एक नए अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया के अधिकांश लोगों में मधुमेह, हृदय संबंधी बीमारियों और सिज़ोफ्रेनिया जैसी तीन आम बीमारियों के लिए आनुवंशिक जोखिम का स्तर अधिक हो सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि अधिक आनुवंशिक जोखिम वाले प्रत्येक व्यक्ति को भविष्य में ये बीमारियां जरूर होंगी। आनुवंशिक जोखिम केवल बीमारी होने की संभावित आशंका को दर्शाता है, न कि बीमारी होने की निश्चितता को।
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने मानव DNA में पाए जाने वाले आनुवंशिक बदलावों और बीमारी के जोखिम का अनुमान लगाने में उनकी भूमिका का अध्ययन किया। Genome Medicine नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध से यह समझने में मदद मिलती है कि आनुवंशिक जांच के नतीजों को किस तरह समझना चाहिए और उनका चिकित्सकीय उपयोग करते समय किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर University of Exeter, UK के शोधकर्ताओं ने दो बड़े जनसंख्या-आधारित शोध कार्यक्रमों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इनमें ब्रिटेन का UK Biobank और अमेरिका का All of Us रिसर्च प्रोग्राम शामिल था। इन दोनों स्रोतों से लगभग 10 लाख लोगों की संपूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध हुई।
संपूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति के DNA में मौजूद आनुवंशिक जानकारी का व्यापक अध्ययन किया जाता है। इससे वैज्ञानिकों को आनुवंशिक बदलावों और उनके संभावित प्रभावों को समझने में मदद मिलती है।
शोध दल ने 28 आम बीमारियों के लिए पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर का अध्ययन किया। यह स्कोर कई आनुवंशिक बदलावों के प्रभावों को मिलाकर यह अनुमान लगाने में मदद करता है कि किसी व्यक्ति में किसी बीमारी के विकसित होने की आनुवंशिक संभावना कितनी हो सकती है।
अध्ययन के अनुसार, औसतन एक व्यक्ति का आनुवंशिक जोखिम स्कोर लगभग तीन बीमारियों के लिए सबसे अधिक जोखिम वाले शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों में आ सकता है। इसके अलावा, लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति का स्कोर कम से कम एक बीमारी के लिए शीर्ष एक प्रतिशत में पाया जा सकता है।
इन निष्कर्षों से पता चलता है कि अधिक आनुवंशिक जोखिम स्कोर होना असामान्य नहीं है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति को उन बीमारियों का होना तय है।
शोधकर्ताओं ने औसत मानव जीनोम की विशेषताओं का भी अध्ययन किया, ताकि डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को सामान्य आनुवंशिक विविधताओं को समझने में सहायता मिल सके।
अध्ययन के अनुसार, एक सामान्य मानव जीनोम में लगभग 50 लाख आनुवंशिक बदलाव हो सकते हैं। ये DNA के वे स्थान हैं, जहां किसी व्यक्ति का आनुवंशिक क्रम एक संदर्भ क्रम से अलग होता है या दूसरे व्यक्तियों के आनुवंशिक क्रम में अंतर पाया जाता है।
इनमें से लगभग 10,000 बदलाव जीन के क्रम को प्रभावित करते हैं। ऐसे बदलाव शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं और कुछ विशेषताओं पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ आनुवंशिक बदलाव लैक्टोज असहिष्णुता यानी दूध में मौजूद लैक्टोज को पचाने में कठिनाई और कुछ दवाओं के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया से जुड़े हो सकते हैं।
हालांकि, सभी आनुवंशिक बदलाव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते। इनमें से कई का स्वास्थ्य पर बहुत कम या कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता।
यह अध्ययन इस बात को मजबूत करता है कि आनुवंशिक विविधता मानव शरीर की एक सामान्य विशेषता है। केवल DNA में बदलाव मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कोई बीमारी है या भविष्य में जरूर होगी।
शोध के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि प्रत्येक व्यक्ति में औसतन एक से तीन ऐसे दुर्लभ आनुवंशिक बदलाव हो सकते हैं, जिन्हें पहले गंभीर आनुवंशिक बीमारियों से जुड़ा पाया गया है।
इसके अलावा, प्रत्येक व्यक्ति में लगभग 50 दुर्लभ आनुवंशिक बदलाव ऐसे हो सकते हैं, जिनके चिकित्सकीय महत्व के बारे में अभी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे बदलावों को अनिश्चित महत्व वाले आनुवंशिक बदलाव कहा जाता है।
इन बदलावों की मौजूदगी अपने आप में किसी आनुवंशिक बीमारी का प्रमाण नहीं है। कुछ बदलाव बीमारी के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि कुछ का प्रभाव सीमित हो सकता है। कई मामलों में यह समझने के लिए अतिरिक्त शोध की जरूरत होती है कि किसी बदलाव का स्वास्थ्य पर वास्तव में क्या असर पड़ता है।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आनुवंशिक जांच के नतीजों का मूल्यांकन व्यक्ति के स्वास्थ्य, लक्षणों, पारिवारिक इतिहास और अन्य संबंधित जानकारियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर कई आनुवंशिक कारकों के प्रभावों को जोड़कर तैयार किया जाता है। इसकी मदद से उन लोगों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है, जिनकी आनुवंशिक बनावट किसी बीमारी के अधिक या कम जोखिम से जुड़ी होती है।
लेकिन यह स्कोर किसी व्यक्ति के भविष्य के स्वास्थ्य की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करता। किसी बीमारी के विकसित होने की वास्तविक संभावना कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती है।
इनमें पारिवारिक इतिहास, खानपान, शारीरिक गतिविधि, जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रभाव, पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं और शरीर की अन्य जैविक विशेषताएं शामिल हो सकती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का आनुवंशिक जोखिम स्कोर अधिक होने के बावजूद उसे संबंधित बीमारी कभी नहीं हो सकती। इसके विपरीत, कम आनुवंशिक जोखिम स्कोर वाला व्यक्ति भी उस बीमारी से प्रभावित हो सकता है।
इसलिए केवल आनुवंशिक जांच के आधार पर बीमारी का निदान करना या यह मान लेना कि व्यक्ति भविष्य में निश्चित रूप से बीमार होगा, सही नहीं है। जांच के परिणामों को दूसरे चिकित्सकीय तथ्यों के साथ समझना जरूरी है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर की वरिष्ठ शोधकर्ता कैरोलिन राइट ने बताया कि संपूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग आनुवंशिक बीमारियों की पहचान में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसके साथ ही, भविष्य में बीमारी के जोखिम का अनुमान लगाने के लिए आनुवंशिक जांच के इस्तेमाल पर भी काम किया जा रहा है।
राइट के अनुसार, कई लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि मानव जीनोम में कितनी अधिक आनुवंशिक विविधता मौजूद होती है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किसी सामान्य व्यक्ति के आनुवंशिक प्रोफाइल में आम तौर पर किस प्रकार के बदलाव पाए जा सकते हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आनुवंशिक जांच के नतीजों को समझते समय व्यक्ति के लक्षणों, पारिवारिक इतिहास, चिकित्सकीय जांच और पर्यावरण से जुड़े प्रभावों को ध्यान में रखना चाहिए।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह जानकारी डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। इससे आनुवंशिक रिपोर्टों की अधिक जिम्मेदारी से व्याख्या करने और भविष्य में आनुवंशिक जांच कार्यक्रम तैयार करने में मदद मिल सकती है। सामान्य आनुवंशिक बदलावों को बेहतर ढंग से समझने से ऐसे परिणामों को लेकर अनावश्यक चिंता कम करने में भी सहायता मिल सकती है, जिनका कोई स्पष्ट चिकित्सकीय महत्व नहीं है।
बड़े पैमाने पर आंकड़ों का विश्लेषण करने के बावजूद शोधकर्ताओं ने अध्ययन की एक महत्वपूर्ण सीमा स्वीकार की। अध्ययन में इस्तेमाल किए गए मूल शोध कार्यक्रमों में पश्चिमी यूरोपीय वंश के लोगों की भागीदारी अधिक थी।
इस कारण निष्कर्षों को दुनिया की दूसरी आबादियों पर समान रूप से लागू करना मुश्किल हो सकता है। अलग-अलग आबादी में आनुवंशिक बदलावों की मौजूदगी और उनके प्रभावों में अंतर हो सकता है। इसलिए एक आबादी के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया आनुवंशिक जोखिम स्कोर दूसरी आबादी में उतना सटीक साबित नहीं भी हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने अधिक विविध आनुवंशिक आंकड़े जुटाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे भविष्य में होने वाले शोध को अधिक विश्वसनीय और समावेशी बनाया जा सकेगा तथा आनुवंशिक जांच के चिकित्सकीय उपयोग में सुधार किया जा सकेगा।
Genome Medicine में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि अधिक आनुवंशिक जोखिम स्कोर होना आम बात हो सकती है और मानव DNA में विविधता होना शरीर की सामान्य विशेषता है। हालांकि, केवल आनुवंशिक जोखिम के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी होगी या नहीं।
आनुवंशिक जानकारी के साथ व्यक्ति के स्वास्थ्य इतिहास, जीवनशैली, चिकित्सकीय लक्षणों और विभिन्न आबादियों से प्राप्त अधिक व्यापक आंकड़ों को शामिल करना जरूरी है। इससे आनुवंशिक जांच के परिणामों को अधिक सटीक और जिम्मेदारी से समझने में मदद मिल सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिक आनुवंशिक जोखिम का अर्थ बीमारी होना तय नहीं है। किसी भी जांच के नतीजे को लेकर चिंता होने पर योग्य चिकित्सक या आनुवंशिक परामर्शदाता से सलाह लेना उचित है।