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Suresh Kumar Lehri

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लिज्जत पापड़ - 7 महिला उद

समाज को एक साथ रखने की अधिकांश जिम्मेदारी महिलाएं ही उठाती हैं, चाहे वह घर हो, स्कूल हो, स्वास्थ्य सेवा हो या हमारे बुजुर्गों की देखभाल। ये सभी कार्य वे आमतौर पर बिना वेतन के करती हैं। और इन कामों का हमारे समाज में कोई मूल्य नहीं समझा जाता था। पर अब समाय  बदल रहा है, महिलाओं ने बीते दशकों में स्वयं को आत्मनर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये है। महिलाएं सांगठनिक स्तर पर अधिक मजबूती से आगे बढ़ रही है। उनके सामूहिक प्रयास बड़े पैमाने पर सामाजिक, आर्थिक और काफी हद तक राजनैतिक परिदृश्य पर बड़े बदलाव के साक्षी बन रहे है। महिलाये संगठित हो कर ही अपनी दिशा और दशा बदल सकती है यह बात महिलाएं समझ चुकी हैं। शुरुआत में औपचारिक रूप से संचालित समूहों formally driven groups ने समय के साथ अपनी पहचान बनाई और बाद में सरकार ने भी इसकी महत्ता और शक्ति को समझते हुए औपचरिक स्वरुप प्रदान कर इन्हे मान्यता दी और प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न योजनाओं से जोड़ा और महिलाओं को अधिक सशक्त करने हेतु प्रयास तेज किये। इसी के साथ देश में स्वयं सहायता समूहों Self-Help Groups की अवधारणा ने जन्म लिया और इससे महिलाओं ने सांगठनिक स्तर पर एकजुट होकर अपने सर्वांगीण विकास all-round development की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। भारत में महिला उद्यमिता और आत्मनर्भरता Women's entrepreneurship and self-reliance की अलख जगाने वाले कुछ सामूहिक प्रयास किये गए हैं, जहाँ से महिला उद्यमिता की नींव पड़ी और एक सिलसिला शुरू हो गया। इसी कड़ी में श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ Shri Mahila Home Industries Lijjat Papad एक मिसाल के रूप में आज हमारे सामने है, आज हम इसी संगठन की सफलता की कहानी आपसे सांझा कर रहे है। 

लिज्जत पापड़ की शुरुआत

यह ब्रांड महिला सहकारी कार्यकर्ताओं women cooperative workers द्वारा चलाया जाता है जिसे श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ कहा जाता है। 1959 में वापस, मुंबई के गिरगांव Mumbai's Girgaum में रहने वाली 7 महिलाओं के एक समूह ने अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने का फैसला किया। लिज्जत पापड़, महिलाओं को आत्मनिर्भर करने वाली भारत की सबसे पुरानी सहकारी समितियों में से एक है, जिसकी स्थापना 1959 में मुंबई में सात महिलाओं द्वारा सिर्फ 80 रुपये की पूंजी (वो भी उधार ली गई थी) के साथ की गई थी। आज के समय में इस पर यकीन कर पाना आसान नहीं है पर ये सच है। 15 मार्च 1959 को, गर्म तपती दोपहर में ये सातों महिलाये बड़ी गर्मजोशी और मज़बूत इरादों के साथ, अपने मकान की खुली छत पर इकट्ठा हुई और अपनी ऐतिहासिक सफलता के पहले पड़ाव के रूप में अपना पहला उत्पादन 4 पैकेट पापड़ के साथ शुरू किया। धीरे-धीरे इसमें इज़ाफ़ा होना शुरू हुआ। एक के बाद एक इस काम  को करने में और भी कई महिलाएं जुट गयी। इस काम से महिलाओं को बहुत  खुशी होती थी और उन्हें यह काम करने के लिए बाहर भी नहीं जाना पड़ता था। काम और आसान हो इसके लिए उन्होनें थोड़ा-थोड़ा काम आपस में ही बांट लिया था। पापड़ बनाने के लिए कुछ महिलाएं एकजुट होकर आटा गुथती थी और गुथे हुए आटे को सभी औरतों में बराबर बांट देती। औरतें गुथे हुए आटे को अपने घर ले जाकर पापड़ बनाती थी और अगले दिन बनाये हुए पापड़ लाकर जमा कर देती थी। अपनी पहली बिक्री उन्होंने मुंबई के एक लोकप्रिय बाजार भुलेश्वर के एक जाने-माने व्यापारी से शुरू की ।

उन सात जुझारू साधारण महिलाओं के नाम है - (Lijjat Papad Owner)

  1. असवंतीबेन जमनादास पोपट, 

  2. पार्वतीबेन रामदास थोडानी, 

  3. उजाम्बेन नरंदादास कुंडलिया, 

  4. बानुबेन एन तन्ना, 

  5. लगुबेन अमृतलाल गोकानी, 

  6. जयबेन वी. विठ्ठलानी, 

  7. दीवालीबेन लुक्का

 लज़्ज़त पापड़ की संस्थापक Lijjat Papad Founder 

किसी भी संगठन की शुरुआत किसी एक विचार से होती है वो कभी व्यक्तिगत हो सकता है, तो कभी सामूहिक। लिज़्ज़त पापड़ की स्थापना के पीछे जिसका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था वो  थी इसकी संस्थापक सह सदस्य जसवंतीबेन जमनादास पोपट Jaswantiben Jamnadas Popat। इनके अथक प्रयासों की बदौलत एक छोटा सा समूह आज हज़ारों महिलाओं की आत्मनिर्भरता का जरिया बन गया है।  पिछले साल नवंबर में, लिज्जत पापड़ उद्यम की  90 वर्षीय सह-संस्थापक जसवंतीबेन जमनादास पोपट को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद President Ram Nath Kovind  द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री Padma Shri पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

व्यवसायिक हुनर 

आप सोच रहे होंगे की फिर तो ये महिलाएं काफी स्किल्ड और पढ़ी लिखी होंगी।  पर सच तो ये है की उस समाया 1950 के दशक में, इन महिलाओं के पास खाना पकाने का एकमात्र कौशल था और जिसे किसी कौशल या दक्षता की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता था उस समय उन्होंने  इसी कौशल का उपयोग  करके एक स्थायी आजीविका sustainable livelihood बनाने के लिए, बॉम्बे की सात गुजराती महिलाओं Seven Gujarati women ने पापड़ बनाने के व्यवसाय में कदम रखा। और धीरे धीरे इन सात महिलाओं के शुरू किये गए अभियान से प्रेरणा लेते हुए और महिलाएं आती गई और कारवां बनता गया। 

मात्र 80 रुपये के इन्वेस्टमेंट से शुरुआत 

लिज्जत पापड़ के संस्थापक जसवंतीबेन जमनादास पोपट, जो अब पद्मश्री पुरस्कार विजेता हैं, ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी Servants of India Society के सदस्य और एक सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल करमसी पारेख Social Activist Chhaganlal Karamsi Parekh  से 80 रुपये उधार लिए। 

घाटे में चल रहे पापड़ व्यवसाय को चुना 

महिला उद्यमियों ने उस समय एक ऐसा व्यवसाय करने का निर्णय लिया जो बुरी तरह घाटे में चल रहा था और पापड़ बनाने के लिए आवश्यक सामग्री और बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया। इसका परिणाम आगे चलकर यह हुआ कि लिज्जत पापड़ दृढ़ संकल्प और समर्पित महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए महिलाओं द्वारा स्थापित और संचालित एक ऐतिहासिक कंपनी बनी जो आज सबके सामने है। फेमिना की एक रिपोर्ट A report by Femina  के अनुसार, यह ब्रांड तेजी से बढ़कर 1,600 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुंच गया, जिससे यह एक प्रसिद्ध घरेलू नाम बन गया।

कुशल मार्गदर्शन 

सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के सदस्य और एक सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल पारेख, जिन्हें छगनबापा के नाम से भी जाना जाता है, उनके मार्गदर्शक बने। इन्होने ही 80 रुपये की पूंजी इन महिलाओं को उधार के रूप में अपना व्यवसाय शु

रु करने को दी थी। शुरुआत में महिलाएं अपनी बिक्री बढ़ने के लिए पापड़ों को सस्ते दामों पर बेचने के लिए दो अलग-अलग तरह के पापड़ बना रही थीं। जिनकी क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी तब छगनबापा ने उन्हें एक मानक स्तरीय पापड़ बनाने की सलाह दी और कहा कि गुणवत्ता से कभी समझौता न करें। उन्होंने उन महिलाओं को एक व्यावसायिक उद्यम commercial enterprise के रूप में पूंजी का उचित मैनजमेंट करने और  निरंतरता को बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। आगे चलकर लिज्जत पापड़ के संस्थापक जसवंतीबेन जमनादास पोपट ने भी इस परंपरा को कायम रखते हुए इसकी गुणवत्ता को कायम रखा। 

80 रुपये से बनी  800 करोड़ रुपय की कंपनी 

किसी भी उद्यम को शुरू करने के लिए पहली ज़रुरत आम तौर पर पूंजी यानी इन्वेस्टमेंट मानी जाती है। और बहुत से लोग यही आ कर हार मान बैठते है और अपने बिज़नेस के विचार को छोड़ कर कुछ और करने के तफ बढ़ जाते है। ये महिलाये बहुत साधारण परिवारों से ताल्लुक रखती थी। पर उनकी सोच असाधारण थी और इसी असाधारण सोच ने उन्हें अपने लक्ष्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं से पार पाने में मदद की। एक कहावत है की ‘जब आप अपनी मदद ख़ुद करते है तो भगवान् भी आपकी मदद किसी ना किसी रूप में करते है  उनके जज़्बे और लगन से प्रेरित होकर एक  सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल कमरसी पारेख ने उन्हें  80 रुपये उधार दिए। इस रकम से पापड़ को एक उद्योग में बदलने के लिए जरूरी सामग्री खरीदी गई। इन महिलाओं के हुनर और मेहनत के दम पर काम चल निकला और कंपनी खड़ी हो गई। 15 मार्च 1959 को मशहूर मर्चेंट भूलेश्वर जो कि मुंबई में एक मशहूर मार्केट है में इस ब्रांड के पापड़ बेचे जाने लगे। पहले साल कंपनी ने 6196 रुपये का बिजनेस किया।  

सात महिलाओं से 43000 महिलाओं तक का सफ़र  

धीरे-धीरे लोगों के प्रचार, सहयोग और समाचार पत्रों में लिखे जाने वाले लेखों और अपनी गुणवत्ता के माध्यम से यह ब्रांड मशहूर होने लगा और आलम यह रहा कि दूसरे वर्ष में इस कंपनी में जो सिर्फ सात महिलाओं से शुरू हुई थी  300 महिलाएं काम करने लगीं। धीरे-धीरे वे कुछ सैकड़ों से बढ़कर हजारों महिलाएं हो गईं जिन्होंने उत्पाद बनाया और सह-मालिक के रूप में कमाई की। याहू Yahoo की एक रिपोर्ट की मानें तो लिज्जत पापड़ के सफल सहकारी रोजगार ने करीब 43 हजार महिलाओं को काम दिया।

वर्ष 1962 में पापड़ का नाम लिज्जत और संगठन का नाम श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ रखा गया था। वर्तमान में बाजार में इस ब्रांड के पापड़ समेत अन्य उत्पाद भी उपलब्ध हैं।

4 पैकेट से 4.8 मिलियन पापड़ प्रतिदिन उत्पादन

महिलाओं ने पहले दिन 4 पैकेट के साथ शुरुआत की और पहले साल में 6,000 रुपये से थोड़ा अधिक के पापड़ बेचे। साठ साल बाद, यह 2019 में 1,600 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही थी, जिसके सह-स्वामित्व में 45,000 महिलाएं (2021) थीं, जो हर दिन 4.8 मिलियन पापड़ बनाती हैं। 1962 में, नकद पुरस्कार प्रतियोगिता से चुने जाने के बाद ब्रांड नाम 'लिज्जत' को अपनाया गया था। उस समय इसकी बिक्री 2 लाख रुपये के करीब थी।

लिज्जत पापड़ ने महिलाओं को कैसे बनाया आत्मनिर्भर 

लिज्जत पापड़ उद्योग की प्रत्येक महिला सदस्य अपनी पापड़ बनाने की क्षमता और संगठन में स्थिति के अनुसार कमाती है। हर महिला आज इस उद्यम से इतना कमा रही है की वो अपने ज़रूरी खर्चों के साथ साथ परिवार का भी भरण पोषण करने में समर्थ है। इस काम में जितना मुनाफा होता है वह काम करने वाली औरतों में बराबर बांट दिया जाता है। इनमे से  कुछ महिलाएं तो ऐसी हैं जो अपने पति से अधिक कमाती हैं। इस संगठन ने पुरुषों को भी  रोजगार के अवसर प्रदान किये है पर पुरुषों को केवल ड्राइवर, दुकान सहायक और अन्य सहायक के रूप में भर्ती करता है। उद्यम की 82 शाखाएँ हैं और यह अमेरिका और सिंगापुर America  and Singapore जैसे देशों में विदेशों में भी निर्यात करता है। यह डिटर्जेंट साबुन और ब्रेड Detergent Soap and Bread  जैसे अन्य उत्पाद भी बनाती है। इस संस्था की सबसे ख़ास बात ये है की संस्था में काम करने वाली सभी महिलाएं कंपनी के सह मालिक के रूप में काम करती हैं। एक पितृसत्तात्मक समाज  के रूप में पहचाने जाने वाले देश में यह महिला सशक्तिकरण और एक बेहतरीन बिजनेस मॉडल Best Business Model का बेहतरीन उदाहरण है। 

लिज्जत पापड़ पर बनेगी फिल्म 'कर्रम कुर्रम'

लिज्जत पापड़ की सफलता से बहुत लोगों को प्रेरणा मिली है। यही कारण  है की इस संगठन के प्रयासों और उपलब्धि से प्रभावित हो कर एक फिल्म बन रही है  जिसका नाम  'कर्रम कुर्रम' 'Karram Kurram' है। नामी फिल्म डायरेक्टर आशुतोष गोवारिकर 'Karram Kurram'  इस फिल्म को प्रड्यूस करने जा रहे हैं और फिल्म में कियारा आडवाणी Kiara Advani उस महिला का किरदार निभाने जा रही हैं जिन्होंने मशहूर लिज्जत पापड़ को शुरू किया था।

आपको पता है कि लिज्जत पापड़ के विज्ञापन की टैग लाइन Tag Line में भी 'कर्रम कुर्रम' का इस्तेमाल किया जाता रहा है। महिला सशक्तीकरण के विषय पर बन रही इस फिल्म में दिखाया जाएगा कि किस तरह से श्री महिला गृह उद्योग के लिज्जत पापड़ ने हजारों लाखों गरीब महिलाओं की जिंदगी बदल दी। इस  फिल्म का डायरेक्शन ग्लेन बैरेटो और अंकुश मोहला Directions Glenn Barretto and Ankush Mohla करेंगे।

लिज़्ज़त पापड़ का संचालन एवं प्रसार 

लिज़्ज़त पापड़ की शुरुआत तो शहरी कुटीर उद्योग Urban Cottage Industry के रूप में हुई और प्रारम्भ में ये शहरो तक था धीरे-धीरे यह  ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल गया है,  साल 2019 में इसका 800 मिलियन (INR 80 करोड़) का निर्यात हुआ।

यह लगभग 42,000 लोगों को रोजगार प्रदान करता है। लिज्जत का मुख्यालय मुंबई में है और पूरे भारत में इसकी 81 शाखाएं और 27 डिवीजन हैं। भारत के अलावा विदेशों में ही इसके उत्पादों की मांग है इसके कुल उत्पादन का लगभग 30-35% पापड़ अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर, थाईलैंड USA, UK, Singapore, Thailand आदि जगहों पर निर्यात किये जाता है।

आज अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम Startup Ecosystem बन गया है। पर इस उपलब्धि तक पहुंचे की यात्रा बड़ी लम्बी है और इसका श्रेय सालों पहले छोटे-छोटे समूहों के द्वारा किये गए भागीरथी प्रयासों को दिया जाये तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी। श्री महिला गृह उद्योग; लिज़्ज़त पापड़ और इस जैसे भारत में महिलाओं के समूहों ने अपने स्वयं के प्रयासों और सीमित संसाधनों के साथ सामाजिक विसंगतिओं से जूझते हुए जो कीर्तिमान स्तापित किये वो अतुलनीय हैं। और उनसे प्रेरणा ले कर न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनियां में महिलाओं का व्यापार जगत में दबदबा स्थापित हुआ और महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में नई पहचान मिली।

लिज्जत पापड़ की कीमत | Lijjat Papad Price

Lijjat Papad - उड़द, 200 ग्राम पाउच 64 रुपये - बिगबास्केट।

लिज्जत पापड़ Share Price

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महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास

महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास

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महिला सशक्तिकरण और आर्थिक

महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास (Women Empowerment and Economic  Development) एक-दूसरे से बड़े घनिष्ट रूप से संबंधित हैं: या अगर यू कहें की एक दूसरे के पूरक है तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि आत्मनिर्भरता सशक्तिकरण की पहली शर्त है। आत्मनिर्भर आने से ही सशक्तिकरण संभव होता है और इसका सीधा प्रभाव हमारे जीवन स्तर में सुधार पर पड़ता है। जब तक आपको निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं है तब तक आप आत्मनिर्भर भी नहीं हो सकते। जिसके लिए आर्थिक रूप से आपकी निर्भरता ख़त्म होनी पहली आवश्यकता है। 

भारत एक ऐसा देश है जहाँ समाज पुरुष प्रधान रहा है और यहाँ महिलाओं की परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भरता उनके जीवन के लगभग हर क्षेत्र में देखी गई। कुछ हद तक, परिवार में महिलाओं की निम्न स्थिति और निर्णय लेने की कमी के लिए पुरुषों पर उनकी आर्थिक और सामाजिक निर्भरता को जिम्मेदार माना जाता है। महात्मा गांधी जी ने 'यंग इंडिया' (Young India by Mahatma Gandhi) नामक  एक साप्ताहिक पत्रिका में 1930 में लिखा था की “हमारे गांवों में लाखों महिलाएं जानती हैं कि बेरोजगारी का क्या मतलब है, उन्हें आर्थिक गतिविधियों तक पहुंच प्रदान करें जिससे वो अपनी  शक्ति और आत्मविश्वास को जान सकेगी, जिससे वह अब तक अनजान रही हैं”

लगभग एक सदी बीत चुकी है, और भारत ने तब अब तक सभी क्षेत्रों में बहुआयामी विकास हासिल किया है, उसके बावजूद आज भी बहुत सी समस्याएं प्रासंगिक हैं। हालांकि, महिलाएं भारत की 1.2 अरब की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, फिर भी उन्हें आर्थिक गतिविधियों (economic activities) और निर्णय लेने की स्वतंत्रता (decision making freedom)  के साथ ही स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा आदि के संसाधनों तक भी आसानी से पहुंच प्रदान नहीं है। 

भले ही कामकाजी महिलाओं (working women) की संख्या लगभग 432 मिलियन है, लेकिन उनमें से  लगभग 343 मिलियन वेतन वाली औपचारिक नौकरी में नहीं हैं। उनमें से लगभग  324 मिलियन श्रम बल में नहीं हैं; और अन्य 19 मिलियन श्रम शक्ति का हिस्सा हैं लेकिन नियोजित नहीं हैं। इसलिए, महिलाओं के रोजगार की प्रकृति का औपचारिक अर्थव्यवस्था में हिसाब नहीं रखा जाता है, या फिर महिलाओं को वर्तमान  सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण औपचारिक नौकरियों तक पहुंच ही प्राप्त नहीं होती है। भारत जैसे देश में जहां गहरी पितृसत्ता (deep patriarchy) वाले समाज के रूप में, भले ही महिलाएं रोजगार प्राप्त करना चाहती हों, लेकिन दूषित और रूढ़िवादी सामाजिक सोच के कारण  महिला घरेलू जिम्मेदारी की प्रमुख वाहक के रूप में मानी जाती  हैं और यही सोच  उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में उनकी आर्थिक उन्नति और अवसरों (economic growth and opportunities) तक पहुंच को सीमित करती है।

इस तरह के परिदृश्य में, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) Self Help Groups (SHGs) उन महिला उद्यमियों के बीच एक ब्रिज के रूप में कार्य कर रहे रहे हैं जिनके पास अपना उद्यम शुरू करने की इच्छा है, लेकिन उनके पास अपने सपने को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन और माहौल नहीं हैं। एक एसएचजी में महिलाओं का एक छोटा समूह शामिल होता है जो नियमित रूप से मौद्रिक योगदान देने के लिए एक साथ आते हैं। स्वयं सहायता समूह ऐसी महिलाओं के लिए एक प्लेटफॉर्म के रूप में काम करते हैं जो महिलाओं के बीच एकजुटता को बढ़ावा देते हैं, उन्हें स्वास्थ्य, पोषण, लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय के मुद्दों पर न सिर्फ जागरूक करते है बल्कि संसाधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित कराते  है ।

सामूहिक प्रयासों ने बढ़ाई अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी

महिलाएं देश की आधी आबादी है जब अधिक महिलाएं काम करती हैं, तो  इसका सीधा असर हमारी  अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महिला आर्थिक सशक्तिकरण, सकारात्मक विकास परिणामों के अलावा उत्पादकता को बढ़ाता है, इसके साथ ही आर्थिक विविधीकरण और आय समानता को भी बढ़ाता है।

महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को फलीभूत  करने के लिए महिला आर्थिक सशक्तिकरण केंद्रीय आवश्यकता  है। इसमें  मौजूदा बाजारों में समान रूप से भाग लेने की महिलाओं की क्षमता; उत्पादक संसाधनों (productive resources) तक उनकी पहुंच और नियंत्रण, अच्छे कामों तक पहुंच, अपने समय, जीवन और शरीर पर नियंत्रण; और घर से लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक सभी स्तरों पर निर्णय लेने में उनकी सक्रीय और सार्थक भागीदारी  शामिल है ।

अर्थव्यवस्था में महिलाओं को सशक्त बनाना और काम की दुनिया में लैंगिक अंतर को ख़त्म  करना सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा (2030 Agenda for Sustainable Development) को प्राप्त करने की कुंजी है। समाज को एक साथ रखने की अधिकांश जिम्मेदारी महिलाएं ही उठाती हैं, चाहे वह घर हो, स्कूल हो, स्वास्थ्य सेवा हो या हमारे बुजुर्गों की देखभाल। ये सभी कार्य वे आमतौर पर बिना वेतन के करती हैं। और इन कामों का हमारे समाज में कोई मूल्य नहीं समझा जाता। 

महिलाओं ने बीते दशकों में स्वयं को आत्मनर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये है। महिलाये सांगठनिक स्तर पर अधिक मजबूती से आगे बढ़ रही है। उनके सामूहिक प्रयास बड़े पैमाने पर सामाजिक,आर्थिक और काफी हद तक राजनैतिक परिदृश्य पर बड़े बदलाव के साक्षी बन रहे है। महिलाये संगठित हो कर ही अपनी दिशा और दशा बदल सकती है, ये बात वो समझ चुकी है। शुरुआत में औपचारिक रूप से संचालित समूहों ने समय के साथ अपनी पहचान बनाई और बाद में सरकार ने भी इसकी महत्ता और शक्ति को समझते हुए औपचरिक स्वरुप प्रदान कर इन्हे मान्यता दी और प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न योजनाओं से जोड़ते हुए इन्हे और अधिक सशक्त करने हेतु प्रयास तेज किये। इसी के साथ देश में  स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा ने जन्म लिया और इससे महिलाओं को सांगठनिक स्तर पर एकजुट होकर अपने सर्वांगीण विकास की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। 

स्वयं-सहायता समूह की अवधारणा और प्रांरभ 

स्वयं-सहायता समूह का मतलब  ऐसे लोगों के स्वयं-शासित, समकक्ष नियंत्रित, अनौपचारिक समूह से है, जिनकी समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि हो और सामूहिक रूप से कार्य करने की इच्छा रखते हों। भारत में, SHG आंदोलन 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब कई गैर-सरकारी संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब समुदायों को संगठित किया और उन्हें सामाजिक और वित्तीय सहायता के लिए औपचारिक चैनल की पेशकश की। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (National Bank for Agriculture and Rural Development) के साथ इस कार्यक्रम ने गति प्राप्त की, ऐसे समूहों की एक छोटी संख्या को बैंकों के साथ जोड़ा गया। स्वयं-सहायता समूह द्वारा बैंक लिंकेज कार्यक्रम चलाया है, इस क्रांतिकारी पहल ने समूह के सदस्यों को जोड़ा, जिनमें से कई के पास पहले कभी बैंक खाते नहीं थे।  भारत में स्वयं सहायता समूहों की उत्पत्ति का प्रथम प्रमाण 1972 में स्व-नियोजित महिला संघ (सेवा)  Self Employed Women's Association (SEWA) की स्थापना से मिलता है । इससे पहले भी संगठन के छोटे-छोटे प्रयास होते थे। उदाहरण के लिए, 1954 में, अहमदाबाद के टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (टीएलए) Textile Labor Association (TLA) ने इसी क्रम में अपनी महिला विंग का गठन किया, जो एक ऐतिहासिक आंदोलन का प्रतीक है, जिसमे महात्मा गांधी की भूमिका प्रमुख रही। सेवा का गठन करने वाली इला भट्ट (Ela bhatt) ने गरीब और स्वरोजगार करने वाली महिला कामगारों को संगठित किया। नाबार्ड ने 1992 में एसएचजी बैंक लिंकेज प्रोजेक्ट (SHG Bank Linkage Project) का गठन किया, जो आज दुनिया का सबसे बड़ी सूक्ष्म वित्त परियोजना।

स्वयं सहायता समूहों का महिला आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान 

आज बड़े पैमाने पर स्वयं सहायता समूहों की स्थापना हो रही है और इसे एक वैधानिक इकाई (statutory entity) का दर्जा भी प्राप्त हो चुका है। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को निर्वाह से स्थिरता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया और जो महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए भी भारत के सबसे शक्तिशाली माध्यम हैं। वर्तमान में देश में 29 लाख एसएचजी मौजूद हैं, जिनमें सक्रिय प्रतिभागियों के रूप में 3 करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाओं की सदस्यता है। 

स्वयं -सहायता समूह से तात्पर्य स्वयं-शासित, समकक्ष नियंत्रित, समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के अनौपचारिक समूह से है और सामूहिक रूप से सामान्य उद्देश्यों को पूरा करने की इच्छा रखते हैं।

स्वयं सहायता समूह यानी एसएचजी सूक्ष्म उद्यमों micro enterprises का एक समग्र कार्यक्रम है जिसमें स्वरोजगार के सभी पहलुओं (All aspects of self employment) को शामिल किया गया है, जिसमें  ग्रामीण गरीबों का स्वयं सहायता समूहों में संगठन और उनकी क्षमता निर्माण, गतिविधि समूहों की योजना, बुनियादी ढांचे का निर्माण, बचत की योजना ,उन्हें शिक्षित करना, रोजगार के विभिन्न साधनों से अवगत करना, आदि विभिन्न पहलू समावेशित है। 

आज भारत में ऐसे तमाम उदाहरण है जिन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। छोटे-छोटे समूहों ने सामूहिक प्रयास से अपने स्टार्टअप्स (Startups) शुरू किये और धीरे-धीरे भारतीय बाजारों (Indian markets) में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाने लगे। भारत में, वर्ष 2015 में जब स्टार्टअप इंडिया अभियान Startup India Campaign का ऐलान किया गया था तब से नए  लघु और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) Small and Medium Businesses की संख्या बढ़ रही है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य स्टार्ट-अप के लिए आर्थिक मदद को बढ़ावा देना है ताकि देश के आर्थिक विकास में स्टार्टअप अपनी भूमिका निभाते रहें। इस अभियान ने कई स्मॉल बिज़नेस और स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित किया है, जो अधिक रोज़गार सृजन को भी बढ़ावा दे रहे हैं और और राष्ट्र की आर्थिक ग्रोथ में मदद कर रहे हैं।

पछले 6 सालों में, भारत में स्टार्टअप्स क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। एक आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत ने यूके को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका और चीन (America and China) के बाद तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप देश के रूप में उभर कर सामने आया, जिसने 2021 में क्रमशः 487 और 301 यूनिकॉर्न जोड़े। 14 जनवरी 2022 तक भारत India में 83 यूनिकॉर्न थे, जिनका कुल मूल्यांकन यूएसडी 277.77 बिलियन था। नतीजतन, अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है। 

पर इस उपलब्धि तक पहुंचने की यात्रा बड़ी लम्बी है और इसका श्रेय सालों पहले छोटे-छोटे समूहों के द्वारा किये गए भागीरथी प्रयासों को दिया जाये तो ये गलत नहीं होगा। और विशेषकर जैसा हमने पहले ही बताया की भारत में महिलाओं के समूहों ने अपने स्वयं के प्रयासों और सीमित संसाधनों के साथ सामाजिक विसंगतिओं से जूझते हुए जो कीर्तिमान स्थापित किये वो अतुलनीय हैं। और उनसे प्रेरणा ले कर न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनियां में महिलाओं का व्यापार जगत में दबदबा स्थापित हुआ और महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में नई पहचान मिली। 

भारत में महिला उद्यमिता और आत्मनर्भरता (Women's entrepreneurship and self-reliance) की अलख जगाने वाले कुछ सामूहिक प्रयास जहाँ से महिला उद्यमिता की नींव पड़ी (Women's Entrepreneurship Foundation) और एक सिलसिला जो चलता ही जा रहा है। ऐसे ही दो प्राथमिक महिला समूहों या यू कहे आंदोलनों का यहाँ ज़िक्र करना जरूरी है। 

सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेन एसोसिएशन  (सेवा)  Self-Employed Women  Association  (SEWA )

सेवा नेशनल ट्रेड यूनियन के अंतरगत 1972 में  रजिस्टर्ड एक संगठन है। सेवा एक सदस्यता-आधारित संगठन है, इसे 1972 में श्रम, महिला और सहकारी आंदोलनों के संयोजन से बनाया गया था।  इसका उद्देश्य अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार वाली महिलाओं को संगठित करना और उनको सामूहिक सहायता करना और सामाजिक न्याय, समानता और सामान अधिकारों  की प्राप्ति के लिए उनके संघर्ष में उनकी मदद करना था। 

भारत के इस पहले सेल्फ इम्प्लॉयड महिलाओं के समूह ने 130 सहकारी समितियों, 181 ग्रामीण उत्पादक समूहों को शामिल करके अपने आपको विस्तारित किया है। यह सिर्फ एक संगठन नहीं बल्कि एक "आंदोलन"  है जो भारत में 12 राज्यों के 50 जिलों में सक्रिय है, जिसमें 1.75 मिलियन से अधिक महिलाओं की सदस्यता है ।

श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ (एसएमजीयूएलपी) Shree Mahila Griha Udyog Lijjat Papad (SMGULP)

यह ब्रांड महिला सहकारी कार्यकर्ताओं द्वारा चलाया जाता है जिसे महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ कहा जाता है। 1959 में, मुंबई के गिरगांव में रहने वाली 7 महिलाओं के एक समूह ने अपने जीवन यापन की जिम्मेदारी लेने का फैसला किया। श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ (एसएमजीयूएलपी) को भारत में महिला सशक्तिकरण के साथ पहचाने जाने वाले सबसे उल्लेखनीय एसएचजी में से एक माना जाता है। वर्ष 1962 में पापड़ का नाम लिज्जत और संगठन का नाम श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ रखा गया था। वर्तमान में बाजार में इस ब्रांड के पापड़ समेत अन्य उत्पाद भी उपलब्ध हैं। याहू Yahoo की एक रिपोर्ट की मानें तो लिज्जत पापड़ के सफल सहकारी रोजगार (successful cooperative employment) ने करीब 43 हजार महिलाओं को काम दिया। महिलाओं ने पहले मात्र 80 रुपये के क़र्ज़ से पहले दिन 4 पैकेट के साथ शुरुआत की और पहले साल में 6,000 रुपये से थोड़ा अधिक के पापड़ बेचे। साठ साल बाद, यह 2019 में 1,600 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही थी, जिसके सह-स्वामित्व में 45,000 महिलाएं (2021) थीं, जो हर दिन 4.8 मिलियन पापड़ बनाती हैं। 1962 में, नकद पुरस्कार प्रतियोगिता से चुने जाने के बाद ब्रांड नाम 'लिज्जत' को अपनाया गया था। उस समय बिक्री 2 लाख रुपये के करीब थी। पिछले साल नवंबर में, लिज्जत पापड़ उद्यम की  90 वर्षीय सह-संस्थापक जसवंतीबेन जमनादास पोपट (Jaswantiben Jamnadas Popat) को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री (Padma Shri)  पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

यह सही है पिछले कुछ दशकों में, कामकाजी महिला पेशेवरों ने अपनी प्रतिभा, समर्पण और उत्साह के साथ कड़ी मेहनत से काम किया है। वे भारत के आर्थिक विकास और समृद्धि में बड़े पैमाने पर योगदान कर रही है। वर्तमान में, भारत में लगभग 432 मिलियन कामकाजी महिलाएं हैं, जिनमें से 343 मिलियन असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट (report by McKinsey Global Institute) ने अनुमान लगाया है कि महिलाओं को समान अवसर देकर, भारत 2025 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद में 770 बिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़ सकता है। फिर भी, जीडीपी में महिलाओं का वर्तमान योगदान 18% है।

आज, भारत दुनिया में स्टार्टअप के मामले में तीसरा सबसे बड़ा ईको सिस्टम (3rd largest ecosystem) है और यूनिकॉर्न समुदाय  (Unicorn community) में भी तीसरा सबसे बड़ा ईको सिस्टम  है। हालांकि, उनमें से केवल 10% का नेतृत्व महिला संस्थापकों (women founders) ने किया है। महिला उद्यमियों के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से उनकी सफलता की यात्रा के लिए अधिक सहयोग और अवसर प्रदान करना समय की मांग है। सौभाग्य से, पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के बिजनेस लीडर और संस्थापक कंपनियों के बनने की पूरी प्रक्रिया में बदलाव आया है। यह बदलाव भारत के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा और भारत को वैश्विक परिदृश्य पर और मज़बूती से स्थापित करेगा। 

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महिला उद्यमिता से महिला सशक्तिकरण

महिला उद्यमिता से महिला सशक्तिकरण

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बुजुर्गों की खुशियाँ और स

जीवन में कुछ चीजे कभी नहीं बदलती है। कुदरत का निज़ाम सब पर लागू होता है.जैसे जीवन एक सत्य है, मृत्यु भी सत्य है और इस जन्म और मृत्यु के बीच जो कुछ घटित होता है वो ही हमारा जीवन है और इसके भी कई चरण है, बचपन, शैशवकाल, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और अंत में वृद्धावस्था। जीवन के शुरुआती समय, बचपन को लोग हमेशा सबसे सुखद मानते है फिर युवावस्था में उत्साह से भर कुछ कर दिखाने का सपना संजोते है, और फिर  प्रौढ़वस्था में स्थयित्व, परिवार बच्चों का भविष्य और अपने बुढ़ापे के लिए फिक्रमंद होना आम बात है। ये सबके जीवन का हिस्सा है। पर जीवन का अंतिम पड़ाव यानी, वृद्धवस्था इंसान के जीवन का सबसे ज्यादा संवेदनशील हिस्सा है, जहाँ अक्सर बहुत असमंजस की स्थित होती है। आपने अपने जीवन की सारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया, पैसा कमाया, बच्चों को भी अपने पैरों पर खड़ा किया, उनसे बहुत सी उम्मीदें लगाईं पर फिर भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती की ये सब आपके बुढ़ापे में आपके काम आएगा। यह जिंदगी का ऐसा इन्वेस्टमेंट प्लान है जिसका रिटर्न आपको कब मिलेगा, कितना मिलेगा, किस रूप में मिलेगा या मिलेगा ही नहीं कुछ तय नहीं किया जा सकता। जिन्हे आपने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया वो आपका हाथ, आपकी जिंदगी के सबसे नाज़ुक समय पर नहीं छोड़ देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं। जब लोग बूढ़े हो जाते हैं, तो उन्हें अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता होती है क्योंकि हर छोटे से छोटे काम को खुद करना मुश्किल हो जाता है। वृद्धावस्था में आने पर लोग अक्सर अत्यधिक मूडी हो जाते हैं इसलिए उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो उनकी देखभाल कर सके और समझ सके कि वे क्या चाहते हैं। वो कहते हैं ना बच्चे और बूढ़े एक समान होते है।  

संयुक्त परिवार प्रणाली joint family system के पतन या लगभग समाप्त होने के साथ परिदृश्य धीरे-धीरे बदल गया, जिसे एकल परिवार nuclear family की व्यवस्था ने रीप्लेस कर दिया। अगर पिछले 50 साल का विश्लेषण करें तो इस परिवर्तन से समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का पता चलेगा। इस परिवर्तन के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो न केवल पूरे परिवार की व्यवस्था को दर्शाता है बल्कि बुजुर्गों के जीवन पद्धति lifestyle of the elderly को भी दर्शाता है, जो आंशिक रूप से या पूरी तरह से आश्रित हो गए हैं । 

प्रमुख कारण परिवारों का विघटन था, इनके मुख्य कारकों में शिक्षा, नौकरी, करियर में वृद्धि, शादी, सुविधाओं और बेहतर जीवन शैली के लिए होड़ थी। युवा पीढ़ी को घर से बाहर निकलने और नए वातावरण में खुद को समायोजित करने और जीवन के नए तरीकों को अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई, लेकिन बुजुर्ग आबादी ने बदलाव को एक कठिनाई के रूप में पाया। उनके लिए, संलग्न भावनाओं, सुख-सुविधाओं और संपत्ति के साथ अपने स्वयं के स्थानों से दूर जाना, और  शहरों में नए वातावरण में खुद को एडजस्ट करना कठिन था। लेकिन उन्हें अपने बच्चों और अपनी सुरक्षा के लिए यह त्याग और समझौता करना पड़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में  भी बुजुर्गों को अकेलेपन और अभावों से गुजरना पड़ता है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों से युवा अक्सर रोजी रोटी की तलाश में पलायन कर शहरों में आ जाते है, ऐसे में  बुजुर्गों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बुजुर्ग अकेले या अपने जीवनसाथी के साथ रहते है, एक ऐसा समय आता है जब उन्हें स्वास्थ्य के लिए शारीरिक देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है, पर उस समय वो अपने बच्चों से दूर हो जाते हैं। भारत में कुछ दशक पहले बुजुर्गों के लिए वैकल्पिक साधनों का मुद्दा बहुत प्रासंगिक नहीं था क्योंकि तब तक उनकी देखभाल उनके परिवारों द्वारा की जाती थी। 

इंडिया एजिंग रिपोर्ट India Ageing Report - 2017 के अनुसार  प्रजनन क्षमता में कमी के साथ और वृद्धावस्था में जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, के कारण  पारंपरिक रहने की व्यवस्था में बदलाव आया है। अनौपचारिक सामाजिक मूल्यों में गिरावट decline in social values के साथ बुजुर्गों का सपोर्ट सिस्टम प्रभावित हुआ है, अकेले रहने वाले वृद्ध लोगों की संख्या में वृद्धि के साथ असुरक्षित होने की संभावना बड़ी है, खासकर बुजुर्ग महिलाओं के मामले में। अकेले रहने वाले वृद्ध व्यक्तियों का अनुपात जीवनसाथी (एकल जीवन) समय के साथ बढ़ा है 1992-93 में 2.4 प्रतिशत से 2004-05 में 5 प्रतिशत हो गया। शारीरिक  स्वास्थ्य कई आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक कारकों पर निर्भर करता है । 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि एक बुजुर्ग  व्यक्ति की सबसे अच्छी देखभाल और ध्यान उनके अपने परिवार के सदस्यों द्वारा दिया जा सकता है, हालांकि जैसे-जैसे समाज कई परिवर्तन के दौर से गुजरा है, बहुत सी चीजे ,मूल्य बदल गए  हैं और ऐसे समय में  हमारे समाज में बुजुर्गों के लिए देखभाल करने वाली संस्थाओं और सरकारी प्रयासों को बढ़ाने की बहुत अधिक जरूरत है। आज की युवा पीढ़ी अपने करियर की ओर भाग रही है, वे कभी-कभी परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की आवश्यक जरूरतों का ख्याल रखना भूल जाते हैं और ऐसा अक्सर होता है, हम आये दिन अपने आस-पास, समाज में ऐसे उपेक्षित बुजुर्गों को देख सकते है, ये समाज की एक हक़ीक़त है और इसे स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में भारत में अनुमानित 138 मिलियन बुजुर्ग हैं।

हम जिस आदर्श समाज की परिकल्पना करते है उसमे वृद्धाश्रमों का होना जरूर हमारे समाज की व्यवस्था और मूल्यों पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है, की आखिर इन संस्थाओं की जरूरत है ही क्यों? पर ये सच है की अगर ऐसी संस्थायें ना हों तो स्थिति बद से बदतर हो सकती है। 

जब बड़े लोगों की सावधानीपूर्वक, संवेदनशील  देखभाल की जाती है, तो यह समाज में एक अच्छा संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। वृद्धाश्रमों और देखभाल इकाइयों old age homes and care units ने दुनिया भर के लोगों को वृद्ध लोगों की आवश्यकता के लिए ज़रूरी  सहायता प्रदान करने और उनकी जिंदगी को आसान बनने में मदद की है और वह भी बिना किसी रुकावट और देरी के। जब कोई ऐसी जगह होती है जहां वृद्ध लोग मिल सकते हैं और उसी आयु वर्ग के लोगों के साथ मेलजोल कर सकते हैं, तो वे खुश और सुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए यदि आप अपनी नौकरी या किसी अन्य कारण से अपने परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की देखभाल करने में असमर्थ हैं, और आप कभी-कभी आत्मग्लानि से भर उठते है, हालांकि वो आपकी जिम्मेदारी है, उन्होंने तो अपनी जिम्मेदारी निभाई और आपको लायक बनाया , पर अगर आप अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, तो उनकी जिंदगी को नर्क बनाने से बेहतर है के आप उन्हें, ऐसी जगह दे जहाँ वो अपना बुढ़ापा सुकून से काट सकें। 

ऐसी कई विशेष संस्थाए हैं जो आपके बुजुर्गों की ज़रूरतों का पूरा ध्यान रखने में मदद कर सकती हैं और आप उन पर भरोसा कर सकते हैं।

ऐसी ही कुछ संस्थाओं के बारे में आज आपको इस लेख में बताने के हम कोशिश कर रहे है। हो सकता है ये ब्लॉग हमारे अपने बुजुर्गों को उनकी जिंदगी को आसान बनाने के जरिया बन सके। 

इमोहा एल्डर केयर Imoha Elder Care  -

जनवरी 2019 में स्थापित यह प्लेटफॉर्म , भारत में बुजुर्गों के लिए ऐसा मंच  है, जो एक प्रौद्योगिकी संचालित समुदाय-आधारित व्यापक मंच है जो बुजुर्गों को शालीनता और संवेदनशीलता के साथ  बढ़ती उम्र में सामर्थ्यवान बनाता है। यह प्लेटफॉर्म बुजुर्गों के लिए अपने घरों में ही सुरक्षित रहने,अपने आप को  व्यस्त रखने एवं उनके एकाकी जीवन से निकालकर एक स्वस्थ्य और मनोरंजक जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। इन सेवाओं का लाभ भारत के सबसे व्यापक एल्डर ऐप पर लिया जा सकता है, जिसे विशेष रूप से बुजुर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। यह तकनीकी समाधान बुजुर्गों को स्वास्थ्य सेवा, सुविधा, जुड़ाव, सुरक्षा और आपात स्थिति की श्रेणियों के तहत अपनी विभिन्न सेवाओं से लाभान्वित करता है।

इसकी मुख्य  सेवाओं में शामिल हैं:

-चैनल भागीदारों और सत्यापित सामुदायिक स्वयंसेवकों के माध्यम से दैनिक आवश्यक दवाओं, किराने का सामान आदि की डिलीवरी करना। Delivery of essential medicines, groceries etc.

- स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श के लिए डॉक्टरों के एक पैनल की ऑनलाइन सुविधा, आसपास के अस्पतालों और एम्बुलेंस प्रदाताओं के साथ 24/7 आपातकालीन समन्वय प्रदान करना। 

- यहाँ तक की बुजुर्गों की तमाम सुविधाओं को आसानी से प्राप्त करने के लिए ये उन्हें विभिन्न तकनीकी ज्ञान और स्मार्टफ़ोन का प्रयोग करना Various technical knowledge and use of smartphones भी सिखाते है। जिससे उनकी निर्भरता कम हो सके।

-भावनात्मक समर्थन और कल्याण के लिए प्रामाणिक बुजुर्ग विशिष्ट जानकारी Authentic Elderly Specific Information  और ऑनलाइन इंटरैक्टिव कार्यक्रमों का स्रोत बनना।

इन सेवाओं को इसके 24x7 हेल्पलाइन नंबर 1800-203-5135 के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है और इसे इसके ऐप और वेबसाइट के माध्यम से भी एक्सेस किया जा सकता है। कंपनी का मिशन बुजुर्गों से प्यार करने और उनकी देखभाल करने वालों का दुनिया का सबसे व्यापक डिजिटल समुदाय बनना है। श्री सौम्यजीत रॉय, Mr. Soumyajit Roy जो की इमोहा एल्डर केयर के सह-संस्थापक और सीईओ, हैं  लगभग  एक दशक से अधिक समय से विशेष रूप से एल्डरकेयर के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

सौम्यजीत पहले भी इंडस्ट्री एडवोकेसी में शामिल थे। वह सीनियर केयर पर सीआईआई टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष और एसोसिएशन ऑफ सीनियर लिविंग इंडिया Association of Senior Living India के संस्थापक बोर्ड सदस्य थे। इसके अलावा, वह उद्यमी बनने से पहले पुरस्कार विजेता अंतरा सीनियर लिविंग, मैक्स इंडिया समूह Antara Senior Living, Max India Group के एक हिस्से  के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं। गुरुग्राम के पास, हरियाणा  से संचालित यह समूह  सपने देखने वालों का एक समूह हैं जो मानते हैं कि हमारे वरिष्ठजन दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। इस समूह में वरिष्ठ देखभाल विशेषज्ञ भी हैं जिनके पास वैश्विक स्तर पर 50+ वर्षों का संयुक्त अनुभव है। 

सीनियर्स फर्स्ट  Seniors First-

सीनियर्स फर्स्ट, भारत में सीनियर केयर सेवाओं को प्रदान करने वाला एक अग्रणी मंच है जिसे , डॉ ममता मित्तल Dr. Mamta Mittal द्वारा लॉन्च किया गया। यह  एक ऑनलाइन मार्केटप्लेस online marketplace है जो  बुजुर्गों, और देखभाल करने वालों को भी को उत्कृष्ट और सुलभ संसाधन प्रदान करता है जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार आ सके। सीनियर्स फर्स्ट विभिन्न  सीनियर-केयर टूल्स, सेवाओं और उत्पादों के लिए एक क्लिक पर एक्सेस one click access प्रदान करता है। सीनियर्स फर्स्ट, की शुरुआत के पीछे भी एक वास्तविक मर्म है जिसका अनुभव स्वयं डॉ ममता मित्तल ने कोविड -19 के प्रकोप और उसके बाद के लॉकडाउन के दौरान किया। इस समय ने  समाज के अन्य आयु समूहों की तुलना में बुजुर्गों को सबसे अधिक प्रभावित किया था। इसने तमाम परेशानियों, आये दिन होने वाली दर्दनाक मौतों  के अलावा, अचानक उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या को बुरी तरह बाधित किया, और उन तक जरूरी देखभाल, और बुनियादी चीज़ों तक पहुंच भी बंद हो गई। अकेले रहने वाले बुजुर्गों elderly living alone के लिए तो परिस्थितयां और भी भयावह और कष्टकारी थी। अन्य अभावों के साथ बुनियादी जरूरतों के लिए वो तरस गए। टेलीमेडिसिन जैसी तकनीकों को अपनाने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ा और अलगाव के कारण अकेलापन, चिंता और अवसाद loneliness, anxiety and depression से ग्रसित हो गए। स्वयं डॉ ममता मित्तल के माता-पिता उनमें से एक थे, जो लगभग पूरे आठ महीने तक घर के अंदर कैद रहे। उनके  माता-पिता और आसपास के क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्ग, देखभाल सेवाओं तक किसी भी जानकारी या पहुंच से अनभिज्ञ थे, इसलिए डॉ मित्तल ने उनके लिए आवश्यक सेवाओं की एक लिस्ट बनाना  शुरू कर दिया और  इसके बाद महसूस किया कि हर एक सेवा के लिए उन्हें  एक अलग ऐप डाउनलोड करने की आवश्यकता थी, और प्रत्येक के काम करने का अलग तरीका था । इसको व्यावहारिक रूप से मैनेज करना असंभव था। चूंकि डॉ मित्तल स्वयं एक डॉक्टर थीं वो पहले से ही बुजुर्गों  के सामने आने वाली समस्याओं से अच्छी तरह अवगत थीं।

यहीं से उनके दिमाग में एक ऑल इन वन यूजर-फ्रेंडली एल्डर केयर ऐप सीनियर्स फर्स्ट  बनाने का विचार आया। एक ऐसा मंच जहां सभी सेवाएं सत्यापित सेवा प्रदाताओं द्वारा प्रदान की जाएँ ,और उनके दरवाजे पर एक बटन के एक क्लिक पर उपलब्ध हों। एक ही ऐप में मेडिसिन रिमाइंडर, केयर, कम्युनिटी और एंगेजमेंट टूल Medicine reminder, care, community and engagement tool भी उपलब्ध हों । इसके लिए हमारे बुजुर्गों  को केवल एक ऐप ही का उपयोग करना सीखना होगा और जब भी आवश्यकता हो, एक क्लिक में सहायता प्राप्त करनी होगी। तो इस तरह हुआ सीनियर्स फर्स्ट का जन्म हो गया। आज सीनियर्स फर्स्ट, वरिष्ठ समुदाय और उनके सेवा प्रदाताओं को करीब लाने के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग कर रहा है। यह बुजुर्गों को यथासंभव लंबे समय तक उनके घर के आराम में रहने के लिए सक्षम कर रहे हैं,  यह उन सभी बुनियादी जरूरतों  की पूर्ति में उनकी सहायता कर रहा है जिनकी  उन्हें आवश्यकता हो सकती है।

सीनियर्स फर्स्ट की प्राथमिक सेवाओं में शामिल है -: 

-चिकित्सा सेवाएं - आपातकालीन देखभाल, एम्बुलेंस सेवाएं और अस्पताल में भर्ती करवाना , घरेलू देखभाल समाधान; होम अटेंडेंट Medical Services - Emergency Care, Ambulance Services and Hospitalization, Home Care Solutions; home attendant, नर्स, डॉक्टर, चिकित्सा उपकरण (किराया या बिक्री), दवाओं की होम डिलीवरी, रक्त परीक्षण (होम कलेक्शन)

-गैर-चिकित्सा सेवाएं - गृह रखरखाव, गृह सुरक्षा, कानूनी और वित्त, दैनिक सहायता; किराना, कार रखरखाव, कूरियर और उपहार, कैब, ज्योतिष,सौंदर्य और स्पा, अंतिम संस्कार सेवाएं, आदि।

-वरिष्ठ देखभाल से सम्बंधित विभिन्न  उत्पाद और उपकरण

-मनोरंजन और ऑनलाइन कार्यक्रम, वेबिनार और शैक्षिक कार्यक्रम

 इस सभी अलावा यह  मुफ्त लाइव कार्यक्रम, मनोरंजन और आपसी जुड़ाव की गतिविधियों का आयोजन भी करते हैं ताकि हमारे सम्मानित बुजुर्ग अपने जीवन को पूरी तरह से जी सकें। यह ऑनलाइन समुदाय निर्माण और पारस्परिक सहायता समूहों के गठन को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। 

एपोच Epoch -

बुजुर्गों  के जीवन को बेहतर बनाने के दिशा में अग्रसर एपोच  को 2012 में स्थापित किया गया।  यह , एक होलिस्टिक एप्रोच के साथ व्यक्ति केंद्रित देखभाल प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध प्लेटफार्म है जो  बुजुर्गों को जीवन की उच्चतम गुणवत्ता highest quality of life  प्राप्त करने में सक्षम बनाता है एपोच को भारत में कार्य करने का 10 वर्षों का अनुभव है, और यह प्रामाणिक वैश्विक सर्वोत्तम मानदंडों  का पालन करता है। एपोच असिस्टेड लिविंग और डिमेंशिया केयर Assisted Living and Dementia Care में विशेषज्ञता प्राप्त है। 

एपोच एल्डर केयर की स्थापना भारत में बुजुर्गों की देखभाल और सेवाओं की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए एक घरेलू देखभाल प्रदाता के रूप में की गई थी। कबीर चड्ढा और नेहा सिन्हा Kabir Chadha and Neha Sinha द्वारा संचालित एपोच एल्डर केयर ने बुजुर्गों के देखभाल सम्बंधित जरूरतों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए कम्पैनियन केयर , मनोवैज्ञानिक सहायता और गृह प्रबंधन Companion Care, Psychological Support and Home Management पर विशेष ध्यान दिया, एपोच ने दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और पुणे में 400 से अधिक बुजुर्गों को सेवाएं प्रदान कीं। अपने अनुभवों से सीखते हुए समय के साथ, इनकी समर्पित टीम ने महसूस किया कि सिर्फ घरेलू देखभाल प्रदान करना पर्याप्त नहीं था। कई बुजुर्गों  को लगातार  देखभाल और पर्यवेक्षण की आवश्यकता थी, और इनमे से कइयों के पास कोई पारिवारिक सहयोग family support भी नहीं था और उनका जीवन बहुत कष्टदाई था।  इस तरह 2014 में, इन्होने अपने मॉडल को बदलने और आवासीय देखभाल residential care  को भी अपनी सर्विसेज में शामिल करने का फैसला किया और इस तरह एपोच असिस्टेड लिविंग आश्रय हीन बुजुर्गों  shelterless elderly के जीवन की एक नयी उम्मीद और आशा की किरण बन के आया। नेहा सिन्हा ने दिसंबर 2014 में एपोच के सीईओ के रूप में पदभार संभाला। बहुत कम समय में, एपोच बुजुर्ग और डिमेंशिया देखभाल दोनों में एक अग्रणी संस्थान  बन गया है यह एक ऐसा नाम है  जिसपर तमाम  परिवारों द्वारा अपने प्रियजन की देखभाल के लिए भरोसा किया जाता है। किसी भी बुजुर्ग मरीज के लिए, ऑपरेशन के बाद रिकवरी और पुनर्वास सबसे  महत्वपूर्ण होता है - इसमें  हिप रिप्लेसमेंट, घुटने की सर्जरी, कार्डियक सर्जरी, मोतियाबिंद Hip Replacement, Knee Surgery, Cardiac Surgery, Cataract या कोई अन्य सर्जरी  भी हो सकती है। एपोच एल्डर केयर घर जैसे वातावरण में ऑपरेशन के बाद की देखभाल के लिए एक मजबूत राहत प्रबंधन प्रणाली प्रदान करता है, ताकि बुजुर्ग सामान्य स्थिति में लौट सकें।

एपोच एल्डर केयर मानता है  कि हमारे बड़ों की देखभाल करना एक नैतिक दायित्व है,और यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने बड़ों की जिम्मेदारी से देखभाल करें, उनके साथ सम्मान से पेश आएं और उन्हें उच्चतम स्तर की देखभाल प्रदान करें। एपोच एल्डर केयर वरिष्ठ नागरिकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले घर प्रदान करता है। एपोच असिस्टेड लिविंग होम समग्र, व्यक्ति केंद्रित देखभाल प्रदान करते हैं जो बुजुर्गों को जीवन की उच्चतम गुणवत्ता प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। 

एपोच एल्डर केयर के प्राथमिक सेवाएं निम्न हैं -

रिकवरी और पुनर्वास देखभाल- Recovery & Rehabilitation Care-

एपोच एल्डर केयर एक असिस्टेड लिविंग होम है। यह कोई नर्सिंग होम या धर्मशाला नहीं है। यह किसी भी बुजुर्ग के लिए देखभाल और सहायता प्रदान करने वाली सेवाएं प्रदान करता है जो बंधनों से मुक्त होना चाहते हैं लेकिन उन्हें रोज़मर्रा की गतिविधियों में कुछ सहायता की आवश्यकता होती है। इन घरों में  प्रत्येक में लगभग 12-14 बुजुर्ग रहते हैं और इन्हे इस तरह से सुसज्जित और डिज़ाइन किया गया है जो उन्हें घर जैसा अहसास दे सके। एपोच एल्डर केयर एक असिस्टेड लिविंग होम है इस टीम में कुशल, अनुभवी और पंजीकृत नर्स शामिल हैं, जो नियमित रूप बुजुर्गों के स्वस्थ्य सम्बन्धी जरूरतों का ख्याल रखती  हैं। यह नर्सिंग टीम एपोच होम्स में 24x7 मौजूद है और इसलिए किसी भी आपात स्थिति या विशेष नर्सिंग जरूरतों की देखभाल के लिए लगातार उपलब्ध है जो दिन या रात कभी भी उत्पन्न हो सकती है।

डेमेंटिया केयर Dementia Care-

एपोच एल्डर केयर डिमेंशिया देखभाल में  विशेषज्ञ है। यह  किसी भी प्रकार के और सभी चरणों में मनोभ्रंश Dementia  से पीड़ित बुजुर्गों के लिए एक विशेष  देखभाल कार्यक्रम प्रदान करता है । इस देखभाल में बुजुर्गों  की भावनात्मक, सामाजिक और शारीरिक भलाई के पहलुओं को ध्यान में रख कर एक सधी हुई रणनीति के तहत कार्य होते हैं । 

इसके अलावा इनकी अन्य प्रमुख सेवाएं निम्न है -

-मनोभ्रंश देखभाल - टेली परामर्श Dementia Care 

-असिस्टेड लिविंग Assisted Living -

-किसी भी बुजुर्ग के लिए उनकी दैनिक जीवन की गतिविधियों जैसे स्नान, ड्रेसिंग, परिवहन और उनकी दवा के नियमों का पालन करने में सहायता आदि। 

हेल्पएज इंडिया HelpAge India-

हेल्पएज इंडिया की  स्थापना  1978 में हेल्पएज इंटरनेशनल (यूके) HelpAge International (UK)  के संस्थापक सेसिल जैक्सन कोल Cecil jackson Cole ने की जो इसके पहले अध्यक्ष थे । इस समय के आसपास हेल्पएज इंडिया  में दो अन्य लोगों  को  शामिल किया गया - जॉन एफ। पियर्सन और सैमसन डैनियल John F. Pearson and Samson Daniel 

मार्च 1974 में, जब कोल ने भारत का दौरा किया, सैमसन डैनियल नामक एक व्यक्ति  ने दिल्ली में एक सदस्य संगठन स्थापित करने के लिए  इनसे वित्तीय मदद के लिए उनसे संपर्क किया। कोल एक  दूरदर्शी व्यक्ति थे  उन्होंने  डैनियल को धन जुटाने के लिए प्रशिक्षित करने की पेशकश की। लंदन में तीन महीने के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के बाद, श्री डेनियल और उनकी पत्नी भारत लौट आए और दिल्ली में स्कूली बच्चों के साथ एक प्रायोजित कार्यक्रम  का आयोजन किया। यह इतना सफल रहा कि 1975 में हेल्पएज इंटरनेशनल ने बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता को कवर करने के लिए बहुत सारे कर्मचारियों की भर्ती की।

हेल्पएज इंडिया भारत में एक गैर-लाभकारी संगठन है।  संगठन 'वंचित वृद्ध व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए काम करता है। हेल्पएज एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां हमारे समाज के बुजुर्गों को सक्रिय, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन का अधिकार हो। यह संगठन हाल ही में कोविड-19 महामारी के दौरान  बुजुर्गों  को राहत राहत पहुंचाने के व्यापक प्रयासों और जनसंख्या के मुद्दों में  उत्कृष्ट योगदान देने  के लिए 'संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार 2020' 'United Nations Population Award 2020' से सम्मानित होने वाला पहला और एकमात्र भारतीय संगठन बन गया है। भारत में वृद्ध व्यक्तियों के अधिकारों की के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले अग्रणी संगठनों में इसका नाम शुमार है ।

 हेल्पएज इंडिया भारतीय वृद्ध समुदाय की  चिंताओं को समझता है और उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन के उनके अधिकारों को सुनिश्चित करता है और यह बुजुर्गों के अनुकूल नीतियों और उनके कार्यान्वयन की वकालत करता है। यह भारत भर में 26 राज्य कार्यालयों के माध्यम से काम करता है, कई कार्यक्रम चलाता है। संगठन के कार्यक्रम हेल्थकेयर (मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट, मोतियाबिंद सर्जरी), एजकेयर (हेल्पलाइन, सीनियर सिटीजन केयर होम और डे केयर सेंटर, फिजियोथेरेपी), आजीविका (वृद्ध-स्व-सहायता समूह; सरकार के साथ जुड़ाव) के क्षेत्रों में सीधे हस्तक्षेप पर केंद्रित हैं।  

 हेल्पएज इंडिया बुजुर्गों के लिए निम्न सर्विसेज प्रदान करता है -

मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट:Mobile Healthcare Unit:

यह सेवा बुजुर्गों और उनके लिए स्थायी स्वास्थ्य देखभाल का समुदाय कार्यक्रम है मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट (एमएचयू) जरूरतमंद बुजुर्गों की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, के लिए प्रतिबद्ध है यह यूनिट समुदाय को भी  शिक्षित एवं जागरूक करता है । प्रत्येक एमएचयू में एक डॉक्टर,फार्मासिस्ट और एक सामाजिक कार्यकर्ता है। 22 राज्यों में  170 से अधिक मोबाइल हेल्थकेयर इकाइयां हैं। 

दृष्टि की बहाली:Restoration of Vision: भारत  अधिकतर बुजुर्ग  मोतियाबिंद के शिकार हैं। उनका अंधकारमय जीवन उनकी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देता है  हेल्पएज इंडिया द्वारा प्रामाणिक  नेत्र चिकित्सालयों का चयन किया जाता है और ऐसे बुजर्गों को चिन्हित कर  उनकी सर्जरी कराता है सभी सर्जरी केवल स्थाई अस्पतालों में की जाती हैं ना की अस्थायी शिविरों में। अब  तक  हेल्पएज इंडिया  9 लाख से अधिक बुजुर्गों की  जिंदगी में रोशनी ला चुका है। 

एक बुजुर्ग को सपोर्ट करे Support a Gran:

ऐसे  हजारों बेसहारा  बुजुर्ग है जिन्हें बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया नहीं है । पिछले कुछ वर्षों में हेल्पएज इंडिया ने 30,000 से अधिक निराश्रितों को सहारा दिया और उन्हें आश्रय दिलाया है। भोजन राशन, कपड़े और बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल। जरूरतमंद बुजुर्गों को उनके दिन-प्रतिदिन के भरण-पोषण की व्यवस्था करता है  ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।

वृद्धाश्रम Old Age Homes:

आश्रय हीन बुजुर्गों  के सर पर एक स्थाई छत की व्यवस्था करने के लिए हेल्पएज इंडिया ने पंजाब में पटियाला और गुरदासपुर, तमिलनाडु में कुड्डालोर और पश्चिम बंगाल में कोलकाता जैसे स्थानों में वृद्धों के लिए मॉडल घरों की स्थापना की है। हेल्पएज 300 वृद्धाश्रमों को सपोर्ट  करता है और भारत में वृद्धों के लिए 5 बैरियर होम भी चलाता है। इन आश्रमों में बुजुर्गों की देखभाल से सम्बंधित सभी मूलभूत आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। 

आजीविका सहयोग -Livelihood Support:

आत्मसम्मान से जीने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए  हेल्पएज एल्डर-सेल्फ-हेल्प-ग्रुप्स (ईएसएचजी) के गठन के माध्यम से बुजुर्गों को अपनी स्वयं की आय सृजन के स्थायी तरीकों पर बहुत जोर देता है । इन ईएसएचजी को फिर उच्च स्तरीय सामुदायिक संस्थानों में संघटित किया जाता है ताकि वे और अधिक मजबूती प्राप्त कर सकें। हेल्पएज इंडिया के इस मॉडल को ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अपनाया है। हेल्पएज भारत के 16 राज्यों में 95,584 बुजुर्गों के साथ 7,415 समूहों का सहयोग करता है, जिससे बुजुर्गों को उनकी खोई हुई गरिमा फिर से हासिल करने में मदद मिलती है। और वो स्वतंत्र और आत्मनर्भर जीवन जीने की ओर उन्मुख होते हैं। 

बुजुर्गों  के लिए हेल्पलाइन Elder Helplines:

हेल्पएज भारत के 21 राज्यों की राजधानियों में जरूरतमंद बुजुर्गों को सहायता प्रदान करने के लिए एक टोल-फ्री एल्डर हेल्पलाइन चलाता है। इसके अंतर्गत  - परित्यक्त बुजुर्गों का बचाव, संकट में पड़े  बुजुर्गों की काउंसलिंग, स्वास्थ्य देखभाल, कानूनी सहायता, विभिन्न उपलब्ध सेवाओं से संबंधित जानकारी आदि। हेल्पलाइन बुजुर्गों को विभिन्न संस्थानों जैसे वृद्धाश्रम, अस्पताल, पुलिस, सरकारी और गैर- सरकारी संगठन से सम्बद्ध करने में भी मददगार होती है ।

हेल्पएज इंडिया हेल्पलाइन नंबर है -1800 -180 -1253 

इनके आलावा भी हेल्पएज इंडिया मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, कैंसर केयर आदि विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर बुजुर्गों के जीवन को सुलभ बनाने के अपने प्रयास के साथ आगे बढ़ रहा है और अधिक से अधिक जरूरतमंद बुजुर्गो तक अपनी पहुंच बनने के लिए प्रत्नशील है।

माँ -बाप उन मधु मक्खिओं की तरह होते है जो दर-दर भटक कर, तमाम दुश्वारिओं को झेलते हुए तिनका-तिनका चुन अपने बच्चों को एक मजबूत छत्ता  रूपी घर और शहद रूपी अमृत इकठ्ठा करते है जो उनकी जिंदगी को पोषित कर हर तरह के तूफ़ान, कड़ी धूप और बारिश से उनकी न सिर्फ सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि उनके स्वस्थ समृद्ध जीवन की आधारशिला रखता है। पर जीवन के अंतिम पड़ाव पर वो खुद अपने ही घर से निकाल दिए जाते है और अपने ही शहद की एक-एक बूँद को तरस जाते है। जब तक बुजुर्ग दंपती साथ होते है तो किसी तरह एक दूसरे के सहारे जीवन काटते है पर एक के भी न रहने पर या कई बार जीते जी उन्हें दो बच्चों की बीच किसी चीज़ की तरह बाँट दिया जाता है। उस पर बच्चों की उपेक्षा और उन्हें स्टोर रूम में रखे पुराने सामान के जैसे उपयोगहीन समझने का अपमानजनक एहसास उन्हें जो आंतरिक वेदना देता है उससे उनकी जीने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। पर इन सब के बावजूद माँ-बाप की झोली में अपने बच्चों के लिए दुवाएँ ही होती है। माँ बाप एक नेमत हैं,भगवान् से पहले उनका स्थान है। याद रखो अपनी जड़ों से कट कर कोई भी शाख फलती फूलती नहीं है। उनकी दुआ में इतना असर है तो सोचिये अगर वो  बद्दुआ दे तो क्या होगा ?

ये संस्थाए जो काम कर रही है, ये हमारा और आपका यानि हम बच्चों का काम है। हमें शर्म और ग्लानि से चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए अगर हमारे माँ बाप हमारे होते किसी ओल्ड ऐज होम में आश्रय लें। शुक्रिया इन संस्थाओं का जो न सिर्फ उनके बुढ़ापे की लाठी बन रही हैं बल्कि उन्हें जीने और हंसने की वजह भी दे रही हैं। लिखने को बहुत है पर अब जी भर आया है ये सोच कर कि आखिर बूढा तो मैं भी होऊंगा कभी, और आप सब भी। 

“You don't stop laughing when you grow old, you grow old when you stop laughing.” - George Bernard Shaw

Tags: Seniors Firs, Joint Family System, Imoha Elder Care, Shelterless Elderly

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क्या बुजुर्गों के दिल में भी OTT Music से बजती है घंटियां?

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 FY 26 तक इंजीनियरिंग, दू

Engineering, telecom, healthcare to add 12 mn new jobs by FY26: Report

Engineering, telecom, healthcare expected to add about 12 million jobs by FY26

Engineering, telecom, and healthcare sectors are expected to add about 12 million new jobs by FY26, according to a report by TeamLease Digital, the specialized staffing division of TeamLease Services.

The report delves deep into specialized roles, the sought-after skills, skills gap and measures undertaken to address the gap by employers, and market median salaries for these roles. It also throws light on the impact of technology proliferation and digitization on employment in the three sectors.

According to the research, the contribution to GDP by engineering, telecom, and healthcare will see a rise in the next five years and jobs will grow significantly. The total employment generated by the three sectors together will rise from the current 4.56 million to 9.03 million in the next five years.

The focus on recovery coupled with technology proliferation and digitization in these sectors will lead to an increase in demand for talent with high skill and expertise. The demand for specialized roles will double by 2026.

“The engineering, telecom, and healthcare sectors are on the verge of an industry 4.0 transformation. There is a shift from a central industrial control system to one where smart products and processes at the heart of their operations. This transition coupled with the PLI scheme and FDI (foreign direct investment) is driving an exponential demand, more so for talent with niche skills across these sectors," said Sunil C, head of Specialised Staffing, TeamLease Digital.

"While in overall there will be a 25-27% rise in job opportunities created by the three sectors together, the demand for skilled talent or specialized staff will grow from the current 45,65,000 to more than 90,00,000 (estimated) by 2026," he added.

Brief:

According to a report by TeamLease Digital, the specialised staffing division of TeamLease Services, engineering, telecom and healthcare are expected to add around 12 million new jobs by FY26.

The report delves  into professional roles, required skills, skill gap and actions taken by employers to fill the gap, and market median salaries for these roles. It also covers the impact of technology adoption and digitization on employment in  three sectors.

The focus on recovery coupled with the technology proliferation and digitisation in these sectors can also lead to an increase in demand for talent with skills and expertise. The demand for specialised roles will double by 2026. 

According to the survey, engineering, telecommunications, and healthcare contributions to GDP will increase over the next five years, and employment will increase significantly. Total employment in the three sectors  will increase from  4.56 million today to 9.03 million over the next five years.

The head of Specialised Staffing, TeamLease Digital, Sunil C has said, “The engineering, telecom, and healthcare sector are on the verge of the industry transformation. There is a shift from a central industrial control system to one where smart products andprocesses at the heart of their operations. This transition couples with the PLI scheme and FDI is driving and exponential demand, more so far talent with niche skills scross these sectors.”

 FY 26 तक इंजीनियरिंग, दूरसंचार, स्वास्थ्य सेवा में 12 मिलियन नौकरियों की उम्मीद

टीमलीज डिजिटल TeamLease Digita की एक रिपोर्ट के अनुसार, टीमलीज सर्विसेज, इंजीनियरिंग, टेलीकॉम और हेल्थकेयर ngineering, telecom and healthcare के स्पेशलाइज्ड स्टाफिंग डिवीजन से वित्त वर्ष 26 तक लगभग 12 मिलियन नई नौकरियों के जुड़ने की उम्मीद है। रिपोर्ट पेशेवर भूमिकाओं, आवश्यक कौशल, कौशल अंतराल और नियोक्ता द्वारा इन भूमिकाओं के लिए बाजार के औसत वेतन को भरने के लिए की गई कार्रवाइयों में तल्लीन करती है। इसमें तीन क्षेत्रों में रोजगार पर प्रौद्योगिकी अपनाने और डिजिटलीकरण के प्रभाव को भी शामिल किया गया है। इन क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी प्रसार और डिजिटलीकरण technology proliferation and digitisation technology proliferation and digitisation  के साथ-साथ पुनर्प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित करने से कौशल और विशेषज्ञता के साथ प्रतिभा की मांग में वृद्धि हो सकती है। विशेष भूमिकाओं की मांग 2026 तक दोगुनी हो जाएगी। सर्वेक्षण के अनुसार, अगले पांच वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद GDP में इंजीनियरिंग दूरसंचार और स्वास्थ्य सेवा का योगदान बढ़ेगा, और रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। अगले पांच वर्षों में तीनों क्षेत्रों में कुल रोजगार आज के 4.56 मिलियन से बढ़कर 9.03 मिलियन हो जाएगा। स्पेशलाइज्ड स्टाफिंग के प्रमुख, टीमलीज डिजिटल, सुनील सी Sunil C  ने कहा है, “इंजीनियरिंग, दूरसंचार और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र उद्योग परिवर्तन के कगार पर हैं। एक केंद्रीय औद्योगिक नियंत्रण प्रणाली से एक में बदलाव किया गया है जहां स्मार्ट उत्पाद और प्रक्रियाएं उनके संचालन के केंद्र में हैं। 

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LIVEMINT

https://www.livemint.com/companies/news/engineering-telecom-healthcare-to-add-12-mn-new-jobs-by-fy26-report-11648195595197.html 

 

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Nestlé  ने रूस में  पेट फ़

Nestlé to Stop Selling Pet Food, Coffee and KitKat in Russia

Nestlé suspended production of Pet Food, Coffee and KitKat in Russia

 

Nestlé SA plans to significantly scale back what it sells in Russia, suspending production of pet food, coffee and confectionery as the KitKat maker faces pressure from politicians, employees and consumers for its continuing presence in the country.

The Swiss packaged-foods giant said Wednesday that it would focus on providing essential food while Russia’s war on Ukraine continues. While it doesn’t expect to make a profit in Russia or pay any taxes in the country for the foreseeable future, the company said that any profit it generates would be donated to humanitarian relief organizations.

Nestlé said the only products it would continue to sell in Russia would be baby food and other infant-nutrition items, specialist veterinary meals and medical-nutrition products.

While Nestlé previously suspended imports and exports of products it deemed nonessential, such as Nespresso pods and San Pellegrino water, the company has kept all six of its Russian factories open to produce goods for local sale, including confectionery and coffee. About 90% of what Nestlé sells in Russia is made there. It previously described its products as essential, saying it had a responsibility to its employees in the country.

The consequences of harsh economic sanctions against Russia are already being felt across the globe. WSJ’s Greg Ip joins other experts to explain the significance of what has happened so far and how the conflict might transform the global economy. Photo Illustration: Alexander Hotz

Wednesday’s announcement means Nestlé will suspend the “vast majority of our prewar volume” in Russia, according to a spokesman. “We are in the process of identifying solutions for our people and our factories in Russia,” he said. “We will continue to pay our people.” The company has about 7,000 workers in Russia.

While many of the world’s largest makers of household staples, including Procter & Gamble Co. and Dove soap maker Unilever PLC, are continuing to sell food and other consumer products in Russia, Nestlé has attracted particular scrutiny.

Ukrainian President Volodymyr Zelensky has mentioned Nestlé by name in several speeches calling for Western businesses to pull out of Russia.

“‘Good food. Good life.’ This is the slogan of Nestlé, your company that refuses to leave Russia,” Mr. Zelensky said in a Saturday audiolink address to people attending an antiwar protest in Bern, Switzerland.

Ukrainian Prime Minister Denys Shmyhal has also criticized the company, tweeting last week that he had talked with Nestlé Chief Executive Mark Schneider, who he said showed no understanding of the side effect of continuing to sell in Russia.

Several of Nestlé’s Ukraine-based employees—it has about 5,000—have also voiced dissatisfaction on social media with the company’s response to the invasion.

Late last week, Nestlé’s Europe head, Marco Settembri, drew some employees’ ire during an internal webcast for staff in the region when he said the company’s Ukrainian workers should be united with their Russian colleagues, according to participants.

“At this point, I would say this is a crazy thing to say,” said Sofia Vashchenko, who oversees a team working on web content for Nestlé in Ukraine. “People really, really started getting mad,” she said. Ms. Vashchenko said separately in a LinkedIn post that her team was “mentally broken” after the webcast.

A spokesman for Nestlé said that Mr. Settembri had told colleagues across Europe on the webcast, “Let’s try to stay united against the nonsense of war.”

Russia has been an attractive market for Nestlé. Last month, the company credited strong demand in the country for helping its Europe, Middle East and North Africa region log its highest sales growth in a decade.

Overall, Russia generates about 2% of Nestlé global sales, and the company has announced investments in the past year to bolster its pet food and confectionery operations in the country.

A Nestlé factory in Russia, shown in 2017. The Swiss packaged-goods giant currently has about has about 7,000 workers in Russia.

Ukraine, meanwhile, has an outsize importance for Nestlé because it is home to a hub supporting several key global business functions. The company’s business-service center in Lviv employs about 1,800 workers handling accounting, IT support, supply support, administration, payroll and other tasks for Nestlé offices in more than 70 countries around the world.

After the regional webcast, some employees usually based in Lviv said their team leads had written to Nestlé’s top management calling on the company to suspend operations in Russia. The Nestlé spokesman declined to comment on the letter.

Ukrainian workers have also discussed going on strike if Nestlé continues to sell products in Russia, some employees said.

“Saying ‘we condemn it’ isn’t a lot,” said Osee Petyo, a Lviv-based Nestlé worker who has since fled to Paris. “They have to do things to affect the financial position of Russia.”

Brief:

After multiple companies, Nestlé is also planning to scale back its sales in Russia by suspending the production of pet foods, coffee and confectionery as the company faces pressure from politicians, employees and consumers for its presence in Russia.

Swiss packaged food giant said that it will focus on providing basic necessities as Russia's war in Ukraine continues. It is not immediately expected to make a profit or pay any taxes in Russia, but the company said all the profits it produces will be donated to humanitarian charities.

The only products of the company sold in Russia would be baby food and other infant nutrition items, specialist veterinary meals and medical-nutrition products. 

Nestlé has already suspended imports and exports of products it deemed nonessential. But the company kept all of its Russian factories open for the production of goods for local sales. 

Russia is an attractive market for Nestlé. Last month, the company acknowledged strong demand in the country by helping  Europe, the Middle East and North Africa region record the highest sales growth in the last decade.

Ukrainian Prime Minister Denys Shmyhal also tweeted last week that he spoke with Nestlé CEO Mark Schneider, and said that he showed no understanding of the side effects of continuing to sell in Russia.

 

Nestlé  ने रूस में  पेट फ़ूड , कॉफी और किटकैट का उत्पादन  किया निलंबित

 

कई कंपनियों के बाद, नेस्ले Nestlé ने भी रूस में पेट फ़ूड, कॉफी और कन्फेक्शनरी pet foods, coffee and confectionery के उत्पादन को निलंबित करके रूस Russia  में अपनी बिक्री को कम करने की योजना बना रही है क्योंकि कंपनी को रूस में अपनी उपस्थिति के लिए राजनेताओं, कर्मचारियों और उपभोक्ताओं के दबाव का सामना करना पड़ रहा है। स्विस पैकेज्ड फूड Swiss packaged food की इस दिग्गज कंपनी ने कहा कि वह बुनियादी जरूरतें मुहैया कराने पर ध्यान देगी क्योंकि यूक्रेन में रूस का युद्ध जारी है। रूस में तुरंत लाभ कमाने या किसी भी कर का भुगतान करने की उम्मीद नहीं है, लेकिन कंपनी ने कहा कि वह जो भी मुनाफा पैदा करेगी उसे मानवीय पक्ष umanitarian charities में दान कर दिया जाएगा। रूस में बेचे जाने वाले कंपनी के एकमात्र उत्पाद शिशु आहार और अन्य शिशु पोषण आइटम, विशेषज्ञ पशु चिकित्सा भोजन और चिकित्सा-पोषण उत्पाद होंगे। नेस्ले ने पहले ही गैर-जरूरी समझे जाने वाले उत्पादों के आयात और निर्यात को निलंबित कर दिया है। लेकिन कंपनी ने अपने सभी रूसी कारखानों को स्थानीय बिक्री के लिए माल के उत्पादन के लिए खुला रखा। नेस्ले के लिए रूस एक आकर्षक बाजार है। पिछले महीने, कंपनी ने यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र को पिछले दशक में सबसे अधिक बिक्री वृद्धि दर्ज करने में मदद करके देश में मजबूत मांग को स्वीकार किया।यूक्रेन के प्रधान मंत्री डेनिस शमीहाल Ukrainian Prime Minister Denys Shmyhal ने भी पिछले हफ्ते ट्वीट किया कि उन्होंने नेस्ले के सीईओ मार्क श्नाइडर CEO Mark Schneider के साथ बात की, और कहा कि उन्हें रूस में बिक्री जारी रखने के दुष्प्रभावों की कोई समझ नहीं है।

 

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WSJ

https://www.wsj.com/articles/nestle-to-stop-selling-pet-food-coffee-and-kitkat-in-russia-11648040340 

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लोकसभा ने वित्त विधेयक को

https://www.freepressjournal.in/india/lok-sabha-passes-finance-bill-completes-budgetary-exercise-for-fy23

 

Lok Sabha approved the Finance Bill

 

On Friday, the lower house of the Parliament, Lok Sabha approved the Finance Bill. With the approval of this bill, the budgetary exercise for the 2022-23 fiscal year has also been completed. A total of 39 official amendments proposed by Finance Minister Nirmala Sitharaman were accepted and the amendments requested by the opposition were rejected by voice vote in this approval. Finance Minister further informed that India is probably the only country that did not resort to new taxes to fund the recovery of the economy affected by the COVID pandemic. According to the OECD report around 32 countries in the world have increased the taxes because of the pandemic. While explaining on raising capital expenditure, she said: "Instead, we put more money where multiplier effect would be maximum." The Capex was increased by 35.4 per cent to Rs 7.5 lakh crore in the Budget 2022-23. The number of taxpayers has also increased in India. Currently, there are around 9.1 crore taxpayers compared to 5 crore a few years ago.

 

लोकसभा ने वित्त विधेयक को मंजूरी दी

शुक्रवार को संसद के निचले सदन लोकसभा Parliament, Lok Sabha ने वित्त विधेयक Finance Bill को मंजूरी दे दी। इस विधेयक के अनुमोदन से वित्तीय वर्ष 2022-23 की बजटीय कवायद भी पूरी हो चुकी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण Finance Minister Nirmala Sitharaman द्वारा प्रस्तावित कुल 39 आधिकारिक संशोधनों को स्वीकार कर लिया गया और विपक्ष द्वारा अनुरोधित संशोधनों को इस अनुमोदन में ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया। वित्त मंत्री ने आगे बताया कि भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जिसने COVID महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था की वसूली के लिए नए करों का सहारा नहीं लिया। ओईसीडी की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के लगभग 32 देशों ने महामारी के कारण करों में वृद्धि की है। पूंजीगत व्यय capital expenditure बढ़ाने के बारे में बताते हुए, उन्होंने कहा: "इसके बजाय, हम अधिक पैसा लगाते हैं जहां गुणक प्रभाव अधिकतम होगा।" 2022-23 के बजट में कैपेक्स को 35.4 प्रतिशत बढ़ाकर 7.5 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था। भारत में करदाताओं की संख्या number of taxpayers भी बढ़ी है। वर्तमान में, कुछ साल पहले 5 करोड़ की तुलना में लगभग 9.1 करोड़ करदाता हैं।

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इमामी ने 432 करोड़ रुपये

Emami acquires Dermicool brand from Reckitt for Rs 432 crore

Emami acquires Dermicool brand for Rs 432 crore

 

FMCG major Emami on Friday said it has acquired the 'Dermicool' brand from Reckitt for a total consideration of Rs 432 crore.

The acquisition is funded through internal accruals and is subject to the customary closing conditions, the company said in a statement.

The Dermicool brand is popular for providing respite from the prickly heat caused during summers.

"We are very happy to announce the acquisition of Dermicool brand, which offers great synergy with our existing businesses and is a perfect strategic fit. It will strengthen our presence to make us #1 in the prickly heat powder & cool talc category," Emami Ltd Director Harsha V Agarwal noted.

Emami, as one of its core business strategies, has always been open to growth through inorganic route.

The company considers acquisitions that not only add value and have synergy with the current line of businesses, but also offer opportunities for the organisation to be present in categories that have high growth potential, it said.

Zandu, Kesh King, and German brand Creme 21 are some of the brands or businesses acquired by the company in the past few years, it added.

Brief:

 

FMCG major Emami has announced the acquisition of the Dermicool brand from Reckitt for Rs 432 crore in total. The acquisition is funded by accruals and is subject to the customary closing conditions, the company said in a statement. The brand is known for providing relief from the pricky heat caused during the summers.

Emami Ltd Director, Harsha V Agrawal has said, “We are very happy to announce that the acquisition of the Dermicool brand, which offers synergy without existing businesses and is a perfect strategic fit. It will strengthen our presence and will help in making us #1 in the pricky heat powder and cool talc category,”

Its been a core business strategy of Emami to adapt growth through the inorganic route. The company said it is considering an acquisition that not only provides added value and synergises with its current business area but also provides an opportunity for the organisation to be in a high-growth category. 

Zandu, Kesh King, and German brand Creme 21 are some of the brands or businesses acquired by the company in the past few years, it added.

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इमामी ने 432 करोड़ रुपये में डर्मीकूल ब्रांड का  किया अधिग्रहण

एफएमसीजी FMCG प्रमुख इमामी Emami ने कुल 432 करोड़ रुपये में रेकिट से डर्मिकूल ब्रांड Dermicool brand के अधिग्रहण की घोषणा की है। कंपनी ने एक बयान में कहा कि अधिग्रहण को प्रोद्भवन द्वारा वित्त पोषित किया गया है और यह प्रथागत समापन शर्तों के अधीन है। यह ब्रांड गर्मियों के दौरान होने वाली चुभती गर्मी से राहत प्रदान करने के लिए जाना जाता है। इमामी लिमिटेड के निदेशक, हर्षा वी अग्रवाल Harsha V Agrawal  ने कहा है, “हमें यह घोषणा करते हुए बहुत खुशी हो रही है कि डर्मिकूल ब्रांड का अधिग्रहण, जो मौजूदा व्यवसायों के बिना तालमेल प्रदान करता है और एक आदर्श रणनीतिक फिट perfect strategic fit है। यह हमारी उपस्थिति को मजबूत करेगा और हमें चुभने वाले हीट पाउडर और कूल टैल्क श्रेणी में #1 बनाने में मदद करेगा।" अकार्बनिक मार्ग inorganic route. के माध्यम से विकास को अनुकूलित करने के लिए यह इमामी की एक प्रमुख व्यावसायिक रणनीति रही है। कंपनी ने कहा कि वह एक ऐसे अधिग्रहण पर विचार कर रही है जो न केवल अपने मौजूदा व्यापार क्षेत्र के साथ अतिरिक्त मूल्य और तालमेल प्रदान करता है बल्कि संगठन को उच्च विकास श्रेणी में आने का अवसर भी प्रदान करता है। झंडू, केश किंग और जर्मन ब्रांड क्रीम Zandu, Kesh King, and German brand Creme 21 कुछ ऐसे ब्रांड या व्यवसाय हैं, जिन्हें कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में अधिग्रहित किया है।

 

 

 

 



 

BUSINESS STANDARD

https://www.business-standard.com/article/companies/emami-acquires-dermicool-brand-from-reckitt-for-rs-432-crore-122032500985_1.html 

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वनों का संरक्षण,जलवायु प

कबीर दास जी ने कहा है "वृक्ष कबहुँ न फल भखै, नदी न संचय नीर परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर" अर्थात: वृक्ष कभी अपने फल फूल इत्यादि स्वयं नहीं खाते। नदियाँ कभी अपनी बहती धारा का जल अपने लिए बचा कर नहीं रखतीं, अपना जल स्वयं नहीं पीतीं। कबीर जी के अनुसार परमार्थ का अर्थ है - "त्याग"  साधू वही है जिसमें ये सारे गुण विद्यमान हों। मानव जीवन पाकर अधिक से अधिक परमार्थ के कार्य, दीन दुखियों की सहायता और सेवा करनी चाहिए। यही साधू अर्थात सज्जन पुरुषों का काम है। पर ये परमार्थ का असल काम तो हमारी प्राकृतिक सम्पदा natural resources के सबसे अहम् स्रोत पेड़ पौधे ही करते हैं, मानवों का परमार्थ तो अब सिर्फ स्वार्थ सिद्दी का माध्यम बन चुका है। पेड़-पौधों की गहरी जड़ों से ले कर उनके शीर्ष तक - हमारे जंगल, हमारे ग्रह को स्वस्थ रखने वाले नायक हैं, और हमें जीवित रखते हैं। मानव ग्रह पर जितने लोग हैं, उससे कहीं अधिक मिट्टी में जीव हैं। वन पृथ्वी पर लगभग 80% जीवों का घर हैं। जानवर, बड़े और छोटे, जंगलों पर निर्भर होते हैं, जो उन्हें फल, नट और पौधे प्रदान करते हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता होती है। बदले में, हम मनुष्य अपने द्वारा खाए गए पौधों के बीज फैलाने के लिए फिर से उन्हीं जानवरों पर निर्भर होते हैं, जो मिट्टी को उर्वरित करने में मदद करते हैं। वही मिट्टी जिसमें मनुष्य अपना भोजन भी उगाते हैं। इस तरह अगर गिनना शुरू करें और वनों द्वारा प्रदान किए जाने वाले लाभों की लिस्ट केवल लंबी होती जाएगी, ख़त्म नहीं होगी। वन कटाव, भूस्खलन और हिमस्खलन Deforestation, landslides and avalanches के खिलाफ एक ढाल हैं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को वह संरचना प्रदान करती हैं जो बारिश होने पर पानी को अवशोषित करने और उसे रोके रखने के लिए बहुत जरूरी होती है, बाढ़ से बचाती है नहीं तो ये बाढ़ पूरी तरह से उपजाऊ मिट्टी को धो देगी , जिसकी हमें अन्न उगाने के लिए जरूरत  होती है।

जंगल जितना पुराना होगा, वह मनुष्यों द्वारा पैदा की गई अतिरिक्त CO2 को हवा से बाहर निकालने, उसमें से कुछ को अपने लिए बचाने और बाकी का उपयोग अपनी शाखाओं, पौष्टिक फल, पैदा करने के लिए करते हैं । हर बार जब हम किसी जंगल को ख़त्म करते है, तो हम स्वतः ही अपनी प्राण वायु oxygen का बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए नष्ट कर रहे होते हैं। हम उस भूमि का विनाश करते हैं जिस पर प्राचीन वन एक समय सीना ताने, गर्व से खड़े थे जो हजारों वर्षों से कार्बन जमा कर रहे थे, पर उन्हें आज हमारे अहम और महत्वाकांक्षाओं का शिकार होना पड़ रहा है। कहने का मतलब है कि, हर जंगल के ख़त्म होने के साथ, हम ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ अपनी ही सबसे महत्वपूर्ण सम्पदा को खोते जा रहे हैं।

अमेज़ॅन के वर्षावन Amazon rainforest दुनिया के सबसे विशाल वर्षावन क्षेत्रों में एक है। यह लगभग 2 मिलियन मील से अधिक भूमि क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके साथ ये नौ दक्षिण अमेरिकी देशों South American countries में फैला है: जिनमें ब्राजील, कोलंबिया, पेरू, वेनेजुएला, इक्वाडोर, बोलीविया, गुयाना, सूरीनाम और फ्रेंच गयाना Brazil, Colombia, Peru, Venezuela, Ecuador, Bolivia, Guyana, Suriname and French Guiana आदि आते है । यह एक विशाल जैव विविधता वाला पारिस्थितिकी तंत्र क्षेत्र है, जो असंख्य पेड़ पौधों, जानवरों और दुर्लभ प्रजातियों rare species का निवास स्थान है। इस वर्षावन में इतनी ताकत है की ये अपना खुद का मौसम बना सकते हैं और दुनिया भर की जलवायु पर अपना प्रभाव डालते हैं। दुर्भाग्य से, ये बेहद नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, वनों की कटाई के लगातार खतरे का सामना कर रहा है। एक अंतर्राष्ट्रीय सरकारी उपग्रह के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में ब्राजील के अमेज़ॅन में काटे गए पेड़ों की संख्या पिछले साल के इसी महीने में वनों की कटाई से कहीं अधिक थी। जिस क्षेत्र को नष्ट किया गया वह क्षेत्र 2021 से पांच गुना बड़ा था, जो 2015 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से जनवरी में सबसे अधिक है। ब्राजील की स्पेस रिसर्च एजेंसी space research agency की एक रिपोर्ट के मुताबिक वनों की कटाई में 27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट से पता चलता है कि 2020-21 में वनों की कटाई का अनुमान 13,235 वर्ग किमी था।

तमाम पर्यावरणविदों environmentalists ने ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो Brazilian President Jair Bolsonaro पर वनों की कटाई में तेजी लाने की अनुमति देने का आरोप लगाया लगते हुए उनकी आलोचना की है। इसे रोकना बहुत जरूरी है अगर हमें जलवायु परिवर्तन से निपटना है तो अमेज़न और उस जैसे विश्व के तमाम जंगलों की रक्षा करना आवश्यक है। पिछले साल ग्लासगो Glasgow में जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन Climate change summit COP26 में, 100 से अधिक देशों सरकारों ने 2030 तक वनों की कटाई को रोकने और इसके लिए ज़रूरी कदम उठाने का वादा किया था। ब्राजील ने COP26 में 2030 तक वनों की कटाई को कम करने का लक्ष्य रखा है।

ब्राजील के विशाल वर्षावन Brazil's vast rainforests वातावरण से भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों greenhouse gases को अवशोषित करते है, जिसे कार्बन सिंक carbon sink के रूप में जाना जाता है। लेकिन जितने अधिक पेड़ काटे जाते हैं, उतने ही कम जंगल उत्सर्जन को सोख पाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO) की विश्व के वनों की स्थिति 2020 The State of the World’s Forests 2020 रिपोर्ट के अनुसार, "वनों की कटाई और वन क्षरण खतरनाक दरों पर जारी है, जो जैव विविधता Biodiversity को लगातार हानि पंहुचा रहे हैं।1990 के बाद से, यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 420 मिलियन हेक्टेयर वन अन्य भूमि उपयोगों में बदल दी गई हैं, हालांकि पिछले तीन दशकों में वनों की कटाई की दर में कमी आई है। 2015 और 2020 के बीच, वनों की कटाई की दर प्रति वर्ष लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर थी, जो 1990 के दशक में प्रति वर्ष 16 मिलियन हेक्टेयर से कम थी। 1990 के बाद से दुनिया भर में वन के क्षेत्र में 80 मिलियन हेक्टेयर से अधिक की कमी आई है। कृषि भूमि agricultural land के विस्तार के लिए वनों की कटाई का बड़े पैमाने पर होना वन क्षरण forest degradation और वन जैव विविधता का बड़े पैमाने पर नुक्सानकर रहा है।" वन पूरी दुनियां के भूमि क्षेत्र के सिर्फ 30 प्रतिशत से अधिक को कवर करते हैं, फिर भी वे विज्ञान के लिए ज्ञात स्थलीय पौधों और जानवरों की प्रजातियों के विशाल समुदाय के लिए आवास प्रदान करते हैं।

दुनियां भर में आज जलवायु परिवर्तन Climate change से लड़ने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास किये जा रहे है। इसी कड़ी में सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ अंडरग्राउंड नेटवर्क्स Society for the Protection of Underground Networks जो की एक नई गैर-लाभकारी विज्ञान पहल है, जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारणों का अध्यन करते हुए पाती है कि मशीन लर्निंग का उपयोग करके दुनिया के भूमिगत कवक जीवन underground fungal life को मैप और संरक्षित करके वो इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते है। उनका माना है कि "जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भूमिगत पारिस्थितिक तंत्र underground ecosystem की रक्षा करना बेहद महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से, हम कवक नेटवर्क fungal network की रक्षा करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो कि एक विशाल कार्बन सिंक हैं, और मिट्टी के जीवित बायोमास live biomass का 50% से अधिक बना सकते हैं, "टोबी कीर्स", विकासवादी जीवविज्ञानी और एसपीयूएन के सह-संस्थापक "Toby Keers", evolutionary biologist and co-founder of SPUN कहते हैं "एक कार्बन सिंक वो है जो वायुमंडल से जितना कार्बन छोड़ता है उससे अधिक कार्बन अवशोषित करता है"। आज दुनिया भर के शोधकर्ताओं इस काम में उनका सहयोग भी कर रहे हैं।

अपनी 2016 की किताब द हिडन लाइफ ऑफ ट्रीज़ The Hidden Life of Trees में, जर्मन लेखक और वनपाल पीटर वोहलेबेन German author and forester, Peter Wohlleben लिखते हैं कि कैसे कवक नेटवर्क का पेड़ों के साथ एक अभिन्न संबंध है। वे न केवल उन्हें पोषक तत्वों के आदान-प्रदान में मदद करते हैं, बल्कि वे चेतावनी संकेत भेजने में मदद करते हैं यदि किसी पेड़ पर कीटों या अन्य शिकारियों का हमला होता है। यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि पेड़ों और फफूंद नेटवर्कों में एक प्रकार की "दोस्ती" होती है।

हमारे पैरों के नीचे की दुनिया एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का घर है, और हम उससे अनजान है। खाद्य और कृषि संगठन Food and Agriculture Organization की "मृदा जैव विविधता के ज्ञान की स्थिति, चुनौतियाँ और क्षमता" "The Status, Challenges and Potential of Soil Biodiversity Knowledge" विषय की 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार, मिट्टी पृथ्वी पर सभी प्रजातियों में से 25% का घर है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, वर्तमान अनुमान बताते हैं कि 2050 तक, पृथ्वी की 90% से अधिक मिट्टी खराब हो जाएगी। ऐसे संकट को टालने में फंगल नेटवर्क महत्वपूर्ण हो सकता है।

वन पूरी दुनियां में जलवायु के लिए एक मजबूत ताकत और आधार हैं। वे पारिस्थितिक तंत्र को नियमित वा संतुलित करते हैं, जैव विविधता की सुरक्षा करते हैं, कार्बन चक्र में एक अहम् भूमिका निभाते हैं, हमारे लिए आजीविका का एक श्रोत हैं, जो सतत विकास को बढ़ावा देते हैं।जलवायु परिवर्तन में वनों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण और समाधान दोनों के रूप में कार्य करते हैं।  अतः जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दूर करने के लिए वन भी सबसे महत्वपूर्ण समाधानों में से एक हैं। आंकड़ों के अनुसार लगभग 2.6 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड Carbon dioxide, जीवाश्म ईंधन fossil fuel के जलने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्सइड का एक तिहाई, हर साल वनों द्वारा अवशोषित किया जाता है। इसलिए वनों को बढ़ाना और बनाए रखना जलवायु परिवर्तन का एक बहुत जरूरी समाधान है।

इस समय पूरी दुनिया इस बात पर बहस कर रही है की जलवायु परिवर्तन को कैसे रोका जाये जिससे कि भविष्य ने आने वाली भयानक त्रासदियों से बचा जा सके ऐसे समय में पेरिस समझौते Paris Agreement की प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है पर सवाल ये है इसे कैसे ,और कितनी जल्दी लागू किया जाए, इसके लिए प्रत्येक राष्ट्र को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और राष्ट्रीय नेतृत्वकर्ताओं को ये सुनिश्चित करना होगा। यह काम वनों पर न्यूयॉर्क घोषणा New York Declaration की सदस्यता लेने और उसे लागू करने, वन जलवायु वित्तपोषण को बनाए रखने और पेरिस समझौते के तहत देशों के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान में वन और भूमि उपयोग को शामिल करके किया जा सकता है।

अब समय आ गया है जब पूरी दुनियां जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एकमत से न सिर्फ अपने देश बल्कि पूरी दुनियां को सुरक्षित और बेहतर भविष्य देने के लिए के लिए सार्थक प्रयासों को सुनिश्चित करे।

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बुजुर्गों की खुशियाँ और सम्मान वापस दिलाती ये संस्थाएं  

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क्या बुजुर्गों के दिल में

Let us know how OTT Music is Ringing the Bells in the Hearts of the Elderly Community in India and Worldwide.

"वक्त ने किया क्या हसीं सितम तुम रहे न तुम हम रहे न हम" गीतकार कैफी आज़मी Kaifi Azmi, गीता दत्त Geeta Dutt की सुरीली आवाज़ और सचिन देव बर्मन Sachin Dev Burman के मधुर संगीत से भरा फिल्म  "कागज के फूल" का 1959 का यह गीत शायद आज के 21 वीं सदी के नौजवानों ने सुना भी न हो और अगर सुना हो तो वो उसको कितना पसंद करते हों या उसके मर्म को समझ पाते हों, उससे जुड़ पाते हों, कहना मुश्किल है। पर वो लोग जो उस दौर से गुजरे है, वो इस गीत से जरूर जुड़ जाते है। "कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे" स्वर्गीय गोपाल दास नीरज Gopal Das Neeraj के इस मशहूर गीत की लाइन हमें ना चाहते हुए भी पीछे पलट कर अपने अतीत पर निगाह डालने को मजबूर करती है। हमारे घर के दादा-दादी, नाना-नानी जैसे हमारे बुजुर्ग, आज भी अपने समय में ही जीते हैं क्योंकि, उनके लिए वो यादें , वो अहसास, उनके गुजरे जमाने की स्मृतियाँ बहुत मायने रखती है। हमारे समाज में एक प्रचलित कहावत है कि "अतीत को भूल जाओ, भविष्य की चिंता मत करो, वर्तमान में जियो", लेकिन जो लोग अतीत को भूलने का विकल्प चुनते हैं, वे इसकी पूरी क्षमता से चूक जाते हैं। इससे मूल्यवान सबक सीखने को मिलते हैं। जो लोग अपने अतीत के बारे में सही सवाल पूछना चुनते हैं, वे वर्तमान में पूरी तरह से जीवन जीने के लिए तैयार हैं। आज जो है वो कभी कल भी होगा ये हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। हम जो आज हैं वो हमारे कल का ही विस्तार है, कल की समझ हमें आज को बेहतर बनने में मदद करती है। कल जो हमारे साथ थे आज नहीं है कल हम भी नहीं रहेंगे, पर आज हम जो कुछ करते हैं, हमारी सारी सफलताएं या विफलताएं जो भी हों सब हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक बनेंगी। साल दर साल बीतते जाते हैं जिंदगी अपनी रफ़्तार से धूल उड़ाती चलती जाती है। 

हम अपने बुजुर्गों से सीखते हैं और उनके अनुभवों से हमें परिपक्वता की ओर जाने में मदद मिलती है। हमारे बुजुर्ग हमसे कुछ ज्यादा नही बस थोड़ा सा प्यार, देखभाल, अपनापन और सुकून की ही अपेक्षा करते हैं, वे अपनी पुरानी यादों के अनुभवों के पिटारे से हमें कई मूल्यवान जवाहरात देते हैं और खुद को अपने में व्यस्त रखते है। खुद को व्यस्त रखने, और आनंद उठाने का सबसे अच्छा जरिया जिससे हर कोई पसंद करते हैं वो है संगीत, चाहे यो कोई भी दौर हो, किसी भी पीढ़ी के लोग हों, अच्छा संगीत सभी को भाता है। ख़ास कर हमारे बुजर्गों को अपने पुराने बीते दिनों के गानों से ख़ास लगाव होता है। ट्रांजिस्टर Transistor आज एक गुजरे ज़माने की चीज हो गई है पर एक ज़माना था जब घर-घर ट्रांजिस्टर होता था, उस वक्त सिर्फ यही मनोरंजन का साधन था। लोग आज के मोबाइल की तरह उसे प्यार करते थे, अपने सिरहाने रख कर सोते थे, आकाशवाणी से ले कर विविध भारती Vividh Bharati तक सब सुनने को लोग लालायित रहते थे। बस ट्रांजिस्टर के कान मरोडो और चैनल बदल जाता था।

हमारे ज्यादातर बुजुर्गों का मानना है कि तमाम संगीत स्ट्रीमिंग ऐप music streaming app और तत्काल उपलब्धता के इस युग में बहुत सारे संगीत वास्तव में गायब हो गए हैं। उन्हें लगता है की आज इस डिज़िटल युग digital age में उनकी प्राथमिकताओं की उपेक्षा हो रही है। जहाँ अपनी पसंद का संगीत सुनने जैसे सरल कार्य भी बहुत जटिल हो गए है और वे इससे असंतुष्ट, भ्रमित और निराश भी हैं। ज्यादातर मामलों में, यह उनके डिजीटल संगीत संग्रह से अपने पसंद के गीतों को चुनने जैसा श्रमसाध्य काम है। कभी-कभी कोई फ़ाइल उनके मोबाइल के साथ सही संगत नहीं करती है या फ़ाइल कर्रप्ट हो सकती है।

सरल उपाय यह हो सकता है कि संगीत स्ट्रीमिंग ऐप पर साइन अप किया जाए जो हजारों गानों, कलाकारों और एल्बमों तक पहुंच को आसान कर देगा। हालाँकि, 1950 और 1960 के दशक में पैदा हुए लोगों के लिए, एक पीढ़ी जो रेडियो, ट्रांजिस्टर, रिकॉर्ड प्लेयर record player से होती हुई कैसेट, सीडी और फिर आज के डाउनलोड, ब्राउज़, साइनअप और साइडलोड की तकनीकी तक का सफर तय कर रही ही उसके लिए आज के इस "स्ट्रीम" संगीत तक पहुंच बनाना, बहुत आसान नहीं है वो इसमें सहजता महसूस नहीं करते हैं न ही यह उन्हें पुराने माध्यमों के समान संतुष्टि प्रदान करता है। आप उन गीतों को ब्राउज़ नहीं कर सकते हैं जिन्हें आपने दशकों से सुना है। एक पुराने पसंदीदा गाने को जिसे आप लगभग भूल गए थे और अब आप उसे दोबारा सुनना चाहते है, हो सकता है कि अधिकांश नए जमाने के स्ट्रीमिंग ऐप्स पर आपको वह संगीत आज के स्ट्रीमिंग संगीत के महासागर में न मिले। कई बार ये काम एक भूसे के ढेर में सुई तलाशने जितना कठिन लग सकता है।

एक बार मुझे एक बुजुर्ग जो पेशे से लेखक थे और दुनियाँ भर के बेहतरीन म्यूजिक को सुनते और समझते थे और वह चाहते थे की उनके बच्चे भी दक्षिण अमेरिका South America और विभिन्न पश्चिम अफ्रीकी बैंडों West African Bands के संगीत से परिचित हों जिन्हे जगह-जगह से तलाशते, इकट्ठा करते और सुनते हुए वो बड़े हुए थे। कहते है "वे केवल मेरी कुछ पुरानी सीडी और रेकॉर्ड्स में ही मौजूद हैं। संगीत की इस विशाल दुनियाँ में, मैं चाहूं तो एक सेकंड में 200 सेलिया क्रूज़ Celia Cruz गाने पा सकता हूं, जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।" पर उन्हें दुःख के साथ कहना पड़ा की स्ट्रीमिंग की इस दुनियाँ में अपने द्वारा एकत्र किए गए संगीत का लगभग 25-30% खो दिया है। 2000 के दशक की शुरुआत में जब उन्हें आईपॉड मिला, तो उन्होंने अपने बहुत सारे संग्रह को डिजिटल कर दिया था। वह बेकार हो गया तो उनका बहुत सारा संगीत अपने साथ ले गया। वह अब पहले की तुलना में बहुत कम संगीत सुनते हैं। जब वह कुछ ऑनलाइन खोजते हैं, तो वह यू टूयब YouTube को  स्मार्ट टीवी के माध्यम से स्ट्रीम कर प्रयोग करते है। ये सच है अनजाने में, यूटूयब कई पुराने यूज़र्स का पसंदीदा विकल्प प्रतीत होता है। यूटूयब में वॉइस सर्च का विकल्प भी इसे बुजुर्गों के लिए आसान और सुविधाजनक बनाता है। ओटीटी म्यूजिक एप्स OTT Music Apps ने जहां लोगों तक पहुंच बनायी और इसके इस्तेमाल को काफी बढ़ा दिया है, वहीं कुछ पुराने संगीत प्रशंसकों को भी इस बात का अफसोस है कि "तुम वही सुन रहे हो जो तुम्हें पसंद है, मैं वह क्यों नहीं सुन सकता जो मुझे पसंद है"? हर कोई अब अपनी-अपनी बातों में उलझा हुआ है।

महामारी के दौरान, जब लोग अपने परिवारों के साथ महीनों के लिए अपने घरों में बंद होने को मजबूर हो गए थे, तब कुछ बुजुर्गों ने इन ऐप्स का उपयोग करना शुरू कर दिया था। आज, नौ प्रमुख म्यूजिक प्लेटफॉर्म्स हैं जैसे- गाना, ऐप्पल म्यूज़िक, स्पॉटिफ़, जियोसावन, यूट्यूब म्यूज़िक, अमेज़न म्यूज़िक, एयरटेल का विंक, हंगामा म्यूज़िक और रेसो Gaana, Apple Music, Spotify, JioSaavn, YouTube Music, Amazon Music, Airtel's Wink, Hungama Music and Resso। म्यूजिक इंड्रस्ट्री music industry के सूत्रों का कहना है कि पूर्व-कोविड युग में, अधिकांश ऐप में केवल नए ट्रैक ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे; हालांकि, लॉकडाउन के बाद से, उन्होंने कुछ दशक पहले के गानों को भी कुछ हद तक प्राथमिकता देते हुए उनकी संख्या में थोड़ी वृद्धि की है। कुछ बुजुर्गों को इस महामारी के दौरान अपने बच्चों, युवा लोगों के माध्यम से स्ट्रीमिंग ऐप्स के संपर्क में आने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि पहले वे इन ऐप्स पर बिल्कुल नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें एक्सेस करना, समझना और नेविगेट करना उनके लिए मुश्किल हो जाता था।

2017 में सारेगामा ने कारवां Caravan को लॉन्च किया गया था, जो एक ऑफलाइन विंटेज-स्टाइल म्यूजिक प्लेयर Offline Vintage-Style Music Player है, जो 5,000 प्रीलोडेड "एवरग्रीन" गानों के साथ आता है। हिंदी, तमिल, मराठी, बंगाली और पंजाबी के लिए उसके अलग-अलग वेरिएंट लॉन्च किए गए थे, इसका उद्देश्य पुराने श्रोताओं के लिए डिजिटल संगीत को आसान बनाना और उन्हें अपने पसंदीदा गीतों के संग्रह उपलब्ध कराना था। इसने क्रेडिट या डेबिट कार्ड के विवरण में साइन अप करने, सदस्यता लेने आदि झंझटों, जिनसे बुजुर्ग परिचित नहीं थे या उनके आदी नहीं थे, को भी ख़त्म कर उन्हें एक सुखद अनुभव प्रदान किया। सारेगामा इंडिया लिमिटेड Saregama India Limited के प्रबंध निदेशक कहते हैं की कारवां के लॉन्च की प्रकिया में 2016 में किए गए 23-शहरों  के अध्ययन में, तीन चीजें सामने आईं: अधिकांश पुराने उपयोगकर्ता अपने-अपने गानों को अपनी सुविधा के अनुसार सुनने की सुविधा को महत्व देते थे; वे अपना संगीत सुनने के लिए दूसरों पर कम निर्भर रहना चाहते थे; और वे ज्यादातर उस समय के  संगीत को सुनने की इच्छा रखते थे जब वे 15 से 28 साल के उम्र में थे।

पुराने संगीत प्रेमियों के लिए उस जमाने में बहुत कम विकल्प होते थे रेडिओ के साथ टेलीविजन Television एक प्रमुख माध्यम था, हर सुबह रविवार को 8-9 बजे के बीच दूरदर्शन की रंगोली Doordarshan Rangoli शायद ही कोई भूल पाए। सारा परिवार, बच्चे, बूढ़े, जवान सब चाय की चुस्कियों के साथ, रंगोली के मधुर, मनमोहक रंगों में सराबोर हो जाते थे। उस समय लोगों के लिए ये एक रवायत की तरह था। आज स्ट्रीमिंग ऐप्स पर कैटलॉग में बॉलीवुड के गाने भरे पड़े है इसके आलावा यूटूयब  का उपयोग अपने मनचाहे गाने को सुनने के लिए करते हैं, या वॉयस असिस्टेंट एलेक्सा voice assistant Alexa से मदद के लिए कहते हैं। हालांकि, कभी-कभी,एलेक्सा इसे समझ नहीं पाती और पुराने ट्रैक का रीमिक्स बजाने लगती है। दूसरी बार, अपना मनचाहा संगीत खोजने के लिए यूट्यूब पर बहुत छानबीन करनी पड़ती है, और यह थोड़ा मुश्किल होता है हमारे बुजुर्गों के लिए। इससे पहले, वो बस एक रेकॉर्ड, सीडी या कैसेट चुनते थे जो वो चाहते थे और इसे बजाते थे। पहले लोग याद करते है कि किस तरह बैठ कर लोग बाकायदा समय निकाल कर अपने मनपसंद गानों की लिस्ट बनाते थे, और अपनी पसंद के अलावा घर के सदस्यों की भी कुछ प्राथमिकताओं को ध्यान रख कर लिस्ट को फाइनल करने की कोशिश करते थे, काफी उठापटक के बाद वो लिस्ट फाइनल होती थी। फिर उस लिस्ट को कैसेट पर रिकॉर्ड कराने के लिए दुकान पर ले जाय जाता था, हर गाने के हिसाब से पैसे तय होते थे। और अंततः कई दिनों के इंतज़ार के बाद जब उसे सुनते थे तो इतना सुकून मिलता था जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है, ये सारा कुछ एक मिशन से कम नहीं होता था। अगर आज कोई उनसे पूछे  कि क्या उन्होंने प्लेलिस्ट बनाकर इस प्रक्रिया को ऑनलाइन दोहराने की कोशिश की है तो एक झेंपती सी हंसी के साथ जो जवाब आये वो शायद ऐसा हो "शायद हमें अपने दिनों के अंत में बस आगे बढ़ने और सीखने की ज़रूरत है।"

मेरे पड़ोस में रहने वाले 67 साल के श्री मोहन भी यूटूयब YouTube को उपयोग करने में आसानी महसूस करते है, बरसों से सहेजे हुए उनके दिल के करीब गीत जिनमे उनकी जान बसती थी बर्बाद हो चुके है, उनका पुराना ग्रामोफोन Gramophone, जो अब रिपेयर भी नहीं होता, बच्चे उसे कई बार ओलेक्स Olex पर बेचने की कोशिश कर चुके है, उसे उन्होंने अपने बच्चों की तरह सम्हाल के अपने ड्रॉइंग रूम में रखा है, और रोज उसकी धूल साफ़ करते हुए वो, मन ही मन अपने पुराने पसंददीदा गीतों को गुनगुना कर खुश हो लेते है "दिल के खुश रखने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है" वो आज भी उन ख़ास गानों को तलाशते रहते हैं, जिन्हें सुने बिना एक वक्त उनका दिन नहीं गुजरता था। आज भी के. एल. सहगल के "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाये " को सुनने का रस भूल नहीं पाते है, जिसे सुन कर वो अक्सर रो पड़ते थे। 

"रहें न रहें हम, महका करेंगे, बन के कली, बन के सबा, बाग-ऐ-वफ़ा में।” भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर Lata Mangeshkar जी 6 फरवरी 2022 को इस दुनिया से हमेशा के लिए अपने हजारों- करोड़ों फैन्स को छोड़कर रुख़सत हो गई, लेकिन उनके यादगार गीत कभी भुलाए नहीं जा सकते। लता जी ने 1949 में "महल" के "आयेगा आने वाला" गीत गाया जो उस समय की सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध अभिनेत्री मधुबाला Madhubala के लिए फिल्माया था। पुराने लोगों का खासकर उनके गीतों से जुड़ाव था।

कुछ पुराने लोग आज तक कुछ विशिष्ट एल्बमों की तलाश में रहते हैं। हिन्दुस्तानी गानों Indian songs के आलावा पुराने वेस्टर्न म्यूजिक western music भी पुराने लोगों में बहुत पॉपुलर थे एक बुजुर्ग 1980 के दशक के कुछ कैसेट को तलाश रहे हैं, जिसमें माइकल जैक्सन, स्टीवी वंडर और बॉय जॉर्ज Michael Jackson, Stevie Wonder and Boy George शामिल हैं दूसरा एक हिंदुस्तानी गायक एल.पी. शराफत हुसैन खान LP Sharafat Hussain Khan जो उनके पसंदीदा गायकों में है उन्हें नहीं मिल पा रहा है। कुछ हद तक, असंतोष पुरानी यादों से प्रेरित है। इस असंतोष को ख़त्म कर पाना आसान नहीं। 2018 में फ्रांस स्थित संगीत स्ट्रीमिंग ऐप डीज़र streaming app Deezer द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि हम में से अधिकांश 30 साल की उम्र के बाद नया संगीत सुनना बंद कर देते हैं। हालाँकि, कुछ बुजुर्ग कहते हैं कि वह हमेशा नए संगीत को सुनने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन केवल तभी जब यह वास्तव में "दिल को छू जाए, ऐसे गीतों और लिरिक्स की कमी हमेशा खलती है। उन्हें हमेशा लगता है कि रचनाएं पहले ज्यादा बेहतर थीं।

बदला तो बहुत कुछ है और बहुत सारे बदलावों के साथ हमारे बुजुर्गों ने सामंजस्य भी बिठाया है कई बदलावों से समझौता भी किया, "लॉट्स ऑफ़ लव" से "लोल" तक सब समझने की कोशिश कर रहे है और काफी हद तक किया भी है, पर कुछ चीज़े इतनी आसानी से नही बदलतीं, जैसे हमारे जज्बात, पसंद और नापसंद, हमारी बरसों पुरानी आदतें और वो दौर जहाँ हमने जीवन के हसीं पल या कुछ इमोशनल पल बिताये हैं हम जिस समय में होते हैं उस समय की तकनीकी के हम आदी होते हैं और एक समय के बाद जब हम उम्र के उस पड़ाव पर होते हैं जहाँ हम अपनी पिछली जिंदगी की भाग दौड़, जद्द्दोजहद को भूल कर बस कुछ पल अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर, चाय की चुस्कियों के साथ आखें बंद कर "फिर वही शाम वही ग़म वही तन्हाई है" या "कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन"  सुनना चाहते है और कोई तकनीक इस पल के सुकून और आंनद में बाधा बने तो ये एक ज्यादती ही होगी।

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Entrepreneurship Motivation Think With Niche

उद्यमिता का प्रेम, अजीम प्रेम

मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ करने का सोचता है, परन्तु वास्तविकता में जब उसे क्रियान्वित करने की बारी आती है, तो उसकी हिम्मत उसका साथ नहीं देती है। कोई भी बड़ा काम केवल एक कदम चल के ही पूरा हो जाये ऐसा संभव नहीं होता है। परन्तु यही छोटे-छोटे कदम आगे बढ़ने में लोग सकुचाते हैं, उनके मन में यही चलता रहता है कि कहीं एक कदम आगे चलने के बाद वह दो कदम पीछे ना चले जाएं। यही डर कई लोगों को उनके सपनों से उन्हें हमेशा के लिए दूर कर देता है। उद्यमिता के क्षेत्र में हर एक इंसान अपने पैर जमा पाए, ऐसा कम ही होता...




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