भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते यानी India-EU Free Trade Agreement (FTA) से भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को यूरोपीय बाजार में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। यूरोपीय संघ की ओर से जारी समझौते के मसौदा पाठ के अनुसार, भारत में निर्मित यात्री कारों के लिए यूरोपीय बाजार में रियायती शुल्क व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके तहत शुरुआती चरण में हर साल 2.5 लाख भारतीय कारों को केवल 8% शुल्क पर यूरोपीय संघ के बाजार में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी।
यह प्रस्ताव भारतीय वाहन निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यूरोप दुनिया के प्रमुख ऑटोमोबाइल बाजारों में शामिल है। कम आयात शुल्क से भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय देशों में अपने वाहनों को अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेचने का अवसर बढ़ सकता है। इससे निर्यात, उत्पादन और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
प्रस्तावित समझौते के अनुसार, शुरुआती तौर पर हर साल 2.5 लाख भारतीय मूल की कारों को यूरोपीय संघ में 8% शुल्क के साथ प्रवेश मिलेगा। यह सुविधा मुख्य रूप से आंतरिक दहन इंजन (ICE) और हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन (HEV) के लिए होगी।
हालांकि, इस रियायती व्यवस्था के लिए वाहनों की कीमत की सीमा भी तय की गई है। 50,000 यूरो तक कीमत वाली कारों को यह कोटा आधारित सुविधा मिलेगी। यहां कार की कीमत CIF आधार पर मानी जाएगी, यानी वाहन की कीमत के साथ बीमा और माल ढुलाई की लागत को भी इसमें शामिल किया जाएगा।
यह व्यवस्था स्थायी रूप से 8% शुल्क पर नहीं रहेगी। समझौता लागू होने के बाद हर साल शुल्क में धीरे-धीरे कमी की जाएगी।
प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था के अनुसार पहले साल भारतीय कारों पर 8% शुल्क लगेगा। इसके बाद दूसरे साल यह घटकर 6%, तीसरे साल 4%, चौथे साल 2% और पांचवें साल शून्य हो जाएगा।
इसका अर्थ है कि समझौता लागू होने के पांचवें वर्ष तक निर्धारित कोटे के तहत पात्र भारतीय कारें बिना आयात शुल्क के यूरोपीय बाजार में प्रवेश कर सकेंगी। इससे भारतीय वाहन निर्माताओं को यूरोपीय बाजार में कीमत के स्तर पर बेहतर प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है।
शुल्क में कमी के साथ-साथ भारतीय कारों के लिए निर्धारित वार्षिक कोटा भी धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। शुरुआत में 2.5 लाख वाहनों का कोटा रखा गया है, जबकि 10वें वर्ष से यह बढ़कर 4 लाख वाहन प्रति वर्ष हो जाएगा।
इससे भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार में अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए लंबे समय का अवसर मिलेगा। अधिक कोटा मिलने से कंपनियां उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए मॉडल पेश करने और यूरोपीय ग्राहकों की जरूरतों के अनुसार अपनी रणनीति तैयार करने पर ध्यान दे सकती हैं।
जो वाहन निर्धारित वार्षिक कोटे से अधिक संख्या में यूरोपीय संघ में आयात किए जाएंगे, उन पर रियायती शुल्क लागू नहीं होगा। ऐसे वाहनों पर Most Favoured Nation (MFN) duty यानी सामान्य पसंदीदा राष्ट्र शुल्क लागू होगा।
वहीं, 50,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कारों को इस कोटा आधारित रियायत का लाभ नहीं मिलेगा। हालांकि, इन महंगी कारों के लिए भी शुल्क में चरणबद्ध कमी का प्रस्ताव है। इन पर शुरुआती 8% शुल्क धीरे-धीरे कम होकर 10वें वर्ष तक शून्य हो जाएगा।
प्रस्तावित समझौते में केवल पारंपरिक पेट्रोल-डीजल और हाइब्रिड कारों को ही शामिल नहीं किया गया है। इसमें बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (BEV), प्लग-इन हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन (PHEV) और अन्य तकनीकों से जुड़े वाहनों के लिए भी अलग-अलग टैरिफ-रेट कोटा का प्रस्ताव है।
यह व्यवस्था खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक ऑटोमोबाइल उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रहा है। भारत में भी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण और निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
40,000 यूरो तक कीमत वाले वाहनों के लिए प्रस्तावित कोटा समझौते के पांचवें वर्ष से शुरू होगा। शुरुआत में इसके तहत 27,500 वाहनों को 8% शुल्क पर यूरोपीय बाजार में प्रवेश की अनुमति होगी।
यह कोटा धीरे-धीरे बढ़कर 14वें वर्ष से 1.25 लाख वाहन हो जाएगा। वहीं, इन वाहनों पर शुल्क नौवें वर्ष से पूरी तरह समाप्त करने का प्रस्ताव है।
40,000 यूरो से अधिक और 60,000 यूरो तक कीमत वाले वाहनों के लिए पांचवें वर्ष से 16,250 वाहनों का कोटा प्रस्तावित है। यह आगे चलकर 75,000 वाहनों तक बढ़ाया जाएगा।
इसी तरह, 60,000 यूरो से अधिक कीमत वाले वाहनों के लिए शुरुआत में 6,250 वाहनों का कोटा होगा, जिसे 14वें वर्ष से बढ़ाकर 25,000 वाहन किया जाएगा।
इस तरह भारत-EU FTA में अलग-अलग कीमत और तकनीक वाले वाहनों के लिए चरणबद्ध रियायतों का प्रावधान रखा गया है।
प्रस्तावित व्यापार समझौते का फायदा केवल ऑटोमोबाइल क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसमें भारत के कुछ कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के लिए भी कोटा आधारित रियायतों का प्रस्ताव दिया गया है।
इन उत्पादों में टेबल अंगूर, सूखे प्याज, खीरा, घेरकिन, शीरे से बनी रम और घी जैसे उत्पाद शामिल हैं। इससे भारतीय कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए यूरोपीय बाजार में निर्यात के नए अवसर खुल सकते हैं।
मसौदे में घी के लिए विशेष प्रावधान किया गया है। इसके तहत हर साल 1,000 मीट्रिक टन घी को निर्धारित कोटे के भीतर आधार सीमा शुल्क के 50% शुल्क पर यूरोपीय बाजार में भेजने का प्रस्ताव है।
यह भारतीय डेयरी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है, क्योंकि यूरोपीय बाजार में कम शुल्क के कारण भारतीय उत्पादों की कीमत और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार हो सकता है।
भारत-EU FTA दोनों पक्षों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, कृषि और खाद्य उत्पादों जैसे क्षेत्रों को मिलने वाली प्रस्तावित रियायतें भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाजार तक पहुंच आसान बना सकती हैं।
भारतीय वाहन निर्माताओं के लिए कम शुल्क और बढ़ता कोटा निर्यात बढ़ाने का अवसर देगा, जबकि यूरोपीय ग्राहकों को भारतीय निर्मित वाहनों और उत्पादों के अधिक विकल्प मिल सकते हैं। हालांकि, अंतिम शुल्क, कोटा और अन्य शर्तें समझौते के अंतिम रूप और उसके लागू होने की प्रक्रिया पर निर्भर करेंगी।
कुल मिलाकर, प्रस्तावित India-EU FTA भारतीय ऑटोमोबाइल और कृषि-खाद्य क्षेत्र के लिए यूरोपीय बाजार में विस्तार का एक महत्वपूर्ण रास्ता खोल सकता है। यदि समझौते की प्रस्तावित व्यवस्था अंतिम रूप में लागू होती है, तो भारतीय कारों के निर्यात को अगले कई वर्षों में बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है।