वैज्ञानिकों ने एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फ्रेमवर्क विकसित किया है, जो ट्यूमर के अंदर मौजूद दुर्लभ कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की पहचान करने में मदद कर सकता है। माना जाता है कि ये कोशिकाएं कैंसर के दोबारा होने, शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने और इलाज के प्रति प्रतिरोध पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
यह शोध एस. एन. बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज (SNBNCBS) के वैज्ञानिकों ने अशोका यूनिवर्सिटी के सहयोग से किया है। SNBNCBS, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है।
नई तकनीक ट्यूमर में मौजूद जीन-एक्सप्रेशन डेटा का विश्लेषण करती है। इसका उद्देश्य उन कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की आबादी का पता लगाना है, जिन्हें सामान्य तरीकों से पहचानना मुश्किल हो सकता है।
कैंसर का इलाज ट्यूमर की बड़ी संख्या में कोशिकाओं को नष्ट कर सकता है, लेकिन कुछ कोशिकाएं बच सकती हैं। बाद में यही कोशिकाएं कैंसर के दोबारा होने या शरीर में फैलने में योगदान दे सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि दुर्लभ कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाएं ट्यूमर के विकास, कैंसर की वापसी और उपचार के प्रति प्रतिरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, इन कोशिकाओं की पहचान करना आसान नहीं है।
कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाएं अक्सर बहुत कम संख्या में मौजूद होती हैं। इसके अलावा, समय के साथ इनके जैविक गुण भी बदल सकते हैं।
इस वजह से ट्यूमर के अंदर मौजूद इन छिपी हुई कोशिकाओं को पहचानना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इन कोशिकाओं की पहचान करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि ट्यूमर समय के साथ कैसे बदलता है और अलग-अलग उपचारों के प्रति उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है।
शोध टीम का नेतृत्व डॉ. शुभाशिस हलदार ने किया। टीम ने ACSCeND नाम का AI फ्रेमवर्क विकसित किया है। इसका पूरा नाम AI-based Cancer Stem-like Cell Profiler and Neoplasm Deconvoluter है।
पारंपरिक कंप्यूटेशनल तरीकों में ट्यूमर की स्टेमनेस को अक्सर एक ही माप के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत, ACSCeND कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की तीन अलग-अलग विकासात्मक अवस्थाओं की पहचान करता है।
यह वर्गीकरण ट्यूमर के अंदर मौजूद अलग-अलग स्टेम-लाइक कोशिकाओं को अधिक विस्तार से समझने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है।
ACSCeND हाई-रेजोल्यूशन सिंगल-सेल सीक्वेंसिंग से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल करता है और इसे डीप-लर्निंग तकनीकों के साथ जोड़कर सामान्य बल्क ट्यूमर RNA सीक्वेंसिंग डेटा का विश्लेषण करता है।
यह तरीका उन अस्पतालों और रिसर्च सेंटरों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है जहां अत्याधुनिक सिंगल-सेल सीक्वेंसिंग सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
मौजूदा बल्क RNA सीक्वेंसिंग डेटासेट का इस्तेमाल करके यह फ्रेमवर्क बड़ी संख्या में मरीजों के सैंपल में छिपी कोशिका आबादी की पहचान करने में मदद कर सकता है।
इसका एक संभावित लाभ यह है कि हर सैंपल के लिए महंगी और हाई-रेजोल्यूशन सिंगल-सेल सीक्वेंसिंग की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, इसके वास्तविक चिकित्सकीय उपयोग के लिए आगे वैज्ञानिक और क्लिनिकल जांच जरूरी होगी।
शोधकर्ताओं ने ACSCeND की तुलना मौजूदा कंप्यूटेशनल तरीकों से की। इसके लिए अलग-अलग स्वतंत्र डेटासेट और विभिन्न सीक्वेंसिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया।
इसके बाद इस फ्रेमवर्क से 25,000 से अधिक ट्यूमर सैंपल का विश्लेषण किया गया। इनमें The Cancer Genome Atlas (TCGA) और PRECOG जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कैंसर संसाधनों से प्राप्त डेटा शामिल था।
इतने बड़े डेटासेट के विश्लेषण से वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर मिला कि कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की अलग-अलग अवस्थाएं मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों और ट्यूमर के व्यवहार से किस तरह जुड़ी हो सकती हैं।
विश्लेषण से संकेत मिला कि जिन ट्यूमर में अधिक संख्या में अत्यधिक सक्रिय या प्लुरिपोटेंट-जैसी कैंसर स्टेम कोशिकाएं थीं, उनमें मरीजों के जीवित रहने के परिणाम अपेक्षाकृत खराब थे।
इन ट्यूमर में कैंसर के दोबारा होने का जोखिम भी अधिक पाया गया। साथ ही, ऐसे ट्यूमर नए प्रकार के इम्यूनोथेरेपी उपचारों के प्रति कमजोर प्रतिक्रिया से भी जुड़े थे।
AI फ्रेमवर्क ने ऐसे आणविक कार्यक्रमों की पहचान करने में भी मदद की, जो कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं को बदलती परिस्थितियों में जीवित रहने और अपने व्यवहार को अनुकूलित करने में सहायता कर सकते हैं।
ये कोशिकाएं शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के हमले से बचने में भी सक्षम हो सकती हैं।
इन निष्कर्षों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कुछ कैंसर इलाज के बाद दोबारा क्यों लौटते हैं और कुछ मामलों में उन्हें नियंत्रित करना इतना कठिन क्यों होता है।
नया शोध उसी रिसर्च टीम द्वारा विकसित किए गए पहले के AI प्लेटफॉर्म OncoMark पर भी आधारित है।
OncoMark को कैंसर के बढ़ने से जुड़े जैविक गुणों का अध्ययन करने के लिए विकसित किया गया था। यह बड़ी संख्या में कोशिकाओं के डेटा का विश्लेषण करने में मदद करता है और रिपोर्ट के अनुसार इसकी भविष्यवाणी की सटीकता 99 प्रतिशत से अधिक रही है।
OncoMark का मुख्य उद्देश्य कैंसर के विकास से जुड़े जैविक तंत्रों को समझना था। इसके विपरीत, ACSCeND का ध्यान एक अधिक विशेष समस्या पर है।
यह ट्यूमर के अंदर मौजूद दुर्लभ स्टेम-लाइक कोशिकाओं की पहचान करने की कोशिश करता है, जो कैंसर के विकास, ट्यूमर के बदलने और इलाज के असफल होने में भूमिका निभा सकती हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में कैंसर रिसर्च और उपचार से जुड़े कई क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है।
अगर किसी मरीज के ट्यूमर में आक्रामक कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की संख्या अधिक पाई जाती है, तो यह जानकारी भविष्य में दोबारा कैंसर होने के जोखिम को समझने में मदद कर सकती है।
यह तकनीक वैज्ञानिकों को नई दवाओं के लिए संभावित आणविक लक्ष्यों की पहचान करने में भी सहायता कर सकती है। इसके अलावा, अलग-अलग ट्यूमर की जैविक विशेषताओं के आधार पर उपचार रणनीतियां विकसित करने में भी इसका इस्तेमाल संभव हो सकता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ACSCeND जैसे AI फ्रेमवर्क को नियमित कैंसर उपचार का हिस्सा बनाने से पहले बड़े स्तर पर अतिरिक्त शोध, स्वतंत्र परीक्षण और क्लिनिकल वैलिडेशन की आवश्यकता होगी।
यह अध्ययन दिखाता है कि जटिल जैविक जानकारी को समझने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
आधुनिक जीनोमिक डेटासेट में बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी होती है। पारंपरिक तरीकों से इतनी बड़ी जानकारी का विश्लेषण करना कठिन हो सकता है।
AI और डीप-लर्निंग तकनीकें इन डेटासेट में मौजूद पैटर्न को पहचानने और ऐसे संबंध खोजने में मदद कर सकती हैं जो सामान्य विश्लेषण में आसानी से दिखाई नहीं देते।
ACSCeND जैसे फ्रेमवर्क उन जगहों पर विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं जहां अत्याधुनिक सीक्वेंसिंग तकनीक तक पहुंच सीमित है।
भविष्य में ऐसे AI टूल कैंसर की बेहतर समझ, उपचार की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने और व्यक्तिगत चिकित्सा यानी Precision Medicine को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं।
ACSCeND का विकास कैंसर के अंदर छिपी कोशिका आबादी को समझने के लिए AI के इस्तेमाल की दिशा में एक महत्वपूर्ण और संभावनाशील कदम है। हजारों ट्यूमर सैंपल का विश्लेषण करके यह फ्रेमवर्क कैंसर स्टेम-लाइक कोशिकाओं की अलग-अलग अवस्थाओं की पहचान करने में मदद करता है।
इससे वैज्ञानिकों को कैंसर के दोबारा होने, शरीर में फैलने और इलाज के प्रति प्रतिरोध जैसे जटिल पहलुओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
यदि आगे के शोध और क्लिनिकल परीक्षणों में इसके परिणामों की पुष्टि होती है, तो ऐसे AI आधारित टूल भविष्य में कैंसर के जोखिम का आकलन करने और मरीज की जैविक स्थिति के अनुसार उपचार की योजना बनाने में सहायक हो सकते हैं।