महंगाई पर RBI का सख्त रुख, रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी

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08 Oct 2026
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News Synopsis

भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दर रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की है। इस बढ़ोतरी के बाद रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गया है। इस फैसले के साथ केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी के एक नए दौर की शुरुआत के संकेत दिए हैं।

यह निर्णय RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की ताजा बैठक में लिया गया। समिति ने बदलती आर्थिक परिस्थितियों, महंगाई से जुड़े जोखिमों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में हो रहे बदलावों का आकलन करने के बाद यह फैसला किया।

यह कदम RBI की अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा से अलग है। अगस्त में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा था और अपनी नीति का रुख तटस्थ बनाए रखा था। अब रेपो रेट बढ़ाने के साथ नीति का रुख भी बदल दिया गया है।

MPC ने नीति का रुख ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ किया MPC Changes Policy Stance to Calibrated Tightening

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा RBI Governor Sanjay Malhotra ने बताया कि मौद्रिक नीति समिति ने बदलते व्यापक आर्थिक और वित्तीय माहौल की समीक्षा के बाद रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी को सर्वसम्मति से मंजूरी दी।

महंगाई पर नियंत्रण के लिए सख्त रुख A Tighter Stance to Control Inflation

रेपो रेट बढ़ाने के साथ MPC ने अपनी नीति के रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी धीरे-धीरे सख्त किए जाने वाले रुख में बदल दिया। इस बदलाव को समिति के अधिकांश सदस्यों का समर्थन मिला।

नीति रुख में यह बदलाव संकेत देता है कि RBI अब उभरते महंगाई दबाव को नियंत्रित करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहता है। साथ ही, केंद्रीय बैंक वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक विकास की गति पर भी नजर रखेगा।

अन्य प्रमुख नीतिगत दरों में भी बढ़ोतरी Other Key Policy Rates Also Increase

रेपो रेट में बदलाव के बाद RBI से जुड़ी दूसरी प्रमुख ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की गई है।

स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट अब 5.25% हो गई है। वहीं मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट और बैंक रेट को बढ़ाकर 5.75% कर दिया गया है।

बैंकिंग व्यवस्था की तरलता पर असर Impact on Banking System Liquidity

इन दरों का असर बैंकिंग व्यवस्था में उपलब्ध धन यानी तरलता (Liquidity) पर पड़ता है। साथ ही, इनसे यह भी प्रभावित होता है कि बैंक RBI से कितनी लागत पर धन प्राप्त कर सकते हैं या केंद्रीय बैंक के पास अतिरिक्त धन रखने पर उन्हें क्या दर मिलती है।

इसलिए इन दरों में बदलाव का असर आगे चलकर बैंकिंग और ऋण बाजार पर भी दिखाई दे सकता है।

बढ़ती महंगाई ने RBI के फैसले को प्रभावित किया Rising Inflation Risks Influence RBI Decision

RBI के ताजा फैसले के पीछे महंगाई एक प्रमुख कारण मानी जा रही है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.82% पहुंच गई।

FY27 में महंगाई 5% से ऊपर जाने का अनुमान Inflation Could Rise Above 5% in FY27

अर्थशास्त्रियों और विभिन्न शोध रिपोर्टों ने वित्त वर्ष 2026-27 यानी FY27 में महंगाई के 5% से ऊपर जाने की संभावना जताई है।

महंगाई में संभावित बढ़ोतरी ने कीमतों पर दबाव को लेकर चिंता बढ़ाई है। ऐसे में RBI की ओर से रेपो रेट बढ़ाने का फैसला महंगाई को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने से रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती यह है कि वह महंगाई को नियंत्रित करे, लेकिन ऐसा करते समय आर्थिक गतिविधियों पर जरूरत से ज्यादा दबाव न पड़े।

वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां भी बनीं चिंता Global Financial Conditions Remain Challenging

RBI के फैसले पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में होने वाले बदलावों का भी असर पड़ा है। वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में बदलाव का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की वित्तीय परिस्थितियों पर पड़ सकता है।

अमेरिका में ब्याज दर और बॉन्ड यील्ड ऊंची US Rates and Bond Yields Remain Elevated

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सितंबर में अपनी नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी। इसके अलावा, 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की यील्ड करीब 5.3% के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।

अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और बॉन्ड यील्ड दुनिया भर में पूंजी के प्रवाह, मुद्रा बाजार और घरेलू वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए RBI को अपनी मौद्रिक नीति तय करते समय बाहरी वित्तीय दबावों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ी तरलता भी बड़ी चिंता Liquidity Conditions Become Another Key Concern

देश में बैंकिंग व्यवस्था की तरलता भी RBI के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। RBI की विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा के तहत 31 अगस्त तक FCNR(B) जमा के माध्यम से 132.98 अरब डॉलर की राशि जुटाई गई थी।

अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करना जरूरी Managing Excess Liquidity Becomes Important

इससे बैंकिंग व्यवस्था में पर्याप्त तरलता उपलब्ध हुई है। हालांकि, व्यवस्था में धन की मात्रा बढ़ने के कारण RBI को इसे संतुलित रखने के लिए कैलिब्रेटेड एब्जॉर्प्शन यानी अतिरिक्त तरलता को धीरे-धीरे सोखने के उपाय करने की जरूरत पड़ सकती है।

नए सख्ती वाले मौद्रिक नीति दौर में अतिरिक्त तरलता का प्रबंधन RBI की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था ने अब तक दिखाई मजबूती Indian Economy Continues to Show Resilience

महंगाई और वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की घरेलू गतिविधियां अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था ने FY27 की पहली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा, कई हाई-फ्रीक्वेंसी आर्थिक संकेतकों ने घरेलू मांग में लगातार मजबूती की ओर इशारा किया।

विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से मिला सहारा Manufacturing and Services Support Growth

विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां भी मजबूत बनी हुई हैं। इससे देश की समग्र आर्थिक वृद्धि को समर्थन मिल रहा है।

घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती RBI को महंगाई पर ज्यादा ध्यान देने की गुंजाइश देती है। हालांकि, केंद्रीय बैंक को यह भी देखना होगा कि बढ़ती ब्याज दरों का असर लोगों के खर्च, निवेश और कारोबार पर कितना पड़ता है।

RBI के सामने महंगाई और विकास के बीच संतुलन की चुनौती RBI Balances Inflation and Growth

ताजा रेपो रेट बढ़ोतरी RBI की दो प्रमुख प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाती है। एक तरफ केंद्रीय बैंक को महंगाई को नियंत्रित करना है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति को भी बनाए रखना है।

ऊंची ब्याज दरों का कर्ज पर असर Impact of Higher Rates on Borrowing

ब्याज दर बढ़ने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घरों और कारोबारों की उधारी, खर्च और निवेश पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, ऊंची ब्याज दरें मांग को नियंत्रित करके महंगाई को कम करने में मदद कर सकती हैं।

इसी कारण RBI के लिए ब्याज दरों में बदलाव एक संतुलन का विषय है। आगे के फैसले महंगाई के आंकड़ों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों, बैंकिंग व्यवस्था की तरलता और घरेलू आर्थिक गतिविधियों की मजबूती पर निर्भर कर सकते हैं।

रेपो रेट बढ़ोतरी से बदला RBI का नीतिगत रुख Rate Hike Marks a Policy Shift

25 बेसिस प्वाइंट की यह बढ़ोतरी RBI के पहले के वेट एंड वॉच यानी इंतजार करके स्थिति देखने वाले रुख से महत्वपूर्ण बदलाव है। महंगाई के बढ़ते जोखिम और चुनौतीपूर्ण वैश्विक वित्तीय माहौल के बीच केंद्रीय बैंक ने अब अधिक सावधानी वाला मौद्रिक नीति रुख अपनाया है।

आने वाले समय में बाजार, बैंक और कर्ज लेने वाले लोग RBI के अगले संकेतों पर नजर रखेंगे। खास तौर पर महंगाई की दिशा और आर्थिक विकास की गति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि आगे ब्याज दरों का रुख कैसा रहता है।

नए रेट-हाइक साइकिल की शुरुआत के साथ अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RBI आने वाली नीतिगत बैठकों में कितनी तेजी से और कितनी मात्रा में ब्याज दरों में बदलाव करता है। फिलहाल केंद्रीय बैंक का मुख्य लक्ष्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए अर्थव्यवस्था की मजबूती को बनाए रखना है।

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