नितिन कामथ Nithin Kamath ने कक्षाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच किशोरों की पढ़ाई और सीखने की क्षमता को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कई विकसित देशों में किशोर विद्यार्थियों के पढ़ाई से जुड़े प्रदर्शन में आई गिरावट का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि कहीं तकनीक पर बढ़ती निर्भरता लोगों की अपनी बुनियादी क्षमताओं को कमजोर तो नहीं कर रही है।
कामथ ने Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) के आंकड़ों का हवाला दिया। इन आंकड़ों के अनुसार, कई OECD देशों में 15 वर्ष की उम्र के विद्यार्थियों के पढ़ने और गणित से जुड़े प्रदर्शन में गिरावट देखी गई है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब AI आधारित उपकरण शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं।
हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि विद्यार्थियों के प्रदर्शन में गिरावट के लिए AI सीधे तौर पर जिम्मेदार है। इसके पीछे महामारी, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव, सामाजिक परिस्थितियां और तकनीक के इस्तेमाल सहित कई कारण हो सकते हैं।
OECD का Programme for International Student Assessment यानी PISA दुनिया के अलग-अलग देशों में 15 वर्षीय विद्यार्थियों की पढ़ने, गणित और विज्ञान से जुड़ी क्षमताओं का आकलन करता है। इसके जरिए अलग-अलग देशों के विद्यार्थियों के प्रदर्शन की तुलना की जाती है और समय के साथ होने वाले बदलावों को समझने की कोशिश की जाती है।
नितिन कामथ Nithin Kamath द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 23 OECD देशों में विद्यार्थियों के औसत प्रदर्शन में गिरावट देखी गई है। पढ़ने और गणित के परिणामों में यह गिरावट विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
PISA का अंक पैमाना अलग-अलग वर्षों के परिणामों की तुलना करने में मदद करता है। OECD का अनुमान है कि लगभग 20 अंकों का अंतर मोटे तौर पर एक वर्ष की स्कूली शिक्षा के बराबर माना जा सकता है। इसलिए प्रदर्शन में बड़े बदलाव शिक्षा की स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
फिर भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि PISA के आंकड़े केवल शैक्षणिक प्रदर्शन में बदलाव दिखाते हैं। वे यह प्रमाणित नहीं करते कि इस गिरावट का कारण AI ही है।
किशोरों के शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट की चर्चा करते हुए कोविड-19 महामारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महामारी के दौरान कई देशों में लंबे समय तक स्कूल बंद रहे और विद्यार्थियों की नियमित कक्षाएं प्रभावित हुईं।
स्कूल बंद होने, ऑनलाइन पढ़ाई पर निर्भरता बढ़ने और शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के बीच सामान्य कक्षा संपर्क कम होने से सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। इन परिस्थितियों का असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और शैक्षणिक उपलब्धियों पर पड़ना स्वाभाविक था।
कामथ ने भी माना कि महामारी इस गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। हालांकि, उनका संकेत यह भी था कि समस्या केवल महामारी तक सीमित नहीं हो सकती और इसके पीछे लंबे समय से चल रहे बदलावों की भी भूमिका हो सकती है।
AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने इस बहस में एक नया पहलू जोड़ दिया है।
नितिन कामथ ने इस मुद्दे को अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि वह अब अपने लिखे हुए काम की समीक्षा के लिए ChatGPT और Claude जैसे AI उपकरणों का अधिक इस्तेमाल करते हैं।
इन उपकरणों की मदद से व्याकरण और वर्तनी की गलतियां जल्दी पकड़ी और सुधारी जा सकती हैं। कामथ के अनुसार, इस सुविधा के कारण उन्हें हर चीज खुद से सही लिखने की कोशिश करने की प्रेरणा पहले की तुलना में कम महसूस होती है।
कामथ ने महसूस किया है कि AI की मदद के बिना उनके लेखन कौशल में समय के साथ कुछ कमी आ सकती है। उनका यह व्यक्तिगत अनुभव एक बड़ा सवाल सामने रखता है—यदि कोई तकनीक हमारे लिए लगातार किसी कौशल का काम करती रहे, तो क्या हम उस कौशल को खुद विकसित करना बंद कर सकते हैं?
यही सवाल अब शिक्षा व्यवस्था के सामने भी खड़ा हो रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में AI के इस्तेमाल के कई फायदे हैं। विद्यार्थी कठिन विषयों को समझने, नए विचार खोजने, अपनी गलतियां पहचानने और पढ़ाई को व्यवस्थित करने के लिए AI की सहायता ले सकते हैं।
AI अलग-अलग विद्यार्थियों की जरूरत के अनुसार सहायता भी दे सकता है। इससे किसी कठिन विषय को अलग तरीके से समझने या अतिरिक्त अभ्यास करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं।
लेखन, गणित, समस्या समाधान और आलोचनात्मक सोच जैसे कौशल लगातार अभ्यास से विकसित होते हैं। गलतियां करना, किसी कठिन सवाल पर समय लगाना और खुद समाधान खोजने की कोशिश करना सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि AI हर सवाल का तुरंत उत्तर देने लगे, तो विद्यार्थियों के पास खुद सोचने और गलतियों से सीखने के अवसर कम हो सकते हैं। इसलिए समस्या AI के इस्तेमाल में नहीं, बल्कि उस पर अत्यधिक निर्भरता में हो सकती है।
कामथ ने यह मुद्दा शिक्षा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने Zerodha के मुख्य तकनीकी अधिकारी के साथ भी इस विषय पर चर्चा की और सवाल उठाया कि AI के बढ़ते इस्तेमाल से कर्मचारियों के कौशल में भी इसी तरह के बदलाव हो सकते हैं।
आज कर्मचारी ईमेल लिखने, रिपोर्ट तैयार करने, दस्तावेज बनाने, कोड लिखने और कई अन्य कामों में AI की मदद ले रहे हैं। इससे काम तेजी से पूरा होता है और उत्पादकता बढ़ सकती है।
लेकिन संगठनों को यह भी देखना होगा कि कर्मचारी उन बुनियादी क्षमताओं को लगातार विकसित कर रहे हैं या नहीं, जिनकी मदद से वे AI के बिना भी जरूरी काम कर सकें।
कामथ के अनुसार, इंसान स्वाभाविक रूप से ऐसे विकल्प को चुनने की ओर आकर्षित होता है, जिसमें कम मेहनत लगे। AI ने पहले से समय लेने वाले कई कामों को कुछ ही क्षणों में पूरा करना संभव बना दिया है।
विद्यार्थी उत्तर तैयार करने में सहायता ले सकते हैं, जबकि पेशेवर रिपोर्ट, प्रस्तुति या कंप्यूटर कोड तैयार करने के लिए AI का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसका तत्काल लाभ स्पष्ट है, लेकिन लंबे समय में मानव कौशल पर इसका क्या असर होगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
AI के दौर में मुख्य सवाल यह नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थियों को AI इस्तेमाल करने देना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि AI का इस्तेमाल कब, कितना और किस उद्देश्य से किया जाए।
विद्यार्थियों को पहले स्वयं पढ़ने, लिखने, गणना करने, तर्क करने और समस्या का समाधान खोजने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। इसके बाद AI को सहायक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
स्कूलों और शिक्षकों के सामने ऐसी व्यवस्था बनाने की चुनौती होगी, जिसमें कुछ गतिविधियां विद्यार्थियों को बिना AI सहायता के करनी हों और अन्य गतिविधियों में उन्हें AI का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सिखाया जाए।
कामथ ने अपनी चिंता समझाने के लिए व्यंग्यात्मक फिल्म Idiocracy का भी उल्लेख किया। यह फिल्म एक ऐसे काल्पनिक भविष्य की कहानी दिखाती है, जहां मानव बुद्धि में काफी गिरावट आ चुकी है।
यह तुलना जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई थी, लेकिन इसके पीछे कामथ की चिंता स्पष्ट है। सवाल यह है कि क्या अत्यधिक सक्षम तकनीक पर निर्भरता लोगों को अपनी सोचने और सीखने की क्षमता विकसित करने के लिए कम प्रेरित कर सकती है।
PISA के परिणामों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि AI विद्यार्थियों को कमजोर बना रहा है। शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले कई कारण होते हैं, जिनमें महामारी, शिक्षण पद्धति, सामाजिक परिस्थितियां और तकनीक के इस्तेमाल का तरीका शामिल हैं।
फिर भी AI के कक्षाओं और कार्यस्थलों में तेजी से प्रवेश के साथ यह चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है। भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल AI का इस्तेमाल सिखाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में मजबूत बुनियादी कौशल और AI साक्षरता दोनों विकसित करना होगा।
नितिन कामथ की टिप्पणी AI के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाती है—क्या समाज शक्तिशाली तकनीक का लाभ उठाते हुए उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हुए बिना आगे बढ़ सकता है?
AI शिक्षा और काम को आसान, तेज और अधिक प्रभावी बना सकता है। लेकिन स्वतंत्र सोच, लेखन, गणित, समस्या समाधान और सीखने की क्षमता जैसे मानवीय कौशल लगातार अभ्यास से ही मजबूत होते हैं।
इसलिए आने वाले समय में सही रास्ता AI को पूरी तरह अपनाने या उससे पूरी तरह दूर रहने के बजाय तकनीक और मानवीय क्षमता के बीच संतुलन बनाने का हो सकता है। AI एक उपयोगी सहायक बने, लेकिन सोचने और सीखने की जिम्मेदारी पूरी तरह मशीनों को न सौंपना ही लंबे समय में अधिक महत्वपूर्ण होगा।