पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences यानी MoES) और वैज्ञानिक एवं नवाचार अनुसंधान अकादमी (Academy of Scientific and Innovative Research यानी AcSIR) ने भारत में पृथ्वी प्रणाली विज्ञान से जुड़े डॉक्टरेट शोध के अवसर बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक साझेदारी की है। इस पहल का उद्देश्य देश की वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमताओं को मजबूत करना और विद्यार्थियों को विशेष वैज्ञानिक क्षेत्रों में पीएचडी करने के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।
इस समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding यानी MoU) की औपचारिक घोषणा 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित पृथ्वी भवन में की गई। इससे पहले, दोनों संस्थानों ने 21 अगस्त 2026 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत वैज्ञानिक अनुसंधान सुविधाओं को अकादमिक कार्यक्रमों से जोड़ा जाएगा, ताकि विद्यार्थी पृथ्वी विज्ञान के विभिन्न विशिष्ट विषयों में उच्च स्तरीय शोध कर सकें।
इस साझेदारी के अंतर्गत MoES के अधीन काम करने वाले सभी 10 अनुसंधान संस्थानों को AcSIR से संबद्ध अनुसंधान संस्थान (AcSIR Associated Research Institutes यानी AcSIR-ARIs) के रूप में मान्यता दी गई है। इससे दोनों संगठनों के बीच सहयोग के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार होगा। साथ ही, पीएचडी करने वाले विद्यार्थियों की आधुनिक प्रयोगशालाओं, वैज्ञानिक उपकरणों और अनुभवी शोधकर्ताओं तक पहुंच बढ़ेगी।
यह साझेदारी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences यानी MoES) के अनुसंधान संस्थानों की वैज्ञानिक क्षमताओं और AcSIR की अकादमिक व्यवस्था को एक साथ लाती है। इसका उद्देश्य डॉक्टरेट शिक्षा को मजबूत करना और उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है।
इस कार्यक्रम में दाखिला लेने वाले विद्यार्थी संबंधित MoES संस्थानों में अपना शोध करेंगे। उन्हें ऐसे वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन मिलेगा, जिन्हें AcSIR के संकाय सदस्य के रूप में मान्यता प्राप्त है। पीएचडी की डिग्री वैज्ञानिक एवं नवाचार अनुसंधान अकादमी (Academy of Scientific and Innovative Research यानी AcSIR) प्रदान करेगा, जबकि जिस अनुसंधान संस्थान में विद्यार्थी ने शोध किया होगा, उसका नाम भी डिग्री प्रमाणपत्र पर दर्ज किया जाएगा।
इस व्यवस्था से विद्यार्थियों को विशेष प्रयोगशालाओं, आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों, शोध सुविधाओं और अनुभवी विशेषज्ञों के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। इससे कक्षा में प्राप्त अकादमिक ज्ञान को वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने में भी मदद मिलेगी। यह सहयोग पर्यावरण, जलवायु और भूभौतिकी से जुड़ी जटिल चुनौतियों पर शोध को बढ़ावा दे सकता है।
MoES और AcSIR की साझेदारी के तहत पृथ्वी प्रणाली से जुड़े कई विषयों में डॉक्टरेट शोध को समर्थन दिया जाएगा। इनमें वायुमंडल, महासागर, ध्रुवीय क्षेत्र और पृथ्वी की अन्य प्राकृतिक प्रणालियों से संबंधित विषय शामिल हैं।
इस क्षेत्र में मौसम पूर्वानुमान, जलवायु सेवाओं और संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान से संबंधित शोध के अवसर उपलब्ध होंगे। इन विषयों का उद्देश्य वायुमंडल में होने वाली प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझना और मौसम की अधिक विश्वसनीय जानकारी तैयार करना है।
इन क्षेत्रों में उन्नत अनुसंधान से अत्यधिक गर्मी, भारी बारिश, चक्रवात और अन्य चरम मौसमी घटनाओं के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, जलवायु संबंधी आकलन को अधिक प्रभावी बनाने और नीति-निर्माताओं को उपयोगी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने में भी ऐसे शोध महत्वपूर्ण होंगे।
साझेदारी के तहत महासागरों का निरीक्षण, समुद्री रोबोटिक्स, गहरे समुद्र में खनन, समुद्री जल का विलवणीकरण और समुद्री जीव संसाधनों से जुड़े विषयों में भी शोध किया जाएगा।
इन क्षेत्रों में अनुसंधान से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को समझने, महासागरों में उपलब्ध संसाधनों का अध्ययन करने और उनका टिकाऊ उपयोग करने वाली तकनीकों को विकसित करने में सहायता मिल सकती है। समुद्री रोबोटिक्स के माध्यम से समुद्र की गहराई में खोज और आंकड़े एकत्र करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। वहीं, विलवणीकरण से समुद्री पानी से नमक और अन्य घुले पदार्थ हटाकर उपयोगी मीठा पानी प्राप्त करने की तकनीकों पर काम किया जा सकता है। यह शोध जल संकट से निपटने के प्रयासों में भी उपयोगी हो सकता है।
इस साझेदारी में ध्रुवीय क्षेत्रों, हिममंडल, भूकंप विज्ञान, भूकंप से होने वाले खतरों के आकलन और तटीय प्रक्रियाओं पर भी डॉक्टरेट शोध किया जाएगा।
हिममंडल में ग्लेशियर, बर्फ की चादरें और पृथ्वी पर जमी हुई बर्फ से जुड़े अन्य क्षेत्र शामिल होते हैं। इनका अध्ययन जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में मदद करता है। ध्रुवीय क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का अध्ययन भी वैश्विक जलवायु से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के जवाब खोजने में सहायक हो सकता है।
भूकंप विज्ञान के अंतर्गत भूकंपीय गतिविधियों और उनसे जुड़े जोखिमों का अध्ययन किया जाएगा। ऐसे शोध से आपदा की तैयारी बेहतर बनाने और भूकंप के संभावित प्रभावों को समझने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही, तटीय प्रक्रियाओं पर अनुसंधान से समुद्र तटों में हो रहे बदलावों, तटीय खतरों और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों को समझने में सहायता मिलेगी।
इस साझेदारी के तहत पृथ्वी विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दिया जाएगा।
इन तकनीकों की मदद से वैज्ञानिक बड़ी मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं, उनमें छिपे पैटर्न पहचान सकते हैं और पूर्वानुमान लगाने के तरीकों को बेहतर बना सकते हैं। मौसम, महासागर और भूभौतिकी से संबंधित अनुसंधान में इनका उपयोग वैज्ञानिक विश्लेषण को अधिक उन्नत बनाने में सहायक हो सकता है।
AI और ML आधारित प्रणालियां मौसम के पूर्वानुमान, पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी और प्राकृतिक घटनाओं से जुड़े आंकड़ों को समझने में उपयोगी साबित हो सकती हैं। इससे शोधकर्ताओं को जटिल वैज्ञानिक समस्याओं का अध्ययन करने और बेहतर शोध परिणाम प्राप्त करने के नए अवसर मिलेंगे।
MoES और AcSIR की साझेदारी का एक प्रमुख उद्देश्य अलग-अलग वैज्ञानिक विषयों के बीच सहयोग को मजबूत करना है। इसके तहत वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पीएचडी विद्यार्थियों को मिलकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
इस व्यवस्था में भाग लेने वाले संस्थान अपनी शोध सुविधाओं और संसाधनों को साझा कर सकेंगे। इससे विद्यार्थियों को ऐसी विशेष प्रयोगशालाओं, वैज्ञानिक उपकरणों और विशेषज्ञों तक पहुंच मिल सकती है, जो किसी एक संस्थान में उपलब्ध नहीं होते।
इस पहल से शुरुआती करियर वाले शोधकर्ताओं के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। साथ ही, पृथ्वी विज्ञान के विशिष्ट क्षेत्रों में कुशल वैज्ञानिक और पेशेवर तैयार करने में भी मदद मिल सकती है। इससे भारत की दीर्घकालिक वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता को मजबूती मिलने की संभावना है।
इस नई व्यवस्था के तहत MoES के सभी 10 अनुसंधान संस्थान AcSIR के नवीनतम पीएचडी प्रवेश चक्र में भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से लागू करने के लिए प्रत्येक संस्थान में एक नोडल समन्वयक नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, मंत्रालय के स्तर पर कामकाज में तालमेल बनाए रखने के लिए MoES ने एक केंद्रीय समन्वयक भी नियुक्त किया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य सभी भाग लेने वाले संस्थानों के बीच संवाद बेहतर बनाना, कार्यक्रम के संचालन को आसान करना और डॉक्टरेट शोध से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रभावी बनाना है।
एक साझा अकादमिक ढांचे के अंतर्गत विद्यार्थी, उनके मार्गदर्शक और अनुसंधान संस्थान मिलकर काम कर सकेंगे। इससे शोध कार्यक्रमों के संचालन में एकरूपता बनाए रखने और विद्यार्थियों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
इस समझौते में साझेदारी के तहत किए जाने वाले शोध से उत्पन्न बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights यानी IPR) से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं।
इन प्रावधानों में शोध के दौरान आविष्कार करने वाले विद्यार्थियों को उचित पहचान देना और दोनों संस्थानों के संयुक्त प्रयासों से विकसित बौद्धिक संपदा को साझा करने की व्यवस्था शामिल है। इससे शोध में योगदान देने वाले लोगों की भूमिका स्पष्ट करने और वैज्ञानिक नवाचार को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।
बौद्धिक संपदा से जुड़े स्पष्ट नियम शोध के परिणामों को व्यावहारिक उपयोग तक पहुंचाने में भी सहायक हो सकते हैं। ऐसे परिणामों का इस्तेमाल तकनीक के विकास, पर्यावरण संबंधी सेवाओं और पृथ्वी विज्ञान से जुड़े अन्य क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस तरह यह साझेदारी केवल अकादमिक शोध तक सीमित न रहकर वैज्ञानिक खोजों के व्यावहारिक उपयोग को भी बढ़ावा दे सकती है।
MoES और AcSIR का यह सहयोग विशेष वैज्ञानिक सुविधाओं को व्यवस्थित डॉक्टरेट शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। MoES के सभी 10 अनुसंधान संस्थानों को शामिल करने से उच्च स्तरीय शोध और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के लिए उपलब्ध संस्थागत संसाधनों का दायरा बढ़ेगा।
इस पहल का बहुविषयक स्वरूप मौसम, जलवायु, महासागरों, ध्रुवीय पर्यावरण, भूकंप और नई वैज्ञानिक तकनीकों से जुड़ी चुनौतियों को ध्यान में रखता है। इन क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा मिलने से भारत को प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने और उनसे जुड़ी समस्याओं के समाधान विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
MoES और AcSIR के बीच हुई साझेदारी से पृथ्वी विज्ञान में पीएचडी करने के अवसर बढ़ने, विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के बीच सहयोग मजबूत होने और आधुनिक शोध सुविधाओं तक विद्यार्थियों की पहुंच बेहतर होने की उम्मीद है। MoES के सभी 10 अनुसंधान संस्थानों की भागीदारी इस पहल को व्यापक आधार प्रदान करती है।
यह सहयोग शोधकर्ताओं के कौशल विकास, वैज्ञानिक नवाचार और भारत की दीर्घकालिक अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने में योगदान दे सकता है। मौसम, जलवायु, महासागर, भूकंप और पृथ्वी की अन्य प्राकृतिक प्रणालियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान खोजने में ऐसे शोध की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।