महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास 

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10 May 2022
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महिलाएं हमारे देश की आधी आबादी हैं, जब अधिक महिलाएं काम करती हैं, तो इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महिला आर्थिक सशक्तिकरण सकारात्मक विकास परिणामों और उत्पादकता को बढ़ाता है, इसके आलावा यह आर्थिक विविधीकरण और आय समानता को भी बढ़ाता है। महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को फलीभूत  करने के लिए महिला आर्थिक सशक्तिकरण केंद्रीय आवश्यकता  है। महिला उद्यमियों के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से उनकी सफलता की यात्रा के लिए अधिक सहयोग और अवसर प्रदान करना समय की मांग है। वर्तमान में, भारत में लगभग 432 मिलियन कामकाजी महिलाएं हैं, जिनमें से 343 मिलियन असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट McKinsey Global Institute की एक रिपोर्ट ने अनुमान लगाया है कि महिलाओं को समान अवसर देकर, भारत 2025 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद में 770 बिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़ सकता है।

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महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास (Women Empowerment and Economic  Development) एक-दूसरे से बड़े घनिष्ट रूप से संबंधित हैं: या अगर यू कहें की एक दूसरे के पूरक है तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि आत्मनिर्भरता सशक्तिकरण की पहली शर्त है। आत्मनिर्भर आने से ही सशक्तिकरण संभव होता है और इसका सीधा प्रभाव हमारे जीवन स्तर में सुधार पर पड़ता है। जब तक आपको निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं है तब तक आप आत्मनिर्भर भी नहीं हो सकते। जिसके लिए आर्थिक रूप से आपकी निर्भरता ख़त्म होनी पहली आवश्यकता है। 

भारत एक ऐसा देश है जहाँ समाज पुरुष प्रधान रहा है और यहाँ महिलाओं की परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भरता उनके जीवन के लगभग हर क्षेत्र में देखी गई। कुछ हद तक, परिवार में महिलाओं की निम्न स्थिति और निर्णय लेने की कमी के लिए पुरुषों पर उनकी आर्थिक और सामाजिक निर्भरता को जिम्मेदार माना जाता है। महात्मा गांधी जी ने 'यंग इंडिया' (Young India by Mahatma Gandhi) नामक  एक साप्ताहिक पत्रिका में 1930 में लिखा था की “हमारे गांवों में लाखों महिलाएं जानती हैं कि बेरोजगारी का क्या मतलब है, उन्हें आर्थिक गतिविधियों तक पहुंच प्रदान करें जिससे वो अपनी  शक्ति और आत्मविश्वास को जान सकेगी, जिससे वह अब तक अनजान रही हैं”

लगभग एक सदी बीत चुकी है, और भारत ने तब अब तक सभी क्षेत्रों में बहुआयामी विकास हासिल किया है, उसके बावजूद आज भी बहुत सी समस्याएं प्रासंगिक हैं। हालांकि, महिलाएं भारत की 1.2 अरब की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, फिर भी उन्हें आर्थिक गतिविधियों (economic activities) और निर्णय लेने की स्वतंत्रता (decision making freedom)  के साथ ही स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा आदि के संसाधनों तक भी आसानी से पहुंच प्रदान नहीं है। 

भले ही कामकाजी महिलाओं (working women) की संख्या लगभग 432 मिलियन है, लेकिन उनमें से  लगभग 343 मिलियन वेतन वाली औपचारिक नौकरी में नहीं हैं। उनमें से लगभग  324 मिलियन श्रम बल में नहीं हैं; और अन्य 19 मिलियन श्रम शक्ति का हिस्सा हैं लेकिन नियोजित नहीं हैं। इसलिए, महिलाओं के रोजगार की प्रकृति का औपचारिक अर्थव्यवस्था में हिसाब नहीं रखा जाता है, या फिर महिलाओं को वर्तमान  सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण औपचारिक नौकरियों तक पहुंच ही प्राप्त नहीं होती है। भारत जैसे देश में जहां गहरी पितृसत्ता (deep patriarchy) वाले समाज के रूप में, भले ही महिलाएं रोजगार प्राप्त करना चाहती हों, लेकिन दूषित और रूढ़िवादी सामाजिक सोच के कारण  महिला घरेलू जिम्मेदारी की प्रमुख वाहक के रूप में मानी जाती  हैं और यही सोच  उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में उनकी आर्थिक उन्नति और अवसरों (economic growth and opportunities) तक पहुंच को सीमित करती है।

इस तरह के परिदृश्य में, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) Self Help Groups (SHGs) उन महिला उद्यमियों के बीच एक ब्रिज के रूप में कार्य कर रहे रहे हैं जिनके पास अपना उद्यम शुरू करने की इच्छा है, लेकिन उनके पास अपने सपने को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन और माहौल नहीं हैं। एक एसएचजी में महिलाओं का एक छोटा समूह शामिल होता है जो नियमित रूप से मौद्रिक योगदान देने के लिए एक साथ आते हैं। स्वयं सहायता समूह ऐसी महिलाओं के लिए एक प्लेटफॉर्म के रूप में काम करते हैं जो महिलाओं के बीच एकजुटता को बढ़ावा देते हैं, उन्हें स्वास्थ्य, पोषण, लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय के मुद्दों पर न सिर्फ जागरूक करते है बल्कि संसाधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित कराते  है ।

सामूहिक प्रयासों ने बढ़ाई अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी Collective efforts increased the participation of women in the economy

महिलाएं देश की आधी आबादी है जब अधिक महिलाएं काम करती हैं, तो  इसका सीधा असर हमारी  अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महिला आर्थिक सशक्तिकरण, सकारात्मक विकास परिणामों के अलावा उत्पादकता को बढ़ाता है, इसके साथ ही आर्थिक विविधीकरण और आय समानता को भी बढ़ाता है।

महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को फलीभूत  करने के लिए महिला आर्थिक सशक्तिकरण केंद्रीय आवश्यकता  है। इसमें  मौजूदा बाजारों में समान रूप से भाग लेने की महिलाओं की क्षमता; उत्पादक संसाधनों (productive resources) तक उनकी पहुंच और नियंत्रण, अच्छे कामों तक पहुंच, अपने समय, जीवन और शरीर पर नियंत्रण; और घर से लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक सभी स्तरों पर निर्णय लेने में उनकी सक्रीय और सार्थक भागीदारी  शामिल है ।

अर्थव्यवस्था में महिलाओं को सशक्त बनाना और काम की दुनिया में लैंगिक अंतर को ख़त्म  करना सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा (2030 Agenda for Sustainable Development) को प्राप्त करने की कुंजी है। समाज को एक साथ रखने की अधिकांश जिम्मेदारी महिलाएं ही उठाती हैं, चाहे वह घर हो, स्कूल हो, स्वास्थ्य सेवा हो या हमारे बुजुर्गों की देखभाल। ये सभी कार्य वे आमतौर पर बिना वेतन के करती हैं। और इन कामों का हमारे समाज में कोई मूल्य नहीं समझा जाता। 

महिलाओं ने बीते दशकों में स्वयं को आत्मनर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये है। महिलाये सांगठनिक स्तर पर अधिक मजबूती से आगे बढ़ रही है। उनके सामूहिक प्रयास बड़े पैमाने पर सामाजिक,आर्थिक और काफी हद तक राजनैतिक परिदृश्य पर बड़े बदलाव के साक्षी बन रहे है। महिलाये संगठित हो कर ही अपनी दिशा और दशा बदल सकती है, ये बात वो समझ चुकी है। शुरुआत में औपचारिक रूप से संचालित समूहों ने समय के साथ अपनी पहचान बनाई और बाद में सरकार ने भी इसकी महत्ता और शक्ति को समझते हुए औपचरिक स्वरुप प्रदान कर इन्हे मान्यता दी और प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न योजनाओं से जोड़ते हुए इन्हे और अधिक सशक्त करने हेतु प्रयास तेज किये। इसी के साथ देश में  स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा ने जन्म लिया और इससे महिलाओं को सांगठनिक स्तर पर एकजुट होकर अपने सर्वांगीण विकास की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। 

स्वयं-सहायता समूह की अवधारणा और प्रांरभ 

स्वयं-सहायता समूह का मतलब  ऐसे लोगों के स्वयं-शासित, समकक्ष नियंत्रित, अनौपचारिक समूह से है, जिनकी समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि हो और सामूहिक रूप से कार्य करने की इच्छा रखते हों। भारत में, SHG आंदोलन 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब कई गैर-सरकारी संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब समुदायों को संगठित किया और उन्हें सामाजिक और वित्तीय सहायता के लिए औपचारिक चैनल की पेशकश की। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (National Bank for Agriculture and Rural Development) के साथ इस कार्यक्रम ने गति प्राप्त की, ऐसे समूहों की एक छोटी संख्या को बैंकों के साथ जोड़ा गया। स्वयं-सहायता समूह द्वारा बैंक लिंकेज कार्यक्रम चलाया है, इस क्रांतिकारी पहल ने समूह के सदस्यों को जोड़ा, जिनमें से कई के पास पहले कभी बैंक खाते नहीं थे।  भारत में स्वयं सहायता समूहों की उत्पत्ति का प्रथम प्रमाण 1972 में स्व-नियोजित महिला संघ (सेवा)  Self Employed Women's Association (SEWA) की स्थापना से मिलता है । इससे पहले भी संगठन के छोटे-छोटे प्रयास होते थे। उदाहरण के लिए, 1954 में, अहमदाबाद के टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (टीएलए) Textile Labor Association (TLA) ने इसी क्रम में अपनी महिला विंग का गठन किया, जो एक ऐतिहासिक आंदोलन का प्रतीक है, जिसमे महात्मा गांधी की भूमिका प्रमुख रही। सेवा का गठन करने वाली इला भट्ट (Ela bhatt) ने गरीब और स्वरोजगार करने वाली महिला कामगारों को संगठित किया। नाबार्ड ने 1992 में एसएचजी बैंक लिंकेज प्रोजेक्ट (SHG Bank Linkage Project) का गठन किया, जो आज दुनिया का सबसे बड़ी सूक्ष्म वित्त परियोजना।

स्वयं सहायता समूहों का महिला आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान 

आज बड़े पैमाने पर स्वयं सहायता समूहों की स्थापना हो रही है और इसे एक वैधानिक इकाई (statutory entity) का दर्जा भी प्राप्त हो चुका है। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को निर्वाह से स्थिरता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया और जो महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए भी भारत के सबसे शक्तिशाली माध्यम हैं। वर्तमान में देश में 29 लाख एसएचजी मौजूद हैं, जिनमें सक्रिय प्रतिभागियों के रूप में 3 करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाओं की सदस्यता है। 

स्वयं -सहायता समूह से तात्पर्य स्वयं-शासित, समकक्ष नियंत्रित, समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के अनौपचारिक समूह से है और सामूहिक रूप से सामान्य उद्देश्यों को पूरा करने की इच्छा रखते हैं।

स्वयं सहायता समूह यानी एसएचजी सूक्ष्म उद्यमों micro enterprises का एक समग्र कार्यक्रम है जिसमें स्वरोजगार के सभी पहलुओं (All aspects of self employment) को शामिल किया गया है, जिसमें  ग्रामीण गरीबों का स्वयं सहायता समूहों में संगठन और उनकी क्षमता निर्माण, गतिविधि समूहों की योजना, बुनियादी ढांचे का निर्माण, बचत की योजना ,उन्हें शिक्षित करना, रोजगार के विभिन्न साधनों से अवगत करना, आदि विभिन्न पहलू समावेशित है। 

आज भारत में ऐसे तमाम उदाहरण है जिन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। छोटे-छोटे समूहों ने सामूहिक प्रयास से अपने स्टार्टअप्स (Startups) शुरू किये और धीरे-धीरे भारतीय बाजारों (Indian markets) में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाने लगे। भारत में, वर्ष 2015 में जब स्टार्टअप इंडिया अभियान Startup India Campaign का ऐलान किया गया था तब से नए  लघु और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) Small and Medium Businesses की संख्या बढ़ रही है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य स्टार्ट-अप के लिए आर्थिक मदद को बढ़ावा देना है ताकि देश के आर्थिक विकास में स्टार्टअप अपनी भूमिका निभाते रहें। इस अभियान ने कई स्मॉल बिज़नेस और स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित किया है, जो अधिक रोज़गार सृजन को भी बढ़ावा दे रहे हैं और और राष्ट्र की आर्थिक ग्रोथ में मदद कर रहे हैं।

पछले 6 सालों में, भारत में स्टार्टअप्स क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। एक आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत ने यूके को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका और चीन (America and China) के बाद तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप देश के रूप में उभर कर सामने आया, जिसने 2021 में क्रमशः 487 और 301 यूनिकॉर्न जोड़े। 14 जनवरी 2022 तक भारत India में 83 यूनिकॉर्न थे, जिनका कुल मूल्यांकन यूएसडी 277.77 बिलियन था। नतीजतन, अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है। 

पर इस उपलब्धि तक पहुंचने की यात्रा बड़ी लम्बी है और इसका श्रेय सालों पहले छोटे-छोटे समूहों के द्वारा किये गए भागीरथी प्रयासों को दिया जाये तो ये गलत नहीं होगा। और विशेषकर जैसा हमने पहले ही बताया की भारत में महिलाओं के समूहों ने अपने स्वयं के प्रयासों और सीमित संसाधनों के साथ सामाजिक विसंगतिओं से जूझते हुए जो कीर्तिमान स्थापित किये वो अतुलनीय हैं। और उनसे प्रेरणा ले कर न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनियां में महिलाओं का व्यापार जगत में दबदबा स्थापित हुआ और महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में नई पहचान मिली। 

भारत में महिला उद्यमिता और आत्मनर्भरता (Women's entrepreneurship and self-reliance) की अलख जगाने वाले कुछ सामूहिक प्रयास जहाँ से महिला उद्यमिता की नींव पड़ी (Women's Entrepreneurship Foundation) और एक सिलसिला जो चलता ही जा रहा है। ऐसे ही दो प्राथमिक महिला समूहों या यू कहे आंदोलनों का यहाँ ज़िक्र करना जरूरी है। 

 सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेन एसोसिएशन (सेवा) Self-Employed Women  Association (SEWA) 

सेवा नेशनल ट्रेड यूनियन के अंतरगत 1972 में  रजिस्टर्ड एक संगठन है। सेवा एक सदस्यता-आधारित संगठन है, इसे 1972 में श्रम, महिला और सहकारी आंदोलनों के संयोजन से बनाया गया था।  इसका उद्देश्य अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार वाली महिलाओं को संगठित करना और उनको सामूहिक सहायता करना और सामाजिक न्याय, समानता और सामान अधिकारों  की प्राप्ति के लिए उनके संघर्ष में उनकी मदद करना था। 

भारत के इस पहले सेल्फ इम्प्लॉयड महिलाओं के समूह ने 130 सहकारी समितियों, 181 ग्रामीण उत्पादक समूहों को शामिल करके अपने आपको विस्तारित किया है। यह सिर्फ एक संगठन नहीं बल्कि एक "आंदोलन"  है जो भारत में 12 राज्यों के 50 जिलों में सक्रिय है, जिसमें 1.75 मिलियन से अधिक महिलाओं की सदस्यता है ।

श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ (एसएमजीयूएलपी) Shree Mahila Griha Udyog Lijjat Papad (SMGULP)

यह ब्रांड महिला सहकारी कार्यकर्ताओं द्वारा चलाया जाता है जिसे महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ कहा जाता है। 1959 में, मुंबई के गिरगांव में रहने वाली 7 महिलाओं के एक समूह ने अपने जीवन यापन की जिम्मेदारी लेने का फैसला किया। श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ (एसएमजीयूएलपी) को भारत में महिला सशक्तिकरण के साथ पहचाने जाने वाले सबसे उल्लेखनीय एसएचजी में से एक माना जाता है। वर्ष 1962 में पापड़ का नाम लिज्जत और संगठन का नाम श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ रखा गया था। वर्तमान में बाजार में इस ब्रांड के पापड़ समेत अन्य उत्पाद भी उपलब्ध हैं। याहू Yahoo की एक रिपोर्ट की मानें तो लिज्जत पापड़ के सफल सहकारी रोजगार (successful cooperative employment) ने करीब 43 हजार महिलाओं को काम दिया। महिलाओं ने पहले मात्र 80 रुपये के क़र्ज़ से पहले दिन 4 पैकेट के साथ शुरुआत की और पहले साल में 6,000 रुपये से थोड़ा अधिक के पापड़ बेचे। साठ साल बाद, यह 2019 में 1,600 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही थी, जिसके सह-स्वामित्व में 45,000 महिलाएं (2021) थीं, जो हर दिन 4.8 मिलियन पापड़ बनाती हैं। 1962 में, नकद पुरस्कार प्रतियोगिता से चुने जाने के बाद ब्रांड नाम 'लिज्जत' को अपनाया गया था। उस समय बिक्री 2 लाख रुपये के करीब थी। पिछले साल नवंबर में, लिज्जत पापड़ उद्यम की  90 वर्षीय सह-संस्थापक जसवंतीबेन जमनादास पोपट (Jaswantiben Jamnadas Popat) को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री (Padma Shri)  पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

यह सही है पिछले कुछ दशकों में, कामकाजी महिला पेशेवरों ने अपनी प्रतिभा, समर्पण और उत्साह के साथ कड़ी मेहनत से काम किया है। वे भारत के आर्थिक विकास और समृद्धि में बड़े पैमाने पर योगदान कर रही है। वर्तमान में, भारत में लगभग 432 मिलियन कामकाजी महिलाएं हैं, जिनमें से 343 मिलियन असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट (report by McKinsey Global Institute) ने अनुमान लगाया है कि महिलाओं को समान अवसर देकर, भारत 2025 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद में 770 बिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़ सकता है। फिर भी, जीडीपी में महिलाओं का वर्तमान योगदान 18% है।

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आज, भारत दुनिया में स्टार्टअप के मामले में तीसरा सबसे बड़ा ईको सिस्टम (3rd largest ecosystem) है और यूनिकॉर्न समुदाय  (Unicorn community) में भी तीसरा सबसे बड़ा ईको सिस्टम  है। हालांकि, उनमें से केवल 10% का नेतृत्व महिला संस्थापकों (women founders) ने किया है। महिला उद्यमियों के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से उनकी सफलता की यात्रा के लिए अधिक सहयोग और अवसर प्रदान करना समय की मांग है। सौभाग्य से, पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के बिजनेस लीडर और संस्थापक कंपनियों के बनने की पूरी प्रक्रिया में बदलाव आया है। यह बदलाव भारत के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा और भारत को वैश्विक परिदृश्य पर और मज़बूती से स्थापित करेगा। 

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