facebook-pixel
Startup Initiative

काजू की खेती लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देती

Startup Initiative

काजू की खेती लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देती

cashew-cultivation-encourages-small-scale-industries

Post Highlights

काजू की खेती कोई भी साधारण इंसान थोड़ी सी जागरूकता के साथ शुरू कर सकता है। यह ऐसा व्यवसाय है जो उद्योग क्षेत्र में एक व्यक्ति को स्थापित कर सकता है। इससे होने वाले फायदे मनुष्य को मजबूत आर्थिक स्थिति तो प्रदान करेंगे ही साथ में लोगों को लघु उद्योगों में अपनी भूमिका को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित भी करेंगे। लघु उद्योग के माध्यम से ही सामान्य लोगों की बढ़ती अर्थव्यवस्था में ज्यादा भागेदारी होती है।    

उद्योग जगत विश्व का वो भाग है जिसने पूरी दुनिया को प्राचीन काल से खींचकर आधुनिक काल में प्रवेश कराने का काम किया है। आज हमारी छोटी से लेकर बड़ी चीज़ की जरूरत को उद्योग जगत ही पूरा करता है। वैश्विक चाल के साथ सरपट दौड़ता हमारा देश लगातार इस फुर्ती को बनाये हुए है। पिछले कुछ दशक में देश में कई ऐसी कंपनियों ने अपने पैर पसारे जिन्हें अब विश्व स्तर पर पहचाना जाता है। हालाँकि कुछ कम्पनियां ऐसी भी हैं जो सैकड़े की गिनती को पार गयी हैं, आज भी वो उतने ही तन्मयता के साथ खड़ी अपना कार्य कर ही हैं। यह सब वो संगठन हैं जो देश में बड़े स्तर पर काम करती हैं। देश की लगभग आधी से ज्यादा आबादी इसका सपना देखती है कि उसका भी अपना उद्योग हो, भले ही वह छोटे स्तर पर ही क्यों न काम करे। परन्तु छोटे स्तर पर काम शुरू करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पूँजी ना होने के कारण तथा उस उद्योग में फायदा-नुकसान के गठजोड़ के भय से व्यक्ति अपना व्यवसाय शुरू नहीं करता। ऐसे कई कार्य हैं जिसका व्यवसाय छोटे स्तर पर कम पूंजी में शुरू किया जा सकता है, परन्तु पर्याप्त जानकारी के अभाव में लोग उद्योग क्षेत्र की तरफ कदम नहीं बढ़ाते।   

हर इलाके में काजू का उत्पादन 

अगर हम ध्यानपूर्वक सोचें तो छोटे औद्योगिक क्षेत्र में व्यवसाय करने की तथा उसमें सफल होने की सम्भावना बड़े औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में अधिक है। इसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा है, बस जरूरत है तो हमें अपने आत्मविश्वास के साथ इसमें कदम रखने की। छोटे उद्योगों की खासियत यह है कि यह केवल शहरी इलाकों तक ही सिमट के नहीं बैठा है। इसने देश के हर कोने में अपने लिए जगह बनाई है। देश का कोई भी व्यक्ति जहाँ पर रहता है, वहीं से छोटे उद्योग की शुरूआत कर सकता है। ऐसे ही छोटे उद्योगों को बढ़ावा देता एक व्यवसाय है काजू की खेती का।

तीसरा सबसे बड़ा काजू निर्यातक देश 

काजू पूरे विश्व में सबसे अधिक उगाया जाने वाला मेवा है। यह अत्यधिक महंगे बिकने वाले मेवे में से एक है। वियतनाम और नाइजीरिया के बाद भारत विश्व का तीसरा वह देश है जो काजू का सबसे अधिक उत्पादन करता है और निर्यात करता है। 23% काजू की पैदावार भारत में ही होती है। देश में प्रति वर्ष में इसका उत्पादन 6.74 लाख टन का है। वैसे तो यह उन इलाकों में उगाया जाता है जहाँ की मिट्टी में पानी के आसानी से निकलने की सुविधा हो(अर्थात बलुई मिट्टी में), परन्तु काजू का उत्पादन बाकि क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि तटीय इलाकों में आधे से ज्यादा लोगों की आजीविका काजूू की खेती के माध्यम से ही चलती है। करीब 2 लाख लोग काजू की खेती से जुड़े हैं, जिनमें करीब 90% कामगार महिलाएं हैं। काजू  की खेती करके या तो आप खुद बाजार में एक विक्रेता के रूप में काम कर सकते हैं या तो अन्य कंपनियों को काजू का निर्यात कर सकते हैं। काजू उन उत्पादों में से एक है, जिसके माध्यम से विदेशी मुद्रा का भारत में प्रवेश होता है। 

बारिश के समय करें पौधारोपण 

काजू की खेती भी सामान्य खेती की तरह की जाती है। इस बात का ध्यान देना आवश्यक है कि ठंढ में पड़ने वाले पाले से इसे बचाया जा सके। पौधों के लगने से पहले खेत को अच्छे तरीके से तैयार करने की जरूरत होती है। खर-पतवार को खेत से पूरी तरह से निकाल दें, तथा खेत का कम से कम 2 या 3 बार जुताई करें। इससे पौधों को सुचारु रूप से बढ़ने में परेशानी नहीं होगी। पौधारोपण के लिए सबसे सही समय मॉनसून आने के पहले मई-जून का होता है। ढलान वाली जगह पर मिट्टी को तैयार करने के बाद वहां पर निश्चित दूरी पर गढ्ढे बनाये जाते हैं, उसमें जैविक तथा रासायनिक खाद को मिट्टी में मिलाकर 15-20 दिन तक छोड़ा जाता है। ऐसा करने से काजू का पौधा ज्यादा अच्छे से विकास करता है। इसके बाद बारिश के शुरूआती महीने में पौधों को गढ्ढों में रोपा जाता है। इसके बाद इसका समय-समय पर ध्यान देना पड़ता है। 

समय-समय पर कांट-छांट की जरूरत 

काजू के पौधों को आकार देने की भी आवश्यकता होती है। इसके लिए समय-समय पर इसमें कांट-छांट करते रहने की जरूरत होती है। काजू के पौधों में कीटों के लगने का खतरा ज्यादा रहता है, जो उसके फूलों, कल्लों के रस को चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके लिए इस पर कीटनाशक का छिड़काव कल्ले आते समय, उसके बाद फूल आते समय और फिर फल लगते समय करना पड़ता है। 

कुछ वर्षों तक पौधे से मुनाफ़ा 

काजू वह फसल है जिसमें पूरे फसल को नहीं ख़त्म करते हैं। केवल पौधे से गिरे हुए नट को ही इस्तेमाल में लाया जाता है। बीने गए नट को धूप में सूखाते हैं, फिर उसको जूट के बोरों में भरकर ऊँचे स्थानों पर टांग दिया जाता है। इसके बाद इससे काजू को निकाला जाता है। प्रति हेक्टेयर 10-15 क्विंटल तक काजू निकलते हैं। इस प्रकार एक बार काजू का फसल लगाने से हम कई बार काजू के नट को प्राप्त करते हैं। 

काजू लघु उद्योग का अच्छा विकल्प 

इसकी खेती अन्य खेती की तरह की जाती है। कोई भी इसे अपने लघु उद्योग के रूप में चुन सकता है। क्योंकि  इसकी खेती में आपको अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु इससे होने वाले लाभ लम्बे समय तक चलते हैं। चूँकि इसकी मांग दुनिया भर में ज्यादा है, इसलिए इससे आपकी अच्छी आमदनी भी हो सकती है। साथ ही आप काजू से बनने वालो उत्पादों को भी बनाकर औद्योगिक बाज़ार में एक कंपनी के रूप में उतर सकते हैं। 

उद्योग जगत विश्व का वो भाग है जिसने पूरी दुनिया को प्राचीन काल से खींचकर आधुनिक काल में प्रवेश कराने का काम किया है। आज हमारी छोटी से लेकर बड़ी चीज़ की जरूरत को उद्योग जगत ही पूरा करता है। वैश्विक चाल के साथ सरपट दौड़ता हमारा देश लगातार इस फुर्ती को बनाये हुए है। पिछले कुछ दशक में देश में कई ऐसी कंपनियों ने अपने पैर पसारे जिन्हें अब विश्व स्तर पर पहचाना जाता है। हालाँकि कुछ कम्पनियां ऐसी भी हैं जो सैकड़े की गिनती को पार गयी हैं, आज भी वो उतने ही तन्मयता के साथ खड़ी अपना कार्य कर ही हैं। यह सब वो संगठन हैं जो देश में बड़े स्तर पर काम करती हैं। देश की लगभग आधी से ज्यादा आबादी इसका सपना देखती है कि उसका भी अपना उद्योग हो, भले ही वह छोटे स्तर पर ही क्यों न काम करे। परन्तु छोटे स्तर पर काम शुरू करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पूँजी ना होने के कारण तथा उस उद्योग में फायदा-नुकसान के गठजोड़ के भय से व्यक्ति अपना व्यवसाय शुरू नहीं करता। ऐसे कई कार्य हैं जिसका व्यवसाय छोटे स्तर पर कम पूंजी में शुरू किया जा सकता है, परन्तु पर्याप्त जानकारी के अभाव में लोग उद्योग क्षेत्र की तरफ कदम नहीं बढ़ाते।   

हर इलाके में काजू का उत्पादन 

अगर हम ध्यानपूर्वक सोचें तो छोटे औद्योगिक क्षेत्र में व्यवसाय करने की तथा उसमें सफल होने की सम्भावना बड़े औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में अधिक है। इसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा है, बस जरूरत है तो हमें अपने आत्मविश्वास के साथ इसमें कदम रखने की। छोटे उद्योगों की खासियत यह है कि यह केवल शहरी इलाकों तक ही सिमट के नहीं बैठा है। इसने देश के हर कोने में अपने लिए जगह बनाई है। देश का कोई भी व्यक्ति जहाँ पर रहता है, वहीं से छोटे उद्योग की शुरूआत कर सकता है। ऐसे ही छोटे उद्योगों को बढ़ावा देता एक व्यवसाय है काजू की खेती का।

तीसरा सबसे बड़ा काजू निर्यातक देश 

काजू पूरे विश्व में सबसे अधिक उगाया जाने वाला मेवा है। यह अत्यधिक महंगे बिकने वाले मेवे में से एक है। वियतनाम और नाइजीरिया के बाद भारत विश्व का तीसरा वह देश है जो काजू का सबसे अधिक उत्पादन करता है और निर्यात करता है। 23% काजू की पैदावार भारत में ही होती है। देश में प्रति वर्ष में इसका उत्पादन 6.74 लाख टन का है। वैसे तो यह उन इलाकों में उगाया जाता है जहाँ की मिट्टी में पानी के आसानी से निकलने की सुविधा हो(अर्थात बलुई मिट्टी में), परन्तु काजू का उत्पादन बाकि क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि तटीय इलाकों में आधे से ज्यादा लोगों की आजीविका काजूू की खेती के माध्यम से ही चलती है। करीब 2 लाख लोग काजू की खेती से जुड़े हैं, जिनमें करीब 90% कामगार महिलाएं हैं। काजू  की खेती करके या तो आप खुद बाजार में एक विक्रेता के रूप में काम कर सकते हैं या तो अन्य कंपनियों को काजू का निर्यात कर सकते हैं। काजू उन उत्पादों में से एक है, जिसके माध्यम से विदेशी मुद्रा का भारत में प्रवेश होता है। 

बारिश के समय करें पौधारोपण 

काजू की खेती भी सामान्य खेती की तरह की जाती है। इस बात का ध्यान देना आवश्यक है कि ठंढ में पड़ने वाले पाले से इसे बचाया जा सके। पौधों के लगने से पहले खेत को अच्छे तरीके से तैयार करने की जरूरत होती है। खर-पतवार को खेत से पूरी तरह से निकाल दें, तथा खेत का कम से कम 2 या 3 बार जुताई करें। इससे पौधों को सुचारु रूप से बढ़ने में परेशानी नहीं होगी। पौधारोपण के लिए सबसे सही समय मॉनसून आने के पहले मई-जून का होता है। ढलान वाली जगह पर मिट्टी को तैयार करने के बाद वहां पर निश्चित दूरी पर गढ्ढे बनाये जाते हैं, उसमें जैविक तथा रासायनिक खाद को मिट्टी में मिलाकर 15-20 दिन तक छोड़ा जाता है। ऐसा करने से काजू का पौधा ज्यादा अच्छे से विकास करता है। इसके बाद बारिश के शुरूआती महीने में पौधों को गढ्ढों में रोपा जाता है। इसके बाद इसका समय-समय पर ध्यान देना पड़ता है। 

समय-समय पर कांट-छांट की जरूरत 

काजू के पौधों को आकार देने की भी आवश्यकता होती है। इसके लिए समय-समय पर इसमें कांट-छांट करते रहने की जरूरत होती है। काजू के पौधों में कीटों के लगने का खतरा ज्यादा रहता है, जो उसके फूलों, कल्लों के रस को चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके लिए इस पर कीटनाशक का छिड़काव कल्ले आते समय, उसके बाद फूल आते समय और फिर फल लगते समय करना पड़ता है। 

कुछ वर्षों तक पौधे से मुनाफ़ा 

काजू वह फसल है जिसमें पूरे फसल को नहीं ख़त्म करते हैं। केवल पौधे से गिरे हुए नट को ही इस्तेमाल में लाया जाता है। बीने गए नट को धूप में सूखाते हैं, फिर उसको जूट के बोरों में भरकर ऊँचे स्थानों पर टांग दिया जाता है। इसके बाद इससे काजू को निकाला जाता है। प्रति हेक्टेयर 10-15 क्विंटल तक काजू निकलते हैं। इस प्रकार एक बार काजू का फसल लगाने से हम कई बार काजू के नट को प्राप्त करते हैं। 

काजू लघु उद्योग का अच्छा विकल्प 

इसकी खेती अन्य खेती की तरह की जाती है। कोई भी इसे अपने लघु उद्योग के रूप में चुन सकता है। क्योंकि  इसकी खेती में आपको अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु इससे होने वाले लाभ लम्बे समय तक चलते हैं। चूँकि इसकी मांग दुनिया भर में ज्यादा है, इसलिए इससे आपकी अच्छी आमदनी भी हो सकती है। साथ ही आप काजू से बनने वालो उत्पादों को भी बनाकर औद्योगिक बाज़ार में एक कंपनी के रूप में उतर सकते हैं। 




Newsletter

Read and Subscribe