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शहर कलकत्ता

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शहर कलकत्ता
31 Jul 2021
6 min read

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एक नज़र में देखते हैं कलकत्ता का इतिहास, कलकत्ता की इमारतें और कलकत्ता की ज़मीन की खूबसूरती कि कैसे ये शहर बना और आज भी एक बुलंद ईमारत की तरह खड़ा है। और कलकत्ता शजर में बदलती आदमी की पहचान। एक शहर कितना कुछ समेटे हुए है अपने भीतर। आइये जानते हैं इस कविता के माध्यम से।

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कलकत्ता शहर
हावड़ा ब्रिज से गुजरते हुए
हुगली को पार करते हुए
शुरू होता है
छोपड़- पट्टी से
बड़ी बड़ी इमारतों तक 
जमीन से हवा तक बसा हुआ शहर है
कलकत्ता 
कलकत्ता शहर अपने पिटारे में 
न जाने कितने तख्तों ताज दफ़न किये
किसी बुलंद इमारत की तरह खड़ा है
अंग्रेजी हुक़ूमत से
कलकत्ता के टुकड़े हुए
पर आज तक टूटा नहीं कलकत्ता
इमारते चढ़ी गिरी
खून बहा सूखा
सत्ता आयी गयी
पर कलकत्ता की ज़मीन ने
फसलें उगाना नही छोड़ी
ज़मीन इंसान से क़ीमत नही माँगती
मगर महंगाई ये है कि ज़मी
ज़मी भर नही बची सोना हो गयी है
शहर कलकत्ता रोज़ बिकता है
और कभी बिका नही
आदमी,आबरू,जान ओ माल बिकते हैं
भला शहर कभी बिकता है
कागज़ों पर तो लोग 
न जाने क्या क्या खरीद लेतेे हैं
कलकत्ता तो न जाने की 
उसकी भी कीमत है
कीमत है पर न बिकने वाली कीमत है
भला जमीन कही चलके जाती है
पैसों से कागज़ खरीदे जाते है ज़मीने नही
कलकत्ता ने इतिहास देखा है
आदमी आदमी भर था 
जब शहर ने आँख खोली
देखते देखते शहर चीटीयों का 
घर हो गया है
मगर चीटीयों जैसा समर्पण नही है
आदमी कभी आदमी को पसंद नही करता 
कलकत्ता ने खून की नदियां देखी हैं
जिसने बहाया और जिसका बहा
कलकत्ता ने दोनों को ज़मी में सुला रखा है
कितना बड़ा ह्रदय है इसका
मैंने कहा न शहर और शरह की ज़मी नही बिकती
यही है शहर कलकत्ता
एक नींव से इमारत का सफ़र है 
शहर कलकत्ता