भारत में सोशल मीडिया के नियम बदलने की तैयारी, फेसबुक और इंस्टाग्राम की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

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भारत में सोशल मीडिया के नियम बदलने की तैयारी, फेसबुक और इंस्टाग्राम की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
05 Nov 2026
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News Synopsis

भारत सरकार देश में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X (पूर्व में ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा यानी 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) को सीमित या समाप्त किया जा सकता है। यह सुरक्षा फिलहाल इन कंपनियों को उनके उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सीधे कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने से बचाती है।

सरकार का मानना है कि जो डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल उपयोगकर्ताओं के बीच जानकारी पहुंचाने का काम करते हैं और जो प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के माध्यम से सामग्री को चुनते, बढ़ावा देते या उसकी पहुंच सीमित करते हैं, उनके साथ एक जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने शुरुआती स्तर पर चर्चा शुरू की है। हालांकि, अभी किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचा गया है और नियमों में बड़े बदलाव के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक होगी।

सेफ हार्बर सुरक्षा में बदलाव पर विचार (Safe Harbour Protection Under Review)

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय Ministry of Information Technology ने सोशल मीडिया कंपनियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की समीक्षा शुरू की है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार इस सुरक्षा को इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, दूरसंचार कंपनियों और पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग सेवाओं तक सीमित रखने के विकल्प पर विचार कर रही है।

इसका अर्थ है कि वे सेवाएं जो केवल एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक संदेश या जानकारी पहुंचाती हैं, उन्हें पहले की तरह कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। वहीं, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X जैसे प्लेटफॉर्म्स को इस सुरक्षा से बाहर रखने पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि ये उपयोगकर्ताओं को दिखाई देने वाली सामग्री तय करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

एल्गोरिदम के इस्तेमाल पर सरकार की चिंता (Government's Concerns Over Algorithms)

सरकार के भीतर उभरती सोच यह है कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल निष्क्रिय माध्यम नहीं हैं। इनके एल्गोरिदम यह तय करते हैं कि किसी उपयोगकर्ता को कौन-सी पोस्ट, वीडियो या समाचार सबसे पहले दिखाई देगा। ये प्रणालियां कुछ सामग्री को अधिक लोगों तक पहुंचा सकती हैं, जबकि दूसरी सामग्री की पहुंच कम कर सकती हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने भी इसी तरह की चिंता जताई है। अधिकारी का मानना है कि जब कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के माध्यम से उपयोगकर्ता की सामग्री को बढ़ावा देता है, उसकी रैंकिंग तय करता है या उसे दबाता है, तो वह उस सामग्री के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाता है। ऐसे में उसे पूरी कानूनी सुरक्षा देना उचित है या नहीं, इस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 की भूमिका (Role of Section 79 of the IT Act)

वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत डिजिटल मध्यस्थों को उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए कुछ शर्तों के साथ कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे ही सेफ हार्बर कहा जाता है।

हालांकि, इस सुरक्षा का लाभ उठाने के लिए कंपनियों को सरकार द्वारा निर्धारित सावधानी और नियमों का पालन करना पड़ता है। यदि सरकार सोशल मीडिया कंपनियों को इस सुरक्षा से बाहर करना चाहती है, तो इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन करना पड़ सकता है।

इस बदलाव का असर मेटा, गूगल और X जैसी बड़ी कंपनियों के कामकाज और व्यावसायिक मॉडल पर पड़ सकता है। साथ ही, तकनीकी उद्योग और नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठनों की ओर से इसका विरोध भी हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में मंत्रालय, मेटा और गूगल ने अखबार के सवालों का जवाब नहीं दिया।

सरकार और बड़ी टेक कंपनियों के बीच बढ़ता तनाव (Growing Tensions Between Government and Big Tech)

सोशल मीडिया कंपनियों के नियमों में बदलाव पर विचार करने के पीछे पिछले कुछ महीनों में सरकार और बड़ी टेक कंपनियों के बीच बढ़ा तनाव भी एक कारण माना जा रहा है।

सोशल मीडिया एल्गोरिदम और राजनीतिक सामग्री (Social Media Algorithms and Political Content)

रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी तंत्र के एक वर्ग में यह चिंता रही है कि सोशल मीडिया के एल्गोरिदम कभी-कभी विपक्षी दलों या सरकार के विरोध में उठने वाली आवाजों से जुड़ी सामग्री को आधिकारिक संदेशों की तुलना में अधिक लोगों तक पहुंचाते हैं।

इसके अलावा, जुलाई में हुए छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंस्टाग्राम की भूमिका को भी इस चर्चा से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को एकजुट करने और आंदोलनों से जुड़ी जानकारी फैलाने की इसकी क्षमता ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

प्रधानमंत्री के वीडियो को लेकर मेटा से जवाब-तलब (Meta Summoned Over Prime Minister's Video)

जुलाई में उस समय विवाद बढ़ गया, जब फेसबुक ने भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पोस्ट किए गए एक वीडियो को कुछ समय के लिए रोक दिया था। इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा के वैश्विक नीति अधिकारियों को तलब किया था।

वहीं, X ने सरकार की सामग्री हटाने से जुड़ी व्यवस्था और सहयोग पोर्टल (Sahyog Portal) को भी चुनौती दी है। कंपनी ने इस व्यवस्था के तहत जारी निर्देशों और सामग्री हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। सितंबर 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने X की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद कंपनी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए अपील की।

सुप्रीम कोर्ट और संसदीय समिति का दबाव (Supreme Court and Parliamentary Pressure)

सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने की चर्चा को सुप्रीम कोर्ट और संसद की स्थायी समिति की टिप्पणियों से भी बल मिला है।

सुप्रीम कोर्ट का 15 अक्टूबर का आदेश (Supreme Court's October 15 Order)

रिपोर्ट के अनुसार, 15 अक्टूबर को जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।

अदालत ने कहा कि सामान्य नियमों का पालन न करने पर किसी प्लेटफॉर्म की सेफ हार्बर सुरक्षा पूरी तरह समाप्त कर देना जरूरत से ज्यादा कठोर कदम हो सकता है। दूसरी ओर, लगातार और गंभीर उल्लंघन करने वाले प्लेटफॉर्म्स के लिए केवल यह सुरक्षा समाप्त करना पर्याप्त सख्त कार्रवाई नहीं है।

अदालत ने इसके लिए अलग और संतुलित कानूनी व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई। इसके तहत उल्लंघन की गंभीरता के अनुसार आर्थिक जुर्माना और अन्य दंड लगाए जा सकते हैं। सेफ हार्बर सुरक्षा समाप्त करने को अंतिम विकल्प के रूप में रखा जाना चाहिए।

संसदीय समिति की सख्त कार्रवाई की मांग (Parliamentary Committee Seeks Tougher Action)

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने भी सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है।

अगस्त में समिति ने सुझाव दिया था कि जो डिजिटल प्लेटफॉर्म भारतीय कानूनों का पालन नहीं करते, उनसे कानूनी सुरक्षा वापस लेने पर विचार किया जाना चाहिए। इस सिफारिश का उद्देश्य कंपनियों को भारतीय नियमों और कानूनों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना है।

सोशल मीडिया कंपनियों के लिए अन्य नए प्रस्ताव (Other Proposals for Social Media Platforms)

सेफ हार्बर सुरक्षा में बदलाव के अलावा सरकार कुछ अन्य प्रस्तावों पर भी विचार कर रही है। इनका उद्देश्य उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा बढ़ाना और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना है।

बड़े बदलावों से पहले सरकार को सूचना देना (Prior Notification of Major Product Changes)

एक प्रस्ताव के अनुसार, सोशल मीडिया और मैसेजिंग कंपनियों को अपने उत्पादों या सेवाओं में ऐसे बड़े बदलाव करने से पहले सरकारी अधिकारियों को जानकारी देनी पड़ सकती है, जिनका असर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

इस प्रस्ताव का संबंध जुलाई में व्हाट्सऐप को दिए गए निर्देश से भी है। उस समय मंत्रालय ने व्हाट्सऐप को अपना प्रस्तावित यूजरनेम फीचर लागू करने से रोकने को कहा था। सरकार को आशंका थी कि इस सुविधा का गलत इस्तेमाल करके पहचान की नकल करना, फिशिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

डीपफेक और आपत्तिजनक तस्वीरों पर सख्त शिकायत व्यवस्था (Stronger Grievance Redressal for Deepfakes)

सरकार शिकायत निवारण व्यवस्था को भी मजबूत करना चाहती है। इसके तहत सोशल मीडिया कंपनियों को डीपफेक, बिना सहमति के साझा की गई आपत्तिजनक तस्वीरों और वीडियो से जुड़ी शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

फिलहाल ऐसी सामग्री को हटाने में काफी हद तक कंपनियों की अपनी निगरानी और मॉडरेशन व्यवस्था की भूमिका रहती है। नए प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपयोगकर्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री को समय पर हटाया जाए।

आगे क्या हो सकता है? (What Lies Ahead?)

भारत सरकार की ओर से प्रस्तावित बदलाव अभी शुरुआती चर्चा के स्तर पर हैं। इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी सुरक्षा तुरंत समाप्त होने की संभावना नहीं मानी जानी चाहिए। किसी भी बड़े बदलाव के लिए कानूनी संशोधन और संसद की मंजूरी जरूरी होगी।

यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिदम, सामग्री की निगरानी, शिकायत निवारण और उपयोगकर्ता सुरक्षा से जुड़ी नीतियों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

इसका असर केवल बड़ी टेक कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि आम उपयोगकर्ताओं, डिजिटल क्रिएटर्स, समाचार संगठनों और ऑनलाइन कारोबार करने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।