डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे बदल रहा है भारत की शासन व्यवस्था

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डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे बदल रहा है भारत की शासन व्यवस्था
01 Jun 2026
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डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) 21वीं सदी में देशों के शासन, लेन-देन और सार्वजनिक सेवाओं को प्रदान करने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। भारत इस क्षेत्र में केवल डिजिटल तकनीक का उपयोग करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि अब वह ऐसी डिजिटल व्यवस्था का निर्माणकर्ता बन गया है, जिसे दुनिया एक आदर्श मॉडल के रूप में देख रही है।

भारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशाल पहुंच, खुली डिजिटल व्यवस्था और विभिन्न प्रणालियों के बीच मजबूत एकीकरण है। पहचान (Identity), डिजिटल भुगतान (Payments) और डेटा साझा करने की सेवाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, जिससे 1.4 अरब से अधिक लोगों तक सरकारी योजनाओं, वित्तीय सेवाओं और अन्य सुविधाओं को आसानी से पहुंचाया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर Digital Public Infrastructure उन बुनियादी डिजिटल प्रणालियों का समूह है जो आधुनिक समाज की रीढ़ बनते हैं। यह लोगों, व्यवसायों और सरकारों के बीच सुरक्षित, तेज और सहज संपर्क स्थापित करने में मदद करता है।

किसी भी डिजिटल व्यवस्था को वास्तव में सफल बनाने के लिए उसका समावेशी, आपस में जुड़ा हुआ और जनहित पर आधारित होना आवश्यक है। भारत ने यह साबित किया है कि कम लागत में भी बड़े स्तर पर प्रभावी डिजिटल सार्वजनिक सेवाएं विकसित की जा सकती हैं।

आज दुनिया के कई देश भरोसेमंद और समावेशी डिजिटल मॉडल की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में भारत का अनुभव वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। फरवरी 2026 तक भारत सरकार 24 देशों के साथ इंडिया स्टैक और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर चुकी है।

भारत की यह डिजिटल यात्रा India's Digital Journey दिखाती है कि तकनीक को केवल व्यावसायिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक संसाधन के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

इससे यह सिद्ध होता है कि डिजिटल समावेशन, पारदर्शिता और दक्षता एक साथ आगे बढ़ सकते हैं तथा समाज के हर वर्ग को इसका लाभ मिल सकता है।

भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है? (What is India's Digital Public Infrastructure, and why is it important?)

भारत के डीपीआई की नींव: जैम त्रिमूर्ति (Foundations of India's DPI: The JAM Trinity)

जैम समन्वय को समझना (Understanding the JAM Convergence)

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) एक दिन में नहीं बना। इसकी शुरुआत पहचान, बैंकिंग और कनेक्टिविटी के एक सुनियोजित संयोजन से हुई, जिसे जैम (JAM) त्रिमूर्ति कहा जाता है। इसमें जन धन बैंक खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी शामिल हैं।

इस मॉडल ने भारत के डिजिटल परिवर्तन की मजबूत नींव रखी। इससे लोगों और सरकार के बीच सीधा तथा भरोसेमंद जुड़ाव स्थापित हुआ।

जैम के माध्यम से सरकारी लाभ सीधे लोगों के बैंक खातों में पहुंचने लगे। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई, भुगतान में देरी घटी और योजनाओं में होने वाली गड़बड़ियों पर नियंत्रण मिला। यही व्यवस्था आगे चलकर एक व्यापक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित हुई।

आधार: डिजिटल पहचान की मजबूत नींव (Aadhaar: The Digital Identity Backbone)

आधार ने देश के निवासियों को बायोमेट्रिक आधारित डिजिटल पहचान प्रदान की। इससे लोगों की विशिष्ट पहचान सुनिश्चित हुई और सेवाओं तक सुरक्षित तथा तेज़ पहुंच संभव हो सकी।

मार्च 2026 तक देश में 144 करोड़ से अधिक आधार संख्या जारी की जा चुकी थीं, जो इसकी व्यापक पहुंच को दर्शाती हैं।

आधार की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024-25 के दौरान इस प्लेटफॉर्म पर 2,707 करोड़ से अधिक प्रमाणीकरण (Authentication) लेनदेन किए गए।

आधार के कारण पहचान सत्यापन तेज़ और आसान हुआ। इससे सरकारी सेवाओं तक पहुंच अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनी। वर्तमान में सरकार की 2,240 से अधिक सामाजिक कल्याण योजनाएं लाभार्थियों तक सुरक्षित और सटीक तरीके से लाभ पहुंचाने के लिए आधार का उपयोग कर रही हैं।

जन धन योजना: वित्तीय समावेशन की क्रांति (Jan Dhan Yojana: Financial Inclusion Revolution)

प्रधानमंत्री जन धन योजना Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana की शुरुआत अगस्त 2014 में वित्तीय समावेशन के राष्ट्रीय मिशन के रूप में की गई थी। इसका उद्देश्य प्रत्येक ऐसे वयस्क नागरिक को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था, जिसके पास बैंक खाता नहीं था।

इस योजना के तहत लोगों को बैंक खाते, वित्तीय पहचान, ऋण, बीमा और पेंशन जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं तक पहुंच प्रदान की गई।

जन धन खातों की संख्या 2015 में 14.72 करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 तक 57.71 करोड़ हो गई।

इसी अवधि में इन खातों में जमा राशि 15,670 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.94 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

योजना के तहत लाभार्थियों को 39.98 करोड़ रुपे डेबिट कार्ड भी जारी किए गए, जिससे डिजिटल और औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक उनकी पहुंच और मजबूत हुई।

इस पहल ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी और वित्तीय सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया।

Also Read: कैसे प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना बदल रही है भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था

मोबाइल फोन और कनेक्टिविटी: तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ (Mobile Phones and Connectivity: The Third Pillar)

कनेक्टिविटी ने जैम त्रिमूर्ति को पूर्ण बनाया। वर्ष 2026 तक भारत के 85.5 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक स्मार्टफोन उपलब्ध था।

मोबाइल फोन अब केवल संचार का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह बैंक, कक्षा और सरकारी सेवाओं तक पहुंच का प्रमुख साधन बन गया है।

दिसंबर 2025 तक देश में वायरलेस टेलीफोन ग्राहकों की संख्या 125.87 करोड़ तक पहुंच गई थी।

पांचवीं पीढ़ी की मोबाइल सेवा यानी 5G अब देश के 99.9 प्रतिशत जिलों में उपलब्ध है और लगभग 85 प्रतिशत आबादी तक इसकी पहुंच बन चुकी है।

दिसंबर 2025 तक देशभर में 5.18 लाख 5G बेस ट्रांसीवर स्टेशन स्थापित किए जा चुके थे।

इस मजबूत डिजिटल नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि पहचान, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोगों तक समान रूप से पहुंच सकें।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के सबसे बड़े और सफल डिजिटल परिवर्तन मॉडलों में से एक माना जाता है। आधार, जन धन और मोबाइल कनेक्टिविटी की यह त्रिमूर्ति न केवल सेवाओं की डिलीवरी को बेहतर बना रही है, बल्कि समावेशी विकास और राष्ट्र निर्माण को भी नई दिशा दे रही है।

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई): डिजिटल वाणिज्य में क्रांतिकारी बदलाव (Unified Payments Interface (UPI): Transforming Digital Commerce)

अभूतपूर्व विस्तार और तेज़ विकास (Unprecedented Scale and Growth)

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने खुदरा भुगतान प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है। इसने लोगों और व्यापारियों के बीच तुरंत, सुरक्षित और आसान डिजिटल भुगतान को संभव बनाया है।

जनवरी 2026 में ही यूपीआई के माध्यम से 21.70 अरब से अधिक लेनदेन किए गए, जिनका कुल मूल्य 28.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक था। यह दर्शाता है कि यूपीआई आज भारत के दैनिक आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

वर्तमान में 691 बैंक यूपीआई प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं, जो इसकी व्यापक स्वीकृति और मजबूत बैंकिंग नेटवर्क को दर्शाता है।

वैश्विक स्तर पर पहचान (Global Recognition)

जून 2025 में जारी अपनी रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने यूपीआई को लेनदेन की संख्या के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल फास्ट पेमेंट प्रणाली बताया था।

ACI Worldwide’s 2024  की रिपोर्ट "Prime Time for Real Time" के अनुसार, भारत का यूपीआई दुनिया के कुल रियल-टाइम भुगतान लेनदेन का लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।

देश के भीतर खुदरा भुगतान लेनदेन की कुल मात्रा का लगभग 81 प्रतिशत यूपीआई के माध्यम से किया जाता है। यही कारण है कि यह व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) और व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) दोनों प्रकार के डिजिटल भुगतानों का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है।

यूपीआई की ऐतिहासिक उपलब्धियां (UPI's Historic Achievements)

यूपीआई की सफलता का अंदाजा इसके तेज़ी से बढ़ते उपयोग से लगाया जा सकता है।

वित्त वर्ष 2016-17 में जहां यूपीआई पर केवल 2 करोड़ लेनदेन हुए थे, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 24,162 करोड़ से अधिक हो गई। यह लगभग 12,000 गुना वृद्धि को दर्शाता है।

अगस्त 2025 में पहली बार मासिक यूपीआई लेनदेन 2,000 करोड़ के आंकड़े को पार कर गया और 2,001 करोड़ लेनदेन दर्ज किए गए।

इसके बाद दिसंबर 2025 में 2,163 करोड़ लेनदेन दर्ज हुए, जो यूपीआई के दस वर्षों के इतिहास में सबसे अधिक मासिक लेनदेन था।

पूरे वर्ष 2025 के दौरान यूपीआई ने लगभग 22,000 करोड़ लेनदेन संसाधित किए। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन औसतन लगभग 60 करोड़ डिजिटल भुगतान यूपीआई के माध्यम से किए गए।

बाजार में यूपीआई की अग्रणी स्थिति (UPI's Leading Position in the Market)

जनवरी 2026 तक यूपीआई लेनदेन के मामले में PhonePe सबसे आगे रहा, जिसने 9,913.63 मिलियन लेनदेन दर्ज किए।

इसके बाद Google Pay का स्थान रहा, जिसने 7,229.11 मिलियन लेनदेन संसाधित किए।

Paytm ने 1,659.49 मिलियन लेनदेन के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया।

यूपीआई ने कई वैश्विक भुगतान नेटवर्क को पीछे छोड़ते हुए भारत को तेज़, सुरक्षित और समावेशी डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में विश्व अग्रणी बना दिया है।

सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) (Public Financial Management System (PFMS) and Direct Benefit Transfer)

सरकारी खर्च में पारदर्शिता (Transparency in Public Expenditure)

सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) ने सरकारी धन के प्रबंधन और निगरानी को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया है।

यह एक वेब-आधारित ऑनलाइन प्रणाली है, जो सरकारी धन के आवंटन से लेकर अंतिम भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया पर निगरानी रखती है।

दिसंबर 2014 में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाओं के भुगतान, लेखांकन और रिपोर्टिंग के लिए PFMS को अनिवार्य बनाया गया था।

इस सुधार से फर्जी और डुप्लीकेट लाभार्थियों की पहचान कर उन्हें हटाने में मदद मिली। साथ ही सरकारी योजनाओं में होने वाली वित्तीय गड़बड़ियों और रिसाव को भी काफी हद तक कम किया गया।

रिकॉर्ड बचत और बेहतर कल्याण वितरण (Monumental Savings)

PFMS और DBT की मदद से सरकार ने वर्ष 2015 से मार्च 2024 के बीच 4.31 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है।

जनवरी 2026 तक प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से लाभार्थियों के खातों में कुल 49.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे हस्तांतरित की जा चुकी है।

यह भारत की कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में एक बड़ा बदलाव है।

अब सरकारी लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचते हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका लगभग समाप्त हो गई है।

इस व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया है कि योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक सही समय पर पहुंचे। साथ ही इससे सरकारी खर्च में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता भी बढ़ी है।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विशेष रूप से यूपीआई, पीएफएमएस और डीबीटी जैसे प्लेटफॉर्म, देश को अधिक पारदर्शी, समावेशी और तकनीक-सक्षम अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रहे हैं। ये पहलें न केवल नागरिकों को बेहतर सेवाएं प्रदान कर रही हैं, बल्कि सुशासन और राष्ट्र निर्माण को भी नई मजबूती दे रही हैं।

डिजिलॉकर: डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट की क्रांति (DigiLocker: Digital Document Wallet Revolution)

बड़े पैमाने पर उपयोग और स्वीकृति (Massive User Adoption)

वर्ष 2015 में शुरू किया गया डिजिलॉकर नागरिकों के लिए एक सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट के रूप में विकसित किया गया था। यह लोगों को अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने, देखने और आवश्यकता पड़ने पर साझा करने की सुविधा देता है।

यह प्लेटफॉर्म सहमति-आधारित (Consent-Based) पहुंच प्रदान करता है, जिससे दस्तावेज़ों की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित होती है। साथ ही यह नकली दस्तावेज़ों के उपयोग को कम करने में भी मदद करता है।

5 मार्च 2026 तक डिजिलॉकर के 67.63 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता थे, जो इसकी व्यापक लोकप्रियता और उपयोगिता को दर्शाते हैं।

दस्तावेज़ जारी करने में ऐतिहासिक उपलब्धियां (Document Issuance Milestones)

मार्च 2026 तक डिजिलॉकर के माध्यम से 950 करोड़ से अधिक दस्तावेज़ जारी किए जा चुके थे। यह सार्वजनिक सेवाओं में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

इनमें से 675 करोड़ से अधिक ई-दस्तावेज़ विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी किए गए हैं।

पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या जापान की कुल आबादी से चार गुना से भी अधिक है, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल दस्तावेज़ भंडारों में से एक बन गया है।

अब नागरिक अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज़, जैसे शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, लाइसेंस और अन्य सरकारी रिकॉर्ड, कभी भी और कहीं से भी प्राप्त कर सकते हैं। इससे सरकारी दस्तावेज़ों के उपयोग और प्रबंधन का तरीका पूरी तरह बदल गया है।

कोविन: वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य मंच की सफलता की कहानी (CoWIN: Global Health Platform Success Story)

महामारी प्रबंधन में उत्कृष्ट प्रदर्शन (Pandemic Response Excellence)

कोविन (CoWIN) प्लेटफॉर्म की शुरुआत 16 जनवरी 2021 को भारत के कोविड-19 टीकाकरण अभियान के डिजिटल आधार के रूप में की गई थी।

इस प्लेटफॉर्म ने वैक्सीन निर्माताओं, स्वास्थ्य कर्मियों, टीकाकरण केंद्रों और लाभार्थियों को एक ही डिजिटल मंच पर जोड़ा।

सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को एक साथ जोड़कर कोविन ने दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया।

220 करोड़ से अधिक वैक्सीन डोज़ के प्रबंधन के साथ इस प्लेटफॉर्म ने बड़े स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन की क्षमता का प्रदर्शन किया।

अभूतपूर्व पैमाना और उपलब्धियां (Unprecedented Scale)

कोविन पोर्टल पर 95 करोड़ से अधिक नागरिकों ने ऑनलाइन और ऑन-साइट माध्यमों से पंजीकरण कराया।

यह प्लेटफॉर्म एक अरब से अधिक लोगों की आवश्यकताओं को संभालने की क्षमता रखता है।

कोविन के माध्यम से 160 करोड़ से अधिक वैक्सीन डोज़ लगाए गए और उनका डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रूप से दर्ज किया गया।

देशभर में 2.05 करोड़ से अधिक टीकाकरण सत्र आयोजित किए गए।

टीकाकरण के लिए 4.70 लाख से अधिक केंद्रों का उपयोग किया गया, जिनमें से लगभग 73 प्रतिशत केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित थे।

जनवरी 2021 से सितंबर 2022 के बीच कुल 104 करोड़ लाभार्थियों में से 84.7 करोड़ से अधिक लोगों के रिकॉर्ड आधार से जोड़े गए, जिससे पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया और अधिक मजबूत हुई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना (International Recognition)

कोविन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रियल-टाइम डेटा ट्रैकिंग क्षमता थी, जिसने टीकाकरण कार्यक्रम के बेहतर समन्वय और लोगों के विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके सफल संचालन और डिज़ाइन ने दुनिया भर के देशों का ध्यान आकर्षित किया।

कई देशों ने कोविन को डिजिटल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के एक आदर्श मॉडल के रूप में अध्ययन किया है।

भारत ने इस प्लेटफॉर्म को केवल अपने देश तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर के रूप में दुनिया को निःशुल्क उपलब्ध कराया।

कोविन की सफलता ने यह साबित किया कि बड़े पैमाने पर जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों का प्रभावी प्रबंधन डिजिटल तकनीक की सहायता से किया जा सकता है।

यह पहल डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को वैश्विक सार्वजनिक हित के साधन के रूप में प्रस्तुत करने का एक सफल उदाहरण बन गई है।

डिजिलॉकर और कोविन जैसे प्लेटफॉर्म यह दर्शाते हैं कि भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर केवल तकनीकी नवाचार नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को बेहतर सेवाएं, अधिक पारदर्शिता और आसान पहुंच प्रदान करने वाला एक सशक्त साधन भी है। ये पहलें भारत को डिजिटल शासन और सार्वजनिक सेवा वितरण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं।

ई-संजीवनी: टेलीमेडिसिन से स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव (eSanjeevani: Telemedicine Transforming Healthcare Access)

स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना (Bridging Healthcare Gaps)

ई-संजीवनी की शुरुआत नवंबर 2019 में की गई थी। इसका उद्देश्य टेलीमेडिसिन के माध्यम से लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना था, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक।

यह प्लेटफॉर्म मरीजों को घर बैठे डॉक्टरों से परामर्श लेने की सुविधा देता है। इससे यात्रा का खर्च और समय दोनों बचते हैं। साथ ही दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह भी आसानी से मिल जाती है।

ई-संजीवनी ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, सुविधाजनक और समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ई-संजीवनी सेवाओं का उल्लेखनीय विकास और उपलब्धियां (Remarkable Growth and Achievements of e-Sanjeevani Services)

5 मार्च 2026 तक ई-संजीवनी के माध्यम से 45.42 करोड़ से अधिक मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा चुकी हैं।

इस प्लेटफॉर्म से 2.3 लाख से अधिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता और डॉक्टर जुड़ चुके हैं।

टेली-कंसल्टेशन अब केवल एक प्रयोगात्मक पहल नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

ई-संजीवनी आज दुनिया के सबसे बड़े टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्मों में से एक है। इसने भौगोलिक दूरी की बाधाओं को कम करते हुए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाया है।

दीक्षा: स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय मंच (DIKSHA: National Platform for School Education)

शिक्षा में डिजिटल परिवर्तन (Educational Transformation)

दीक्षा (DIKSHA) प्लेटफॉर्म की शुरुआत वर्ष 2017 में की गई थी। यह भारत की स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय डिजिटल मंच है।

इस पहल का संचालन शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद National Council for Educational Research and Training (NCERT) द्वारा किया जाता है।

आज लगभग सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस मंच का उपयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और कई अन्य शैक्षिक संस्थान भी इससे जुड़े हुए हैं।

यह मंच छात्रों, शिक्षकों और शिक्षा प्रशासकों को डिजिटल सामग्री, प्रशिक्षण और सीखने के संसाधन उपलब्ध कराता है।

दीक्षा प्लेटफॉर्म के प्रभावशाली आंकड़े और उपलब्धियां (Impressive Statistics and Achievements of the DIKSHA Platform)

5 मार्च 2026 तक दीक्षा प्लेटफॉर्म पर 566 करोड़ से अधिक शिक्षण सत्र पूरे किए जा चुके हैं।

इस प्लेटफॉर्म के 2.11 करोड़ पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं।

कोर्स नामांकन की संख्या 18.52 करोड़ तक पहुंच चुकी है।

अब तक 14.71 करोड़ से अधिक कोर्स सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं और 12.69 करोड़ प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं।

दीक्षा शिक्षा को अधिक सुलभ, रोचक और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास करती है। यह केवल कक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा प्रशासन को भी सशक्त बनाती है।

ओएनडीसी: डिजिटल वाणिज्य को लोकतांत्रिक बनाना (ONDC: Democratizing Digital Commerce)

खुले नेटवर्क की नई सोच (Open Network Vision)

ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स National Council for Educational Research and Training (ONDC) की शुरुआत वर्ष 2022 में की गई थी।

यह एक खुला डिजिटल नेटवर्क है, जिसका उद्देश्य ई-कॉमर्स को अधिक समावेशी और प्रतिस्पर्धी बनाना है।

पारंपरिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म जहां एक ही कंपनी के नियंत्रण में होते हैं, वहीं ओएनडीसी खरीदारों और विक्रेताओं को विभिन्न इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से जोड़ता है।

इससे बाजार तक पहुंच आसान होती है, प्रवेश की बाधाएं कम होती हैं और छोटे व्यवसायों को भी समान अवसर मिलते हैं।

ONDC का बढ़ता उपयोग और व्यापक पहुंच (ONDC's Growing Usage and Widespread Reach)

दिसंबर 2025 तक ओएनडीसी नेटवर्क पर भारत के 630 से अधिक शहरों और कस्बों से 1.16 लाख से अधिक खुदरा विक्रेता सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।

ओएनडीसी एक ऐसा खुला प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है, जहां खरीदार, विक्रेता, लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाता और भुगतान सेवा प्रदाता एक ही नेटवर्क पर काम कर सकें।

इसका मुख्य उद्देश्य ई-कॉमर्स को सभी के लिए सुलभ बनाना है, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए।

ओएनडीसी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता को कम करता है और व्यापारियों को अधिक स्वतंत्रता तथा प्रतिस्पर्धा का अवसर प्रदान करता है।

ई-संजीवनी, दीक्षा और ओएनडीसी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म यह दिखाते हैं कि भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर केवल तकनीकी विकास का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने का एक प्रभावी माध्यम भी है।

ये पहलें भारत को अधिक समावेशी, सशक्त और डिजिटल रूप से सक्षम राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM): पारदर्शी सरकारी खरीद प्रणाली Government eMarketplace (GeM): Transparent Public Procurement

संचालन का व्यापक पैमाना Scale of Operations

सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने सरकारी खरीद प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बना दिया है। यह सरकारी विभागों और संस्थानों को वस्तुओं और सेवाओं की पारदर्शी तथा प्रभावी खरीद के लिए एक ऑनलाइन मंच प्रदान करता है।

नवंबर 2025 तक GeM पर लगभग 3.27 करोड़ ऑर्डर पूरे किए जा चुके थे। इस दौरान कुल व्यापारिक मूल्य (Gross Merchandise Value) ₹16.41 लाख करोड़ से अधिक रहा। इससे सरकारी खरीद प्रक्रिया अधिक तेज़, पारदर्शी और जवाबदेह बनी है।

एमएसएमई को सशक्त बनाने वाला मंच MSME Empowerment

GeM प्लेटफॉर्म पर 10,894 से अधिक उत्पाद श्रेणियां और 348 सेवा श्रेणियां उपलब्ध हैं। इस प्लेटफॉर्म से 1.67 लाख से अधिक सरकारी खरीदार संगठन जुड़े हुए हैं।

24 लाख से अधिक विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं ने अपनी प्रोफ़ाइल पंजीकृत की है, जिनमें 11 लाख से अधिक सूक्ष्म और लघु उद्यम (MSMEs) शामिल हैं।

MSMEs ने कुल ऑर्डर मूल्य में 44.8 प्रतिशत योगदान दिया है और उन्हें ₹7.35 लाख करोड़ से अधिक के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। यह दिखाता है कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना छोटे व्यवसायों को बड़े स्तर पर सरकारी खरीद प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर प्रदान कर रही है।

उमंग (UMANG): सरकारी सेवाओं के लिए एकल डिजिटल मंच UMANG: Single Window for Government Services

एक ही स्थान पर अनेक सरकारी सेवाएं Comprehensive Service Access

UMANG (Unified Mobile Application for New-age Governance) को वर्ष 2017 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य नागरिकों को केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों की विभिन्न सेवाएं एक ही मोबाइल और वेब प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना है।

UMANG के माध्यम से नागरिक ईपीएफओ बैलेंस और क्लेम, पैन और आधार सेवाएं, डिजिलॉकर, बिजली-पानी के बिल भुगतान, पेंशन सेवाएं, छात्रवृत्ति आवेदन, पासपोर्ट सेवाएं, ड्राइविंग लाइसेंस और परीक्षा परिणाम जैसी अनेक सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं।

उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े Usage Statistics

5 मार्च 2026 तक UMANG पर 10.25 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता पंजीकृत थे। प्लेटफॉर्म पर 723.36 करोड़ से अधिक लेनदेन दर्ज किए गए।

इस पोर्टल पर 2,400 से अधिक सरकारी सेवाएं उपलब्ध हैं। इससे नागरिकों और सरकार के बीच संपर्क पहले से अधिक आसान और सुविधाजनक हो गया है।

ई-कोर्ट्स: न्याय व्यवस्था का डिजिटल परिवर्तन e-Courts: Judicial System Digital Transformation

तीन चरणों में विकसित हुई डिजिटल न्याय प्रणाली Three-Phase Evolution

ई-कोर्ट्स परियोजना, न्याय विभाग और विधि एवं न्याय मंत्रालय Department of Justice, Ministry of Law and Justice की एक राष्ट्रीय पहल है। इसका उद्देश्य सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) की मदद से न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुलभ बनाना है।

पहला चरण (2011-2015) न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और डिजिटल कनेक्टिविटी पर केंद्रित था। इस दौरान 14,249 अदालतों का कंप्यूटरीकरण किया गया और 13,683 अदालतों में लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) स्थापित किए गए।

चरण II और III की प्रगति Phase II and III Progress

दूसरा चरण (2015-2023) नागरिकों के लिए डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने पर केंद्रित रहा। इसमें वाइड एरिया नेटवर्क, हितधारकों का प्रशिक्षण, ई-सेवा केंद्र और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों का कंप्यूटरीकरण शामिल था।

सितंबर 2023 में केंद्र सरकार ने तीसरे चरण (2023-2027) को मंजूरी दी, जिसके लिए ₹7,210 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया।

इस चरण का उद्देश्य पेपरलेस अदालतों को बढ़ावा देना, पुराने रिकॉर्ड और लंबित मामलों का डिजिटलीकरण करना तथा अदालतों, जेलों और अस्पतालों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का विस्तार करना है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) जैसी तकनीकों का उपयोग मामलों के विश्लेषण और भविष्य की न्यायिक प्रवृत्तियों का अनुमान लगाने के लिए किया जा रहा है।

भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना कूटनीति India's DPI Diplomacy

अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां International Partnerships

फरवरी 2026 तक भारत सरकार ने 24 देशों के साथ इंडिया स्टैक और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापनों (MoUs) और अन्य समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।

इन साझेदारियों का उद्देश्य तकनीकी ज्ञान साझा करना और डिजिटल शासन प्रणालियों को अन्य देशों में अपनाने में सहयोग देना है। सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, डेटा एक्सचेंज फ्रेमवर्क और सेवा वितरण प्रणाली शामिल हैं।

भारत के साथ DPI साझेदारी करने वाले देश Countries Partnering with India on DPI

भारत के साथ DPI सहयोग करने वाले 24 देशों में आर्मेनिया, सिएरा लियोन, सूरीनाम, एंटीगुआ और बारबुडा, पापुआ न्यू गिनी, त्रिनिदाद और टोबैगो, तंजानिया, केन्या, क्यूबा, कोलंबिया, लाओस, सेंट किट्स एंड नेविस, इथियोपिया, जमैका, गाम्बिया, फिजी, गुयाना, वेनेजुएला, श्रीलंका, ब्राज़ील, लेसोथो, मालदीव, मंगोलिया और मलेशिया शामिल हैं।

यूपीआई की वैश्विक सफलता UPI Goes Global

भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुकी है।

वर्तमान में UPI संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस, मॉरीशस और कतर सहित 8 देशों में उपलब्ध है।

इससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान और धन प्रेषण (Remittance) आसान हुआ है, भुगतान प्रणाली अधिक प्रभावी बनी है और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है।

इंडिया स्टैक ग्लोबल प्लेटफॉर्म India Stack Global Platform

भारत के डिजिटल समाधानों को दुनिया तक पहुंचाने के लिए India Stack Global नामक एक विशेष मंच बनाया गया है।

यह प्लेटफॉर्म भारत की DPI उपलब्धियों को प्रदर्शित करता है और अन्य देशों को इन्हें अपनाने में सहायता प्रदान करता है।

इस पोर्टल पर 18 प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, जिन्हें मित्र देशों द्वारा अपनाया जा सकता है।

जी-20 में भारत का नेतृत्व G20 Leadership

वर्ष 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को वैश्विक विकास एजेंडा का प्रमुख विषय बनाया।

नई दिल्ली जी-20 नेताओं की घोषणा (G20 New Delhi Leaders' Declaration) में DPI को विकास को गति देने वाले महत्वपूर्ण साधन के रूप में मान्यता दी गई।

भारत की अध्यक्षता में Global Digital Public Infrastructure Repository की शुरुआत की गई। यह एक वैश्विक ज्ञान मंच है, जहां विभिन्न देशों के डिजिटल अनुभव, सीख और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जाता है।

इस मंच पर सबसे अधिक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना समाधान भारत द्वारा साझा किए गए हैं, जो इस क्षेत्र में भारत की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को दर्शाते हैं।

मोसिप: ओपन-सोर्स डिजिटल पहचान मंच MOSIP: Open-Source Identity Platform

मॉड्यूलर ओपन-सोर्स आइडेंटिटी प्लेटफॉर्म Modular Open-Source Identity Platform (MOSIP), भारत द्वारा विकसित एक महत्वपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) पहल है।

MOSIP एक लचीला और ओपन-सोर्स डिजिटल पहचान ढांचा प्रदान करता है, जिसकी मदद से विभिन्न देश अपनी स्वयं की सुरक्षित और संप्रभु डिजिटल पहचान प्रणाली विकसित कर सकते हैं।

यह प्लेटफॉर्म देशों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार डिजिटल पहचान समाधान तैयार करने की सुविधा देता है, जिससे वे विदेशी तकनीकों पर निर्भर हुए बिना अपनी पहचान प्रणाली स्थापित कर सकते हैं।

वर्तमान में 25 से अधिक देश अपने राष्ट्रीय डिजिटल पहचान कार्यक्रमों के लिए MOSIP को अपना रहे हैं या इसके उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।

MOSIP भारत की उस सोच का उदाहरण है, जिसमें तकनीक को वैश्विक सार्वजनिक हित के लिए साझा किया जाता है।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के क्षेत्र में भारत की यात्रा यह दिखाती है कि डिजिटल युग में विकास और शासन के तरीके किस प्रकार बदल रहे हैं।

जिस पहल की शुरुआत वित्तीय समावेशन और डिजिटल पहचान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुई थी, वह आज एक व्यापक और एकीकृत डिजिटल ढांचे का रूप ले चुकी है। यह ढांचा आर्थिक गतिविधियों, सरकारी सेवाओं और संस्थागत क्षमता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

भारत का अनुभव यह साबित करता है कि बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाएं प्रदान करते हुए भी भरोसा, सुरक्षा और पारदर्शिता बनाए रखी जा सकती है। साथ ही, खुली और समावेशी प्रणालियां भी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।

भारत का "मिडिल-पाथ" मॉडल India's "Middle-Path" Model

भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) बेंगलुरु के सेंटर फॉर डिजिटल पब्लिक गुड्स द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट "State of Digital Public Infrastructure in India 2025" के अनुसार, भारत ने एक ऐसा "मिडिल-पाथ" डिजिटल मॉडल विकसित किया है, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की भागीदारी का संतुलन है।

यह मॉडल विशेष रूप से विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ के लिए एक उपयोगी उदाहरण माना जा रहा है।

तकनीक को जनहित से जोड़ने की सफलता Linking Technology with Public Purpose

भारत ने यह दिखाया है कि जब तकनीक को जनहित के साथ जोड़ा जाता है, तो यह केवल आर्थिक विकास को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी मजबूत बनाती है।

आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, कोविन और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने करोड़ों लोगों तक सेवाओं की पहुंच आसान, तेज़ और पारदर्शी बनाई है।

दुनिया के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण A Global Reference Point

आज दुनिया के कई देश सुरक्षित, समावेशी और मजबूत डिजिटल ढांचा विकसित करने के लिए भारत के अनुभवों का अध्ययन कर रहे हैं।

भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल अब केवल एक अध्ययन का विषय नहीं रह गया है, बल्कि भविष्य की डिजिटल शासन व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सराहना Recognition by the IMF

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत को डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में अग्रणी उदाहरण के रूप में मान्यता दी है।

IMF का मानना है कि डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान नेटवर्क और डेटा एक्सचेंज प्लेटफॉर्म को सड़कों, बिजली और दूरसंचार जैसी पारंपरिक अवसंरचनाओं की तरह ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

भारत का DPI मॉडल यह साबित करता है कि बड़े पैमाने पर डिजिटल परिवर्तन न केवल संभव है, बल्कि इसे अत्यधिक दक्षता, समावेशिता और नवाचार के साथ सफलतापूर्वक लागू भी किया जा सकता है।

आगे का रास्ता The Road Ahead

भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने यह दिखाया है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भी किया जा सकता है।

आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे अधिक देश अपने डिजिटल भविष्य का निर्माण करेंगे, भारत का अनुभव उन्हें एक भरोसेमंद, समावेशी और टिकाऊ डिजिटल व्यवस्था विकसित करने में मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारत ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वे 21वीं सदी में डिजिटल परिवर्तन का एक वैश्विक मानक स्थापित करती हैं।