Zoho ने 12,313 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया
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बिजनेस सॉल्यूशंस देने वाली कंपनी Zoho Corporation भारत की पहली ऐसी बूटस्ट्रैप्ड स्टार्टअप बन गई है, जिसने 12,000 करोड़ रुपये के रेवेन्यू का आंकड़ा पार कर लिया है। कंपनी ने साल-दर-साल 17.8% की लगातार ग्रोथ दर्ज की है। हालांकि Sridhar Vembu द्वारा शुरू की गई इस कंपनी का मुनाफा इस दौरान स्थिर रहा।
रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ से मिले कंसोलिडेटेड फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स के मुताबिक पिछले तीन फाइनेंशियल सालों में Zoho का रेवेन्यू लगभग दोगुना हो गया है, FY22 में 6,711 करोड़ रुपये से बढ़कर FY25 में 12,313 करोड़ रुपये हो गया।
कंपनी ने मुख्य रूप से अपने इन-हाउस एंटरप्राइज़ IT मैनेजमेंट और बिज़नेस एप्लिकेशन सॉफ़्टवेयर की बिक्री से रेवेन्यू कमाया। इसके मुख्य प्रोडक्ट ManageEngine और Zoho ग्रोथ के मुख्य ज़रियें बने रहे। Zoho Suite ने कुल रेवेन्यू में 57% का योगदान दिया, जो कि 7,051 करोड़ रुपये था, जबकि ManageEngine का योगदान 39% रहा, जो कि 4,863 करोड़ रुपये था। बाकी 399 करोड़ रुपये सेवाओं की बिक्री से आए।
कंपनी ने अन्य आय से भी 1,231 करोड़ रुपये जोड़े—जो मुख्य रूप से ब्याज और मौजूदा निवेशों की बिक्री से हुए लाभ से प्राप्त हुए—जिससे वित्त वर्ष 24 के 11,193 करोड़ रुपये के मुकाबले वित्त वर्ष 25 में कुल राजस्व बढ़कर 13,544 करोड़ रुपये हो गया।
ज्योग्राफिकली, नॉर्थ अमेरिका सबसे बड़ा मार्केट बना रहा, जिसने रेवेन्यू में 41% यानी 5,028 करोड़ रुपये का कंट्रीब्यूशन दिया। इसके बाद एशिया और यूरोप का स्थान रहा, जिन्होंने क्रमशः 30% (3,711 करोड़ रुपये) और 23% (2,819 करोड़ रुपये) का योगदान दिया। शेष राजस्व लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे क्षेत्रों से प्राप्त हुआ।
खर्च के मामले में एम्प्लॉई बेनिफिट्स सबसे बड़ा खर्च बनकर उभरा, जो कुल खर्च का 47% था। यह खर्च FY24 के 3,372 करोड़ रुपये से बढ़कर FY25 में 29% की बढ़ोतरी के साथ 4,347 करोड़ रुपये हो गया। विज्ञापन और प्रचार पर होने वाला खर्च भी 31.3% बढ़कर 2,230 करोड़ रुपये हो गया।
कुल खर्च साल-दर-साल 30.5% बढ़कर FY25 में 9,217 करोड़ रुपये हो गया, जो FY24 में 7,062 करोड़ रुपये था। इसकी वजह लीगल, सर्वर, डेटा सेंटर, डेप्रिसिएशन और ट्रैवल खर्च पर ज़्यादा खर्च था।
खर्चों में तेज़ी से हुई बढ़ोतरी ने रेवेन्यू ग्रोथ को पीछे छोड़ दिया, जिसके चलते FY24 के ₹3,299 करोड़ के मुकाबले FY25 में मुनाफ़े में थोड़ी गिरावट आकर यह ₹3,191 करोड़ रह गया। खास बात यह है, कि डेफ़र्ड टैक्स समेत टैक्स खर्च ₹820 करोड़ से बढ़कर ₹1,112 करोड़ हो गए, जिससे मुनाफ़े पर और भी ज़्यादा दबाव पड़ा।
यूनिट लेवल पर Zoho ने FY25 में एक रुपया कमाने के लिए 0.75 रुपये खर्च किए। इसके ROCE और EBITDA मार्जिन क्रमशः 16.85% और 31.27% रहे। FY25 तक कंपनी ने कुल 6,010 करोड़ रुपये की मौजूदा संपत्ति बताई, जिसमें 1,880 करोड़ रुपये का कैश और बैंक बैलेंस शामिल है।
इस साल के दौरान श्रीधर वेम्बु ने अपनी सक्रिय कार्यकारी भूमिका से हटकर 'चीफ़ साइंटिस्ट' का पद संभाला। शैलेश कुमार डेवी को नया 'ग्रुप CEO' नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही Zoho Corporation ने 'Zoho Pay' लॉन्च करके कंज्यूमर फिनटेक के क्षेत्र में भी कदम रखा है, यह एक पेमेंट्स ऐप है, जो उसके चैट प्लेटफ़ॉर्म 'Arattai' के साथ इंटीग्रेटेड है, और यह एंटरप्राइज़ सॉफ़्टवेयर से आगे उसके विस्तार का संकेत है।
चूंकि कंपनी पब्लिक मार्केट से दूर है, और उसकी कैश की स्थिति भी काफी अच्छी है, इसलिए Zoho का कम मार्जिन शायद घरेलू बाज़ार पर उसके फोकस का नतीजा हो सकता है। इस बाज़ार में उसने कुछ ऐसी बड़ी सफलताएँ हासिल की हैं, जिन्होंने खूब सुर्खियाँ बटोरी हैं, जैसे कि अब वह भारत सरकार के कई मंत्रालयों को ईमेल सेवाएँ दे रही है। भले ही इन 'प्रतिष्ठित' सफलताओं का आर्थिक मूल्य कम हो, लेकिन इन्होंने संस्थापक वेम्बु की 'स्वदेशी' सोच और साख को एक नया आयाम दिया है। कंपनी भारत में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए अच्छी स्थिति में है, भले ही उसका मार्जिन कम हो - और साथ ही वह दूसरे बाज़ारों में अपने कारोबार पर AI के असर से भी निपट रही है। ZohoPay या Arattai जैसे प्रोडक्ट्स की शुरुआत असल में घरेलू बाज़ार के लिए एक तरह के 'ट्रायल' ही हैं, जहाँ कंपनी सिर्फ़ व्यवसायों तक ही सीमित न रहकर, एक सेवा प्रदाता के तौर पर और भी बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद रखती है। अमेरिका में वेम्बु की पत्नी से तलाक़ से जुड़ी कानूनी परेशानियाँ कंपनी पर एक 'साये' की तरह मंडरा रही हैं, शायद इसी वजह से कंपनी वेम्बु पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि अमेरिकी अदालतें कंपनी की संपत्तियों को ज़ब्त करने का अधिकार रखती हैं। इन मुद्दों के सुलझने के बाद कंपनी के विकास और उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में विस्तार को एक नई और ज़ोरदार गति मिलेगी, लेकिन फ़िलहाल कंपनी अपने नए 'ग्रुप CEO' को काम समझने और अपनी जगह बनाने के लिए ज़्यादा आज़ादी और समय देने में ही संतुष्ट रहेगी।


