संयुक्त राष्ट्र के एक विशेषज्ञ पैनल ने देशों से पारंपरिक आर्थिक संकेतकों जैसे GDP से आगे बढ़ने का आग्रह किया है, और एक अधिक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की है जो लोगों के कल्याण, पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक प्रगति को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
संयुक्त राष्ट्र ने देशों की प्रगति को मापने के तरीके को फिर से परिभाषित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ पैनल ने सिफारिश की है, कि देशों को Gross Domestic Product (GDP) पर निर्भरता से आगे बढ़ना चाहिए, यह तर्क देते हुए कि यह अब समाज के कल्याण की पूरी तस्वीर को नहीं दर्शाता।
हालांकि GDP लंबे समय से आर्थिक प्रदर्शन का मुख्य संकेतक रहा है, पैनल ने जोर देकर कहा कि यह “उत्पादन” को मापता है, “परिणामों” को नहीं। दूसरे शब्दों में, यह दिखाता है, कि अर्थव्यवस्था कितना उत्पादन करती है, लेकिन यह नहीं बताता कि लोग वास्तव में कैसे जीते हैं।
ये सिफारिशें “Counting What Counts: A Compass of Progress for People and Planet” नामक रिपोर्ट से आई हैं। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासचिव के स्वतंत्र उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समूह द्वारा तैयार की गई है, जो GDP से आगे जाकर प्रगति को मापने पर केंद्रित है।
रिपोर्ट में कहा गया है, कि कई देशों में GDP वृद्धि मजबूत रही है, लेकिन नागरिक अभी भी निम्न समस्याओं का सामना कर रहे हैं:
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, कि “GDP वृद्धि और जनता की भावना अलग हो गई है”, जो वैश्विक स्तर पर प्रगति को मापने के तरीके में एक गहरी समस्या को दर्शाता है।
GDP दशकों से आर्थिक विश्लेषण की आधारशिला रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है, कि यह आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है।
GDP कुल आर्थिक उत्पादन को मापता है, लेकिन यह नहीं बताता कि संपत्ति कैसे वितरित होती है।
वनों की कटाई या प्रदूषण जैसी गतिविधियाँ GDP बढ़ा सकती हैं, भले ही वे दीर्घकालिक रूप से नुकसानदायक हों।
स्वास्थ्य, शिक्षा, खुशी और जीवन की गुणवत्ता GDP में शामिल नहीं होती।
आर्थिक वृद्धि के बावजूद लोग अक्सर असुरक्षित या असंतुष्ट महसूस करते हैं।
इन कमियों को दूर करने के लिए UN पैनल ने “समान, समावेशी और टिकाऊ कल्याण” पर आधारित एक व्यापक ढांचा प्रस्तावित किया है।
इसमें 31 संकेतकों का एक डैशबोर्ड शामिल है:
यह बहु-आयामी प्रणाली राष्ट्रीय प्रगति की अधिक सटीक और सूक्ष्म समझ प्रदान करने का लक्ष्य रखती है।
रिपोर्ट में पर्यावरणीय चुनौतियों पर विशेष जोर दिया गया है, और चेतावनी दी गई है कि वर्तमान आर्थिक मॉडल टिकाऊ नहीं हैं।
वैश्विक वृद्धि के बावजूद दुनिया में देखा जा रहा है:
ये प्रवृत्तियाँ दिखाती हैं कि विकास मापने में पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है।
रिपोर्ट में उभरती तकनीकों, विशेषकर Artificial Intelligence (AI), के प्रभाव पर भी चर्चा की गई है।
जहाँ AI उत्पादकता और नवाचार बढ़ा सकता है, वहीं इसके कुछ जोखिम भी हैं:
पैनल का कहना है कि बिना उचित नियमन के तकनीकी प्रगति असमानता को और बढ़ा सकती है।
UN पैनल ने इस नए दृष्टिकोण को लागू करने के लिए कई सिफारिशें दी हैं:
सरकारों को GDP से आगे बढ़कर विभिन्न संकेतकों को ट्रैक करने वाले डैशबोर्ड विकसित करने चाहिए।
डेटा संग्रह प्रणालियों में निवेश किया जाना चाहिए ताकि कल्याण और पर्यावरण की बेहतर माप हो सके।
नीतियाँ इस तरह बनाई जाएँ कि आर्थिक लाभ सभी वर्गों में समान रूप से वितरित हों।
नए मापदंडों को मानकीकृत करने और सर्वोत्तम प्रथाएँ साझा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।
यह रिपोर्ट 2025 में शुरू की गई “Pact for the Future” पहल के तहत UN सदस्य देशों के अनुरोध पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक चुनौतियों से निपटना है जैसे:
यदि इन सिफारिशों को व्यापक रूप से अपनाया गया, तो यह सरकारों की नीति निर्माण प्रक्रिया को बदल सकता है।
संभावित प्रभाव:
संयुक्त राष्ट्र का GDP से आगे बढ़ने का आह्वान वैश्विक आर्थिक सोच में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। आज जब दुनिया असमानता, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी बदलाव जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रही है, पारंपरिक मापदंड पर्याप्त नहीं रह गए हैं।
लोगों, पर्यावरण और समृद्धि पर केंद्रित एक अधिक व्यापक ढांचे की सिफारिश करके UN देशों को प्रगति मापने का अधिक संतुलित और यथार्थवादी तरीका अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश इसे कितनी प्रभावी ढंग से अपनाते और लागू करते हैं।