टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड (TSPL) Tata Sons Private Limited (TSPL) को लेकर एक महत्वपूर्ण पुनर्गठन प्रस्ताव सामने आया है। टाटा ट्रस्ट, जिसकी टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (TESS) Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) Tata Consulting Engineers (TCE) का Tata Sons में विलय करने का प्रस्ताव रखा है।
इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य टाटा संस के कारोबारी स्वरूप में बदलाव करना है, ताकि कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी यानी NBFC और Core Investment Company (CIC) से जुड़े वर्गीकरण के दायरे से बाहर आ सके। यदि प्रस्ताव लागू होता है तो Tata Sons एक ऐसी कंपनी के रूप में काम कर सकती है, जो Tata Group की होल्डिंग कंपनी होने के साथ-साथ सीधे तौर पर परिचालन कारोबार भी करेगी।
टाटा ट्रस्ट Tata Trusts ने यह प्रस्ताव 28 सितंबर 2026 को Tata Sons के बोर्ड के सामने रखा। इसे लागू करने के लिए पहले Tata Sons के बोर्ड की मंजूरी और उसके बाद RBI की आवश्यक अनुमति लेनी होगी।
टाटा ट्रस्ट Tata Trusts के अनुसार, Tata Sons का इतिहास केवल एक होल्डिंग कंपनी के रूप में नहीं रहा है। लगभग 100 साल के इतिहास में करीब 80 वर्षों तक Tata Sons के पास खुद के परिचालन कारोबार और उससे होने वाली आय रही है।
इन कारोबारों से मिलने वाली आय का इस्तेमाल समूह की नई कंपनियों और कारोबारों में निवेश करने के लिए किया जाता था। Tata Trusts ने Tata Consultancy Services (TCS) का उदाहरण भी दिया है। वर्ष 2004 तक TCS, Tata Sons के भीतर एक कारोबारी इकाई के रूप में काम करती थी। बाद में इसे अलग कंपनी के रूप में स्थापित किया गया।
प्रस्तावित विलय के बाद Tata Sons में फिर से सीधे परिचालन कारोबार और उससे होने वाली आय शामिल हो जाएगी। Tata Trusts का कहना है कि इससे कंपनी अपने पुराने कारोबारी मॉडल के करीब लौट सकेगी।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (TESS) Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) Tata Consulting Engineers (TCE) दोनों गैर-वित्तीय परिचालन कारोबार से जुड़ी कंपनियां हैं। इनके Tata Sons में शामिल होने से कंपनी की कुल आय में परिचालन कारोबार की हिस्सेदारी काफी बढ़ जाएगी।
Tata Trusts के अनुसार, 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के आधार पर प्रस्तावित विलय के बाद बनी कंपनी के पास लगभग:
₹1,05,043 करोड़ की परिचालन आय होगी।
वित्तीय संपत्तियों से करीब ₹40,072 करोड़ की आय होगी।
कुल आय में परिचालन आय की हिस्सेदारी लगभग 64.3 प्रतिशत होगी।
कुल शुद्ध संपत्ति करीब ₹2,00,158 करोड़ होगी।
Tata Group की कंपनियों में निवेश लगभग ₹1,77,120 करोड़ होगा।
इन आंकड़ों के आधार पर Tata Trusts का कहना है कि पुनर्गठित कंपनी RBI के Principal Business Criteria के अनुसार NBFC की श्रेणी में नहीं आएगी।
Core Investment Company यानी CIC के लिए समूह की कंपनियों में निवेश की मात्रा एक महत्वपूर्ण नियामकीय मानदंड है।
Tata Trusts के अनुसार, प्रस्तावित विलय के बाद Tata Sons की कुल शुद्ध संपत्ति करीब ₹2,00,158 करोड़ होगी। इसमें समूह की कंपनियों में निवेश लगभग ₹1,77,120 करोड़ होगा। यानी यह कुल शुद्ध संपत्ति का करीब 88.5 प्रतिशत होगा।
Tata Trusts का कहना है कि यह अनुपात 90 प्रतिशत की सीमा से नीचे होगा। इसलिए प्रस्तावित संरचना CIC की लागू शर्तों को पूरा नहीं करेगी। इस आधार पर कंपनी का नियामकीय दर्जा बदल सकता है।
TESS और TCE जैसी परिचालन और गैर-वित्तीय कंपनियों का Tata Sons में विलय केवल Tata Sons के बोर्ड की मंजूरी से पूरा नहीं होगा। Tata Trusts के अनुसार, यह प्रक्रिया RBI (Non-Banking Financial Companies – Voluntary Amalgamation) Directions, 2025 के तहत पूरी करनी होगी।
इसके लिए RBI से पहले No-Objection Certificate यानी NOC लेना जरूरी होगा। Tata Trusts और Tata Sons को प्रस्तावित पुनर्गठन के नियामकीय और परिचालन पहलुओं पर RBI के साथ बातचीत करनी होगी।
यदि पुनर्गठन के बाद Tata Sons CIC की श्रेणी में नहीं रहती है, तो उसे अपना मौजूदा पंजीकरण प्रमाणपत्र भी RBI को वापस करना पड़ सकता है।
Tata Trusts के प्रस्ताव का एक प्रमुख उद्देश्य Tata Sons को Unlisted Private Company के रूप में बनाए रखना है। Trusts का कहना है कि प्रस्तावित पुनर्गठन Tata Group की मौजूदा संगठनात्मक संरचना को बनाए रखते हुए नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप रास्ता उपलब्ध करा सकता है।
Tata Trusts ने बताया कि Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के बोर्ड ने जुलाई 2025 में सर्वसम्मति से ऐसे प्रस्ताव पारित किए थे, जिनमें Tata Sons को अनलिस्टेड निजी कंपनी बनाए रखने के लिए प्रयास जारी रखने की बात कही गई थी।
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब Tata Sons के नियामकीय दर्जे और भविष्य की सूचीबद्धता को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम चल रहे हैं। RBI ने सितंबर 2026 में Tata Sons की CIC पंजीकरण छोड़ने की पिछली कोशिश को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद कंपनी को मौजूदा नियामकीय व्यवस्था का पालन करने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।
Tata Trusts ने Tata Sons के बोर्ड से प्रस्ताव पर विचार करने और इसे मंजूरी देने का अनुरोध किया है। इसके बाद RBI से आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
इसका मतलब है कि फिलहाल TESS और TCE का Tata Sons में विलय पूरा नहीं हुआ है। प्रस्ताव को Tata Sons के बोर्ड और RBI दोनों स्तरों पर आवश्यक मंजूरियों से गुजरना होगा। इसलिए Tata Sons की अंतिम नियामकीय स्थिति अभी तय नहीं हुई है।
यदि प्रस्ताव मंजूर होकर लागू होता है, तो Tata Sons केवल Tata Group की निवेश और होल्डिंग कंपनी तक सीमित नहीं रहेगी। इसमें सीधे परिचालन कारोबार भी शामिल होंगे।
इससे कंपनी की आय का बड़ा हिस्सा परिचालन गतिविधियों से आएगा और वित्तीय संपत्तियों से मिलने वाली आय का अनुपात कम हो सकता है। Tata Trusts के अनुसार, इससे कंपनी का कारोबारी स्वरूप RBI के NBFC और CIC वर्गीकरण से अलग हो सकता है।
यह व्यवस्था Tata Sons के उस पुराने मॉडल की भी वापसी होगी जिसमें कंपनी खुद कारोबार चलाती थी और उनसे प्राप्त आय के माध्यम से समूह के नए कारोबारों को आगे बढ़ाती थी।
Tata Trusts द्वारा TESS और Tata Consulting Engineers को Tata Sons में मिलाने का प्रस्ताव Tata Group की संगठनात्मक और नियामकीय संरचना में संभावित बड़े बदलाव का संकेत देता है। प्रस्ताव का उद्देश्य Tata Sons में परिचालन कारोबार और आय का हिस्सा बढ़ाना है, जिससे कंपनी Tata Group की होल्डिंग कंपनी के साथ एक परिचालन कंपनी के रूप में भी काम कर सके।
Tata Trusts के अनुसार, प्रस्तावित वित्तीय संरचना Tata Sons को RBI के NBFC और CIC वर्गीकरण से बाहर रखने में मदद कर सकती है। हालांकि, यह अभी एक प्रस्ताव है और इसके लिए Tata Sons के बोर्ड की मंजूरी के साथ RBI की पूर्व NOC भी जरूरी है।
यदि यह पुनर्गठन मंजूर होकर लागू होता है, तो Tata Sons का नियामकीय स्वरूप बदल सकता है और कंपनी को अनलिस्टेड निजी कंपनी के रूप में बनाए रखने का रास्ता मिल सकता है। अंतिम स्थिति हालांकि संबंधित मंजूरियों और नियामकीय फैसलों पर निर्भर करेगी।