टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और कंपनी की भविष्य की संरचना को लेकर चल रहा मतभेद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड के सामने दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखने की पहल की है। इनमें पहला प्रस्ताव कंपनी के पुनर्गठन से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से बचाने का विकल्प तलाशना है। वहीं, दूसरे प्रस्ताव के तहत शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप को लगभग ₹25,000 करोड़ की नकदी उपलब्ध कराने की योजना है।
नोएल टाटा ने टाटा संस के कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि इन दोनों प्रस्तावों को 26 नवंबर को होने वाली बोर्ड बैठक के एजेंडे में शामिल किया जाए। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व के बीच कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है।
इससे पहले रविवार को नोएल टाटा और टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के बीच बैठक हुई थी। इसका उद्देश्य समूह के भीतर चल रहे मतभेदों को सुलझाना था, लेकिन बातचीत से कोई ठोस समाधान निकलता दिखाई नहीं दिया।
टाटा संस के भविष्य और नेतृत्व से जुड़े फैसलों को लेकर कंपनी के भीतर मतभेद सामने आए हैं। इन मतभेदों का एक प्रमुख मुद्दा एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव रहा है।
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन Tata Sons Chairman N. Chandrasekaran के लिए पूरे पांच साल का नया कार्यकाल प्रस्तावित किया गया था। हालांकि, नोएल टाटा ने इस विस्तार पर अपनी असहमति जताई थी। इसके बावजूद 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में उनके विरोध को स्वीकार नहीं किया गया और कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई।
इस घटनाक्रम के बाद कंपनी के नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर मतभेद और स्पष्ट हो गए। अब नोएल टाटा की ओर से पुनर्गठन और SP ग्रुप को भुगतान से जुड़े प्रस्तावों को औपचारिक रूप से बोर्ड के सामने रखने की मांग को इसी व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।
नोएल टाटा Noel Tata के पहले प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य टाटा संस की मौजूदा संरचना में बदलाव करके ऐसा रास्ता तलाशना है, जिससे कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की जरूरत न पड़े।
अपने पत्र में नोएल टाटा ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उस फैसले का उल्लेख किया है, जिसमें केंद्रीय बैंक ने टाटा संस को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) का दर्जा छोड़ने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। RBI ने कंपनी को सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश भी दिया है।
इसके अलावा, उन्होंने 28 सितंबर को टाटा ट्रस्ट्स की ओर से भेजे गए पत्र का हवाला दिया। टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने कंपनी और उसके निदेशकों से पुनर्गठन के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने को कहा था।
पहले दिए गए पुनर्गठन प्रस्ताव में Tata Electronics Systems Solutions Private Limited और Tata Consulting Engineers का टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड के साथ विलय करने का सुझाव दिया गया था।
नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि इस बदलाव से टाटा संस को उसके पुराने कारोबारी ढांचे के करीब लाया जा सकेगा। प्रस्तावित व्यवस्था में कंपनी अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से सीधे आय अर्जित कर सकेगी और साथ ही पूरे टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी की भूमिका भी निभाती रहेगी।
इस योजना का एक उद्देश्य टाटा संस को RBI की उस पुरानी श्रेणी के अनुरूप लाना भी है, जिसके तहत 2004 के बाद कंपनी को गैर-बैंकिंग और गैर-वित्तीय कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
हालांकि, पुनर्गठन की इस योजना को टाटा संस के सभी वरिष्ठ सदस्यों का समर्थन नहीं मिला है। टाटा संस के वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन ने प्रस्ताव की अधिक विस्तार से समीक्षा करने की जरूरत बताई है। वे सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट से भी जुड़े हुए हैं।
इससे स्पष्ट है कि प्रस्ताव को लागू करने से पहले कंपनी के भीतर इसके कानूनी, वित्तीय और कारोबारी प्रभावों पर व्यापक विचार-विमर्श करना होगा।
नोएल टाटा का दूसरा प्रस्ताव शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप को वित्तीय राहत देने से संबंधित है। SP ग्रुप के पास टाटा संस की लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी है। फिलहाल यह समूह वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है और उसे नकदी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा गया है।
17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने चुनिंदा पूंजी कटौती (Selective Capital Reduction) का विकल्प सुझाया था। इस व्यवस्था के माध्यम से SP ग्रुप को लगभग ₹25,000 करोड़ उपलब्ध कराए जा सकते हैं। अब अपने नए पत्र में उन्होंने इस प्रस्ताव पर औपचारिक चर्चा और मतदान कराने की मांग की है।
प्रस्तावित योजना के तहत टाटा संस, SP ग्रुप के कुछ शेयर खरीदेगी और फिर उन शेयरों को रद्द कर देगी। कितने शेयर खरीदे और रद्द किए जाएंगे, इसकी गणना इस तरह की जाएगी कि SP ग्रुप को कुल ₹25,000 करोड़ की राशि मिल सके।
इस प्रस्ताव के अनुसार, शेयरों की खरीद और उन्हें रद्द करने की प्रक्रिया 18 महीनों की अवधि में दो चरणों में पूरी की जाएगी। इसका उद्देश्य SP ग्रुप को जरूरी नकदी उपलब्ध कराना है। साथ ही, इस कदम से टाटा संस के शेयरधारकों के बीच हिस्सेदारी का अनुपात भी बदल सकता है।
हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि टाटा संस का बोर्ड इस प्रस्ताव को मंजूरी देगा या नहीं। इसके लिए बोर्ड की सहमति और प्रस्ताव के सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी होगा।
टाटा संस की 26 नवंबर को होने वाली बोर्ड बैठक कंपनी के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। इस बैठक में यह तय होना है कि नोएल टाटा के दोनों प्रस्तावों को औपचारिक रूप से चर्चा के लिए स्वीकार किया जाए और उन पर मतदान कराया जाए या नहीं।
पुनर्गठन प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर टाटा संस के कारोबारी ढांचे और नियामकीय स्थिति में बदलाव हो सकता है। वहीं, SP ग्रुप के लिए बायआउट योजना आगे बढ़ती है तो कंपनी की हिस्सेदारी का मौजूदा स्वरूप भी बदल सकता है।
टाटा संस पूरे टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। इसलिए इससे जुड़े फैसलों का प्रभाव केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूह की व्यापक कारोबारी रणनीति और भविष्य की योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बोर्ड बैठक के एजेंडे में इन प्रस्तावों को जगह मिलती है या नहीं और निदेशक इनके पक्ष में कितना समर्थन देते हैं।
टाटा समूह से जुड़ी एक अन्य खबर में Trent Limited के शेयरों में शुक्रवार को तेजी दर्ज की गई। कंपनी ने अपने ताजा वित्तीय नतीजों में मुनाफे में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जानकारी दी थी। इसके बाद निवेशकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर Trent के शेयर 5.20 प्रतिशत बढ़कर ₹3,015.10 पर बंद हुए। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर कंपनी के शेयरों में 5.43 प्रतिशत की तेजी आई और कारोबार समाप्त होने पर इनका भाव ₹3,017.30 रहा।
कंपनी के मुनाफे में बढ़ोतरी की खबर के बाद शेयरों में आई यह तेजी निवेशकों के भरोसे को दर्शाती है। हालांकि, Trent के शेयरों की यह हलचल टाटा संस के पुनर्गठन और SP ग्रुप के बायआउट प्रस्ताव से अलग एक स्वतंत्र कारोबारी घटनाक्रम है।
नोएल टाटा के दोनों प्रस्तावों ने टाटा संस के स्वामित्व ढांचे, नियामकीय स्थिति और नेतृत्व से जुड़े मतभेदों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ₹25,000 करोड़ के SP ग्रुप बायआउट से कंपनी के एक बड़े शेयरधारक को नकदी उपलब्ध हो सकती है, जबकि पुनर्गठन योजना सार्वजनिक लिस्टिंग से बचने का एक संभावित विकल्प पेश करती है।
हालांकि, इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए बोर्ड की सहमति और सभी कानूनी तथा वित्तीय पहलुओं की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी होगी। ऐसे में 26 नवंबर की बैठक महत्वपूर्ण रहने वाली है। इसके फैसलों से यह संकेत मिल सकता है कि टाटा समूह अपने भीतर चल रहे मतभेदों को सुलझाकर भविष्य की रणनीति पर किस तरह आगे बढ़ता है।