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Sustainability Quality Education

इसको जानो, शिक्षा नीतियाँ

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इसको जानो, शिक्षा नीतियाँ

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Post Highlights

जिस तरह से हमने जाना भारत में शिक्षा नीतियों में प्रत्येक वर्ष कुछ न कुछ बदलाव होते रहते हैं। परन्तु अतीत में हुए बदलाव को जानना भी उतना ही जरुरी है की किस तरह से पहले की शिक्षा नीतियां रहीं हैं। चाहे शुरूआती शिक्षा निति हो या वर्तमान शिक्षा निति इस लेख के द्वारा हम बीती पिछली शिक्षा निति को देखेंगे।

अगर हम बात करें शिक्षा के बदलते स्वरूप की, तो हम आश्चर्यचकित होंगे की शिक्षा दिन व् दिन अपना स्वरुप बदलती है। और दिन व दिन इसमें बदलाव देखने को मिलते रहते हैं।

वैदिक काल से ही शिक्षा में गुण और द्धेष का मिला जुला स्वरुप रहा है। मगर विद्वानों ने इसको द्धेष से गुणवत्ता की ओर धकेलने का प्रयास किया है। वेदों ने शिक्षा की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है, शिक्षा व्यक्तित्व के निर्माण के साथ-साथ चरित्र निर्माण की भी धारणा का प्रतिपादन करते हुए आगे बढ़े तो छात्रों और शिक्षकों में एक क्रन्तिकारी बदलाव होने की सम्भावना का जन्म होता है।

बुद्ध के समय में भी शिक्षा एक व्यापक रूप धारण करते हुए उभर कर आयी। जिस तरह शिक्षा का व्याख्यान वेदों में अध्यात्म के रूप में दर्शाया गया है वहीँ बुद्ध ने भी इसी से जोड़ते हुए ‘अप्प दीपो भवः’ की श्रेणी तक पहुंचाने का काम किया है। भारतीय परम्परा जैसे-जैसे विकास करती गयी वैसे-वैसे शिक्षा में “विकास की नीव से इमारत की कहानी बनती गयी” ।

आज़ादी से पहले अंग्रेजों ने समय-समय पर शिक्षा को काफी परिवर्तित किया। इनके ही समय से शिक्षा को धर्म से अलग करके देखने की शुरुआत देखी जा सकती है। अंग्रेजी हुकमत ही “कान्वेंट थ्योरी” लेकर आयी जहाँ से शिक्षा ने अपने असीम पर फैलाये और शिक्षा सभी के लिए एक सम्भावना तथा अवसर के रूप में उभर कर आयी।

 

सबसे पहले सन 1952-1953  में मुदालियर आयोग (माध्यमिक शिक्षा आयोग) ने आजादी के बाद शिक्षा निति में कुछ बदलाव किये जिसको इन्होने कुछ बिंदुओं के द्वारा समझाया।

1) इन्होने माध्यमिक शिक्षा के सुधर के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग की स्थपना की ।

2) पाठ्यचर्चा में विविधता लाने, एक मध्यवर्ती स्तर जोड़ने, त्रिस्तरीय स्नातक पाठ्यक्रम शुरू करने इत्यादि की सिफारिश की ।

3) वस्तुनिष्ठ (MCQ) परीक्षण-पद्धति को अपनाया जाए ।

4 )संख्यात्मक अंक देने के बजाय सांकेतिक अंक दिया जाए ।

5 )उच्च तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा के पाठ्यक्रम में एक core subject रहे जो अनिवार्य रहे जैसे—गणित, सामान्य ज्ञान, कला, संगीत ।

 

दूसरी बार जो शिक्षा निति में बदलाव हुआ उसको हम 1964-66 कोठारी आयोग राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, 1964-66 के नाम से जानते हैं,

इसकी अध्यक्षता प्रो. दौलत सिंह कोठारी ने की थी

इस आयोग के मूल में तीसरी पंचवर्षीय योजना रही, जिसने बहुत स्पष्ट शब्दों में देश की शिक्षा पद्धति के पुनर्विचार की बात पर बल दिया है।

यह आयोग पहला ऐसा आयोग था जिसने विस्तार से भारतीय शिक्षा पद्धति का अध्ययन किया। इसके परिणामस्वरूप ही वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति अस्तित्व में आ सकी।

लगभग सभी एजुकेशन से जुड़ी बातों को इस निति के द्वारा ध्यान दिया गया या ध्यान खीचा गया, जैसे नारी शिक्षा में होने वाली वित्तीय समस्याओं पर विचार, शिक्षा के प्रति जागरूकता आदि।

 

कोठारी आयोग के बाद राष्ट्र को एक नई शिक्षा निति मिली जो की इन्हीं की सिफारिशों का अग्रिम परिणाम था जिसे हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 (national education policy) के नाम से जानते हैं।

कोठारी आयोग शिक्षा आयोग की सिफारिशों के सम्बन्ध में लोकसभा में व्यापक चर्चा हुई। वर्ष भर में वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दे दी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कुछ प्रमुख बातें जो आपके लिए जानना आवश्यक है,

सामान्य रूप से देश के सभी भागों में शिक्षा का समान ढाँचा अपनाना लाभप्रद होगा जो कि 10़+2़+3 पर आधारित होगा।

शिक्षा में निवेश को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए ।

कमजोर वर्ग के छात्रों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के लिए छात्रवृत्ति योजनायें बढ़ायी जाएँ ।

विद्यालयी शिक्षा में विज्ञान, तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाए ।

14 वर्ष की आयु तक अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा ।

विज्ञान तथा अनुसंधान की शिक्षा का समानीकरण ।

पाठ्य पुस्तकों को अधिक उत्तम बनाना और सस्ती पुस्तकों का उत्पादन ।

राष्ट्रीय आय का 6 शिक्षा पर व्यय करना जरुरी कर दिया गया ।


संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा-नीति

वर्ष 1991 शिक्षा-नीति में किए गए परिवर्तनों का पुनरीक्षण किया गया जो की राष्ट्रीय शिक्षा निति की रिवाइज़ड वर्शन थी ।

इसके अध्यक्ष श्री जनार्दन रेड्डी थे ।

प्रत्येक विद्यालय में कम से कम तीन शिक्षकों का प्रावधान ।

ऑपरेशन ब्लेक बोर्ड  और स्कूल काम्प्लेक्स योजनाओं को जारी रखा जाए ।

प्रौढ़ शिक्षा(adult education) पर जोर और उसी के लिए “जिला साक्षरता अभियान”  की सिफारिश ।

 

सन  2020 में इसके बाद एक नयी शिक्षा निति आयी है जिसको हम अगले आर्टिकल में पढ़ेंगे कि उसका स्वरुप कैसा है तथा उसके बदलने से शिक्षा के क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है ।

अगर हम बात करें शिक्षा के बदलते स्वरूप की, तो हम आश्चर्यचकित होंगे की शिक्षा दिन व् दिन अपना स्वरुप बदलती है। और दिन व दिन इसमें बदलाव देखने को मिलते रहते हैं।

वैदिक काल से ही शिक्षा में गुण और द्धेष का मिला जुला स्वरुप रहा है। मगर विद्वानों ने इसको द्धेष से गुणवत्ता की ओर धकेलने का प्रयास किया है। वेदों ने शिक्षा की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है, शिक्षा व्यक्तित्व के निर्माण के साथ-साथ चरित्र निर्माण की भी धारणा का प्रतिपादन करते हुए आगे बढ़े तो छात्रों और शिक्षकों में एक क्रन्तिकारी बदलाव होने की सम्भावना का जन्म होता है।

बुद्ध के समय में भी शिक्षा एक व्यापक रूप धारण करते हुए उभर कर आयी। जिस तरह शिक्षा का व्याख्यान वेदों में अध्यात्म के रूप में दर्शाया गया है वहीँ बुद्ध ने भी इसी से जोड़ते हुए ‘अप्प दीपो भवः’ की श्रेणी तक पहुंचाने का काम किया है। भारतीय परम्परा जैसे-जैसे विकास करती गयी वैसे-वैसे शिक्षा में “विकास की नीव से इमारत की कहानी बनती गयी” ।

आज़ादी से पहले अंग्रेजों ने समय-समय पर शिक्षा को काफी परिवर्तित किया। इनके ही समय से शिक्षा को धर्म से अलग करके देखने की शुरुआत देखी जा सकती है। अंग्रेजी हुकमत ही “कान्वेंट थ्योरी” लेकर आयी जहाँ से शिक्षा ने अपने असीम पर फैलाये और शिक्षा सभी के लिए एक सम्भावना तथा अवसर के रूप में उभर कर आयी।

 

सबसे पहले सन 1952-1953  में मुदालियर आयोग (माध्यमिक शिक्षा आयोग) ने आजादी के बाद शिक्षा निति में कुछ बदलाव किये जिसको इन्होने कुछ बिंदुओं के द्वारा समझाया।

1) इन्होने माध्यमिक शिक्षा के सुधर के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग की स्थपना की ।

2) पाठ्यचर्चा में विविधता लाने, एक मध्यवर्ती स्तर जोड़ने, त्रिस्तरीय स्नातक पाठ्यक्रम शुरू करने इत्यादि की सिफारिश की ।

3) वस्तुनिष्ठ (MCQ) परीक्षण-पद्धति को अपनाया जाए ।

4 )संख्यात्मक अंक देने के बजाय सांकेतिक अंक दिया जाए ।

5 )उच्च तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा के पाठ्यक्रम में एक core subject रहे जो अनिवार्य रहे जैसे—गणित, सामान्य ज्ञान, कला, संगीत ।

 

दूसरी बार जो शिक्षा निति में बदलाव हुआ उसको हम 1964-66 कोठारी आयोग राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, 1964-66 के नाम से जानते हैं,

इसकी अध्यक्षता प्रो. दौलत सिंह कोठारी ने की थी

इस आयोग के मूल में तीसरी पंचवर्षीय योजना रही, जिसने बहुत स्पष्ट शब्दों में देश की शिक्षा पद्धति के पुनर्विचार की बात पर बल दिया है।

यह आयोग पहला ऐसा आयोग था जिसने विस्तार से भारतीय शिक्षा पद्धति का अध्ययन किया। इसके परिणामस्वरूप ही वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति अस्तित्व में आ सकी।

लगभग सभी एजुकेशन से जुड़ी बातों को इस निति के द्वारा ध्यान दिया गया या ध्यान खीचा गया, जैसे नारी शिक्षा में होने वाली वित्तीय समस्याओं पर विचार, शिक्षा के प्रति जागरूकता आदि।

 

कोठारी आयोग के बाद राष्ट्र को एक नई शिक्षा निति मिली जो की इन्हीं की सिफारिशों का अग्रिम परिणाम था जिसे हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 (national education policy) के नाम से जानते हैं।

कोठारी आयोग शिक्षा आयोग की सिफारिशों के सम्बन्ध में लोकसभा में व्यापक चर्चा हुई। वर्ष भर में वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दे दी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कुछ प्रमुख बातें जो आपके लिए जानना आवश्यक है,

सामान्य रूप से देश के सभी भागों में शिक्षा का समान ढाँचा अपनाना लाभप्रद होगा जो कि 10़+2़+3 पर आधारित होगा।

शिक्षा में निवेश को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए ।

कमजोर वर्ग के छात्रों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के लिए छात्रवृत्ति योजनायें बढ़ायी जाएँ ।

विद्यालयी शिक्षा में विज्ञान, तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाए ।

14 वर्ष की आयु तक अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा ।

विज्ञान तथा अनुसंधान की शिक्षा का समानीकरण ।

पाठ्य पुस्तकों को अधिक उत्तम बनाना और सस्ती पुस्तकों का उत्पादन ।

राष्ट्रीय आय का 6 शिक्षा पर व्यय करना जरुरी कर दिया गया ।


संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा-नीति

वर्ष 1991 शिक्षा-नीति में किए गए परिवर्तनों का पुनरीक्षण किया गया जो की राष्ट्रीय शिक्षा निति की रिवाइज़ड वर्शन थी ।

इसके अध्यक्ष श्री जनार्दन रेड्डी थे ।

प्रत्येक विद्यालय में कम से कम तीन शिक्षकों का प्रावधान ।

ऑपरेशन ब्लेक बोर्ड  और स्कूल काम्प्लेक्स योजनाओं को जारी रखा जाए ।

प्रौढ़ शिक्षा(adult education) पर जोर और उसी के लिए “जिला साक्षरता अभियान”  की सिफारिश ।

 

सन  2020 में इसके बाद एक नयी शिक्षा निति आयी है जिसको हम अगले आर्टिकल में पढ़ेंगे कि उसका स्वरुप कैसा है तथा उसके बदलने से शिक्षा के क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है ।




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