भारत में ऐसे हुई फ़िल्म इंडस्ट्री की शुरुआत, यादगार रहा पहला शो

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12 Jul 2021
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News Synopsis

फिल्में, बॉलीवुड, सिनेमा, ये सब हम सभी भारतीयों के लिए उत्साह और मनोरंजन का एक जरिया है। हम भारतीयों ने सिनेमा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है। ऐसा बिलकुल नही है कि फिल्मों को बस आज के युग के लोग देखना पसंद करते हैं और इसे आकर्षक पाते हैं, वास्तव में सिनेप्रेमी की परंपरा इसकी स्थापना के बाद से मौजूद थी। 

इतिहास में ऐसा कोई सबूत नहीं है जो सिनेमा के शुरुआती बिंदु के बारे में बताए लेकिन ऐसा माना जाता है कि फ़िल्मों को बनाने और भारत तक लाने वाले दो फ्रांसीसी भाई लुई और अगस्त लुमियर थे। यहां तक की इनकी कंपनी सिनेमैटोग्राफी का नाम आज तक फिल्म निर्माण के क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। भारत ने 1910 के दशक के अंत में पहली मूक फिल्म देखी, जिसका नाम "राजा हरिश्चंद्र" था। फिल्म को स्वर्गीय धुंडीराज गोविंद फाल्के ने पेश किया था। स्वर्गीय धुंडीराज गोविंद फाल्के को आज हम दादा साहब फाल्के के नाम से भी जानते हैं। भले ही यह एक मूक फिल्म थी, लेकिन दादा साहब फाल्के को इसका ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि वह एक ऐसी कला को जन्म दे रहे हैं,जिसकी आवाज दुनिया भर में गूंजेगी। उनकी पहल ने हमारे देश में कई फिल्म निर्माताओं के उदय को प्रेरित किया। भारतीय फिल्म निर्माता 1940 से 1960 दशक के समय को, जो ब्रिटिश राज के अंत के बाद का युग था, उसे "द गोल्डन एरा" कहते हैं। यह वह समय था जब सिनेमा अस्तित्व में आया और बंगाली फिल्म निर्माता जैसे ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और सत्यजीत रे और अन्य कई फिल्म निर्माताओं ने अपना पूर्ण योगदान फिल्म इंडस्ट्री को दिया।

आवाज रहित फिल्मों से लेकर आवाज़ वाली फिल्मों तक, बिना रंग वाले सिनेमा से लेकर अब रंगों से भरे सिनेमा तक, जीरो ग्राफिक्स से लेकर एनिमेशन तक, ये सारी चीज़ें फिल्म इंडस्ट्री के विकास का सबूत हैं।

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