भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित करने और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानूनी नियम बनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, यह याचिका इंदौर स्थित एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल की ओर से दायर की गई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 दिसंबर की तारीख तय की है। स्कूल और उसके निदेशक सिद्धार्थ सिंह ने बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए एक व्यापक नियामक व्यवस्था बनाने की मांग की है।
याचिका में केंद्र सरकार, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है। इस मामले के जरिए बच्चों की डिजिटल दुनिया तक पहुंच, उनकी सुरक्षा और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी से जुड़े कई अहम सवाल सामने आए हैं।
याचिका में एक निर्धारित उम्र से कम बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कानूनी रोक लगाने की मांग की गई है। इसके साथ ही, नाबालिगों के सोशल मीडिया खाते बनाने, उन्हें चलाने और उनका इस्तेमाल करने के लिए उम्र के आधार पर स्पष्ट नियम तैयार करने का अनुरोध किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए एक व्यवस्थित कानूनी ढांचा जरूरी है। उनके अनुसार, केवल सामान्य सुरक्षा नीतियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसे नियम होने चाहिए जो सभी सोशल मीडिया मंचों पर लागू हों और कम उम्र के उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए समान मानक तय करें।
इस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगने के न्यायालय के कदम से बच्चों की डिजिटल पहुंच और ऑनलाइन संरक्षण का मुद्दा न्यायिक विचार के दायरे में आया है। हालांकि, मामले का अंतिम परिणाम अदालत में पेश किए जाने वाले तर्कों और आगे जारी होने वाले निर्देशों पर निर्भर करेगा।
याचिका में बच्चों के ऑनलाइन शोषण को लेकर कई गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। इनमें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण और साइबर बुलिंग जैसे खतरे शामिल हैं। ऑनलाइन ग्रूमिंग में कोई व्यक्ति इंटरनेट के माध्यम से बच्चे का विश्वास जीतने की कोशिश करता है, ताकि बाद में उसका शोषण किया जा सके।
याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि बच्चे अपनी उम्र के लिहाज से अनुचित या नुकसानदायक सामग्री के संपर्क में आ सकते हैं। इसमें हिंसक सामग्री, यौन रूप से स्पष्ट सामग्री और खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या से जुड़ी सामग्री शामिल हो सकती है।
इसके अलावा, बच्चों की निजी तस्वीरों को उनकी अनुमति के बिना साझा करने या उनका इस्तेमाल करके उन्हें डराने और दबाव डालने का खतरा भी उठाया गया है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ऐसी घटनाएं बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और भावनात्मक विकास को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। उनका तर्क है कि किसी घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से ऐसे उपाय किए जाने चाहिए, जो बच्चों को इन खतरों से बचा सकें।
याचिका में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के संभावित प्रभावों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें चिंता, अवसाद, अपने शरीर की बनावट को लेकर असंतोष, खानपान से जुड़ी अस्वस्थ आदतें और नींद में बाधा जैसी समस्याओं पर ध्यान दिलाया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली चुनी हुई तस्वीरों और जीवनशैली से बच्चे अपनी तुलना दूसरों से करने लग सकते हैं। ऑनलाइन बातचीत और नुकसानदायक सामग्री का लगातार सामना करना भी उनके भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि ऑनलाइन अनुभवों से होने वाला नुकसान हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देता। कई बार समस्या का पता तब चलता है, जब बच्चे पर उसका गंभीर प्रभाव पड़ चुका होता है। इसलिए बच्चों की उम्र और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पहले से सुरक्षा उपाय अपनाना महत्वपूर्ण बताया गया है।
स्कूल और उसके निदेशक का कहना है कि तकनीकी कंपनियों की स्वैच्छिक सुरक्षा नीतियां, उनके आश्वासन और अभिभावकीय नियंत्रण बच्चों को ऑनलाइन खतरों से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अभिभावकीय नियंत्रण ऐसे विकल्प होते हैं, जिनकी मदद से माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों, सामग्री तक पहुंच और स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय को सीमित कर सकते हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इन उपायों से सभी जोखिमों को दूर नहीं किया जा सकता।
याचिका में व्यवहार संबंधी प्रोफाइलिंग पर भी चिंता जताई गई है। इसमें सोशल मीडिया मंच उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों और पसंद का विश्लेषण करते हैं। इसके अलावा, कुछ ऐसे डिजाइन फीचर भी चिंता का विषय हैं, जो लोगों को लंबे समय तक मंच पर सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसे तरीकों के कारण बच्चों के लिए अपने ऑनलाइन समय को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए वे सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने और नाबालिगों के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा तय करने की मांग कर रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यह घोषणा करने की भी मांग की है कि सोशल मीडिया से जुड़े खतरों से बच्चों को पर्याप्त सुरक्षा देने में सरकार की कथित विफलता मनमानी है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
याचिका में समानता के अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार तथा शिक्षा के अधिकार का उल्लेख किया गया है।
यह मामला इस सवाल को सामने लाता है कि बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच, उनके अधिकारों, व्यक्तिगत विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले पर होने वाली सुनवाई से सरकार की जिम्मेदारी और तकनीकी कंपनियों के दायित्वों पर व्यापक चर्चा को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, अभी न्यायालय ने केवल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में की गई मांगों को बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लागू हो चुकी पाबंदी नहीं माना जाना चाहिए।
भारत में यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर कंपनियों की कानूनी जवाबदेही की जांच बढ़ रही है।
रिपोर्ट में बताए गए एक अन्य मामले के अनुसार, अगस्त 2026 में न्यू मैक्सिको की एक अदालत ने फेसबुक और इंस्टाग्राम के युवा उपयोगकर्ताओं से जुड़े जोखिमों के दावों पर मेटा को कुल 942 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया। इस राशि में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को हुए नुकसान से संबंधित कथित तौर पर 567 मिलियन डॉलर का पुरस्कार और इससे पहले जूरी द्वारा लगाए गए 375 मिलियन डॉलर के नागरिक दंड शामिल थे।
यह मामला इस बात को दर्शाता है कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी, मंचों की डिजाइन व्यवस्था और सुरक्षा नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी निगरानी बढ़ रही है।
सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर अगली सुनवाई 7 दिसंबर को करेगा। केंद्र सरकार से जवाब मांगे जाने के बाद अदालत के सामने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल, न्यूनतम उम्र की सीमा और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों पर आगे विचार करने का अवसर होगा।
आने वाली सुनवाई में उम्र आधारित प्रतिबंधों, सोशल मीडिया खाते बनाने के नियमों और नुकसानदायक ऑनलाइन अनुभवों से बच्चों को बचाने के उपायों पर चर्चा हो सकती है।
फिलहाल, यह याचिका कानूनी हस्तक्षेप की मांग है, न कि देशभर में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लागू कोई प्रतिबंध। सरकार का जवाब और सर्वोच्च न्यायालय के आगे के निर्देश यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है।