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कैसा होता है अंतरिक्ष स्टेशन

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कैसा होता है अंतरिक्ष स्टेशन
09 Nov 2021
6 min read
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अंतरिक्ष स्टेशन, अंतरिक्ष में रहने लिए एक कृत्रिम उपग्रह है। यह स्पेस स्टेशन एक विशाल घर की तरह है, जो हजारों मील प्रति घंटा की रफ़्तार से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। स्पेस स्टेशन को ऑर्बिटल स्टेशन भी कहते हैं। यह अंतरिक्ष में मानव निर्मित ऐसा स्टेशन है, जिससे पृथ्वी से कोई अंतरिक्ष यान जाकर मिल सकता है।

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अंतरिक्ष Space की दुनिया रहस्‍यों से भरी है। तभी तो इन रहस्‍यों को जानने के लिए अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष के मिशन पर जाते हैं। अंतरिक्ष में एस्‍ट्रोनॉट Astronaut कैसे जाते हैं, कहाँ रहते हैं ये हर किसी के मन में सवाल उठता है। इस सवाल के जवाब को हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन ISS के बारे में जानकर समझ सकते हैं, जिसे खासतौर पर इंसानों की सुविधाओं का ख्‍याल रखते हुए बनाया गया है।

अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन, अंतरिक्ष में मानव निर्मित ऐसा स्टेशन है, जिससे पृथ्वी से कोई अंतरिक्ष यान जाकर मिल सकता है। अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन इसलिए बनाया जाता है, जिससे वैज्ञानिक Scientist वहाँ जाकर काम कर सकें। सीधी भाषा में हम ये कह सकते हैं कि यहाँ पर इंसानों के रहने के लिए सभी सुविधाएं होती हैं। इसमें इतनी क्षमता होती है कि इस पर अंतरिक्ष यान उतारा जा सके। इन्हें पृथ्वी की लो-ऑर्बिट low-orbit कक्षा में ही स्थापित किया जाता है। स्पेस स्टेशन एक प्रकार का मंच है जहां से पृथ्वी का सर्वेक्षण किया जा सकता है। आकाश के रहस्यों को मालूम किया जा सकता है। हम अक्सर दूसरे ग्रहों पर मानव बस्ती बनाने की बात सुनते हैं। हमारे पड़ोसी ग्रह मंगल तक पहुंचने में करीब 6-7 महीने लगते हैं। इतने महीने अंतरिक्ष में कैसे गुज़ारने होंगे। अंतरिक्ष में रहने पर हमारे शरीर में क्या असर पड़ेगा? इस दौरान हम ज़िंदा कैसे रहेंगे। ऐसे और न जाने कितने बारीक सवालों के लिए रिसर्च ज़रूरी है। ऐसी रिसर्च, जो सिर्फ अंतरिक्ष में ही की जा सकती है।

अंतरिक्ष स्टेशन अंतरिक्ष में उड़ता हुआ उपग्रह Satellite, नई तकनीकी, खगोलीय celestial, पर्यावरण और भूगर्भीय शोध के लिए एक प्रयोगशाला है। अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया एक ऐसा स्टेशन है जहां से अंतरिक्ष के बारे गहराई से अध्ययन किया जा सकता है। इसमें कई सोलर पैनल लगे हुए हैं और इसका वजन लगभग 391000 किलोग्राम है। इस अंतरिक्ष स्टेशन space station में छह अंतरिक्ष यात्री छह महीने तक रह सकते हैं। स्पेस स्टेशन पृथ्वी से लगभग 248 मील (approx 400 km) की औसत ऊंचाई पर उड़ता है। यह 90 मिनट में लगभग 17,500 मिल प्रति घंटे की चाल से हमारी पृथ्वी का चक्कर लगता है। इस प्रोजेक्ट में नासा NASA, यूरोपियन स्पेस एजेंसी European Space Agency, कैनेडियन स्पेस एजेंसी canadian space agency आदि एजेंसियां काम कर रही हैं। 18 देशों के 230 व्यक्तियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का दौरा किया है। भारत की कल्पना चावला Kalpana Chawla और सुनीता विलियम्स Sunita Williams भी इस पर खोज कार्य कर चुकी हैं। पृथ्वी से 100 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष शुरू होता है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। ये करीब 28,000 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इतनी स्पीड से ये 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेता है। आमतौर पर ISS में एकसाथ छह लोग रहते हैं। यहां सबसे ज़्यादा दिन रहने वाले ऐस्ट्रोनॉट नासा के स्कॉट कैली हैं। स्कॉट कैली ने ISS में 340 दिन बिताए। 

अमेरिका अंतरिक्ष में सामान और ऐस्ट्रोनॉट भेजने के लिए स्पेस शटल का इस्तेमाल करता था लेकिन 2003 में स्पेस शटल कोलंबिया Columbia के साथ बड़ा हादसा हो गया। 2003 में स्पेस शटल कोलंबिया स्पेस स्टेशन से पृथ्वी पर लौट रहा था। इसमें सात ऐस्ट्रोनॉट बैठे थे। इनमें से एक कल्पना चावला भी थीं। जब स्पेस शटल पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल हुआ, तो कुछ तकनीकी गड़बड़ हो गई। स्पेस शटल कोलंबिया के टुकड़े-टुकड़े हो गए। अंदर बैठे सातों क्रू मेंबर्स की मौत हो गई। पूरे स्टेशन में सिर्फ दो बाथरूम होते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों और प्रयोगशाला के जानवरों का यूरिन फिल्टर होकर फिर से स्टेशन के ड्रिकिंग वॉटर सप्लाई में चला जाता है, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों को कभी पानी की कमी ना झेलनी पड़े। यह स्पेस सेंटर रात के समय आकाश में चंद्रमा और शुक्र के बाद तीसरा सबसे चमकदार है। जब कोई अंतरिक्ष यात्री किसी भी समय यान से निकलकर अंतरिक्ष में कदम रखता है, तो उसे स्पेस वॉक कहते हैं। क्या आप जानते हैं कि 18 मार्च, 1965 को पहली बार स्पेस वॉक, रूसी अंतरिक्ष यात्री एल्केसी लियोनोव ने की थी। पृथ्वी पर हमारे हिसाब से सही तापमान है। अंतरिक्ष में तापमान बहुत कम हो जाता है। पृथ्वी पर प्रेशर है, वायुमंडलीय दाब, अगर ये प्रेशर न हो, तो हमारा शरीर फूलने लगेगा। स्पेस स्टेशन के अंदर तापमान और प्रेशर भी बनाए रखना पड़ता है। ऑक्सीजन और कार्बन-डाइऑक्साइड का लेवल सही रखना होता है। ISS का हर हिस्सा प्रेशराइज़्ड होता है।

रिसर्च के अलावा ऐस्ट्रोनॉट्स स्पेस स्टेशन को मेंटेन भी करते हैं। कई बार किसी चीज़ को सुधारने के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता है। स्पेस-वॉक करनी पड़ती है। इसके लिए उन्हें स्पेस सूट पहनना ज़रूरी होता है। बाकी अंदर सब लोग नॉर्मल कपड़ों में रहते हैं। इस स्टेशन में ऑक्सीजन electrolysis की प्रक्रिया के जरिए आती है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में सबसे बड़ा बदलाव ग्रैविटी को लेकर आता है। पृथ्वी गोल है, लेकिन सब लोग ज़मीन से चिपके रहते हैं क्योंकि पृथ्वी का अपना गुरुत्वाकर्षण बल है। ISS के अंदर बहुत ही कम ग्रैविटी होती है। दरअसल, जिस ऊंचाई पर ISS है, वहां पृथ्वी के मुकाबले 90% ग्रैविटी रहती है। अगर आप उस ऊंचाई से कोई चीज़ छोड़ेंगे, तो वो पृथ्वी की ग्रैविटी से नीचे खिंची आएगी। फिर ISS के अंदर ग्रैविटी क्यों फील नहीं होती? क्योंकि ये बहुत तेज़ रफ्तार से चल रहा है। मेले में वो बड़ा-सा गोल पहिए वाला झूला होता है। जब आप उसके टॉप वाले पॉइंट से नीचे आते हैं, तो कैसा लगता है? या जब रोलर-कोस्टर नीचे की तरफ जाता है, कैसा लगता है? पेट में गुदगुदी-सी होती है न? ऐसा ग्रैविटी के कारण होता है। उस समय आपके लिए ग्रैविटी कम हो जाती है, क्योंकि आप फ्री-फॉल कंडीशन में होते हैं। ISS हमेशा फ्री-फॉल की कंडीशन में रहता है। फिज़िक्स की भाषा में कहें, तो इसका एक्सीलरेशन पृथ्वी की तरफ होता है, इसलिए एक स्यूडो-फोर्स बनता है। वो ग्रैविटेशनल फोर्स को कैंसिल कर देता है, इसलिए ISS की इफेक्टिव ग्रैविटी बहुत कम हो जाती है। लगभग शून्य के बराबर, इसे माइक्रोग्रेविटी कहते हैं।

माइक्रोग्रैविटी microgravity में बहुत सारे काम मुश्किल हो जाते हैं। ऊपर और नीचे जैसी कोई चीज़ नहीं होती, इसलिए ऐस्ट्रोनॉट हवा में तैरते हैं। बैठ भी नहीं सकते। ISS में सोने के लिए खास तरह के स्लीपिंग स्टेशन बने हुए हैं। ऐस्ट्रोनॉट ख़ुद को स्लीपिंग बैग में बांध लेते हैं, ताकि नींद में यहां-वहां न उड़ जाएं। माइक्रोग्रैविटी के कारण ISS का टॉयलेट भी बहुत अलग है। पृथ्वी पर ग्रैविटी हमारे मल और मूत्र को नीचे खींच लेती है। इसलिए हमें इसके सेटल होने की चिंता नहीं करनी पड़ती लेकिन वहाँ पर ऐसा नहीं होता है। स्पेस स्टेशन के अंदर खास तरह के माइक्रोग्रैविटी टॉयलेट लगाए गए हैं। ये टॉयलेट सक्शन पर चलते हैं यानी हवा के ज़रिए मल और मूत्र को अंदर खींच लिया जाता है। माइक्रोग्रैविटी में ऐस्ट्रोनॉट्स को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी होती। उनकी मसल्स कमज़ोर होने लगती है, इसलिए उन्हें एक्सरसाइज़ करनी पड़ती है। हर ऐस्ट्रोनॉट को दो घंटे एक्सरसाइज़ करनी होती है। एक्सरसाइज़ वाली मशीन भी हवा के दबाव से काम करती हैं।