रिपोर्टों में नियामक विभाग के एक अधिकारी और भुगतान उद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) आने वाले दिनों में इसे टालने के बारे में अंतिम निर्णय ले सकता है। हालांकि, NPCI की ओर से लागू होने की तारीख में बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
प्रस्तावित शुल्क को लेकर खुदरा कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है। अक्टूबर से दिसंबर तक त्योहारों और साल के अंत में खरीदारी के कारण बाजार में लेनदेन बढ़ जाता है। ऐसे समय में डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त खर्च छोटे और मध्यम कारोबारियों के मुनाफे तथा रोजमर्रा के व्यावसायिक खर्चों को प्रभावित कर सकता है।
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) National Payments Corporation of India (NPCI) ने 2,000 रुपये से अधिक के पात्र कारोबारी UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाने का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए पहले 15 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की गई थी।
MDR वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने और उसे संसाधित करने के बदले व्यापारी से लिया जाता है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर निर्धारित सीमा से अधिक के कुछ UPI भुगतानों पर कारोबारियों को यह शुल्क देना पड़ सकता है। इससे संबंधित लेनदेन के लिए छह साल से अधिक समय से चली आ रही शून्य-MDR व्यवस्था में बदलाव होगा।
प्रस्तावित शुल्क सभी कारोबारियों पर लागू नहीं होगा। जिन छोटे दुकानदारों और विक्रेताओं की UPI QR कोड के माध्यम से मासिक प्राप्तियां एक लाख रुपये से कम रहती हैं, उन्हें छूट दिए जाने की बात कही गई है।
इस प्रस्ताव को लेकर बहस का मुख्य मुद्दा यह है कि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की लागत कितनी होनी चाहिए और अलग-अलग आकार के कारोबारियों के लिए भुगतान सेवाओं को किफायती कैसे रखा जाए।
कई व्यापारी संगठनों ने प्रस्तावित MDR का विरोध किया है। उनका कहना है कि भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगने से कारोबारियों का मुनाफा घट सकता है और संचालन संबंधी खर्च बढ़ सकते हैं। कम लाभ के अंतर पर काम करने वाले दुकानदारों के लिए यह खर्च विशेष रूप से चिंता का विषय है।
कुछ व्यापारी समूहों की ओर से 2 अक्टूबर को ‘नो UPI डे’ के जरिए विरोध जताने की बात सामने आई थी। इस दौरान कुछ कारोबारियों ने अपने व्यापारिक खातों पर UPI भुगतान स्वीकार न करने का विकल्प अपनाने की बात कही। हालांकि, व्यापारिक संगठनों की ओर से विरोध के कार्यक्रम को लेकर अलग-अलग अपडेट भी सामने आए।
व्यापारियों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान अब खुदरा कारोबार का सामान्य हिस्सा बन चुका है। ऐसे में शुल्क लागू करने से पहले उसके प्रभाव, छूट की शर्तों और भुगतान व्यवस्था से जुड़े नियमों को स्पष्ट करना जरूरी है।
अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (CAIT) Confederation of All India Traders (CAIT) ने प्रस्तावित MDR व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। संगठन ने माना है कि UPI व्यवस्था की सुरक्षा, रखरखाव और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए भुगतान प्रणाली के वित्तपोषण पर विचार जरूरी है। हालांकि, संगठन चाहता है कि शुल्क की सीमा और छोटे कारोबारियों को मिलने वाली छूट में संशोधन किया जाए।
CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया ने बताया कि संगठन ने पिछले सप्ताह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बैठक में अपनी चिंताएं रखी थीं। व्यापारी संगठन को उम्मीद है कि सरकार शुल्क लागू करने की तारीख टालने के अनुरोध पर विचार करेगी।
CAIT ने मांग की है कि MDR लागू होने के लिए लेनदेन की न्यूनतम राशि 2,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये की जाए। इसके अलावा, छोटे व्यापारियों को मिलने वाली छूट के लिए मासिक UPI प्राप्तियों की सीमा एक लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने का सुझाव दिया गया है।
संगठन का मानना है कि इन बदलावों से छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ कम होगा और नई व्यवस्था को समझने तथा अपनाने के लिए उन्हें अधिक समय मिलेगा।
CAIT ने कारोबारियों के बीच होने वाले UPI भुगतान को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है। संगठन के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था में यह साफ होना चाहिए कि जब एक कारोबारी दूसरे कारोबारी को UPI के माध्यम से भुगतान करता है, तो उस पर शुल्क किस तरह लागू होगा।
UPI में व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले भुगतान को P2P और व्यक्ति से व्यापारी को किए जाने वाले भुगतान को P2M कहा जाता है। CAIT का कहना है कि कारोबारी से कारोबारी के बीच होने वाले लेनदेन पर नियमों की स्पष्ट व्याख्या जरूरी है।
व्यापारियों को आशंका है कि यदि शुल्क लागू करने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हुई, तो एक ही भुगतान के अलग-अलग चरणों में अतिरिक्त शुल्क लगने को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए संगठन चाहता है कि संबंधित अधिकारी शुल्क लागू करने से पहले पारदर्शी नियम जारी करें। स्पष्ट परिभाषाएं और एक समान कार्यान्वयन कारोबारियों को अनावश्यक खर्च तथा भ्रम से बचाने में मदद कर सकते हैं।
अक्टूबर से दिसंबर का समय भारतीय खुदरा बाजार के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में त्योहारों, शादी-ब्याह और साल के अंत की खरीदारी के कारण ग्राहकों का खर्च बढ़ता है। ऐसे में डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का समय भी व्यापारियों की आपत्तियों का प्रमुख कारण बन गया है।
मुंबई के फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन (FRTWA) ने 6 अक्टूबर 2026 को वित्त मंत्री को पत्र लिखकर प्रस्तावित शुल्क पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया।
संगठन के अध्यक्ष वीरेन शाह ने कहा कि व्यापारी पहले से ही कमजोर बिक्री, सीमित मुनाफे और नकदी की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनके अनुसार, भुगतान पर अतिरिक्त खर्च छोटे और मध्यम खुदरा कारोबारियों की आर्थिक स्थिति पर और दबाव डाल सकता है।
CAIT ने भी सुझाव दिया है कि यदि सरकार शुल्क लागू करने का फैसला करती है, तो व्यापारियों को तैयारी का पर्याप्त समय देने के लिए इसे दिसंबर तक टाला जाए। इसी बीच जनवरी 2027 तक देरी की संभावना से व्यापारिक संगठनों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद जगी है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम आधिकारिक निर्णय का इंतजार है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या NPCI 15 अक्टूबर की निर्धारित तारीख में बदलाव करेगा और क्या सरकार व्यापारियों की ओर से मांगी गई अधिक छूट की सीमा पर विचार करेगी।
यदि शुल्क लागू होने की तारीख आगे बढ़ाई जाती है, तो कारोबारियों, बैंकों और भुगतान सेवा कंपनियों को नई व्यवस्था समझने तथा अपनी प्रणालियों को तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है। हालांकि, शुल्क की दर और छूट की शर्तों में बदलाव होगा या नहीं, यह संबंधित अधिकारियों के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।
फिलहाल जनवरी 2027 की समय-सीमा को संभावित बदलाव के रूप में ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि NPCI की ओर से इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
UPI पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत MDR शुल्क ने देश के व्यापारियों के बीच लेनदेन की लागत, छूट की सीमा और कारोबारियों के बीच भुगतान पर नियमों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। जनवरी 2027 तक इसे टालने की संभावना से खुदरा कारोबारियों को तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
हालांकि, व्यापारी संगठनों की मांगों पर क्या निर्णय लिया जाएगा और नई व्यवस्था कब लागू होगी, यह NPCI तथा संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा। तब तक कारोबारियों के लिए जरूरी है कि वे प्रस्तावित नियमों और उनसे जुड़े बदलावों पर नजर बनाए रखें।