भारत ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी बनाए रखने के लिए विश्व व्यापार संगठन (WTO) को संरक्षित करने और उसमें जरूरी सुधार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को कुछ शक्तिशाली देशों के आर्थिक हितों के बजाय साझा नियमों के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए। इसके लिए व्यापार विवादों को सुलझाने की व्यवस्था बहाल करना, विकासशील देशों के हितों की रक्षा करना और सभी देशों को समान अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।
वर्तमान समय में वैश्विक व्यापार कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। संरक्षणवादी नीतियों, एकतरफा व्यापार प्रतिबंधों, औद्योगिक सब्सिडी, क्षेत्रीय व्यापार समूहों और जलवायु से जुड़े व्यापार प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में बिखराव बढ़ रहा है। इसके साथ ही, WTO की विवाद निपटान व्यवस्था भी कमजोर हुई है। इसका प्रमुख कारण अपीलीय निकाय (Appellate Body) को लेकर लंबे समय से जारी गतिरोध है।
इन परिस्थितियों में छोटे और विकासशील देशों के लिए अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना अधिक कठिन हो सकता है। भारत के लिए WTO को मजबूत बनाना रणनीतिक और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) World Trade Organization (WTO) ने लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता, पारदर्शिता और पूर्वानुमान की सुविधा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके नियमों ने विकासशील देशों को भी वैश्विक बाजारों में भाग लेने का अवसर दिया है।
लेकिन मौजूदा समय में कई देश घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर प्रतिबंध, अतिरिक्त शुल्क और अन्य एकतरफा उपाय अपना रहे हैं। कुछ देशों की औद्योगिक सब्सिडी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लगाए जाने वाले व्यापारिक प्रतिबंध नए विवाद पैदा कर रहे हैं।
यदि इन मामलों का समाधान साझा अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत नहीं होता है, तो वैश्विक व्यापार नियम-आधारित व्यवस्था के बजाय आर्थिक शक्ति पर निर्भर हो सकता है। ऐसी स्थिति में बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लाभ मिल सकता है, जबकि विकासशील देशों के लिए अपने उत्पादों और सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
30 सितंबर से 1 अक्टूबर 2026 तक मिलवॉकी में आयोजित G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक G20 Trade Ministers' Meeting के दौरान भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि व्यापार में होने वाली गड़बड़ियों और अनुचित प्रतिस्पर्धा से निपटने के लिए WTO के नियमों के अनुरूप कदम उठाए जाने चाहिए। इनमें प्रमाणों पर आधारित एंटी-डंपिंग शुल्क और काउंटरवेलिंग ड्यूटी जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। ऐसे उपायों की निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा भी जरूरी है, ताकि उनका गलत इस्तेमाल न हो।
भारत ने यह चिंता भी जताई कि आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने के प्रयासों का उपयोग WTO के नियमों को दरकिनार करने या समायोजन का पूरा बोझ विकासशील देशों पर डालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में विश्व व्यापार संगठन में सुधार और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने के समर्थन को दोहराया गया।
इसमें ऐसी व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया, जो खुली, समान, पारदर्शी, गैर-भेदभावपूर्ण और पूर्वानुमान योग्य हो। WTO को इस व्यवस्था का केंद्रीय संस्थान बनाए रखने की बात भी कही गई।
शिखर सम्मेलन में सबसे पसंदीदा राष्ट्र का व्यवहार (Most-Favoured-Nation Treatment) और विशेष एवं विभेदक व्यवहार (Special and Differential Treatment) जैसे बुनियादी सिद्धांतों के महत्व को रेखांकित किया गया। इन सिद्धांतों का उद्देश्य व्यापार में भेदभाव को कम करना और विकासशील देशों को उनकी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे प्रावधान महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक और संस्थागत क्षमताएं विकसित देशों की तुलना में सीमित हो सकती हैं।
भारत WTO में सुधार के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की वकालत कर सकता है।
WTO की विवाद निपटान व्यवस्था को विश्वसनीय और समयबद्ध बनाया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक प्रक्रियागत सुधार किए जा सकते हैं, ताकि व्यापार विवादों का समाधान तय समय के भीतर हो और देशों को निष्पक्ष निर्णय मिल सकें।
विशेष एवं विभेदक व्यवहार के प्रावधानों को मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही, खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण से जुड़े मुद्दों का स्थायी समाधान निकालना जरूरी है, ताकि विकासशील देश जरूरतमंद लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली नीतियां जारी रख सकें।
कृषि सब्सिडी के मौजूदा नियमों में मौजूद असंतुलन को दूर किया जाना चाहिए। विकासशील देशों को किसानों की सहायता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
ऐसे नियम विकसित करने की जरूरत है, जो व्यापार को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी और विकास के लिए दी जाने वाली सहायता के बीच अंतर कर सकें। इससे देशों को घरेलू उद्योगों और रोजगार को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा, जबकि अनुचित प्रतिस्पर्धा पर भी नियंत्रण रखा जा सकेगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा या पर्यावरण संरक्षण के आधार पर लगाए जाने वाले एकतरफा व्यापारिक प्रतिबंधों के लिए स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय नियम बनाए जाने चाहिए। इससे इन उपायों के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा और व्यापारिक विवादों में पारदर्शिता बढ़ेगी।
कुछ देशों के बीच होने वाले बहुपक्षीय से अलग सीमित सदस्यता वाले समझौते WTO की व्यापक व्यवस्था के अनुरूप होने चाहिए। इनमें अन्य सदस्य देशों के हितों और भागीदारी के अवसरों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
संगठन की निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने, वार्ताओं को समयबद्ध करने और पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है। इसके सचिवालय की शोध एवं विश्लेषण क्षमता को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि सदस्य देशों को बेहतर नीतिगत जानकारी मिल सके।
भारत केवल सुधारों की मांग करने के बजाय उन्हें आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है। इसके लिए उसे विभिन्न देशों और समूहों के साथ सहयोग बढ़ाना होगा।
भारत G-33, अफ्रीकी समूह, ASEAN देशों और अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर कृषि, खाद्य सुरक्षा और विशेष एवं विभेदक व्यवहार जैसे मुद्दों पर साझा रुख तैयार कर सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में विकासशील देशों की आवाज अधिक प्रभावी हो सकती है।
भारत यूरोपीय संघ, जापान और अन्य समान विचार वाले देशों के साथ मिलकर WTO की विवाद निपटान व्यवस्था बहाल करने के लिए काम कर सकता है। इसमें उचित प्रक्रियागत सुधारों का समर्थन करना शामिल हो सकता है, लेकिन विवादों पर बाध्यकारी निर्णय देने की व्यवस्था को बनाए रखना भी जरूरी होगा।
अमेरिका की चिंताओं को पूरी तरह खारिज करने के बजाय भारत निर्णयों के लिए सख्त समय-सीमा, अपीलीय निकाय की व्याख्या संबंधी भूमिका की स्पष्ट सीमाएं और नए दायित्व न बनाने संबंधी दिशानिर्देश जैसे विकल्पों पर चर्चा का समर्थन कर सकता है। इससे विवाद निपटान व्यवस्था को बहाल करने के लिए सहमति बनाने में मदद मिल सकती है।
निवेश को आसान बनाने, डिजिटल व्यापार और जलवायु से जुड़े व्यापारिक उपायों जैसे नए विषयों पर भारत रचनात्मक बातचीत कर सकता है। इसका उद्देश्य ऐसे नियम तैयार करना होना चाहिए, जो व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ घरेलू विकास नीतियों के लिए आवश्यक स्वतंत्रता भी बनाए रखें।
भारत WTO में समयबद्ध वार्ताओं, अधिक पारदर्शिता और बेहतर शोध क्षमता जैसे सुधारों की वकालत कर सकता है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है और सदस्य देशों के बीच विश्वास बढ़ सकता है।
BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत के पास विकसित और विकासशील देशों के बीच सहमति बनाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारत संतुलित, निष्पक्ष और विकास-केंद्रित सुधारों को आगे बढ़ाकर वैश्विक व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।
एक मजबूत और सुधारों से लैस WTO केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता और भरोसे के लिए भी आवश्यक है। नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि देशों के व्यापारिक संबंध केवल आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि साझा नियमों और निष्पक्ष प्रक्रियाओं से संचालित हों।