भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को एक बड़ा बढ़ावा मिला है, क्योंकि सरकार ने Electronics Component Manufacturing Scheme के तहत 29 नए निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है। यह कदम देश में घरेलू उत्पादन को मजबूत करने, सप्लाई चेन को बेहतर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस चरण में कुल निवेश ₹7,000 करोड़ से अधिक का है, जो यह दिखाता है कि भारत धीरे-धीरे एक वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है।
इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय Ministry of Electronics and Information Technology ने इस स्कीम के तहत 29 नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है।
ये प्रोजेक्ट्स सेमीकंडक्टर्स, सब-असेंबली और हाई-वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के निर्माण पर केंद्रित होंगे, जो स्मार्टफोन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल उपकरणों में उपयोग होते हैं।
सरकार का उद्देश्य है कि भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन में मजबूत स्थान मिले।
अब तक इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर पूर्वी एशिया के देशों का दबदबा रहा है, लेकिन भारत इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
Electronics Component Manufacturing Scheme को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था।
सरकार ने PLI (Production Linked Incentive) जैसी योजनाओं के जरिए निवेश आकर्षित किया है।
विशेषज्ञों और उद्योग जगत ने इस कदम का स्वागत किया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत वैश्विक सप्लाई चेन से बेहतर तरीके से जुड़ता है, तो यह निवेश और तेजी से बढ़ सकता है।
Ministry of Commerce and Industry के अनुसार, भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात तेजी से बढ़ा है।
इसके अलावा India Brand Equity Foundation की रिपोर्ट बताती है कि सही नीतियों के साथ यह सेक्टर और तेजी से बढ़ सकता है।
सरकार भविष्य में नीतियों को और मजबूत करने पर काम करेगी, ताकि निवेश और बढ़ सके।
भारत का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को $500 बिलियन तक पहुंचाया जाए।
यह लक्ष्य तभी संभव है जब:
भारत में Electronics Component Manufacturing Scheme के तहत 29 नई परियोजनाओं को मंजूरी मिलना देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल न केवल निवेश को बढ़ावा देती है, बल्कि रोजगार सृजन, तकनीकी प्रगति और घरेलू उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करती है।
वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में बदलाव के इस दौर में भारत के पास एक विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का सुनहरा अवसर है।
सरकार की नीतियों, निजी क्षेत्र की भागीदारी और लगातार बढ़ते निर्यात के चलते यह सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, दीर्घकालिक सफलता के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, स्किल डेवलपमेंट और रिसर्च पर निरंतर ध्यान देना जरूरी होगा।
यदि इन सभी पहलुओं पर संतुलित तरीके से काम किया जाता है, तो भारत आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी।