2050 तक भारत में 34.7 करोड़ हो सकते हैं बुजुर्ग, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ेगी देखभाल की चुनौती

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2050 तक भारत में 34.7 करोड़ हो सकते हैं बुजुर्ग, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ेगी देखभाल की चुनौती
10 Aug 2026
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News Synopsis

भारत एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Transition) के दौर से गुजर रहा है। आने वाले दशकों में देश में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने की संभावना है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा, बदलती पारिवारिक संरचना और घटते परिवार के आकार के कारण बुजुर्ग आबादी की देखभाल आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।

Transform Rural India (TRI) की एक नई व्हाइट पेपर रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारत में लगभग 34.7 करोड़ लोग 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के हो सकते हैं। यह संख्या देश की कुल आबादी का करीब पांचवां हिस्सा हो सकती है।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भारत उस समय अपेक्षाकृत कम आर्थिक विकास स्तर पर बूढ़ा हो रहा होगा, जब कई विकसित देशों में आबादी के वृद्ध होने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसका मतलब है कि भारत को सीमित संसाधनों के बीच बढ़ती बुजुर्ग आबादी की स्वास्थ्य और देखभाल संबंधी जरूरतों को पूरा करना होगा।

ग्रामीण भारत पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर (Rural India Could Face the Biggest Impact)

भारत में बुजुर्ग आबादी बढ़ने का असर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से दिखाई दे सकता है।

अध्ययन के अनुसार, 2050 तक भारत की लगभग 70 प्रतिशत बुजुर्ग आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रह सकती है। इससे परिवारों, स्वास्थ्य सेवाओं और पहले से मौजूद सामुदायिक सहायता प्रणालियों पर काफी दबाव बढ़ सकता है।

TRI ने यह जानकारी अपनी व्हाइट पेपर रिपोर्ट Demographic Transition, Evolving Families and the Future of the Care Ecosystem in Rural India में दी है। यह रिपोर्ट India Rural Colloquy के दौरान जारी की गई।

रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण समुदायों को बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और उनकी बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए मजबूत और बेहतर तरीके से जुड़े देखभाल तंत्र की आवश्यकता होगी।

ग्रामीण परिवारों के सामने बढ़ेगी देखभाल की जिम्मेदारी (Rural Families Could Face Greater Care Responsibilities)

ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की अधिक संख्या होने के कारण परिवारों को स्वास्थ्य, दैनिक जरूरतों और लंबे समय तक देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है।

यदि स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ने की संभावना है।

छोटे परिवारों से बुजुर्गों के लिए सहारा घट रहा है (Smaller Families Are Reducing Support for Older People)

भारत की पारंपरिक परिवार आधारित देखभाल व्यवस्था अब कई बदलावों के कारण दबाव में है।

रिपोर्ट का अनुमान है कि एक बुजुर्ग व्यक्ति की सहायता के लिए उपलब्ध कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या 2001 में 8.4 से घटकर 2026 में लगभग 5.2 रह सकती है।

छोटे परिवार, रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों या राज्यों में जाना और लोगों की बढ़ती जीवन प्रत्याशा इस बदलाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

इसके बावजूद आज भी बुजुर्गों की देखभाल में परिवारों की भूमिका सबसे बड़ी है। अध्ययन के अनुसार, करीब 94 प्रतिशत बुजुर्ग देखभाल अभी भी परिवारों के भीतर ही की जाती है।

पारंपरिक परिवार व्यवस्था पर बढ़ता दबाव (Growing Pressure on the Traditional Family Care System)

पहले बड़े परिवारों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए अधिक लोग उपलब्ध होते थे। लेकिन परिवार छोटे होने और युवा सदस्यों के रोजगार के लिए बाहर जाने के कारण बुजुर्गों को लंबे समय तक सहायता उपलब्ध कराना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आने वाले वर्षों में औपचारिक और सामुदायिक देखभाल सेवाओं की जरूरत इसलिए बढ़ सकती है।

महिलाओं पर देखभाल का बोझ ज्यादा (Women Carry a Larger Caregiving Burden)

भारत में बिना वेतन वाली देखभाल की जिम्मेदारी अभी भी महिलाओं पर असमान रूप से अधिक पड़ती है।

अध्ययन के अनुसार, महिलाएं हर दिन औसतन लगभग 305 मिनट बिना भुगतान वाली देखभाल संबंधी गतिविधियों में बिताती हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह समय करीब 56 मिनट है।

इस अंतर के कारण महिलाओं के लिए रोजगार, व्यवसाय और अन्य आर्थिक गतिविधियों में नियमित रूप से भाग लेना कठिन हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा सकता है देखभाल का बोझ (Climate Change Could Increase the Care Burden)

रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को भी भविष्य की देखभाल व्यवस्था के लिए एक उभरती हुई चुनौती बताया गया है।

हीटवेव, बाढ़ और अन्य चरम मौसम की घटनाएं परिवारों की जिम्मेदारियां बढ़ा सकती हैं। इसका प्रभाव उन महिलाओं पर ज्यादा पड़ सकता है जो पहले से ही घर में बिना वेतन वाली देखभाल का बड़ा हिस्सा संभालती हैं।

इसलिए बुजुर्गों की देखभाल की योजना बनाते समय जलवायु जोखिमों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।

पुरानी बीमारियों से बढ़ रही स्वास्थ्य जरूरतें (Chronic Diseases Are Increasing Healthcare Needs)

भारत में बीमारियों का बदलता स्वरूप भी बढ़ती उम्र की आबादी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

रिपोर्ट के अनुसार, गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases) जैसे डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारियां और कैंसर अब देश में होने वाली लगभग दो-तिहाई मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।

वहीं, आज अधिक लोग ऐसी पुरानी बीमारियों और दिव्यांगताओं के साथ लंबे समय तक जीवन जी रहे हैं, जिनके कारण उन्हें लगातार स्वास्थ्य सहायता की जरूरत पड़ सकती है।

स्वास्थ्य व्यवस्था को लंबे समय की देखभाल पर देना होगा जोर (Healthcare Systems Need Greater Focus on Long-Term Care)

बढ़ती बुजुर्ग आबादी के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अचानक होने वाली बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं रहना होगा।

भविष्य में क्रॉनिक बीमारी प्रबंधन, पुनर्वास, दिव्यांगता सहायता और लंबे समय तक देखभाल जैसी सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।

इस बदलाव के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था को पहले से तैयार करना आवश्यक होगा।

मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की जरूरत (Existing Healthcare Systems Need to Evolve)

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का स्वास्थ्य ढांचा लंबे समय से मुख्य रूप से तत्काल और सीमित अवधि वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित रहा है।

इनमें प्रसव सेवाएं, टीकाकरण और अचानक होने वाली बीमारियों का उपचार जैसी सेवाएं शामिल हैं।

लेकिन उम्रदराज आबादी के लिए अलग तरह की देखभाल की जरूरत होती है, जिसमें लंबे समय तक इलाज, पुनर्वास, पुरानी बीमारियों का प्रबंधन और दिव्यांग लोगों के लिए सहायता शामिल है।

अस्पताल अकेले नहीं संभाल पाएंगे बढ़ती जरूरतें (Hospitals Alone Cannot Meet the Growing Care Needs)

रिपोर्ट का कहना है कि केवल अस्पतालों पर निर्भर रहकर बुजुर्ग आबादी की सभी जरूरतें पूरी करना संभव नहीं होगा।

देखभाल की कई सेवाओं को लोगों के घरों और स्थानीय समुदायों के करीब उपलब्ध कराना होगा। इससे बुजुर्गों को लंबी दूरी तय किए बिना जरूरी सहायता मिल सकेगी और परिवारों का बोझ भी कम हो सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 'Neighbourhood of Care' मॉडल का प्रस्ताव (‘Neighbourhood of Care’ Model Proposed for Rural Communities)

बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए Transform Rural India ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए “Neighbourhood of Care” यानी “देखभाल के पड़ोस” मॉडल का प्रस्ताव रखा है।

इस मॉडल का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से काम कर रही संस्थाओं और स्वास्थ्यकर्मियों को एक साझा व्यवस्था से जोड़ना है।

इसमें ग्राम पंचायत, स्वयं सहायता समूह (SHGs), ASHA कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी केंद्र और Ayushman Arogya Mandirs जैसी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

नई व्यवस्था बनाने के बजाय मौजूदा संस्थाओं को जोड़ा जाएगा (Connecting Existing Institutions Instead of Building an Entirely New System)

इस मॉडल में पूरी तरह नया स्वास्थ्य ढांचा बनाने के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से मौजूद संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया गया है।

उद्देश्य एक ऐसा सामुदायिक देखभाल नेटवर्क तैयार करना है, जहां घरों से पैदल दूरी के भीतर आवश्यक सहायता उपलब्ध हो सके।

इससे बुजुर्गों, परिवारों और देखभाल करने वालों को स्थानीय स्तर पर अधिक सहायता मिल सकती है।

Care Economy से लाखों रोजगार पैदा हो सकते हैं (Care Economy Could Create Millions of Jobs)

रिपोर्ट में देखभाल के क्षेत्र को केवल सामाजिक जरूरत के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक विकास के संभावित स्रोत के रूप में भी देखा गया है।

अध्ययन का अनुमान है कि यदि भारत अपनी GDP का लगभग 2 प्रतिशत Care Economy पर खर्च करता है, तो इससे करीब 1.1 करोड़ नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

ग्रामीण महिलाओं को मिल सकता है रोजगार का अवसर (Rural Women Could Benefit From New Employment Opportunities)

इनमें बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर महिलाओं को मिल सकते हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं को।

यदि देखभाल से जुड़े काम को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया जाता है, तो इससे एक साथ दो बड़ी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है।

पहली, तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की देखभाल की जरूरत पूरी होगी। दूसरी, महिलाओं और अन्य कामगारों के लिए नए रोजगार और आजीविका के अवसर तैयार हो सकते हैं।

भारत को बुजुर्गों की देखभाल के लिए नई रणनीति चाहिए (India Needs a New Approach to Ageing)

Transform Rural India का कहना है कि भारत के जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए देखभाल की मौजूदा व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

भारत ने लोगों के जीवित रहने और औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि लोग लंबे समय तक स्वस्थ, सक्रिय और स्वतंत्र जीवन जी सकें।

सामुदायिक देखभाल से परिवारों का दबाव घट सकता है (Community-Based Care Could Reduce Pressure on Families)

यदि स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं को बेहतर तरीके से जोड़ा जाए, तो बुजुर्गों को समय पर सहायता मिल सकती है।

इससे परिवारों पर अकेले देखभाल की जिम्मेदारी कम हो सकती है और बुजुर्गों को भी अधिक सम्मानजनक तथा स्वतंत्र जीवन जीने में सहायता मिल सकती है।

ग्रामीण भारत को भविष्य की बुजुर्ग आबादी के लिए तैयार करना होगा (Preparing Rural India for the Future)

भारत में बुजुर्ग आबादी का बढ़ना एक बड़ी सामाजिक चुनौती के साथ-साथ स्वास्थ्य, रोजगार और सामुदायिक व्यवस्था को नए तरीके से विकसित करने का अवसर भी है।

क्योंकि 2050 तक भारत के अधिकांश बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहने की संभावना है, इसलिए गांवों में स्थानीय देखभाल नेटवर्क को मजबूत करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

मौजूदा संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल, परिवारों और देखभाल करने वालों के लिए अधिक सहायता तथा Care Economy में निवेश भारत को आने वाली जनसांख्यिकीय चुनौती के लिए तैयार कर सकता है।

मौजूदा ग्रामीण संस्थाएं बन सकती हैं मजबूत देखभाल नेटवर्क की आधारशिला (Existing Rural Institutions Can Become the Foundation of a Strong Care Network)

अध्ययन का मुख्य संदेश यह है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक संस्थाएं पहले से मौजूद हैं।

ग्राम पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, ASHA कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी केंद्रों और अन्य स्थानीय संस्थाओं को एक साझा देखभाल प्रणाली से जोड़कर एक मजबूत नेटवर्क बनाया जा सकता है।

ऐसी व्यवस्था से आने वाले दशकों में मजबूत परिवार, स्वस्थ समुदाय और अधिक टिकाऊ ग्रामीण समाज तैयार करने में मदद मिल सकती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ने वाली है और 2050 तक लगभग 34.7 करोड़ लोग 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के हो सकते हैं। इनमें करीब 70 प्रतिशत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने की संभावना है। इससे परिवारों, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय समुदायों के सामने देखभाल की बड़ी चुनौती पैदा हो सकती है।

छोटे परिवार, युवाओं का पलायन, बढ़ती जीवन प्रत्याशा और महिलाओं पर असमान देखभाल का बोझ इस चुनौती को और गंभीर बना सकते हैं। साथ ही, डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों की बढ़ती संख्या से लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत भी बढ़ेगी।

ऐसे में “Neighbourhood of Care” जैसा सामुदायिक मॉडल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मौजूदा ग्रामीण संस्थाओं को जोड़कर घरों के करीब देखभाल सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

इसके अलावा, Care Economy में GDP का लगभग 2 प्रतिशत निवेश करीब 1.1 करोड़ रोजगार पैदा कर सकता है। इससे बुजुर्गों की देखभाल और रोजगार, दोनों चुनौतियों को एक साथ संबोधित करने का अवसर मिल सकता है।

भारत के लिए अब केवल लंबी उम्र सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है। आने वाले समय में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि बुजुर्ग लोग स्वस्थ, सम्मानजनक और अधिक स्वतंत्र जीवन जी सकें और ग्रामीण समुदाय इस बदलाव के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हों।