एन. चंद्रशेखरन की विदाई से पहले जानिए टाटा ग्रुप के 7 टॉप लीडर्स की कहानी

Share Us

70
एन. चंद्रशेखरन की विदाई से पहले जानिए टाटा ग्रुप के 7 टॉप लीडर्स की कहानी
13 Aug 2026
min read

News Synopsis

टाटा ग्रुप ने अपने 157 साल के इतिहास में बेहद कम शीर्ष नेतृत्व देखा है। वर्ष 1868 में जमशेदजी टाटा द्वारा कारोबार की शुरुआत किए जाने के बाद से अब तक केवल सात पुरुषों ने समूह के प्रमुख नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली है।

अब टाटा ग्रुप एक और महत्वपूर्ण नेतृत्व बदलाव के दौर में प्रवेश करने जा रहा है। N. Chandrasekaran का Tata Sons के चेयरमैन के रूप में मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होने की उम्मीद है। इसके बाद उनके पद से हटने के साथ भारत के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में से एक के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू होगा।

1. जमशेदजी टाटा: टाटा ग्रुप के संस्थापक (Jamsetji Tata: The Founder)

जमशेदजी नुसरवानजी टाटा ने वर्ष 1868 में टाटा ग्रुप की नींव रखी थी। उस समय उनकी उम्र केवल 29 वर्ष थी। उन्होंने करीब ₹21,000 की पूंजी के साथ कारोबार की शुरुआत की थी।

व्यापार से आगे था जमशेदजी टाटा का सपना (Jamsetji Tata’s Vision Went Beyond Trading)

समय के साथ जमशेदजी टाटा का लक्ष्य केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भारत में कपड़ा, स्टील, बिजली और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बड़े संस्थान और उद्योग खड़े करने का सपना देखा।

उनकी सोच के परिणामस्वरूप आगे चलकर Tata Steel और Indian Institute of Science जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव पड़ी। हालांकि जमशेदजी का निधन 1904 में हुआ और वे अपनी कई योजनाओं को पूरा होते नहीं देख सके, लेकिन उनकी औद्योगिक सोच और परोपकार की भावना टाटा ग्रुप की मजबूत नींव बन गई।

2. दोराबजी टाटा: पिता के सपनों को वास्तविकता में बदला (Dorabji Tata: Turning His Father’s Vision Into Reality)

जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने 1904 में समूह के दूसरे प्रमुख नेता के रूप में जिम्मेदारी संभाली।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक भारत में स्टील उद्योग के विकास के अपने पिता के सपने को पूरा करना था। Tata Iron and Steel Company, जिसे आज Tata Steel के नाम से जाना जाता है, ने 1912 में उत्पादन शुरू किया।

टाटा कारोबार का नए क्षेत्रों में विस्तार (Expansion Into New Business Sectors)

दोराबजी के नेतृत्व में टाटा समूह ने बिजली, होटल और बीमा जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार किया।

वर्ष 1932 में उन्होंने Sir Dorabji Tata Trust की स्थापना की। इससे टाटा परिवार की परोपकारी गतिविधियों को और मजबूत आधार मिला। उसी वर्ष बाद में दोराबजी टाटा का निधन हो गया।

3. नौरोजी सकलातवाला: छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कार्यकाल (Nowroji Saklatvala: A Short but Important Tenure)

सर नौरोजी सकलातवाला, जो दोराबजी टाटा के रिश्तेदार थे, 1932 में टाटा ग्रुप के तीसरे चेयरमैन बने।

उन्होंने 1901 में टाटा संगठन के साथ काम शुरू किया था और धीरे-धीरे वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका तक पहुंचे।

कर्मचारियों के कल्याण पर भी दिया जोर (Focus on Employee Welfare)

उनके कार्यकाल में टाटा के कारोबार का विस्तार हुआ। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण और बेहतर कार्य परिस्थितियों को भी महत्व दिया।

हालांकि उनका नेतृत्व लंबे समय तक नहीं चल सका। 1938 में फ्रांस में उनके अचानक निधन के बाद टाटा ग्रुप को एक ऐसे नेता मिला, जिसने आने वाले कई दशकों तक समूह को नई दिशा दी।

4. जेआरडी टाटा: पांच दशकों तक बदलाव का दौर (JRD Tata: Five Decades of Transformation)

जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, जिन्हें आमतौर पर जेआरडी टाटा के नाम से जाना जाता है, 1938 में टाटा ग्रुप के चेयरमैन बने। उन्होंने 50 वर्षों से अधिक समय तक इस जिम्मेदारी को संभाला।

टाटा ग्रुप का तेजी से हुआ विस्तार (Tata Group Expanded Rapidly)

जेआरडी टाटा के नेतृत्व में टाटा ग्रुप एक मुख्य रूप से औद्योगिक संगठन से बदलकर एक विविध कारोबारी समूह बन गया।

उनके कार्यकाल में समूह ने एविएशन, केमिकल्स, ऑटोमोबाइल, होटल और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में प्रवेश किया।

इसी अवधि में Tata Motors और Tata Consultancy Services (TCS) जैसे महत्वपूर्ण कारोबार विकसित हुए।

जेआरडी टाटा ने 1991 में चेयरमैन पद छोड़ा। भारत में उनके योगदान के लिए उन्हें 1992 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

5. रतन टाटा: टाटा ग्रुप को दुनिया तक पहुंचाया (Ratan Tata: Taking the Group Global)

रतन नवल टाटा ने 1991 में जेआरडी टाटा के बाद टाटा ग्रुप की कमान संभाली। यह वह समय था जब भारत आर्थिक सुधारों और वैश्विक बाजार के लिए अपने दरवाजे खोलने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

वैश्विक कंपनियों का अधिग्रहण (Acquiring Global Companies and Brands)

रतन टाटा के करीब 21 साल के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर काफी जोर दिया।

समूह ने Tetley, Corus और Jaguar Land Rover जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और ब्रांडों का अधिग्रहण किया। इससे टाटा ग्रुप की वैश्विक पहचान और मजबूत हुई।

इस अवधि में TCS भी दुनिया की प्रमुख IT सेवा कंपनियों में शामिल होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ी।

टाटा ग्रुप ने ऑटोमोबाइल, स्टील, टेलीकॉम, होटल और कई अन्य क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाई।

रतन टाटा ने दिसंबर 2012 में Tata Sons के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया।

6. साइरस मिस्त्री: छोटा रहा नेतृत्व कार्यकाल (Cyrus Mistry: A Brief Leadership Period)

साइरस पी. मिस्त्री ने दिसंबर 2012 में रतन टाटा के बाद Tata Sons के चेयरमैन का पद संभाला।

टाटा ग्रुप के छठे प्रमुख के रूप में उन्होंने कारोबार के प्रदर्शन को बेहतर बनाने, निवेश की समीक्षा करने और पूंजी पर बेहतर रिटर्न हासिल करने पर ध्यान दिया।

चार साल से भी कम समय में समाप्त हुआ कार्यकाल (Leadership Ended in Less Than Four Years)

हालांकि उनका कार्यकाल चार साल से भी कम रहा। अक्टूबर 2016 में Tata Sons के बोर्ड ने उन्हें चेयरमैन पद से हटा दिया।

इसके बाद रतन टाटा ने अंतरिम चेयरमैन के रूप में जिम्मेदारी संभाली और 2017 तक इस भूमिका में रहे। इसके बाद N. Chandrasekaran ने Tata Sons की कमान संभाली।

7. एन. चंद्रशेखरन: पेशेवर नेतृत्व का दौर (N. Chandrasekaran: The Professional Leader)

नटराजन चंद्रशेखरन ने 21 फरवरी 2017 को Tata Sons के चेयरमैन का पद संभाला। इससे पहले वे TCS के CEO और Managing Director रह चुके थे।

टाटा परिवार के बाहर से आने वाले प्रमुख नेता (A Major Leader From Outside the Tata Family)

चंद्रशेखरन की नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि वे लंबे समय बाद टाटा परिवार से बाहर के ऐसे पेशेवर नेता बने, जिन्होंने स्थायी रूप से टाटा ग्रुप का शीर्ष नेतृत्व संभाला।

उनके कार्यकाल में टाटा ग्रुप ने कई नए और तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में अपनी महत्वाकांक्षाएं बढ़ाईं।

समूह ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और एविएशन जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर ध्यान दिया।

चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होने की उम्मीद है।

चंद्रशेखरन का TCS से Tata Sons तक का सफर (Chandrasekaran’s Journey From TCS to Tata Sons)

चंद्रशेखरन का टाटा ग्रुप के साथ करियर TCS से शुरू हुआ था। उन्होंने शुरुआत में एक इंटर्न के रूप में काम किया और धीरे-धीरे संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हुए CEO के पद तक पहुंचे।

उनका सफर टाटा ग्रुप में पेशेवर प्रबंधन की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

टाटा परिवार तक सीमित नहीं रहा नेतृत्व (Leadership Is No Longer Limited to the Tata Family)

चंद्रशेखरन की नियुक्ति ने यह भी दिखाया कि टाटा ग्रुप का नेतृत्व केवल टाटा परिवार के सदस्यों तक सीमित नहीं है। योग्य पेशेवर भी समूह की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।

अब उनके संभावित प्रस्थान के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि Tata Sons का अगला चेयरमैन कौन होगा और वह टाटा ग्रुप को किस दिशा में ले जाएगा।

टाटा ग्रुप एक और उत्तराधिकार चरण में (Tata Group Enters Another Succession Phase)

चंद्रशेखरन के संभावित बदलाव के साथ Tata Sons एक बार फिर महत्वपूर्ण उत्तराधिकार प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है।

Tata Sons में टाटा ग्रुप के ट्रस्टों की बड़ी हिस्सेदारी है। इन ट्रस्टों की भूमिका समूह के स्वामित्व ढांचे के साथ-साथ उसकी परोपकारी गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण रही है।

अगले चेयरमैन पर होगी सबकी नजर (All Eyes Will Be on the Next Chairman)

चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि नए चेयरमैन को बदलते कारोबारी माहौल में टाटा ग्रुप की रणनीति को आगे बढ़ाना होगा।

टाटा ग्रुप वर्तमान में तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सेमीकंडक्टर, एविएशन और अन्य नए क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है। ऐसे में अगला नेतृत्व समूह की भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

जमशेदजी टाटा के औद्योगिक सपने से लेकर एन. चंद्रशेखरन के तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग और नए दौर के उद्योगों पर फोकस तक, टाटा ग्रुप का नेतृत्व पिछले 157 वर्षों में काफी बदल चुका है।

टाटा ग्रुप के शीर्ष नेतृत्व की जिम्मेदारी अब तक केवल सात लोगों ने संभाली है। चंद्रशेखरन के संभावित प्रस्थान के बाद उनके उत्तराधिकारी की तलाश टाटा ग्रुप के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव होगी।

अगला चेयरमैन ऐसे समय में जिम्मेदारी संभालेगा जब टाटा ग्रुप पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और एविएशन जैसे नए क्षेत्रों में भी तेजी से विस्तार कर रहा है। इसलिए आने वाला नेतृत्व न केवल समूह की मौजूदा विरासत को आगे बढ़ाएगा, बल्कि उसके अगले विकास चरण की दिशा भी तय कर सकता है।