भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य और उनके सामान्य विकास पर भी दिखाई दे रहा है। एक नए शोध के अनुसार, भारत में 0 से 9 वर्ष की आयु के करीब 145 मिलियन बच्चे, यानी इस आयु वर्ग के लगभग 61 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी के संपर्क में आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी और नमी का सामना करना छोटे बच्चों के लिए विशेष रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी की लहरें अधिक बार और अधिक गंभीर होती जा रही हैं। बच्चों का शरीर अत्यधिक गर्मी को नियंत्रित करने में वयस्कों की तुलना में अधिक कठिनाई महसूस कर सकता है। ऐसे में लगातार बढ़ता तापमान उनके स्वास्थ्य, शारीरिक विकास और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकता है।
व्रीजे यूनिवर्सिटीट ब्रुसेल (VUB) Vrije Universiteit Brussel (VUB) के नेतृत्व में किए गए नए अंतरराष्ट्रीय शोध में भारत और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों के बढ़ते गर्मी जोखिम का अध्ययन किया गया है। शोध में विभिन्न तापमान वृद्धि की स्थितियों के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई है कि भविष्य में बच्चों पर गर्मी का प्रभाव कितना बढ़ सकता है।
शोध के अनुसार, भारत में अभी करीब 145 मिलियन बच्चे, यानी 0 से 9 वर्ष की आयु के लगभग 61 प्रतिशत बच्चे, हर वर्ष कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी के संपर्क में आते हैं। यह स्थिति बच्चों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि उनके शरीर में अत्यधिक गर्मी से निपटने की क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान समय में भारत में 10 वर्ष से कम उम्र के लगभग हर दो में से एक बच्चा साल में कम से कम पांच महीने खतरनाक गर्मी का अनुभव करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
VUB के नेतृत्व वाली शोध टीम के अनुसार, जलवायु परिवर्तन ने 0 से 9 वर्ष के उन बच्चों की संख्या को लगभग दोगुना कर दिया है, जो हर साल कम से कम पांच महीने खतरनाक गर्मी के तनाव का सामना करते हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पहले ऐसे बच्चों की संख्या करीब 59 मिलियन थी। अब यह संख्या बढ़कर लगभग 118 मिलियन हो गई है। इसका मतलब है कि भारत में 0 से 9 वर्ष की आयु के लगभग 50 प्रतिशत बच्चे हर साल कुल पांच महीने तक खतरनाक गर्मी के संपर्क में आ सकते हैं।
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि बढ़ता तापमान बच्चों के लिए एक लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है।
शोध में भविष्य की अलग-अलग तापमान वृद्धि की स्थितियों का भी आकलन किया गया है। यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो भारत में करीब 166 मिलियन बच्चे, यानी 0 से 9 वर्ष के लगभग 74 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव का सामना कर सकते हैं।
इसी स्थिति में लगभग 123 मिलियन बच्चे, यानी करीब 55 प्रतिशत बच्चे, साल में कुल कम से कम पांच महीने या लगभग 150 दिनों तक गर्मी के तनाव के संपर्क में रह सकते हैं।
यह अनुमान बताता है कि तापमान में अपेक्षाकृत सीमित अतिरिक्त वृद्धि भी बच्चों के लिए गर्मी से जुड़े जोखिम को काफी बढ़ा सकती है।
यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। शोध के अनुमान के अनुसार, भारत में 0 से 9 वर्ष की आयु के करीब 169 मिलियन बच्चे, यानी लगभग 96 प्रतिशत बच्चे, हर वर्ष कम से कम एक अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव का सामना कर सकते हैं।
वहीं करीब 120 मिलियन बच्चे, यानी इस आयु वर्ग के लगभग 68 प्रतिशत बच्चे, साल में कुल पांच महीने तक गर्मी के तनाव के संपर्क में आ सकते हैं।
ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ बच्चों के लिए अत्यधिक गर्मी का खतरा तेजी से बढ़ सकता है।
गर्मी से जुड़ी यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। शोध के अनुसार, वर्तमान में दुनिया भर में 560 मिलियन तक बच्चे, यानी 0 से 9 वर्ष की आयु के करीब 43 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी के संपर्क में आते हैं।
यह आंकड़ा अन्य आयु समूहों की तुलना में काफी अधिक है। उदाहरण के लिए, 60 से 69 वर्ष की आयु के करीब 190 मिलियन लोग, यानी लगभग 30 प्रतिशत लोग, इस तरह के स्वास्थ्य जोखिम का सामना कर रहे हैं।
इस तुलना से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी का प्रभाव बच्चों पर उनकी उम्र के कारण असमान रूप से अधिक पड़ रहा है।
छोटे बच्चों का शरीर अभी विकास की प्रक्रिया में होता है। अत्यधिक गर्मी और नमी के लंबे समय तक संपर्क में रहने से उनके लिए शरीर का तापमान सामान्य बनाए रखना कठिन हो सकता है।
लगातार गर्म मौसम बच्चों की नींद, आराम, पढ़ाई और रोजमर्रा की गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक गर्मी का संपर्क उनके स्वास्थ्य और विकास के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने से यह समस्या भविष्य में और गंभीर होने की आशंका है।
शोधकर्ताओं ने वैश्विक स्तर पर भी भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाया है। यदि दुनिया का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है, तो 0 से 9 वर्ष के करीब 620 मिलियन बच्चे, यानी लगभग 49 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी के संपर्क में आ सकते हैं।
वहीं 2 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की स्थिति में प्रभावित बच्चों की संख्या बढ़कर करीब 650 मिलियन हो सकती है। यह इस आयु वर्ग के लगभग 59 प्रतिशत बच्चों के बराबर होगी।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि मौजूदा नीतियों के तहत उत्सर्जन में पर्याप्त कमी नहीं आती है, तो इन तापमान सीमाओं के पार जाने की संभावना काफी अधिक है।
इस अध्ययन में केवल तापमान के आंकड़ों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। शोधकर्ताओं ने जनसंख्या संबंधी आंकड़ों, उन्नत जलवायु मॉडल और जलवायु-आधारित विश्लेषण को एक साथ जोड़ा है।
जलवायु संबंधी विश्लेषण से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी अत्यधिक मौसम की घटना में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी है। इस तरीके से शोधकर्ताओं ने बच्चों पर पड़ रहे गर्मी के प्रभाव को वर्तमान और भविष्य की अलग-अलग परिस्थितियों से जोड़कर देखा।
अध्ययन यह भी दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम पहले से मौजूद हैं और उनका प्रभाव सभी पीढ़ियों तथा सभी क्षेत्रों पर एक जैसा नहीं है।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों को बढ़ती गर्मी से बचाने के लिए जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। अत्यधिक गर्मी के दिनों में बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त पानी, छायादार स्थान और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसके साथ ही, लंबे समय में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना और तापमान वृद्धि को सीमित करना जरूरी होगा। बच्चों की सुरक्षा को जलवायु नीतियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना भी आवश्यक है।
भारत के करोड़ों बच्चों पर बढ़ता गर्मी का खतरा जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव की गंभीर तस्वीर पेश करता है। वर्तमान में ही करीब 145 मिलियन भारतीय बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी के संपर्क में आ रहे हैं। वहीं पांच महीने तक गर्मी का सामना करने वाले बच्चों की संख्या भी जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग दोगुनी होकर 118 मिलियन तक पहुंच गई है।
भविष्य में तापमान वृद्धि के साथ यह जोखिम और बढ़ सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या मानने के बजाय इसे बच्चों के स्वास्थ्य, विकास और भविष्य से जुड़ी चुनौती के रूप में देखना जरूरी है। समय रहते प्रभावी जलवायु कार्रवाई और बच्चों के लिए बेहतर सुरक्षा उपाय अपनाना आने वाली पीढ़ियों को अत्यधिक गर्मी के बढ़ते खतरे से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।