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किस्से-कहानियों और इतिहास को समेटे है - नाहरगढ़ दुर्ग

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किस्से-कहानियों और इतिहास को समेटे है - नाहरगढ़ दुर्ग

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Post Highlights

राजस्थान एक ऐसा राज्य है जो इतिहास और कहानियों से परिपूर्ण है। उदयपुर, बीकानेर, आमेर के अलावा राजधानी और गुलाबी शहर के नाम से मशहूर- जयपुर, न जाने कितने सारे किलों को अपने आस-पास समेटे है, आज आपको बताएंगे सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाए गए नाहरगढ़ क़िले के बारे में।

राजस्थान एक ऐसा राज्य है जो इतिहास और कहानियों से परिपूर्ण है। उदयपुर, बीकानेर, आमेर के अलावा राजधानी और गुलाबी शहर के नाम से मशहूर- जयपुर, न जाने कितने सारे किलों को अपने आस-पास समेटेहै। आज इस लेख में हम बात करेंगे कई सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाए गए नाहरगढ़ क़िले के विषय में।

नाहरगढ़ का क़िला- 

नाहरगढ़ का किला Nahargarh Fort, जयपुर को सुरक्षा कवच की तरह घेरे हुए अरावली की पहाड़ियों के ऊपर बना हुआ है। आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आरावली की पर्वत श्रृंखला के छोर पर इस किले को सवाई जयसिंह द्वितीय ने सन 1734 में बनवाया था। यहाँ 19 वीं शताब्दी में सवाई राम सिंह और सवाई माधो सिंह के द्वारा भी किले के अन्दर भवनों का निर्माण कराया गया था जिनकी हालत आज भी ठीक-ठाक है जबकि पुराने निर्माण जीर्ण शीर्ण हो चले हैं। यहाँ के राजा सवाई राम सिंह की नौ रानियों के लिए अलग-अलग आवास खंड बनवाए गए थे, ये खंड सबसे सुन्दर थे। इनमे शौच आदि के लिए आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था की गयी थी। किले के पश्चिम भाग में “पड़ाव” नामका एक रेस्तरां भी है जहाँ खान-पान की पूरी व्यवस्था है। यहाँ से सूर्यास्त बहुत ही सुन्दर दिखता है।

इस किले का प्राचीन नाम सुदर्शनगढ़ था बाद में इसका नाम बदलकर नाहरगढ़ किला रखा गया था। सवाई जयसिंह की बुद्धिमत्ता और विज्ञान के प्रति उनके लगाव को देखकर ही ओरंगजेब ने उन्हें सवाई की उपाधि दी थी। नाहरगढ़ किला अपने विशेष प्रकार की किलेबंदी की वजह से जयगढ़ के किले से जुड़ा हुआ है। नाहर का अर्थ होता है शेर और गढ़ का अर्थ होता है किला, इस प्रकार नाहरगढ़ का अर्थ होता है शेर का किला।

जानिए सवाई जयसिंह द्वितीय के विषय में-

सवाई राजा जयसिंह द्वितीय, Sawai Raja Jai ​​Singh II कछवाहा राजवंश के राजा थे। उनके पिता का नाम विष्णु कुमार और माता का नाम इंद्रकुंवर था। वर्ष 1756 में यह आमेर की राजगद्दी पर बैठे। ये अपने वंश में सबसे वीर और सबसे प्रतापी राजा होने के साथ बुद्धिमत्ता में भी अपने समकालीन राजाओं से आगे रहे थे। इनका मूल नाम जयसिंह था लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता और चतुराई को देखकर औरंगजेब ने उन्हें उनके मंत्री मिर्ज़ा राजा जयसिंह से ज्यादा योग्य अर्थात सवाया मानकर सवाई जयसिंह का नाम दिया था। यहीं से वह सवाई जयसिंह द्वितीय कहलाए। उनके राज्यारोहण के समय उनके राज्य आमेर की स्थित अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने आतंरिक मामलों को बेहद चतुराई से संभाला और अपने शासन में उसे सुदृण बनाया। इसके साथ साथ उन्होंने अपने सैनिक व्यवस्था पर भी अच्छा ध्यान दिया ताकि आक्रमण के समय उनके सैनिक और भी निर्भयता से युद्ध कर पाएं।

आपको बात दें कि सवाई जयसिंह अंतिम हिन्दू राजा थे जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया था। सवाई जयसिंह जी ने “जिज मुहम्मदशाही” नामक ग्रहों से संबधित एक पुस्तक लिखी थी। इसके आलावा यूक्लिड euclid की प्रसिद्ध पुस्तक ज्योमेट्री, त्रिकोणमिति और जॉन नेपियर john napier की पुस्तक logarithm लागरिथम का संस्कृत भाषा में अनुवाद कराया और लोगों के बीच में विज्ञान के महत्व को साझा किया। इसके आलावा उन्होंने जयसिंह कारिका नामक एक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा। वह स्वयं संस्कृत फ़ारसी गणित और ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान भी थे। 

इस किले के बारे में एक रोचक कहानी भी है- 

एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी, जो किले के निर्माण में व्यवधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से बाधा दूर हो गई थी ।

यह भी कहा जाता है कि तब राजा जी ने अपनी कुलगुरु से इस समस्या का समाधान माँगा, इसपर कुलगुरु ने उन्हें इस किले के अंदर एक मंदिर की स्थापना और उसका नाम नाहर रखने का सुझाव दिया और राजा जी ने वही किया। इस वजह से इस महल का नाम नाहरगढ़ पड़ा। एक क़िले को बनाने में जितना योगदान उसके निर्माणकर्ता का होता है उतना ही योगदान उसकी देखरेख करने वाले का होता है। वर्ष 1868 में इस किले की मरम्मत करवाने और इसे फिर से वापस उसी रूप में लाने का श्रेय सवाई राम सिंह और सवाई माधों सिंह जी को जाता है। उन्होंने इस किले के भीतरी हिस्सों में अन्य भवनों का निर्माण कराया।

अन्य नाम-

जयपुर के पहरेदार के रूप में प्रसिद्ध नाहरगढ़ किले को कई अन्य नाम से भी जाना जाता है जैसे सुलक्षण दुर्गसुदर्शन गढ़, टाइगर किला, जयपुर ध्वजगढ़जयपुर का मुकुट, महलों का दुर्गमीठड़ी का किला Sulakshana Fort,Sudarshan Garh, Tiger Fort, Jaipur Dhwajagarh, Crown of Jaipur, Fort of Palaces, Fort of Mithri आदि।

नाहरगढ़ क़िले की विशेषताएँ -

यहां कभी किसी ने आक्रमण नहीं किया था लेकिन फिर भी यहां ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं हुई हैं । किले में बनाए गए माधवेन्द्र भवन को ग्रीष्म काल में महाराजा के निवास के रूप में उपयोग किया जाता था। रानियों के लिए आरामदेय बैठक तथा राजा के कक्षों का समूह, आलीशान दरवाजों, खिड़कियों और विभिन्न चित्रों से सजाया गया था। हालांकि, नाहरगढ़ आज भी अतीत की यादों को समेटे हुए शान से खड़ा है। रंग दे बसंती, शुद्ध देसी रोमांस, जोधा अकबर समेत कई फ़िल्में हैं जिनके कुछ दृश्य नाहरगढ़ किले में ही शूट किए गए हैं।

भारत के सभी एतिहासिक स्थलों की तरह ही यह महल सुबह भी 10 बजे से शाम के 5 बजे तक खुला रहता है। इसके बाद इस किले में किसी भी पर्यटक को रुकने नहीं दिया जाता है, क्यूंकि नाहरगढ़ एक बृहद जंगल से घिरा हुआ है जिसमे जंगली जानवरों का निवास है। इस जंगल को नाहरगढ़ जैविक पार्क के नाम से भी जाना जाता है।

प्रवेश शुल्क– 

पर्यटकों के लिये यहाँ प्रवेश शुल्क को निर्धारित किया गया है, यह शुल्क आपको किलों के सभी प्रवेश द्वारों पर लिखा हुआ दिख जाएगा। एक यात्री के तौर पर आपको अवश्य ही राजस्थान के किलों का भ्रमण करना चाहिये। 

Think with Niche पर आपके लिए और रोचक विषयों पर लेख उपलब्ध हैं एक अन्य लेख को पढ़ने के लिए कृपया नीचे  दिए लिंक पर क्लिक करे-

भारत में गर्मियों में घूमने की 10 अच्छी जगह

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राजस्थान एक ऐसा राज्य है जो इतिहास और कहानियों से परिपूर्ण है। उदयपुर, बीकानेर, आमेर के अलावा राजधानी और गुलाबी शहर के नाम से मशहूर- जयपुर, न जाने कितने सारे किलों को अपने आस-पास समेटेहै। आज इस लेख में हम बात करेंगे कई सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाए गए नाहरगढ़ क़िले के विषय में।

नाहरगढ़ का क़िला- 

नाहरगढ़ का किला Nahargarh Fort, जयपुर को सुरक्षा कवच की तरह घेरे हुए अरावली की पहाड़ियों के ऊपर बना हुआ है। आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आरावली की पर्वत श्रृंखला के छोर पर इस किले को सवाई जयसिंह द्वितीय ने सन 1734 में बनवाया था। यहाँ 19 वीं शताब्दी में सवाई राम सिंह और सवाई माधो सिंह के द्वारा भी किले के अन्दर भवनों का निर्माण कराया गया था जिनकी हालत आज भी ठीक-ठाक है जबकि पुराने निर्माण जीर्ण शीर्ण हो चले हैं। यहाँ के राजा सवाई राम सिंह की नौ रानियों के लिए अलग-अलग आवास खंड बनवाए गए थे, ये खंड सबसे सुन्दर थे। इनमे शौच आदि के लिए आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था की गयी थी। किले के पश्चिम भाग में “पड़ाव” नामका एक रेस्तरां भी है जहाँ खान-पान की पूरी व्यवस्था है। यहाँ से सूर्यास्त बहुत ही सुन्दर दिखता है।

इस किले का प्राचीन नाम सुदर्शनगढ़ था बाद में इसका नाम बदलकर नाहरगढ़ किला रखा गया था। सवाई जयसिंह की बुद्धिमत्ता और विज्ञान के प्रति उनके लगाव को देखकर ही ओरंगजेब ने उन्हें सवाई की उपाधि दी थी। नाहरगढ़ किला अपने विशेष प्रकार की किलेबंदी की वजह से जयगढ़ के किले से जुड़ा हुआ है। नाहर का अर्थ होता है शेर और गढ़ का अर्थ होता है किला, इस प्रकार नाहरगढ़ का अर्थ होता है शेर का किला।

जानिए सवाई जयसिंह द्वितीय के विषय में-

सवाई राजा जयसिंह द्वितीय, Sawai Raja Jai ​​Singh II कछवाहा राजवंश के राजा थे। उनके पिता का नाम विष्णु कुमार और माता का नाम इंद्रकुंवर था। वर्ष 1756 में यह आमेर की राजगद्दी पर बैठे। ये अपने वंश में सबसे वीर और सबसे प्रतापी राजा होने के साथ बुद्धिमत्ता में भी अपने समकालीन राजाओं से आगे रहे थे। इनका मूल नाम जयसिंह था लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता और चतुराई को देखकर औरंगजेब ने उन्हें उनके मंत्री मिर्ज़ा राजा जयसिंह से ज्यादा योग्य अर्थात सवाया मानकर सवाई जयसिंह का नाम दिया था। यहीं से वह सवाई जयसिंह द्वितीय कहलाए। उनके राज्यारोहण के समय उनके राज्य आमेर की स्थित अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने आतंरिक मामलों को बेहद चतुराई से संभाला और अपने शासन में उसे सुदृण बनाया। इसके साथ साथ उन्होंने अपने सैनिक व्यवस्था पर भी अच्छा ध्यान दिया ताकि आक्रमण के समय उनके सैनिक और भी निर्भयता से युद्ध कर पाएं।

आपको बात दें कि सवाई जयसिंह अंतिम हिन्दू राजा थे जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया था। सवाई जयसिंह जी ने “जिज मुहम्मदशाही” नामक ग्रहों से संबधित एक पुस्तक लिखी थी। इसके आलावा यूक्लिड euclid की प्रसिद्ध पुस्तक ज्योमेट्री, त्रिकोणमिति और जॉन नेपियर john napier की पुस्तक logarithm लागरिथम का संस्कृत भाषा में अनुवाद कराया और लोगों के बीच में विज्ञान के महत्व को साझा किया। इसके आलावा उन्होंने जयसिंह कारिका नामक एक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा। वह स्वयं संस्कृत फ़ारसी गणित और ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान भी थे। 

इस किले के बारे में एक रोचक कहानी भी है- 

एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी, जो किले के निर्माण में व्यवधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से बाधा दूर हो गई थी ।

यह भी कहा जाता है कि तब राजा जी ने अपनी कुलगुरु से इस समस्या का समाधान माँगा, इसपर कुलगुरु ने उन्हें इस किले के अंदर एक मंदिर की स्थापना और उसका नाम नाहर रखने का सुझाव दिया और राजा जी ने वही किया। इस वजह से इस महल का नाम नाहरगढ़ पड़ा। एक क़िले को बनाने में जितना योगदान उसके निर्माणकर्ता का होता है उतना ही योगदान उसकी देखरेख करने वाले का होता है। वर्ष 1868 में इस किले की मरम्मत करवाने और इसे फिर से वापस उसी रूप में लाने का श्रेय सवाई राम सिंह और सवाई माधों सिंह जी को जाता है। उन्होंने इस किले के भीतरी हिस्सों में अन्य भवनों का निर्माण कराया।

अन्य नाम-

जयपुर के पहरेदार के रूप में प्रसिद्ध नाहरगढ़ किले को कई अन्य नाम से भी जाना जाता है जैसे सुलक्षण दुर्गसुदर्शन गढ़, टाइगर किला, जयपुर ध्वजगढ़जयपुर का मुकुट, महलों का दुर्गमीठड़ी का किला Sulakshana Fort,Sudarshan Garh, Tiger Fort, Jaipur Dhwajagarh, Crown of Jaipur, Fort of Palaces, Fort of Mithri आदि।

नाहरगढ़ क़िले की विशेषताएँ -

यहां कभी किसी ने आक्रमण नहीं किया था लेकिन फिर भी यहां ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं हुई हैं । किले में बनाए गए माधवेन्द्र भवन को ग्रीष्म काल में महाराजा के निवास के रूप में उपयोग किया जाता था। रानियों के लिए आरामदेय बैठक तथा राजा के कक्षों का समूह, आलीशान दरवाजों, खिड़कियों और विभिन्न चित्रों से सजाया गया था। हालांकि, नाहरगढ़ आज भी अतीत की यादों को समेटे हुए शान से खड़ा है। रंग दे बसंती, शुद्ध देसी रोमांस, जोधा अकबर समेत कई फ़िल्में हैं जिनके कुछ दृश्य नाहरगढ़ किले में ही शूट किए गए हैं।

भारत के सभी एतिहासिक स्थलों की तरह ही यह महल सुबह भी 10 बजे से शाम के 5 बजे तक खुला रहता है। इसके बाद इस किले में किसी भी पर्यटक को रुकने नहीं दिया जाता है, क्यूंकि नाहरगढ़ एक बृहद जंगल से घिरा हुआ है जिसमे जंगली जानवरों का निवास है। इस जंगल को नाहरगढ़ जैविक पार्क के नाम से भी जाना जाता है।

प्रवेश शुल्क– 

पर्यटकों के लिये यहाँ प्रवेश शुल्क को निर्धारित किया गया है, यह शुल्क आपको किलों के सभी प्रवेश द्वारों पर लिखा हुआ दिख जाएगा। एक यात्री के तौर पर आपको अवश्य ही राजस्थान के किलों का भ्रमण करना चाहिये। 

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