भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दर रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की है। इस बढ़ोतरी के बाद रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गया है। इस फैसले के साथ केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी के एक नए दौर की शुरुआत के संकेत दिए हैं।
यह निर्णय RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की ताजा बैठक में लिया गया। समिति ने बदलती आर्थिक परिस्थितियों, महंगाई से जुड़े जोखिमों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में हो रहे बदलावों का आकलन करने के बाद यह फैसला किया।
यह कदम RBI की अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा से अलग है। अगस्त में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा था और अपनी नीति का रुख तटस्थ बनाए रखा था। अब रेपो रेट बढ़ाने के साथ नीति का रुख भी बदल दिया गया है।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा RBI Governor Sanjay Malhotra ने बताया कि मौद्रिक नीति समिति ने बदलते व्यापक आर्थिक और वित्तीय माहौल की समीक्षा के बाद रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी को सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
रेपो रेट बढ़ाने के साथ MPC ने अपनी नीति के रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी धीरे-धीरे सख्त किए जाने वाले रुख में बदल दिया। इस बदलाव को समिति के अधिकांश सदस्यों का समर्थन मिला।
नीति रुख में यह बदलाव संकेत देता है कि RBI अब उभरते महंगाई दबाव को नियंत्रित करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहता है। साथ ही, केंद्रीय बैंक वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक विकास की गति पर भी नजर रखेगा।
रेपो रेट में बदलाव के बाद RBI से जुड़ी दूसरी प्रमुख ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की गई है।
स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट अब 5.25% हो गई है। वहीं मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट और बैंक रेट को बढ़ाकर 5.75% कर दिया गया है।
इन दरों का असर बैंकिंग व्यवस्था में उपलब्ध धन यानी तरलता (Liquidity) पर पड़ता है। साथ ही, इनसे यह भी प्रभावित होता है कि बैंक RBI से कितनी लागत पर धन प्राप्त कर सकते हैं या केंद्रीय बैंक के पास अतिरिक्त धन रखने पर उन्हें क्या दर मिलती है।
इसलिए इन दरों में बदलाव का असर आगे चलकर बैंकिंग और ऋण बाजार पर भी दिखाई दे सकता है।
RBI के ताजा फैसले के पीछे महंगाई एक प्रमुख कारण मानी जा रही है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.82% पहुंच गई।
अर्थशास्त्रियों और विभिन्न शोध रिपोर्टों ने वित्त वर्ष 2026-27 यानी FY27 में महंगाई के 5% से ऊपर जाने की संभावना जताई है।
महंगाई में संभावित बढ़ोतरी ने कीमतों पर दबाव को लेकर चिंता बढ़ाई है। ऐसे में RBI की ओर से रेपो रेट बढ़ाने का फैसला महंगाई को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने से रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती यह है कि वह महंगाई को नियंत्रित करे, लेकिन ऐसा करते समय आर्थिक गतिविधियों पर जरूरत से ज्यादा दबाव न पड़े।
RBI के फैसले पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में होने वाले बदलावों का भी असर पड़ा है। वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में बदलाव का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की वित्तीय परिस्थितियों पर पड़ सकता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सितंबर में अपनी नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी। इसके अलावा, 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की यील्ड करीब 5.3% के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।
अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और बॉन्ड यील्ड दुनिया भर में पूंजी के प्रवाह, मुद्रा बाजार और घरेलू वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए RBI को अपनी मौद्रिक नीति तय करते समय बाहरी वित्तीय दबावों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
देश में बैंकिंग व्यवस्था की तरलता भी RBI के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। RBI की विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा के तहत 31 अगस्त तक FCNR(B) जमा के माध्यम से 132.98 अरब डॉलर की राशि जुटाई गई थी।
इससे बैंकिंग व्यवस्था में पर्याप्त तरलता उपलब्ध हुई है। हालांकि, व्यवस्था में धन की मात्रा बढ़ने के कारण RBI को इसे संतुलित रखने के लिए कैलिब्रेटेड एब्जॉर्प्शन यानी अतिरिक्त तरलता को धीरे-धीरे सोखने के उपाय करने की जरूरत पड़ सकती है।
नए सख्ती वाले मौद्रिक नीति दौर में अतिरिक्त तरलता का प्रबंधन RBI की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।
महंगाई और वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की घरेलू गतिविधियां अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था ने FY27 की पहली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा, कई हाई-फ्रीक्वेंसी आर्थिक संकेतकों ने घरेलू मांग में लगातार मजबूती की ओर इशारा किया।
विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां भी मजबूत बनी हुई हैं। इससे देश की समग्र आर्थिक वृद्धि को समर्थन मिल रहा है।
घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती RBI को महंगाई पर ज्यादा ध्यान देने की गुंजाइश देती है। हालांकि, केंद्रीय बैंक को यह भी देखना होगा कि बढ़ती ब्याज दरों का असर लोगों के खर्च, निवेश और कारोबार पर कितना पड़ता है।
ताजा रेपो रेट बढ़ोतरी RBI की दो प्रमुख प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाती है। एक तरफ केंद्रीय बैंक को महंगाई को नियंत्रित करना है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति को भी बनाए रखना है।
ब्याज दर बढ़ने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घरों और कारोबारों की उधारी, खर्च और निवेश पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, ऊंची ब्याज दरें मांग को नियंत्रित करके महंगाई को कम करने में मदद कर सकती हैं।
इसी कारण RBI के लिए ब्याज दरों में बदलाव एक संतुलन का विषय है। आगे के फैसले महंगाई के आंकड़ों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों, बैंकिंग व्यवस्था की तरलता और घरेलू आर्थिक गतिविधियों की मजबूती पर निर्भर कर सकते हैं।
25 बेसिस प्वाइंट की यह बढ़ोतरी RBI के पहले के वेट एंड वॉच यानी इंतजार करके स्थिति देखने वाले रुख से महत्वपूर्ण बदलाव है। महंगाई के बढ़ते जोखिम और चुनौतीपूर्ण वैश्विक वित्तीय माहौल के बीच केंद्रीय बैंक ने अब अधिक सावधानी वाला मौद्रिक नीति रुख अपनाया है।
आने वाले समय में बाजार, बैंक और कर्ज लेने वाले लोग RBI के अगले संकेतों पर नजर रखेंगे। खास तौर पर महंगाई की दिशा और आर्थिक विकास की गति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि आगे ब्याज दरों का रुख कैसा रहता है।
नए रेट-हाइक साइकिल की शुरुआत के साथ अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RBI आने वाली नीतिगत बैठकों में कितनी तेजी से और कितनी मात्रा में ब्याज दरों में बदलाव करता है। फिलहाल केंद्रीय बैंक का मुख्य लक्ष्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए अर्थव्यवस्था की मजबूती को बनाए रखना है।