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IMF और विश्व बैंक की बैठक में कर्ज संकट पर चर्चा, गरीब देशों के लिए रोजगार और निवेश पर जोर

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IMF और विश्व बैंक की बैठक में कर्ज संकट पर चर्चा, गरीब देशों के लिए रोजगार और निवेश पर जोर
15 Oct 2026
8 min read

News Synopsis

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने बुधवार को कहा कि अमेरिका और अन्य अमीर देशों को दुनिया में तेजी से बढ़ते कर्ज पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। बढ़ता कर्ज वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर दबाव डाल रहा है और इसका सबसे अधिक असर कम आय वाले देशों पर पड़ रहा है। इन देशों के लिए कर्ज चुकाना, अपने नागरिकों को जरूरी सुविधाएं देना और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

जॉर्जीवा के अनुसार, अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और वहां के अन्य प्रमुख नेता इस बात को समझते हैं कि देश का बजट घाटा और राष्ट्रीय कर्ज जरूरत से ज्यादा बढ़ चुका है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक विकास के सहारे इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है, इसलिए इसे नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने होंगे।

केवल आर्थिक विकास से नहीं सुलझेगी कर्ज की समस्या (Economic Growth Alone Cannot Solve the Debt Problem)

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा International Monetary Fund (IMF) chief Kristalina Georgieva ने बैंकॉक में IMF और विश्व बैंक की शरदकालीन बैठक के दौरान कहा कि आर्थिक विकास से सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त करने में मदद मिलती है, लेकिन इससे जरूरी वित्तीय सुधार इतनी तेजी से नहीं हो सकते कि बढ़ते कर्ज पर समय रहते नियंत्रण पाया जा सके।

उन्होंने कहा कि इस समस्या का कोई आसान या जादुई समाधान नहीं है। सरकारों को अपने खर्च और बजट घाटे को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। इसके लिए वित्तीय अनुशासन जरूरी है, ताकि सरकार की आय और खर्च के बीच बढ़ते अंतर को नियंत्रित किया जा सके।

बढ़ती ब्याज दरों से वित्तीय बाजारों पर दबाव (Rising Interest Rates Put Pressure on Financial Markets)

दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ते सरकारी कर्ज के साथ बॉन्ड पर मिलने वाला प्रतिफल भी बढ़ रहा है। बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि का अर्थ है कि निवेशक सरकारों को कर्ज देने के बदले अधिक रिटर्न की मांग कर रहे हैं। ऐसा अक्सर तब होता है, जब निवेशकों को कर्ज चुकाने के जोखिम या भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों को लेकर अधिक चिंता होती है।

बढ़ते बॉन्ड प्रतिफल के कारण वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ रहा है। सरकारों के लिए नया कर्ज लेना महंगा हो सकता है और पुराने कर्ज पर ब्याज का बोझ भी बढ़ सकता है। इसका असर केवल अमीर देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी वित्त जुटाना कठिन हो जाता है।

महंगाई और ऊर्जा लागत ने बढ़ाई मुश्किलें (Inflation and Energy Costs Have Added to the Pressure)

बढ़ते कर्ज के साथ वैश्विक महंगाई भी कई देशों के लिए चुनौती बनी हुई है। खबर में ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा की ऊंची लागत को महंगाई के दबाव से जुड़ा एक कारण बताया गया है। महंगे ईंधन और अन्य जरूरी वस्तुओं के कारण सरकारों तथा आम लोगों, दोनों के खर्च बढ़ते हैं।

जब महंगाई और कर्ज का बोझ एक साथ बढ़ता है, तो सरकारों के लिए विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ऊंची ब्याज दरें इस स्थिति को और गंभीर बना देती हैं, विशेष रूप से उन देशों में जहां सरकारी आय सीमित है।

वित्तीय अनुशासन की कमी से बढ़ रहे जोखिम (Lack of Fiscal Discipline Is Increasing Risks)

IMF के राजकोषीय मामलों के विभाग के निदेशक रोड्रिगो वाल्देस Rodrigo Valdés, Director of the IMF’s Fiscal Affairs Department ने कहा कि दुनिया के कई देशों में वित्तीय जोखिम बढ़ रहे हैं, लेकिन उनके अनुरूप कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उनके मुताबिक, बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बजट संबंधी अनुशासन की कमी का प्रभाव केवल उनकी सीमाओं तक नहीं रहता, बल्कि दूसरे देशों तक भी पहुंचता है।

कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारों ने अर्थव्यवस्था और नागरिकों को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च किया था। महामारी के बाद भी कई जगह सरकारी खर्च और कर्ज का दबाव बना रहा। इससे कर्ज को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों को झटका लगा।

राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) का अर्थ है सरकारी वित्त को मजबूत करने के लिए बजट घाटे और कर्ज को नियंत्रित करना। इसके लिए सरकारें अनावश्यक खर्च कम कर सकती हैं, राजस्व बढ़ा सकती हैं और उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल कर सकती हैं। हालांकि, खर्च में कटौती करते समय गरीब और कमजोर वर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना भी जरूरी है।

गरीब देशों के सामने कर्ज चुकाने और नागरिकों की मदद करने की चुनौती (Poor Countries Face a Difficult Choice)

IMF की नवीनतम Fiscal Monitor रिपोर्ट The IMF’s latest Fiscal Monitor report के अनुसार, दुनिया के सबसे गरीब देशों में सरकारी राजस्व की तुलना में ब्याज भुगतान ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी के कारण कई देशों के बजट में ऐसे अंतर पैदा हो रहे हैं, जिन्हें पूरा करना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है।

इस स्थिति में सरकारों को कठिन निर्णय लेने पड़ रहे हैं। एक तरफ उन्हें गरीब और कमजोर नागरिकों को भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करानी हैं। दूसरी तरफ, उन्हें समय पर कर्ज और उस पर लगने वाला ब्याज भी चुकाना है।

ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड ने IMF की बैठक के दौरान कहा कि अमीर देशों में बढ़ती ब्याज दरों की कीमत वैश्विक दक्षिण के देशों को चुकानी पड़ रही है। उन्होंने कर्ज से जुड़ी एक नई व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई, जिसके तहत विकासशील देशों को लंबी अवधि में कर्ज चुकाने का अवसर मिले।

मिलिबैंड के अनुसार, इन देशों को बेहतर ब्याज दरों पर पुराने कर्ज का पुनर्वित्तपोषण (Refinancing) करने की सुविधा भी मिलनी चाहिए। इससे उनके पास शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास योजनाओं पर खर्च करने के लिए अधिक धन बच सकेगा।

विकासशील देशों को कर्ज के साथ निवेश और रोजगार की भी जरूरत (Developing Nations Need Investment and Jobs Alongside Debt Relief)

बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के प्रशासक अलेक्जेंडर डी क्रू ने बताया कि एक सामान्य विकासशील देश विकसित देशों की तुलना में कर्ज पर लगभग तीन गुना अधिक ब्याज चुकाता है। औसतन, इन देशों के सरकारी खर्च का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा कर्ज चुकाने में चला जाता है।

महंगे ईंधन, उर्वरकों की बढ़ती कीमतें, अल नीनो जैसी मौसमी घटनाओं के प्रभाव और कर्ज लेने की ऊंची लागत ने कम आय वाले देशों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर किया है। इन परिस्थितियों में उनके लिए संकट से उबरने और विकास की गति बढ़ाने के लिए पर्याप्त धन जुटाना कठिन हो रहा है।

डी क्रू ने एसोसिएटेड प्रेस से बातचीत में कहा कि फिलहाल उन्हें संकट से बाहर निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। उनके अनुसार, कर्ज में राहत के साथ ऐसे कदम भी जरूरी हैं, जो देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएं और लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करें।

AI के दौर में रोजगार पैदा करना बड़ी चुनौती (Job Creation Is a Major Challenge in the Age of AI)

रोजगार बढ़ाना दुनिया के सामने एक और बड़ी चुनौती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बढ़ने से कई पारंपरिक नौकरियों के स्वरूप में बदलाव आ सकता है और कुछ कामों की जरूरत कम हो सकती है।

अनुमानों के अनुसार, अगले लगभग एक दशक में 1.2 अरब से अधिक युवा वैश्विक कार्यबल में शामिल होंगे। लेकिन इसी अवधि में दुनिया भर में केवल 40 करोड़ शुद्ध नए रोजगार पैदा होने का अनुमान है। इन आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर रोजगार की उपलब्धता को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।

यदि पर्याप्त नौकरियां नहीं बनती हैं, तो युवाओं के लिए स्थिर आय प्राप्त करना कठिन हो सकता है। इससे गरीबी, आर्थिक असमानता और सामाजिक दबाव भी बढ़ सकते हैं। इसलिए सरकारों को ऐसी नीतियों पर काम करना होगा, जो निवेश को बढ़ावा दें, युवाओं के कौशल को बेहतर बनाएं और नए क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करें।

UNDP की ‘Jobs for Prosperity’ पहल से निवेश बढ़ाने की कोशिश (UNDP’s Jobs for Prosperity Initiative Aims to Boost Investment)

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने इसी सप्ताह ‘Jobs for Prosperity’ नामक पहल की घोषणा की। इसका उद्देश्य सरकारों, विश्व बैंक जैसे विकास बैंकों और निजी कंपनियों को एक साथ लाना है, ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले और अधिक रोजगार पैदा किए जा सकें।

इस पहल में पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें निवेश से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है और लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार हो सकते हैं।

डी क्रू के अनुसार, इस पहल के तहत देशों को बेहतर शासन व्यवस्था और प्रभावी नीतियां विकसित करने में मदद मिलेगी। साथ ही, ऐसी परियोजनाओं की पहचान की जाएगी, जिनमें निवेशक वास्तव में पैसा लगाने के इच्छुक हों। उन्होंने कहा कि यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है और दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह के प्रयास सफल भी हुए हैं।

बैंकॉक ब्लूप्रिंट से साइबर अपराध और ऑनलाइन धोखाधड़ी से मुकाबला (Bangkok Blueprint to Tackle Cybercrime and Online Scams)

IMF, बैंक ऑफ थाईलैंड और विश्व बैंक समूह ने बुधवार को ‘बैंकॉक ब्लूप्रिंट’ ‘Bangkok Blueprint’ की भी घोषणा की। इसका उद्देश्य साइबर अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन ठगी से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाना है।

यह घोषणा फ्रांस में हुए साइबर हमलों के एक दिन बाद सामने आई। खबर के अनुसार, इन हमलों के कारण सैकड़ों दुकानों में प्रशीतन प्रणालियां यानी सामान को ठंडा रखने वाली व्यवस्थाएं जरूरत से ज्यादा गर्म हो गई थीं।

यह घटना दिखाती है कि साइबर हमले केवल डिजिटल जानकारी या बैंक खातों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि जरूरी व्यावसायिक व्यवस्थाओं और रोजमर्रा की सेवाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सरकारों, वित्तीय संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष: वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए साझा प्रयास जरूरी (Conclusion: Global Economic Stability Requires Collective Action)

IMF प्रमुख की चेतावनी बताती है कि बढ़ता सरकारी कर्ज केवल किसी एक देश की समस्या नहीं है। अमीर अर्थव्यवस्थाओं में ऊंचे ब्याज और वित्तीय असंतुलन का असर विकासशील देशों तक पहुंच सकता है, जहां सरकारों के पास पहले से ही सीमित संसाधन हैं।

कर्ज पर नियंत्रण, बेहतर ब्याज दरों पर पुनर्वित्तपोषण, निवेश को प्रोत्साहन और रोजगार सृजन जैसे कदम इस चुनौती से निपटने में मदद कर सकते हैं। साथ ही, सरकारों के लिए यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वित्तीय सुधारों के दौरान गरीब और कमजोर लोगों की बुनियादी जरूरतों की अनदेखी न हो।

आने वाले वर्षों में युवाओं की बढ़ती संख्या और AI के कारण बदलते रोजगार बाजार को देखते हुए विकासशील देशों में निवेश और कौशल विकास का महत्व और बढ़ेगा। वैश्विक आर्थिक दबाव कम करने के लिए देशों को अपने वित्तीय प्रबंधन में सुधार के साथ मिलकर काम करना होगा।