मार्केटिंग में हमेशा से यह समझने की कोशिश की जाती रही है कि लोग किसी खास संदेश पर ध्यान क्यों देते हैं, किसी उत्पाद को क्यों पसंद करते हैं, किसी ब्रांड पर भरोसा कैसे करते हैं और खरीदारी करने का फैसला क्यों लेते हैं। इन बातों को समझने के लिए कंपनियां लंबे समय से सर्वे, समूह चर्चा, ग्राहकों के इंटरव्यू, वेबसाइट के आंकड़ों और ए/बी टेस्टिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करती रही हैं।
ये तरीके आज भी उपयोगी हैं, लेकिन इनसे हमेशा यह पता नहीं चल पाता कि किसी विज्ञापन या उत्पाद को देखकर लोगों के मन में कौन-सी भावनाएं पैदा होती हैं या उनके फैसलों पर अनजाने में किन बातों का असर पड़ता है।
इसी समस्या को समझने में न्यूरोमार्केटिंग मदद करती है। यह न्यूरोसाइंस यानी मस्तिष्क के काम करने के तरीके से जुड़े विज्ञान, मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान और मार्केटिंग रिसर्च का मेल है। इसकी मदद से यह जानने की कोशिश की जाती है कि लोग विज्ञापनों, उत्पादों की पैकेजिंग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ब्रांड से जुड़े दूसरे संदेशों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
पहले इस तरह की रिसर्च करने के लिए विशेष प्रयोगशालाओं, महंगे उपकरणों और नियंत्रित परिस्थितियों की जरूरत होती थी। लेकिन अब पहनने योग्य सेंसर, आंखों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली तकनीक, चेहरे के भावों का विश्लेषण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकों के विकास से उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना पहले की तुलना में आसान हो रहा है।
इस बदलाव का असर मार्केटिंग और विज्ञापन की दुनिया पर भी पड़ रहा है। अब विज्ञापन एजेंसियां नए विज्ञापनों को बेहतर बनाने, उनके अलग-अलग रूपों का परीक्षण करने और यह समझने के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल कर सकती हैं कि दर्शकों का ध्यान किस चीज पर जाता है और कौन-सी चीज उनके मन में भावनाएं पैदा करती है।
पहले मार्केटिंग के नतीजों को समझने के लिए कंपनियां मुख्य रूप से क्लिक, विज्ञापन देखे जाने की संख्या और सर्वे में मिले जवाबों पर निर्भर रहती थीं। अब वे इन आंकड़ों के साथ-साथ लोगों के व्यवहार और शरीर में होने वाली कुछ प्रतिक्रियाओं का भी अध्ययन कर सकती हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि विज्ञापन का कौन-सा हिस्सा लोगों का ध्यान खींचता है और कौन-सा संदेश उन्हें प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, न्यूरोमार्केटिंग को किसी के मन की बात पढ़ने वाली तकनीक नहीं समझना चाहिए। यह किसी व्यक्ति की हर पसंद या खरीदारी के फैसले की सटीक भविष्यवाणी भी नहीं कर सकती। इसके नतीजे इस बात पर निर्भर करते हैं कि रिसर्च कितनी वैज्ञानिक है, आंकड़ों का विश्लेषण कितनी सावधानी से किया गया है, अध्ययन में शामिल लोग कितने उपयुक्त हैं और उनकी जानकारी कितनी जिम्मेदारी से एकत्र की गई है।
इसलिए, न्यूरोमार्केटिंग का सही इस्तेमाल The Right Use of Neuromarketing करने के लिए इसकी खूबियों के साथ-साथ इसकी सीमाओं को समझना भी जरूरी है। इससे कंपनियां ऐसी मार्केटिंग रणनीतियां तैयार कर सकती हैं, जो अधिक प्रभावी होने के साथ-साथ अलग-अलग तरह के उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखें और लोगों का भरोसा भी बनाए रखें।
न्यूरोमार्केटिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें मस्तिष्क के काम करने के तरीके और मनोविज्ञान से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की जाती है कि उपभोक्ता विज्ञापनों, उत्पादों, ब्रांड के संदेशों और मार्केटिंग से जुड़ी दूसरी गतिविधियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। इसके जरिए यह जानने का प्रयास किया जाता है कि लोग किसी विज्ञापन, उत्पाद के डिजाइन, पैकेजिंग, कीमत, ब्रांड की पहचान और डिजिटल अनुभवों से किस तरह प्रभावित होते हैं।
पारंपरिक मार्केट रिसर्च में कंपनियां आमतौर पर ग्राहकों से पूछती हैं कि वे किसी उत्पाद के बारे में क्या सोचते हैं या उसके प्रति कैसा महसूस करते हैं। न्यूरोमार्केटिंग इस जानकारी के साथ-साथ उन प्रतिक्रियाओं का भी अध्ययन करती है, जिन्हें मापा जा सकता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति विज्ञापन देखता है या किसी उत्पाद के साथ जुड़ता है, तो उसके व्यवहार और शरीर में होने वाले कुछ बदलावों का अध्ययन किया जा सकता है।
मान लीजिए कि किसी सर्वे में ग्राहक बताते हैं कि उन्हें पहला विज्ञापन दूसरे विज्ञापन से ज्यादा पसंद आया। आंखों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली तकनीक से यह पता लगाया जा सकता है कि विज्ञापन देखते समय उनका ध्यान वास्तव में उत्पाद पर गया था या नहीं। इसी तरह, इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (EEG) की मदद से सिर की त्वचा पर लगाए गए सेंसर के जरिए मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों को मापा जा सकता है। इससे शोधकर्ताओं को ध्यान और मानसिक सक्रियता से जुड़े कुछ संकेतों का अध्ययन करने में मदद मिल सकती है।
इसके बाद इन नतीजों की तुलना वास्तविक व्यवहार से की जा सकती है। उदाहरण के लिए, ग्राहक को विज्ञापन कितना याद रहा, उसने कौन-सा उत्पाद चुना या उसने वास्तव में खरीदारी की या नहीं।
न्यूरोमार्केटिंग का उद्देश्य मार्केटिंग रिसर्च के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदलना नहीं है। इसका मकसद सर्वे, ग्राहकों के व्यवहार और वैज्ञानिक माप से मिलने वाली जानकारियों को एक साथ समझकर उपभोक्ताओं की पसंद और उनके फैसलों की बेहतर तस्वीर तैयार करना है।
| रिसर्च का तरीका। (Research Method) | इससे मार्केटर्स को क्या समझने में मदद मिलती है। (What It Helps Marketers Understand) |
|---|---|
| सर्वे और प्रश्नावली। (Surveys and Questionnaires) | ग्राहकों की बताई गई पसंद, राय और खरीदारी करने की इच्छा। |
| फोकस ग्रुप। (Focus Groups) | किसी उत्पाद या ब्रांड के बारे में ग्राहकों की चर्चा, सोच और प्रतिक्रियाएं। |
| ए/बी टेस्टिंग। (A/B Testing) | तय किए गए मापदंडों के आधार पर यह जानना कि दो या अधिक विकल्पों में से कौन-सा बेहतर प्रदर्शन करता है। |
| आई-ट्रैकिंग। (Eye-Tracking) | लोग किस चीज को देखते हैं, कितनी देर तक देखते हैं और उनकी नजर किस क्रम में अलग-अलग चीजों पर जाती है। |
| ईईजी। (EEG) | सिर की त्वचा पर लगाए गए सेंसर से मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों के पैटर्न को मापना। |
| चेहरे के भावों का विश्लेषण। (Facial-Expression Analysis) | चेहरे की दिखाई देने वाली गतिविधियों का अध्ययन करना, जो भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से जुड़ी हो सकती हैं। |
| त्वचा की विद्युत प्रतिक्रिया। (Galvanic Skin Response) | त्वचा की विद्युत चालकता में होने वाले बदलावों को मापना, जो शरीर की सक्रियता या उत्तेजना से जुड़े हो सकते हैं। |
| व्यवहार संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण। (Behavioral Analytics) | वेबसाइट, ऐप और खरीदारी की प्रक्रिया के दौरान ग्राहक वास्तव में क्या करते हैं। |
इनमें से कोई भी एक तरीका उपभोक्ता के व्यवहार की पूरी जानकारी नहीं दे सकता। उदाहरण के लिए, किसी विज्ञापन को देखकर शरीर में तेज प्रतिक्रिया होना जरूरी नहीं कि व्यक्ति को वह विज्ञापन पसंद भी आया हो। ऐसी प्रतिक्रिया उत्साह, उलझन, हैरानी या असहजता के कारण भी हो सकती है।
इसीलिए, न्यूरोमार्केटिंग के नतीजों को सही ढंग से समझने के लिए अलग-अलग तरीकों से मिले संकेतों को एक साथ देखना जरूरी है। साथ ही, उन संकेतों का विश्लेषण उस परिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, जिसमें उपभोक्ता ने प्रतिक्रिया दी थी।
पहले न्यूरोमार्केटिंग से जुड़े कई अध्ययन विशेष प्रयोगशालाओं में किए जाते थे। इनके लिए महंगे उपकरणों, नियंत्रित रोशनी, प्रशिक्षित शोधकर्ताओं और खास तरह की परीक्षण व्यवस्थाओं की जरूरत होती थी। इससे शोध के दौरान एक जैसी परिस्थितियां बनाए रखने में मदद मिलती थी, लेकिन ऐसे अध्ययन महंगे होते थे और उन्हें बड़े स्तर पर करना आसान नहीं था।
अब तकनीक के विकास से उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए नए विकल्प सामने आ रहे हैं। पोर्टेबल ईईजी डिवाइस, दूर से आंखों की गतिविधियों पर नजर रखने वाले सिस्टम, कैमरे की मदद से चेहरे के भावों का विश्लेषण और क्लाउड आधारित रिसर्च प्लेटफॉर्म इस काम को पहले की तुलना में आसान बना सकते हैं।
इन तकनीकों की मदद से कुछ प्रकार के अध्ययन पारंपरिक प्रयोगशालाओं के बाहर भी किए जा सकते हैं। इससे कंपनियों और मार्केटिंग एजेंसियों को अलग-अलग परिस्थितियों में उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने के अधिक अवसर मिलते हैं।
हालांकि, किसी तकनीक का आसानी से उपलब्ध होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उसके नतीजे हमेशा सटीक होंगे। उदाहरण के लिए, वेबकैम से चेहरे के भावों का विश्लेषण करने वाले सिस्टम पर रोशनी, कैमरे की गुणवत्ता, सिर की स्थिति, चेहरे की गतिविधियों और सॉफ्टवेयर को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किए गए डेटा का असर पड़ सकता है।
इसी तरह, पोर्टेबल सेंसर इस्तेमाल करने में सुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन उनसे सही नतीजे पाने के लिए उनकी उचित सेटिंग, जांच और विश्वसनीयता की पुष्टि करना जरूरी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) शोधकर्ताओं को बड़ी मात्रा में व्यवहार संबंधी और शारीरिक प्रतिक्रियाओं से जुड़े आंकड़ों का तेजी से विश्लेषण करने में मदद कर रही है। इस्तेमाल किए जाने वाले सिस्टम के आधार पर एआई आंखों की गतिविधियों के पैटर्न पहचानने, चेहरे की गतिविधियों का विश्लेषण करने, तस्वीरों और वीडियो की विशेषताओं को समझने तथा अलग-अलग समूहों की प्रतिक्रियाओं की तुलना करने में सहायता कर सकती है।
मार्केटिंग एजेंसियों के लिए इससे रिसर्च के नतीजों को व्यवस्थित करने और उनका विश्लेषण करने में लगने वाला समय कम हो सकता है। इन जानकारियों के आधार पर टीमें यह समझने की कोशिश कर सकती हैं कि किसी वीडियो का कौन-सा हिस्सा दर्शकों का ध्यान खींचता है, विज्ञापन में उत्पाद पर्याप्त रूप से दिखाई दे रहा है या नहीं और लोग खरीदारी के लिए दिए गए निर्देश या कॉल टू एक्शन (Call to Action) पर ध्यान दे रहे हैं या नहीं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी विज्ञापन में उत्पाद बहुत देर से दिखाई देता है, तो आई-ट्रैकिंग और अन्य व्यवहार संबंधी आंकड़ों की मदद से यह जांचा जा सकता है कि दर्शकों का ध्यान कहां जा रहा है। इसके बाद मार्केटिंग टीम विज्ञापन के डिजाइन, संदेश या उत्पाद को दिखाने के तरीके में बदलाव करने पर विचार कर सकती है।
फिर भी, एआई से मिलने वाले नतीजों को उपभोक्ता के विचारों को सीधे जानने का तरीका नहीं मानना चाहिए। एआई सिस्टम अपने डिजाइन और प्रशिक्षण के दौरान इस्तेमाल किए गए डेटा के आधार पर पैटर्न पहचानते हैं। इसलिए, उनके नतीजों की जांच करना और उनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करना जरूरी है।
इसी तरह, चेहरे के भावों या शारीरिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति क्या महसूस कर रहा है। किसी प्रतिक्रिया को समझने के लिए उसके संदर्भ, दूसरे उपलब्ध संकेतों और शोध के नतीजों पर भी ध्यान देना चाहिए।
Also Read: ESG क्या है और कंपनियों को इसे क्यों अपनाना चाहिए? पूरी जानकारी
आज कई कंपनियां विज्ञापनों, उत्पादों और ग्राहकों के अनुभवों को बेहतर ढंग से समझने के लिए न्यूरोमार्केटिंग में दिलचस्पी दिखा रही हैं। वे ऐसे तरीकों की तलाश कर रही हैं, जिनसे यह पता लगाया जा सके कि उपभोक्ता किसी विज्ञापन पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, उन्हें कौन-से उत्पाद पसंद आते हैं और खरीदारी के फैसलों पर किन बातों का असर पड़ता है।
हालांकि, न्यूरोमार्केटिंग बाजार के आकार को लेकर अलग-अलग रिसर्च रिपोर्ट में अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं। इसका एक कारण यह है कि सभी रिसर्च कंपनियां बाजार का आकलन करते समय एक जैसी सेवाओं और उत्पादों को शामिल नहीं करती हैं।
उदाहरण के लिए, फरवरी 2026 में प्रकाशित द बिजनेस रिसर्च कंपनी (The Business Research Company) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक न्यूरोमार्केटिंग बाजार का आकार 2025 में 3.33 अरब डॉलर था। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि यह बाजार 2026 में बढ़कर 3.71 अरब डॉलर हो सकता है। इसमें 2030 तक आगे भी विकास की संभावना जताई गई है।
वहीं, फॉर्च्यून बिजनेस इनसाइट्स (Fortune Business Insights) की सितंबर 2026 में प्रकाशित एक अलग बाजार रिपोर्ट में न्यूरोमार्केटिंग समाधानों के बाजार का आकार 2026 के लिए 2.01 अरब डॉलर आंका गया। इन दोनों आंकड़ों की सीधे तुलना करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों रिपोर्ट में बाजार की परिभाषा और आंकड़े जुटाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।
इन आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझना है कि न्यूरोमार्केटिंग में व्यावसायिक रुचि बढ़ रही है। डिजिटल विज्ञापन की दुनिया में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी मार्केटिंग के कामकाज का हिस्सा बन रही है। ऐसे में कंपनियां पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया समझने के नए विकल्प तलाश रही हैं।
हालांकि, बाजार से जुड़े ये आंकड़े भविष्य के अनुमान हैं, न कि निश्चित नतीजे। इसलिए किसी भी अनुमान पर भरोसा करने से पहले यह देखना जरूरी है कि कंपनियां वास्तव में इन तकनीकों को कितना अपना रही हैं, रिसर्च कितनी विश्वसनीय है और इससे कारोबार को कितना मापने योग्य लाभ मिल रहा है।
मार्केटिंग एजेंसियों को अक्सर कम समय और सीमित बजट में विज्ञापन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने पड़ते हैं। किसी विज्ञापन को लाखों बार देखा जा सकता है, लेकिन इसके बावजूद वह दर्शकों तक सही संदेश पहुंचाने, ब्रांड को याद रखने में मदद करने या ग्राहकों को कोई कदम उठाने के लिए प्रेरित करने में असफल हो सकता है।
न्यूरोमार्केटिंग एजेंसियों को ऐसी समस्याओं की पहचान करने में मदद कर सकती है। इसके जरिए बड़े विज्ञापन बजट का इस्तेमाल करने से पहले यह जांचा जा सकता है कि विज्ञापन का कौन-सा हिस्सा लोगों का ध्यान खींच रहा है और कहां सुधार की जरूरत है।
उदाहरण के लिए, रिसर्च में पता चल सकता है कि दर्शक विज्ञापन में उत्पाद को दिखाए जाने वाले हिस्से पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हो सकता है कि वे ब्रांड का लोगो न देख पाएं या मुख्य संदेश आने से पहले ही वीडियो देखना बंद कर दें।
ऐसी जानकारियों के आधार पर विज्ञापन की शुरुआत, तस्वीरों और टेक्स्ट की व्यवस्था, कहानी बताने के तरीके, वीडियो की गति या कॉल टू एक्शन (Call to Action) में बदलाव किया जा सकता है।
इसका उद्देश्य विज्ञापन की कमजोरियों को समय रहते पहचानना है। केवल आकर्षक दिखने या कुछ लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि विज्ञापन बाजार में भी सफल होगा।
रियल-टाइम न्यूरोमार्केटिंग का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई ब्रांड हर ग्राहक की मस्तिष्क गतिविधियों को लगातार माप रहा हो। कई मामलों में इसका अर्थ ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करना है, जिनसे विज्ञापनों का तेजी से परीक्षण किया जा सके, उपयोगी जानकारियां मिल सकें और चल रहे मार्केटिंग अभियानों में समय पर सुधार किया जा सके।
मान लीजिए कि कोई विज्ञापन एजेंसी वीडियो विज्ञापन तैयार कर रही है। विज्ञापन को लॉन्च करने से पहले वह अलग-अलग रूपों का परीक्षण कुछ ऐसे लोगों पर कर सकती है, जो लक्षित ग्राहकों का प्रतिनिधित्व करते हों।
आई-ट्रैकिंग यानी आंखों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली तकनीक से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दर्शक विज्ञापन में उत्पाद को देख रहे हैं या नहीं। वहीं, ईईजी (EEG) और शरीर की कुछ प्रतिक्रियाओं को मापने वाले अन्य उपकरणों से ध्यान और प्रतिक्रिया से जुड़े संकेतों का अध्ययन किया जा सकता है।
इसके बाद शोधकर्ता इन नतीजों की तुलना दूसरी जानकारियों से कर सकते हैं। इनमें बिना किसी संकेत के ब्रांड को याद कर पाना, विज्ञापन का संदेश समझना और उत्पाद खरीदने की इच्छा जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि दर्शकों को विज्ञापन की कहानी याद रहती है, लेकिन वे यह नहीं बता पाते कि विज्ञापन किस कंपनी का था, तो एजेंसी को ब्रांड की पहचान अधिक स्पष्ट करने की जरूरत हो सकती है। वह ब्रांड का लोगो ज्यादा प्रमुखता से दिखा सकती है या उत्पाद को विज्ञापन की कहानी से बेहतर तरीके से जोड़ सकती है।
नीलसन (Nielsen) की उपभोक्ता न्यूरोसाइंस रिसर्च Nielsen's consumer neuroscience research में भी यह अध्ययन किया गया है कि शारीरिक प्रतिक्रियाओं से मिलने वाले आंकड़े पारंपरिक विज्ञापन रिसर्च को किस तरह बेहतर बना सकते हैं।
नीलसन की एक रिसर्च में तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पादों के 25 ब्रांडों के 100 विज्ञापनों का अध्ययन किया गया था। कंपनी के अनुसार, न्यूरोसाइंस आधारित विज्ञापन परीक्षण में औसत से बेहतर स्कोर पाने वाले विज्ञापनों से बिक्री में 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
हालांकि, इस नतीजे को समझना जरूरी है। यह एक विशेष रिसर्च में सामने आया परिणाम है। इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यूरोमार्केटिंग अपनाने वाली हर कंपनी की बिक्री निश्चित रूप से 23 प्रतिशत बढ़ जाएगी।
टिकटॉक (TikTok), इंस्टाग्राम (Instagram) और यूट्यूब (YouTube) जैसे प्लेटफॉर्म पर कई ब्रांड एक ही समय में लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं। ऐसे में छोटे वीडियो को शुरुआत में ही अपना उद्देश्य स्पष्ट करना पड़ सकता है। लेकिन केवल तेज आवाज, चमकदार तस्वीरें या नाटकीय दृश्य दिखाने से विज्ञापन का प्रदर्शन बेहतर होने की गारंटी नहीं मिलती है।
न्यूरोमार्केटिंग रिसर्च की मदद से क्रिएटिव टीमें यह समझने की कोशिश कर सकती हैं कि वीडियो की शुरुआत दर्शकों का ध्यान खींच रही है या नहीं, विज्ञापन का संदेश आसानी से समझ में आ रहा है या नहीं और वीडियो देखने के बाद लोगों को उत्पाद याद रहता है या नहीं।
इन जानकारियों की तुलना वीडियो देखने में बिताए गए समय, वीडियो पूरा देखने की दर, ब्रांड को ऑनलाइन खोजने, खरीदारी करने और बिक्री में होने वाले अतिरिक्त बदलाव जैसे आंकड़ों से की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, कपड़े बेचने वाला कोई ब्रांड दो अलग-अलग वीडियो तैयार कर सकता है। पहले वीडियो में शुरुआत से ही जीवनशैली से जुड़ी कई आकर्षक तस्वीरें दिखाई जाती हैं। दूसरे वीडियो में सीधे यह दिखाया जाता है कि कोई कपड़ा पहनने पर कैसा दिखता है और उसकी फिटिंग कैसी है।
यदि पहले वीडियो को ज्यादा लोग देखते हैं, लेकिन दूसरे वीडियो से उन्हें उत्पाद के बारे में बेहतर जानकारी मिलती है और उसे खरीदने में अधिक दिलचस्पी पैदा होती है, तो ब्रांड अपने मार्केटिंग उद्देश्य के अनुसार बेहतर विकल्प चुन सकता है।
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करना ही सफलता का अंतिम पैमाना नहीं होना चाहिए। कोई विज्ञापन दर्शकों का ध्यान तो खींच सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह उनके मन में भरोसा पैदा करे, उत्पाद की उपयोगिता समझाए या उन्हें खरीदारी के लिए प्रेरित करे।
न्यूरोमार्केटिंग का इस्तेमाल उत्पादों की पैकेजिंग और खरीदारी के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए भी किया जा सकता है। आई-ट्रैकिंग की मदद से यह समझने का प्रयास किया जा सकता है कि ग्राहक उत्पाद के नाम, कीमत, पोषण संबंधी जानकारी या पर्यावरण के अनुकूल होने से जुड़े दावों पर ध्यान दे रहे हैं या नहीं।
ऑनलाइन स्टोर में इसी तरह के तरीकों से यह जांच की जा सकती है कि ग्राहक उत्पाद की जरूरी जानकारी को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे हैं या उन्हें भुगतान करने के विकल्प तक पहुंचने में परेशानी तो नहीं हो रही है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई सुपरमार्केट किसी उत्पाद की नई पैकेजिंग तैयार करना चाहता है, तो वह अलग-अलग डिजाइन की तुलना कर सकता है। इस दौरान यह देखा जा सकता है कि दुकान की अलमारियों पर कौन-सा डिजाइन आसानी से नजर आता है और उस पर दी गई जानकारी कितनी स्पष्ट है।
शोधकर्ता यह भी जांच सकते हैं कि ग्राहक उत्पाद का नाम पहचान पा रहे हैं या नहीं, उसके मुख्य फायदे समझ रहे हैं या नहीं और ब्रांड की सही पहचान कर पा रहे हैं या नहीं।
ई-कॉमर्स कंपनियां भी इन तरीकों का इस्तेमाल अपने उत्पाद पेज को बेहतर बनाने के लिए कर सकती हैं। यदि ग्राहक बार-बार डिलीवरी शुल्क या सामान वापस करने की नीति से जुड़ी जानकारी नहीं देख पाते हैं, तो पेज पर जानकारी को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करने से उन्हें खरीदारी का फैसला लेने में मदद मिल सकती है। इससे भ्रम कम करने में भी सहायता मिल सकती है।
ये उदाहरण बताते हैं कि न्यूरोमार्केटिंग से जुड़ी तकनीकों का इस्तेमाल अलग-अलग व्यावसायिक क्षेत्रों में किस तरह किया जा सकता है। हालांकि, जब तक किसी खास ब्रांड के परिणामों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि न हो जाए, तब तक इन उदाहरणों के आधार पर यह दावा नहीं करना चाहिए कि किसी कंपनी को निश्चित रूप से कोई खास व्यावसायिक लाभ मिला है।
उपभोक्ता हर विज्ञापन को केवल उत्पाद की खूबियों और कीमतों की तुलना करके नहीं परखते हैं। विज्ञापन में इस्तेमाल की गई तस्वीरें, ब्रांड से पहले का परिचय, कहानी बताने का तरीका, व्यक्तिगत अनुभव और उससे जुड़ी भावनाएं भी लोगों की सोच और पसंद को प्रभावित कर सकती हैं।
नीलसन (Nielsen) की रिसर्च में इस बात का अध्ययन किया गया है कि विज्ञापनों को देखकर लोगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं उनकी प्रभावशीलता और ब्रांड से जुड़े नतीजों पर किस तरह असर डाल सकती हैं। इस तरह के अध्ययन बताते हैं कि न्यूरोसाइंस पर आधारित माप और मार्केटिंग के पारंपरिक तरीकों को एक साथ इस्तेमाल करना उपयोगी हो सकता है।
मार्केटिंग टीमों के लिए इसका मतलब है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी विज्ञापन ने लोगों का ध्यान खींचा या नहीं। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि दर्शक विज्ञापन का संदेश समझ पाए या नहीं, उन्हें ब्रांड याद रहा या नहीं और क्या उन्होंने उत्पाद को उस फायदे से जोड़ा, जिसे कंपनी बताना चाहती थी।
उदाहरण के लिए, कोई वित्तीय सेवा कंपनी अपने विज्ञापन के जरिए ग्राहकों के मन में भरोसा पैदा करना चाहती है। यदि वह बहुत मजेदार या रोमांचक विज्ञापन बनाती है, तो हो सकता है कि लोग उसे पसंद करें, लेकिन इससे कंपनी की विश्वसनीय छवि मजबूत न हो।
ऐसी स्थिति में भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और ब्रांड के प्रति लोगों की धारणा का एक साथ अध्ययन करने से कंपनी यह समझ सकती है कि उसका विज्ञापन तय किए गए मार्केटिंग उद्देश्य को पूरा कर रहा है या नहीं।
क्लिक, विज्ञापन दिखाए जाने की संख्या और कन्वर्जन रेट आज भी मार्केटिंग की सफलता मापने के महत्वपूर्ण तरीके हैं। हालांकि, केवल इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि कोई विज्ञापन सफल या असफल क्यों रहा।
उदाहरण के लिए, यदि किसी विज्ञापन पर बहुत कम लोग क्लिक कर रहे हैं, तो इसके कई कारण हो सकते हैं। विज्ञापन आकर्षक नहीं हो सकता है, उसे गलत दर्शकों को दिखाया जा रहा हो सकता है, उसमें दिया गया ऑफर स्पष्ट न हो या विज्ञापन और उससे खुलने वाले वेबपेज के बीच तालमेल न हो।
न्यूरोमार्केटिंग विज्ञापन के कुछ पहलुओं की जांच करने में मदद कर सकती है, लेकिन इससे किसी अभियान के कमजोर प्रदर्शन के सभी कारणों का पता लगाना संभव नहीं है।
बेहतर नतीजों के लिए अलग-अलग प्रकार के आंकड़ों और जानकारियों को एक साथ समझना चाहिए।
ध्यान से जुड़े माप। (Attention Measurements): क्या दर्शकों ने विज्ञापन में दी गई महत्वपूर्ण जानकारी पर ध्यान दिया।
भावनात्मक और शारीरिक प्रतिक्रियाएं। (Emotional and Physiological Responses): विज्ञापन देखने के दौरान लोगों ने कैसी प्रतिक्रिया दी और उस प्रतिक्रिया के पीछे दूसरे संभावित कारण क्या हो सकते हैं।
ब्रांड को याद रखने की क्षमता। (Brand Recall): क्या दर्शक विज्ञापन देने वाली कंपनी की पहचान कर पाए या उन्हें उत्पाद याद रहा।
व्यवहार संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण। (Behavioral Analytics): क्या लोगों ने वेबसाइट खोली, उत्पाद के बारे में अधिक जानकारी देखी या खरीदारी पूरी की।
व्यावसायिक नतीजे। (Business Outcomes): क्या अभियान से अतिरिक्त बिक्री, ग्राहकों को लंबे समय तक जोड़े रखने या किसी दूसरे निर्धारित व्यावसायिक लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिली।
इन सभी जानकारियों को एक साथ देखने से मार्केटिंग एजेंसियां यह समझ सकती हैं कि कौन-सा विज्ञापन केवल लोगों का ध्यान खींच रहा है और कौन-सा वास्तव में कारोबार के लिए उपयोगी साबित हो रहा है।
न्यूरोमार्केटिंग को लेकर एक आम गलतफहमी यह है कि मस्तिष्क का कोई खास संकेत या चेहरे की गतिविधि देखकर यह निश्चित रूप से बताया जा सकता है कि कोई व्यक्ति क्या सोच रहा है।
वास्तव में, शरीर में होने वाले कई बदलावों के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, त्वचा की विद्युत चालकता में बदलाव शरीर की सक्रियता या उत्तेजना का संकेत हो सकता है। लेकिन केवल इस संकेत के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति खुश है, डरा हुआ है, उलझन में है या परेशान है।
इसी तरह, किसी विज्ञापन को देखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि दर्शक उसे समझ भी रहा है या पसंद भी कर रहा है। चेहरे के भावों का विश्लेषण करने वाली तकनीक चेहरे की दिखाई देने वाली गतिविधियों को पहचान सकती है, लेकिन उन गतिविधियों को किसी खास भावना से जोड़ते समय सावधानी बरतना जरूरी है।
न्यूरोमार्केटिंग में ईईजी (EEG) के इस्तेमाल से जुड़े शोध की एक व्यवस्थित समीक्षा में पाया गया कि कुछ माप उपभोक्ताओं की पसंद को समझने में उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, अलग-अलग अध्ययनों के नतीजे हमेशा एक जैसे नहीं होते और उनसे वास्तविक खरीदारी के व्यवहार का भरोसेमंद अनुमान हर स्थिति में नहीं लगाया जा सकता।
इसलिए, कंपनियों को यह दावा करने से बचना चाहिए कि कोई तकनीक किसी व्यक्ति के मन की बात पढ़ सकती है, उसकी हर भावना को पहचान सकती है या उसके खरीदारी संबंधी फैसलों की निश्चित भविष्यवाणी कर सकती है।
किसी अध्ययन में आधुनिक और महंगे उपकरणों का इस्तेमाल करने से उसके नतीजे अपने आप सही नहीं हो जाते। यदि रिसर्च की योजना कमजोर है, तो उससे मिलने वाली जानकारी भी भ्रामक हो सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि अध्ययन में शामिल लोगों की संख्या बहुत कम है, विज्ञापन वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता, रिसर्च का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है या आंकड़ों का विश्लेषण ऐसे अनुमानों पर आधारित है जिनकी पुष्टि नहीं हुई है, तो नतीजों पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।
बेहतर रिसर्च के लिए सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि किस सवाल का जवाब खोजना है। इसके बाद सही मापदंड चुनने, उपयुक्त लोगों को अध्ययन में शामिल करने और नतीजों की तुलना वास्तविक व्यवहार से करने की जरूरत होती है।
शोधकर्ताओं को सहसंबंध (Correlation) और कारण-परिणाम संबंध (Causation) के बीच अंतर भी समझना चाहिए। सहसंबंध का अर्थ है कि दो चीजें एक साथ दिखाई देती हैं, जबकि कारण-परिणाम संबंध यह बताता है कि एक चीज दूसरी में बदलाव का कारण बनी।
उदाहरण के लिए, यदि किसी विज्ञापन को देखने वाले लोगों में शारीरिक प्रतिक्रिया अधिक दिखाई देती है और उसी समय बिक्री भी बढ़ जाती है, तो इससे यह साबित नहीं होता कि शारीरिक प्रतिक्रिया के कारण ही बिक्री बढ़ी है। बिक्री में वृद्धि के पीछे कीमतों में बदलाव, बेहतर ऑफर, मौसम, बाजार की मांग या अन्य विज्ञापनों का भी योगदान हो सकता है।
इसलिए, न्यूरोमार्केटिंग से मिलने वाली जानकारियों को दूसरे आंकड़ों और स्वतंत्र प्रमाणों के साथ समझना चाहिए। इससे कंपनियों को अधिक विश्वसनीय निष्कर्ष निकालने और बेहतर मार्केटिंग फैसले लेने में मदद मिल सकती है।
न्यूरोमार्केटिंग में मस्तिष्क की गतिविधियों, चेहरे की रिकॉर्डिंग, आंखों की गतिविधियों और शरीर की दूसरी प्रतिक्रियाओं से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह के डेटा से लोगों की गोपनीयता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। खासकर तब, जब उनकी स्पष्ट सहमति के बिना जानकारी एकत्र की जाए या उसे किसी व्यक्ति की पहचान से जोड़ दिया जाए।
इसलिए, कंपनियों को उपभोक्ताओं की जानकारी एकत्र करते समय पारदर्शिता बरतनी चाहिए। उन्हें स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि कौन-सा डेटा लिया जा रहा है, उसे एकत्र करने का उद्देश्य क्या है, उसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा, उस तक किसकी पहुंच होगी और क्या उसे किसी दूसरी तकनीकी कंपनी के साथ साझा किया जाएगा।
रिसर्च में शामिल लोगों को अध्ययन की प्रक्रिया और उसके उद्देश्य के बारे में सही जानकारी मिलनी चाहिए। इसके बाद ही उन्हें यह फैसला करने का अवसर दिया जाना चाहिए कि वे इसमें भाग लेना चाहते हैं या नहीं।
डेटा की सुरक्षा से जुड़े कानूनी नियम देश, डेटा के प्रकार और उसके इस्तेमाल के तरीके के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यूरोप में व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल पर जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (General Data Protection Regulation यानी GDPR) लागू हो सकता है।
इसी तरह, यूरोपीय संघ का एआई एक्ट (EU AI Act) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध और सीमाएं निर्धारित करता है। इसमें कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में भावनाओं की पहचान करने वाली एआई तकनीकों के कुछ इस्तेमाल पर भी पाबंदियां शामिल हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून मार्केटिंग में भावनाओं से जुड़ी हर तरह की रिसर्च पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाता है।
इसलिए, कंपनियों को अपने काम और तकनीक के इस्तेमाल के तरीके के अनुसार लागू कानूनी नियमों की जांच करनी चाहिए। इससे उपभोक्ताओं की गोपनीयता सुरक्षित रखने और कानूनी समस्याओं से बचने में मदद मिल सकती है।
जिम्मेदार न्यूरोमार्केटिंग का उद्देश्य ब्रांड के संदेशों को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाना होना चाहिए, न कि लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाना। कंपनियों को रिसर्च से मिली जानकारियों का इस्तेमाल ग्राहकों को जानबूझकर भ्रमित करने, कमजोर परिस्थितियों में रहने वाले लोगों पर दबाव डालने या उत्पाद की महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के लिए नहीं करना चाहिए।
इसके साथ ही, सभी उपभोक्ताओं को ध्यान में रखना भी जरूरी है। चेहरे के भावों का विश्लेषण करने वाले सिस्टम और दूसरे एआई टूल अलग-अलग सामाजिक समूहों, रोशनी की परिस्थितियों और रिकॉर्डिंग के माहौल में अलग-अलग परिणाम दे सकते हैं। इसलिए, शोधकर्ताओं को इन तकनीकों की सीमाओं का परीक्षण करना चाहिए और रिसर्च में ऐसे लोगों को शामिल करना चाहिए, जो वास्तविक लक्षित दर्शकों का प्रतिनिधित्व करते हों।
मार्केटिंग टीमों को दिव्यांग लोगों, अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले उपभोक्ताओं और डिजिटल तकनीक का कम या ज्यादा ज्ञान रखने वाले लोगों की जरूरतों पर भी ध्यान देना चाहिए। जो विज्ञापन एक समूह के लिए प्रभावी है, जरूरी नहीं कि वह दूसरे समूह तक भी उसी तरह अपना संदेश पहुंचा सके।
न्यूरोमार्केटिंग को जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। इनमें केवल आवश्यक डेटा एकत्र करना, रिसर्च से जुड़े रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना, जानकारी तक पहुंच सीमित करना, एआई मॉडल की सीमाओं का दस्तावेज तैयार करना और विज्ञापनों की संभावित हानिकारक प्रभावों के लिए समीक्षा करना शामिल है।
इन तरीकों से कंपनियां उपभोक्ताओं का भरोसा बनाए रखते हुए मार्केटिंग रिसर्च का बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं।
न्यूरोमार्केटिंग का लाभ उठाने के लिए मार्केटिंग एजेंसियों को शुरुआत में ही महंगे वैज्ञानिक उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं है। वे पारंपरिक रिसर्च तरीकों से शुरुआत कर सकती हैं और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ तकनीकों का इस्तेमाल कर सकती हैं।
इसके लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाना जरूरी है, ताकि रिसर्च से मिली जानकारियों के आधार पर बेहतर फैसले लिए जा सकें और उनके परिणामों का मूल्यांकन भी किया जा सके।
सबसे पहले यह तय करें कि मार्केटिंग अभियान में किस चीज को बेहतर बनाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, क्या कंपनी चाहती है कि लोग उसके ब्रांड को बेहतर तरीके से पहचानें, विज्ञापन का संदेश आसानी से समझें, उत्पाद को जल्दी खोज पाएं या कोई दूसरा स्पष्ट लक्ष्य हासिल करें।
रिसर्च के उद्देश्य के अनुसार तकनीक का चुनाव करें। ग्राहकों की राय जानने के लिए सर्वे का इस्तेमाल किया जा सकता है। विज्ञापन में लोगों की नजर कहां जाती है, यह समझने के लिए आई-ट्रैकिंग उपयोगी हो सकती है। वहीं, शरीर की प्रतिक्रियाओं को मापने वाली विशेषज्ञ तकनीकों का इस्तेमाल तभी करना चाहिए, जब उनसे किसी महत्वपूर्ण सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद हो।
विज्ञापन की शुरुआत, डिजाइन, उत्पाद दिखाने के तरीके और संदेश के अलग-अलग रूप तैयार करें। फिर समान परिस्थितियों में उनका परीक्षण करें, ताकि यह समझा जा सके कि कौन-सा विकल्प तय किए गए उद्देश्य को बेहतर तरीके से पूरा करता है।
रिसर्च से मिली जानकारियों की तुलना ब्रांड को याद रखने की क्षमता, लोगों की भागीदारी, कन्वर्जन रेट और बिक्री जैसे आंकड़ों से करें। केवल किसी एक शारीरिक प्रतिक्रिया या बायोमेट्रिक स्कोर के आधार पर अंतिम फैसला न लें।
जहां संभव हो, नियंत्रित प्रयोगों या ऐसे समूहों का इस्तेमाल करें, जिन्हें बदलाव लागू किए बिना रखा गया हो। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि विज्ञापन में किए गए बदलावों से वास्तव में बेहतर नतीजे मिले या बिक्री और ग्राहक व्यवहार में आया बदलाव दूसरे कारणों से हुआ।
बड़े स्तर पर रिसर्च लागू करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि लोगों की सहमति, डेटा की सुरक्षा, रिसर्च की गुणवत्ता और अलग-अलग उपभोक्ता समूहों का उचित प्रतिनिधित्व जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया गया है।
इस प्रक्रिया की मदद से मार्केटिंग एजेंसियां धीरे-धीरे न्यूरोमार्केटिंग को अपना सकती हैं। साथ ही, वे यह भी सुनिश्चित कर सकती हैं कि इस तकनीक से मिली जानकारियों के आधार पर लिए गए फैसले उचित और जवाबदेह हों।
न्यूरोमार्केटिंग अब केवल विशेषज्ञ प्रयोगशालाओं तक सीमित रिसर्च का क्षेत्र नहीं रह गई है। पहनने योग्य सेंसर, आई-ट्रैकिंग, चेहरे के भावों का विश्लेषण और एआई की मदद से डेटा समझने वाली तकनीकें कंपनियों के लिए उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना आसान बना रही हैं। इनकी मदद से विज्ञापनों, उत्पादों की पैकेजिंग और डिजिटल अनुभवों को बेहतर बनाने के नए अवसर मिल रहे हैं।
हालांकि, न्यूरोमार्केटिंग की सबसे बड़ी उपयोगिता पारंपरिक मार्केटिंग रिसर्च की जगह लेना नहीं, बल्कि उसे अधिक प्रभावी बनाना है। यह मार्केटिंग विशेषज्ञों को यह समझने में मदद कर सकती है कि कोई विज्ञापन लोगों का ध्यान कैसे खींचता है, उनसे भावनात्मक जुड़ाव बनाने में कितना सफल होता है और उसका संदेश कितनी आसानी से समझ में आता है। वहीं, व्यवहार संबंधी आंकड़ों और नियंत्रित प्रयोगों से यह जांचा जा सकता है कि इन जानकारियों का वास्तविक व्यावसायिक परिणामों पर क्या असर पड़ा।
मार्केटिंग एजेंसियों के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि वे अनुमान के बजाय रिसर्च और प्रमाणों के आधार पर रचनात्मक फैसले ले सकती हैं। इससे विज्ञापन की कमजोरियों को पहले ही पहचानने और उपभोक्ताओं की वास्तविक जरूरतों के अनुसार अभियान तैयार करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इन फायदों को हासिल करने के लिए वैज्ञानिक तरीके से रिसर्च करना, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता रखना, डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना और तकनीक की सीमाओं को समझना जरूरी है।
जैसे-जैसे न्यूरोमार्केटिंग का विकास होगा, वैसे-वैसे उन कंपनियों के लिए इसके बेहतर परिणाम हासिल करने की संभावना बढ़ेगी, जो उपभोक्ता मनोविज्ञान की जानकारियों को मार्केटिंग के बुनियादी सिद्धांतों और नैतिक जिम्मेदारियों के साथ जोड़कर इस्तेमाल करेंगी।