रक्षा बंधन 2026 से पहले भारत के राखी बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बार ग्राहकों के बीच स्थानीय स्तर पर बनी, हाथ से तैयार और अलग-अलग थीम वाली राखियों की मांग बढ़ रही है। व्यापारियों के अनुमान के अनुसार, इस साल देश का राखी कारोबार करीब ₹25,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा त्योहार से पहले बाजार में मजबूत खरीदारी और बढ़ती उपभोक्ता मांग को दर्शाता है।
रक्षा बंधन के साथ जुड़े व्यापक त्योहारी बाजार का आकार भी काफी बड़ा है। इसमें मिठाई, उपहार, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्राई फ्रूट्स जैसी वस्तुएं शामिल हैं। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) Confederation of All India Traders (CAIT) के हवाले से PTI की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी श्रेणियों को मिलाकर त्योहारी कारोबार ₹30,000 करोड़ से अधिक हो सकता है।
इस बार खास बात यह है कि पारंपरिक राखियों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, देशभक्ति और सामाजिक संदेशों से जुड़ी राखियां भी बाजार में अपनी जगह बना रही हैं। इससे राखी का बाजार केवल एक पारंपरिक त्योहार से जुड़ा कारोबार न रहकर स्थानीय उत्पादन, हस्तशिल्प और महिला उद्यमिता के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर बनता जा रहा है।
28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षा बंधन से पहले दिल्ली सहित देश के प्रमुख बाजारों में खरीदारी तेज हो गई है। चांदनी चौक, सदर बाजार, करोल बाग, लाजपत नगर और राजौरी गार्डन जैसे प्रमुख बाजारों में राखियों की मांग बढ़ रही है।
पारंपरिक डिजाइन वाली राखियां अभी भी ग्राहकों की पसंद बनी हुई हैं, लेकिन इसके साथ बाजार में नए प्रयोग भी दिखाई दे रहे हैं। ग्राहक ऐसी राखियां खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं जिनमें भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक संदेशों को शामिल किया गया है।
इस साल बाजार में कई तरह की थीम आधारित राखियां देखने को मिल रही हैं। इनमें विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, नारी वंदन, लखपति दीदी, ब्रह्मोस और राष्ट्र रक्षा सूत्र जैसी थीम प्रमुख हैं।
इन राखियों ने पारंपरिक रक्षा सूत्र को एक नया रूप दिया है। अलग-अलग संदेशों और डिजाइन के कारण ग्राहक अपनी पसंद तथा भावनाओं के अनुरूप राखी चुन सकते हैं। दुकानदारों के लिए भी ये उत्पाद बाजार में अलग पहचान बनाने का माध्यम बन रहे हैं।
राखी की बढ़ती मांग को पूरा करने में महिला उद्यमियों और पारंपरिक कारीगरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। दिल्ली और आसपास के राज्यों के बाजारों के लिए महिलाओं के समूह बड़ी संख्या में हाथ से राखियां तैयार कर रहे हैं।
कई महिला उत्पादकों के लिए राखी बनाना त्योहार के मौसम में अतिरिक्त घरेलू आय अर्जित करने का अवसर भी है। छोटे स्तर पर घर से उत्पादन शुरू करके महिलाएं स्थानीय दुकानदारों और थोक विक्रेताओं को राखियां उपलब्ध करा रही हैं।
कुछ महिला उत्पादक समूहों द्वारा साझा जानकारी के अनुसार, एक राखी तैयार करने की लागत लगभग ₹3 से ₹4 तक हो सकती है। इन्हें बाजार में करीब ₹6 से ₹7 में आपूर्ति किया जा सकता है, जबकि डिजाइन और इस्तेमाल की गई सामग्री के आधार पर खुदरा कीमत लगभग ₹10 या उससे अधिक हो सकती है।
यह मॉडल छोटे उत्पादकों के लिए उपयोगी है क्योंकि उन्हें राखी बनाने के लिए बड़े कारखाने या भारी निवेश की आवश्यकता नहीं होती। घर या छोटे कार्यस्थल से भी उत्पादन किया जा सकता है।
स्वदेशी उत्पादों की बढ़ती मांग ने भारत की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को राखी बाजार में नई जगह दी है। देश के अलग-अलग हिस्सों के कारीगर स्थानीय सामग्री और क्षेत्रीय कला शैलियों का इस्तेमाल करके राखियां तैयार कर रहे हैं।
इससे ग्राहकों को सामान्य बाजार में मिलने वाली राखियों के अलावा कई अनोखे विकल्प मिल रहे हैं। साथ ही, पारंपरिक कारीगरों को अपनी कला के लिए एक अतिरिक्त बाजार भी मिल रहा है।
इस साल बाजार में कई क्षेत्रीय शैलियों वाली राखियां उपलब्ध हैं, जैसे:
ये राखियां रक्षा बंधन की पारंपरिक भावना को भारत की समृद्ध हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विविधता के साथ जोड़ती हैं।
व्यापारियों का कहना है कि भारतीय बाजार में चीन में बनी राखियों की मौजूदगी में कमी आई है। CAIT के प्रतिनिधियों ने इस बदलाव को आंशिक रूप से 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद बदले उपभोक्ता रुझान से जोड़ा है।
स्थानीय और भारतीय उत्पादों पर बढ़ते जोर से घरेलू निर्माताओं, कारीगरों और छोटे कारोबारियों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। यह बदलाव भारतीय हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादन से जुड़े उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती रुचि को भी दिखाता है।
भारतीय निर्मित राखियों की बढ़ती मांग का असर केवल रक्षा बंधन के बाजार तक सीमित नहीं है। स्थानीय उत्पादों की अधिक बिक्री से छोटे दुकानदारों, घरेलू उत्पादकों, स्वयं सहायता समूहों और कारीगरों को अतिरिक्त व्यापारिक अवसर मिल सकते हैं।
इससे निर्माता नए डिजाइन और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री के साथ प्रयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित हो सकते हैं। ग्राहकों के लिए हस्तनिर्मित और क्षेत्रीय राखियां बड़े पैमाने पर तैयार की गई सामान्य राखियों का एक अलग और आकर्षक विकल्प बन रही हैं।
राखी बनाने वाले कई महिला समूहों के लिए यह कारोबार घरेलू आय बढ़ाने का माध्यम बन गया है। रक्षा बंधन से पहले कुछ सप्ताह तक बड़े पैमाने पर उत्पादन करके ये समूह बाजार की मौसमी मांग को पूरा करते हैं।
कई कारीगर केवल राखियां ही नहीं बनाते, बल्कि पूरे साल अलग-अलग त्योहारों के लिए दीये, सजावटी लाइटें और घरेलू सजावट की वस्तुएं भी तैयार करते हैं। इससे उनकी कला और कौशल का इस्तेमाल अलग-अलग मौसमों में किया जा सकता है और किसी एक उत्पाद पर निर्भरता कम होती है।
हाथ से बनी और स्थानीय राखियों की बढ़ती लोकप्रियता से स्वयं सहायता समूहों (SHGs) तथा महिला-नेतृत्व वाले छोटे उद्यमों के लिए भी अवसर बढ़ रहे हैं।
ये समूह सीधे दुकानदारों और बाजारों से जुड़कर अपने उत्पाद बेच सकते हैं। इससे पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पाद बड़े ग्राहक वर्ग तक पहुंच सकते हैं। साथ ही, यह भारत की त्योहारी अर्थव्यवस्था में छोटे उत्पादकों की भागीदारी को बढ़ाने में मदद कर सकता है।
करीब ₹25,000 करोड़ के अनुमानित राखी कारोबार से पता चलता है कि रक्षा बंधन का व्यावसायिक बाजार कितना बड़ा हो चुका है। लेकिन इस बार बाजार में केवल कारोबार का विस्तार ही नहीं, बल्कि ग्राहकों की पसंद में बदलाव भी दिखाई दे रहा है।
थीम आधारित राखियां, क्षेत्रीय हस्तशिल्प और हाथ से तैयार उत्पाद दुकानदारों को अलग-अलग ग्राहक वर्गों तक पहुंचने में मदद कर रहे हैं। ऐसे उत्पाद त्योहार के पारंपरिक महत्व के साथ-साथ व्यक्तिगत पसंद और भावनाओं को भी व्यक्त करने का अवसर देते हैं।
त्योहार नजदीक आने के साथ बाजारों में खरीदारी और बढ़ने की उम्मीद है। पारंपरिक राखियों के साथ स्वदेशी, हस्तनिर्मित, क्षेत्रीय और थीम आधारित उत्पाद बाजार को विविध बनाए रखेंगे।
अगर मांग मजबूत बनी रहती है, तो रक्षा बंधन का यह सीजन खुदरा व्यापारियों, कारीगरों, महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और छोटे कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण मौसमी अवसर पैदा कर सकता है।
रक्षा बंधन 2026 के दौरान भारत के राखी बाजार में स्वदेशी, हस्तनिर्मित और क्षेत्रीय डिजाइन वाली राखियों की मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। करीब ₹25,000 करोड़ के राखी कारोबार का अनुमान इस त्योहार के बड़े आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है।
विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्र रक्षा जैसी थीम वाली राखियों के साथ नागपुर की खादी, पुणे की बीज, असम की चाय-पत्ती और बिहार की मधुबनी कला जैसी क्षेत्रीय राखियां भी बाजार में अपनी जगह बना रही हैं। इससे स्थानीय कारीगरों और महिला उद्यमियों को नए अवसर मिल रहे हैं।
स्वदेशी राखियों की बढ़ती लोकप्रियता केवल उपभोक्ता पसंद में बदलाव नहीं है, बल्कि यह स्थानीय उत्पादन, महिला आय, पारंपरिक हस्तशिल्प और छोटे व्यवसायों को मजबूत करने वाली प्रवृत्ति के रूप में भी सामने आ रही है। यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है, तो रक्षा बंधन जैसे त्योहार भारत की स्थानीय और हस्तशिल्प आधारित अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।