता। आइये आज राष्ट्रीय बालिका दिवस पर इस सोचने समझने की यात्रा को, इस blog के माध्यम से पढ़िये।

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आज आपको एक क़िस्सा सुनातीं हूँ महाभारत में द्रौपदी पाँच पांडवों की पत्नी थी वो इसलिए क्यूँकि एक कथा के अनुसार उसे पाँच गुण वाले पति चाहिए थे, पाँचों पांडव देवताओं के अंश थे और बहुत सारे नियति के कारणों से ऐसी दैवीय  परिस्थिति बनी, ख़ैर यह उस युग की बात है। कुछ वर्षों पहले भारत के एक गाँव में एक स्त्री का विवाह एक ही परिवार के पुरुषों से किया गया लेकिन यहाँ की परिस्थिति अलग है। इस गाँव में कन्याओं को जन्म लेते ही मार दिया जाता था इसलिए विवाह योग्य कन्याएँ बचती ही नही, इसलिए एक कन्या के साथ एक ही परिवार के भाइयों का विवाह कर दिया जाता।यहाँ ना तो युग प्राचीन है ना ही विचारधारा, ना द्रौपदी है ना कृष्ण ना ही दैवीय नियति। यहाँ है - सोच केवल एक संकुचित सोच जिसने कई बालिकाओं को (कुछ को तो जन्म से पहले ही ) केवल इसलिये एक जीवन जीने का मौक़ा नहीं दिया क्यूँकि वह एक कन्या होती। आइये आज राष्ट्रीय बालिका दिवस पर इस सोचने समझने की यात्रा को, इस blog के माध्यम से पढ़िये। इस blog में अच्छे-बुरे सभी अनुभवों से गुज़रेंगें और मनाएँगें साथ मिलकर - राष्ट्रीय बालिका दिवस 

राष्ट्रीय बालिका दिवस 

राष्ट्रीय बालिका दिवस भारत में हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2008 में की थी। इस दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें save the girl child, child sex ratio और बालिकाओ के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण बनाने सहित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना शामिल है। इसी दिन साल 1966 में इंदिरा गांधी ने भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी।

प्राचीन उदाहरणों से ख़ुद को परखें 

अगर यह कहा जाए कि यह तो पुराने जमाने की बातें है, ऐसा शायद 60 या 70 के दशक में या उससे और पहले होता होगा तो पहले यह समझना आवश्यक है कि बाद की पीढ़ी ने तो अत्यधिक रूढ़िवादिता दिखाई, पहले तो भारत में अपाला, घोषा, लोपमुद्रा जैसी स्त्रियाँ प्रकांड विद्वान थी और ऋषियों के साथ बैठकर यज्ञ में शामिल होती थी। यह उदाहरण इसलिए दिया गया है कि इन विदुषियों को यदि जन्म, शिक्षा और समाज में समानता का अधिकार नहीं मिला होता तो क्या आज हम इनके नाम जानते? नन्ही सी सीता को महाराज जनक और पूरी मिथिला ने प्रकृति का वरदान मानकर सम्मान किया, यदि ऐसा ना हुआ होता तो? इनसभी प्र्श्नों का जवाब आपकी अपनी सोच में है। यदि परिवार की बीज रूपी बालिका को ही उखाड़कर फेंक देंगे तो ना कभी कोई उसकी सुगंध देख पाएँगें ना ही रंग। एक वीरान मरुस्थल सा होगा यह संसार।

इसलिए राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाएँ और उसके विषय में अच्छा अनुभव करें, इसके पहले यह सोचिए कि ऐसी कौन सी परिस्थियाँ रहीं होंगी जिसके कारण बालिकाओं के लिए यह विशेष दिन बनाना पड़ा, विश्व को, भारत को यह याद दिलाना पड़ा कि बालिकाओं का अस्तित्व भी आवश्यक है-

परिवार की मानसिकता - आमतौर पर बालिकाओं पर बाल्यावस्था से ही हर प्रकार के दबाव डाले जातें हैं, जैसे सामाजिक दबाव (रहन-सहन, बातचीत की शैली, कपड़े पहनने का तरीक़ा आदि ) उन्हें हमेशा ख़ुद को हर कसौटी पर खरा उतरने का मानसिक दबाव डाला जाता है। यह दबाव ना तो एक छोटी सी बालिका को ना तो बालिका रहने देता है ना ही उसका छोटा सा मन उसे वयस्कता की ओर जाने देता है, शायद यही कारण है कि अधिकतर कन्याएँ दुनिया में अपना अस्तित्व ढूँढने की उलझन में फाँसी रह जाती है।

भ्रूण हत्या- कई जगहों पर यह माना जाता है कि बालिका हर तरह से कमजोर है तो ऐसे कमजोर शिशु को जन्म देकर भला क्या फ़ायदा। दुःख की बात यह है कि यह मानसिकता, जो जन्म से पहले ही भ्रूण की जाँच करके केवल यह पता लगाना की कहीं कन्या तो नहीं, इस मानसिकता का विरोध स्वयं वयस्क महिलाएँ भी नहीं करती। भारत में बालिका के जन्म के साथ ही उसके विवाह का भार, उसके सामाजिक मान का भार, यह सबकुछ सोचना शुरू कर दिया जाता है बिना यह सोचे की वह अबोध बालिका इन सब से अनभिज्ञ है।

कुछ देश अब भी ऐसे हैं जिन्हें बालिकाओं के जन्म से कोई आपत्ति नहीं पर यह उनके जीवन को भी बोझ बना देते हैं जैसे-शिक्षा का अधिकार ना देना, बाल विवाह, एक नियम क़ानून के अनुसार ही बनाए गाए वस्त्र, सदैव किसी पुरुष का साथ होना आवश्यक आदि। यह सुनने में अविश्वसनीय लगता है पर विश्व के कुछ हिस्से आज भी ऐसी ही मानसिकता में जीते हैं। 

भारत में 1979 में अल्ट्रासाउंड तकनीक की प्रगति आयी हालांकि इसका फैलाव बहुत धीमे था। लेकिन वर्ष 2000 में व्यापक रुप से फैलने लगा। इसका आंकलन किया गया कि 1990 से, लड़की होने की वजह से 10 मिलीयन से ज्यादा कन्या भ्रूणों का गर्भपात हो चुका है। इतिहास और सांस्कृति के नाम पर कन्या भ्रूण हत्या की गई क्यूँकि इस बात को बढ़ावा दिया गया कि बालक शिशु अधिक श्रेष्ठ होता है क्योंकि वो भविष्य में परिवार के वंश को आगे बढ़ाने के साथ ही हस्तचालित श्रम भी उपलब्ध करायेगा। पुत्र को परिवार की संपत्ति के रुप में देखा जाता है जबकि पुत्री को जिम्मेदारी के रुप में माना जाता है।

मलाला यूसुफ़ज़ई का case- अक्टूबर 2012 में, मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने उदारवादी प्रयासों के कारण वे आतंकवादियों के हमले का शिकार बनी, जिससे वह बुरी तरह घायल हो गई। लेकिन इस घटना के बाद पूरे विश्व ने मलाल के लिए दुआएँ की। यह भी एक सकारात्मक नज़रिया दिखा।

लक्ष्मी अग्रवाल ( acid attack survivor and activist )- 2005 में 15 साल की उम्र में, एक 32 वर्षीय व्यक्ति ने उन पर हमला किया था, जिससे शादी करने के लिए उन्होंने इंकार कर दिया था, यहाँ यह बात कर आवश्यक है क्यूँकि एक किशोरावस्था बालिका का इनकार उसके लिए दुखद अनुभव रहा,इन्होंने अपने जैसी कई लड़कियों की सहायता की और अब यह बेहद सफल और खुशहाल जीवन जी रही है।

जातिप्रथा का शिकार कन्याएँ - कुछ बालिकाओं का आत्मसम्मान तो बाल्यावस्था से ही तोड़ा  जाता है, केवल उन्हें तुच्छ होने की अनुभूति कराकर।

सराहनीय प्रयास और बदलती परिस्थितियाँ

अब अच्छा वक्त भी आ गया है क्यूँकि संचार क्रांति आगे बढ़ी है, शिक्षा का प्रकाश दूर-दूर तक पहुँचा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है। ऐसा नहीं था की यह सभी कुछ पहले नहीं था। यह सब तो पहले भी था पर प्रभाव में अब अधिक दिख रहा है। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय बालिका दिवस 24 जनवरी को मनाने का उद्देश्य भी यही है -

इस दिन को मनाने का उद्देश्य देश की बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है. बेटियों के साथ-साथ समाज को भी इस लैंगिग भेदभाव के बारे में जागरूक करना है. पूरे भारत में इस दिन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. आज लड़कियाँ लगभग हर क्षेत्र में आगे हैं।यह बेहद सराहनीय पहल हैं। नन्ही सी बालिका के  अस्तित्व को कई बार लेखकों ने अपनी लेखनी में बड़ी सुंदरता से जंग दी है, जैसे कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्यारी सी बिटिया को देखकर बड़ी ही सुंदर सी कविता लिखी है-

मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी॥ 

नंदन वन-सी फूल उठी, वह छोटी-सी कुटिया मेरी॥ 

माँ ओ! कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी। 

कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने आई थी। 

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा। 

मुँह पर भी आल्हाद लालिमा, विजय गर्व था झलक रहा।

जब इस तरह की सुंदर रचनाएँ देखतें हैं तो लगता है प्रकृति ने एक बालिका में अपना हर भाव, मौसम का हर रंग डाला है, एक बालिका को शिक्षित करने का अर्थ होता है एक समाज को, एक परिवार को शिक्षित करना, क्यूँकि वही आगे अपनी शिक्षाओं से दूसरों का जीवन रोशन करती है। यदि एक बालिका का सबसे अच्छा मित्र उसकी शिक्षा होती है, यही तो साबित किया है -ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने, कादम्बिनी घोष ने, annie besant ने। तो राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाइये क्यूँकि आपकी पहचान, आपका गर्व तो आपके घर के आँगन में ही है।