केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कर नीति से जुड़े सुझावों को लेकर कर विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों से व्यापक और संतुलित सोच अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सरकार के सामने कर से जुड़े प्रस्ताव रखते समय केवल कर दर घटाने, छूट पाने या रियायत मांगने पर ध्यान नहीं होना चाहिए। ऐसे सुझावों में सबसे पहले देश के व्यापक हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वित्त मंत्री ने यह बात बेंगलुरु में इंटरनेशनल टैक्स रिसर्च एंड एनालिसिस फाउंडेशन International Tax Research and Analysis Foundation (ITRAF) की ओर से आयोजित ‘न्यू एज टैक्सेशन’ विषयक दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर कही। ITRAF के अनुसार, यह उसका आठवां वार्षिक अंतरराष्ट्रीय कर सम्मेलन है, जिसका आयोजन 18 और 19 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में किया जाना है। सम्मेलन में कर कानून, डिजिटल अर्थव्यवस्था, तकनीक, वैश्विक व्यापार, स्थिरता और बदलते कारोबारी मॉडल से जुड़े विषयों पर चर्चा प्रस्तावित है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण Union Finance Minister Nirmala Sitharaman ने कहा कि सरकार को कर नीति से जुड़े सुझाव देते समय व्यापक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी प्रस्ताव का उद्देश्य केवल किसी विशेष वर्ग, उद्योग या करदाता को तत्काल राहत दिलाना नहीं होना चाहिए। इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि प्रस्ताव का सरकारी राजस्व, अर्थव्यवस्था और लंबे समय में देश के विकास पर क्या असर पड़ेगा।
उन्होंने कर पेशेवरों से कहा कि यदि किसी कर में कटौती, छूट या रियायत का सुझाव दिया जाता है, तो उसके कारण सरकारी खजाने को होने वाले संभावित राजस्व नुकसान का भी आकलन किया जाना चाहिए। इसके साथ यह बताना जरूरी है कि उस राजस्व की भरपाई किस व्यावहारिक तरीके से की जा सकती है।
कर व्यवस्था में बदलाव की मांग करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि करदाता पर तत्काल कितना बोझ कम होगा। एक अच्छी कर नीति में राजस्व, निवेश, रोजगार, अनुपालन, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक प्रभाव जैसे कई पहलुओं को साथ लेकर चलना जरूरी है।
वित्त मंत्री का जोर इसी व्यापक दृष्टिकोण पर रहा। उन्होंने कहा कि कर नीति पर होने वाली चर्चा में अलग-अलग पक्षों को समझना, उनके प्रभाव को मापना और संभावित फायदे तथा नुकसान के बीच संतुलन देखना जरूरी है।
वित्त मंत्री ने शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विचार समूहों से अपील की कि स्वतंत्र कर नीति अनुसंधान को नियमित रूप से सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे शोध की जांच होनी चाहिए, उस पर सवाल उठाए जाने चाहिए और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार भी किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, मजबूत कर नीति केवल सरकारी स्तर पर तैयार नहीं होती। इसमें विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, कर विशेषज्ञों, उद्योग जगत और अन्य संबंधित पक्षों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।
सीतारमण ने ऐसे कर अनुसंधान की आवश्यकता पर जोर दिया जो किसी एक पक्ष को ध्यान में रखकर न किया जाए। शोध में यह देखना चाहिए कि किसी प्रस्ताव से किसे लाभ होगा, किस पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है और सरकारी राजस्व पर उसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
इसके साथ ही उन्होंने ऐसे व्यावहारिक विकल्प देने की जरूरत बताई जिनके आधार पर सरकार अलग-अलग विकल्पों में से उचित कर नीति का चुनाव कर सके।
वित्त मंत्री ने अपने मंत्रालय की बजट से पहले होने वाली परामर्श प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि इन बैठकों में केवल अगले बजट की मांगों तक चर्चा सीमित नहीं रहनी चाहिए। इनके माध्यम से यह बड़ा सवाल भी उठाया जाना चाहिए कि भारत को अगले दो दशकों में किस तरह की कर व्यवस्था की जरूरत होगी।
यह चर्चा खास तौर पर 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि कर व्यवस्था ऐसी हो जो आर्थिक विकास को समर्थन दे, निवेश और रोजगार के लिए अनुकूल माहौल बनाए तथा साथ ही सरकार के विकास कार्यों के लिए आवश्यक राजस्व उपलब्ध कराए।
आज अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। डिजिटल कारोबार, वैश्विक कंपनियां, ऑनलाइन सेवाएं, नए कारोबारी मॉडल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सीमा पार व्यापार जैसे क्षेत्रों ने कर व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।
ITRAF के ‘न्यू एज टैक्सेशन’ सम्मेलन ITRAF’s ‘New Age Taxation’ Conference में भी ऐसे ही उभरते विषयों पर चर्चा प्रस्तावित है। सम्मेलन के एजेंडे में डिजिटल अर्थव्यवस्था, वैश्विक गतिशीलता, गिग इकॉनमी, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर, तकनीकी बदलाव, स्थिरता और ESG जैसे विषय शामिल हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल से यह सवाल भी सामने आ रहा है कि भविष्य में आय, रोजगार और कारोबार पर कर लगाने के मौजूदा तरीकों में किस तरह बदलाव की जरूरत होगी।
ऐसे विषयों पर जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय शोध, आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर चर्चा करना जरूरी है। इसी कारण स्वतंत्र कर अनुसंधान को सार्वजनिक नीति की चर्चा से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार ने हाल के वर्षों में कर प्रशासन को सरल बनाने, तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाने और करदाताओं के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया है। जुलाई 2026 में आयकर विभाग के 167वें स्थापना दिवस के अवसर पर भी वित्त मंत्री ने कर प्रशासन को निष्पक्ष, पारदर्शी, कुशल और करदाता-केंद्रित बनाने की बात कही थी। उन्होंने कर निश्चितता बढ़ाने और मुकदमेबाजी कम करने की जरूरत पर भी जोर दिया था।
वहीं, 2026-27 के केंद्रीय बजट में भी प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में कई बदलावों का प्रस्ताव रखा गया था, जिनका उद्देश्य करदाताओं के लिए अनुपालन को आसान बनाना और कर व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाना था।
कर व्यवस्था किसी भी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। सरकार को सार्वजनिक सेवाओं, बुनियादी ढांचे, सामाजिक योजनाओं और विकास कार्यों के लिए राजस्व की जरूरत होती है। दूसरी ओर, बहुत अधिक जटिल या भारी कर व्यवस्था से करदाताओं और कारोबारों पर अनुपालन का बोझ बढ़ सकता है।
इसलिए कर नीति में राजस्व जुटाने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के बीच संतुलन जरूरी है। वित्त मंत्री का संदेश इसी व्यापक संतुलन की ओर संकेत करता है कि कर सुधार केवल तत्काल राहत या राजस्व बढ़ाने तक सीमित न हों, बल्कि लंबे समय के आर्थिक लक्ष्यों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएं।
वित्त मंत्री के अनुसार, भारत जब 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब कर नीति पर होने वाली चर्चा भी दीर्घकालिक होनी चाहिए। आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था का आकार, कारोबार के तरीके, तकनीक और वैश्विक व्यापार लगातार बदलेंगे।
ऐसे में कर विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की भूमिका केवल मौजूदा नियमों की व्याख्या करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें भविष्य की चुनौतियों और अवसरों को समझते हुए ऐसे विकल्प सामने रखने चाहिए जो आर्थिक विकास और सरकारी राजस्व दोनों के लिए उपयोगी हों।
वित्त मंत्री ने खास तौर पर कहा कि किसी कर प्रस्ताव से यदि सरकारी राजस्व में कमी आती है, तो उसके साथ राजस्व की भरपाई के व्यावहारिक विकल्प भी दिए जाने चाहिए। इससे सरकार को विभिन्न विकल्पों के प्रभाव को समझने और बेहतर नीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।
इस तरह कर नीति पर चर्चा केवल मांग और राहत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आंकड़ों, प्रभावों, संभावित जोखिमों और व्यावहारिक समाधानों पर आधारित होगी।
निर्मला सीतारमण का संदेश कर नीति पर अधिक जिम्मेदार और तथ्य आधारित चर्चा की जरूरत को सामने रखता है। कर पेशेवरों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं से अपेक्षा की गई है कि वे केवल कर दरों में कमी या छूट की मांग करने के बजाय उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों का अध्ययन करें।
आने वाले वर्षों में डिजिटल अर्थव्यवस्था, नई तकनीक और बदलते वैश्विक कारोबार के कारण कर व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां आएंगी। ऐसे समय में स्वतंत्र शोध, व्यापक चर्चा और व्यावहारिक विकल्प भारत के लिए ऐसी कर नीति तैयार करने में मदद कर सकते हैं जो विकास, निवेश, रोजगार, कर अनुपालन और सरकारी राजस्व के बीच संतुलन बनाए रखे।