अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 3.1% की दर से बढ़ेगी। यह जुलाई में लगाए गए 3% के अनुमान से थोड़ा अधिक है। संगठन के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बुनियादी ढांचे में बढ़ता निवेश मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और ऊर्जा की ऊंची कीमतों से पैदा होने वाले आर्थिक दबाव को कम करने में मदद कर रहा है।
बैंकॉक में IMF और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के बीच जारी अपनी ताजा वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट World Economic Outlook Report में संगठन ने वर्ष 2027 के लिए वैश्विक विकास दर 3.4% रहने का अनुमान लगाया है। हालांकि, ये दोनों अनुमान वर्ष 2025 में दर्ज 3.5% की विकास दर से कम हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों के बावजूद मजबूती दिखा रही है, लेकिन उसकी स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई का दबाव और सरकारों पर बढ़ता कर्ज आर्थिक विकास को कमजोर कर सकते हैं। यदि ये जोखिम और गंभीर होते हैं, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
AI से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश वैश्विक आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। कंप्यूटिंग प्रणालियों, डेटा सेंटर और संबंधित तकनीकों पर खर्च बढ़ने से कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ AI उपकरण बनाने वाले देशों में भी मांग को समर्थन मिल रहा है।
दक्षिण कोरिया, मलेशिया, मैक्सिको और थाईलैंड जैसी अर्थव्यवस्थाओं को AI से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भागीदारी का लाभ मिल रहा है। तकनीकी उपकरणों के निर्माण और उनसे जुड़े कारोबार में बढ़ती गतिविधियों ने यूरोप और अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी आर्थिक विकास के अनुमान बेहतर करने में योगदान दिया है।
हालांकि, इस निवेश का लाभ सभी देशों को समान रूप से नहीं मिल रहा है। IMF के मुताबिक, अब केवल 32 देश दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में 95% योगदान दे रहे हैं, जबकि अप्रैल में ऐसे देशों की संख्या 54 थी। इससे पता चलता है कि AI निवेश का लाभ कुछ अर्थव्यवस्थाओं में अधिक केंद्रित होता जा रहा है और कई देश इस अवसर से पीछे छूट रहे हैं।
मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़े जोखिमों में से एक है। तेल की कीमतें बढ़ने से उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ जाती है। इसका असर कारोबार, परिवारों और सरकारों के खर्च पर पड़ता है।
IMF के अनुसार, कई देशों और कंपनियों ने इस दबाव को कम करने के लिए अपने भंडार का उपयोग किया है, ऊर्जा के वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश की है और तेल की खपत घटाने के कदम उठाए हैं। इन उपायों से आर्थिक गतिविधियों को कुछ हद तक सहारा मिला है। हालांकि, यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो इन उपायों का असर सीमित हो सकता है।
संगठन ने चेताया कि युद्ध बढ़ने से ऊर्जा की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने और वैश्विक मांग कमजोर होने का खतरा है। इसके अलावा, अल नीनो से जुड़ी चरम मौसमी घटनाएं और सरकारों के लिए बढ़ती उधारी लागत भी आर्थिक दबाव बढ़ा सकती हैं।
संघर्ष से सीधे प्रभावित देशों की आर्थिक संभावनाओं में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है। IMF ने अनुमान लगाया है कि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था वर्ष 2026 में 3.3% सिकुड़ सकती है, जबकि जुलाई में इसके 1.7% बढ़ने का अनुमान लगाया गया था।
रिपोर्ट में कुछ अन्य खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी गंभीर अनुमान दिए गए हैं। वर्ष 2026 में ईरान की अर्थव्यवस्था में 7.6%, इराक में 16%, कुवैत में 16.7%, कतर में 15.6% और संयुक्त अरब अमीरात में 3.9% की गिरावट का अनुमान है।
ये अनुमान दिखाते हैं कि युद्ध, ऊर्जा उत्पादन में रुकावट और व्यापार में बाधाएं किसी देश की अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित कर सकती हैं। खासकर वे देश अधिक दबाव में आ सकते हैं, जिनकी आय और आर्थिक गतिविधियां ऊर्जा उत्पादन तथा उसके निर्यात पर निर्भर हैं।
IMF के अनुसार, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रह सकता है। संगठन ने वर्ष 2026 और 2027, दोनों के लिए भारत की आर्थिक विकास दर 7% रहने का अनुमान लगाया है।
जुलाई के अनुमान की तुलना में वर्ष 2026 की विकास दर का पूर्वानुमान 0.6 प्रतिशत अंक बढ़ाया गया है, जबकि वर्ष 2027 का अनुमान 0.3 प्रतिशत अंक ऊपर किया गया है। मजबूत घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र की गतिविधियां और AI से जुड़ा निवेश भारत की आर्थिक संभावनाओं को सहारा देने वाले प्रमुख कारक हैं। <Cite refs={["turn247749news12","turn247749search6"]} />
भारत का अनुमान उन देशों से अलग है, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं मध्य पूर्व के संघर्ष के सीधे प्रभाव का सामना कर रही हैं। देश में उपभोग की मजबूत मांग और तकनीक से जुड़ी गतिविधियों का विस्तार आर्थिक विकास को बनाए रखने में मदद कर सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी भारत के लिए चुनौती बनी रह सकती है।
IMF ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था में वर्ष 2026 और 2027, दोनों में 2.3% की वृद्धि का अनुमान लगाया है। निजी उपभोग, करों में कटौती और AI निवेश से आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलने की उम्मीद है। हालांकि, AI पर खर्च के कारण आयात बढ़ने से इसके कुछ लाभ सीमित हो सकते हैं।
यूरो क्षेत्र के लिए वर्ष 2026 की विकास दर का अनुमान 0.9% से बढ़ाकर 1.1% किया गया है। AI से जुड़ा निवेश, तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं में औद्योगिक भागीदारी और रक्षा क्षेत्र पर बढ़ता खर्च इसके प्रमुख कारण हैं। ब्रिटेन की विकास दर का अनुमान भी बढ़ाकर 1.3% किया गया है।
चीन की अर्थव्यवस्था वर्ष 2026 में 4.5% और वर्ष 2027 में 4% की दर से बढ़ सकती है। हालांकि, मजबूत निर्यात के बावजूद ऊर्जा की ऊंची कीमतें और घरेलू मांग में कमजोरी उसकी आर्थिक वृद्धि पर दबाव डाल सकती हैं।
IMF ने वर्ष 2026 में वैश्विक उपभोक्ता महंगाई दर 4.7% रहने का अनुमान लगाया है। वर्ष 2027 में इसके घटकर 4.1% होने की उम्मीद है। फिर भी, यदि ऊर्जा संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो कीमतों में अनुमान से अधिक वृद्धि हो सकती है।
संगठन के मुख्य अनुमान में वर्ष 2026 के दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत 96 डॉलर प्रति बैरल और वर्ष 2027 में 87 डॉलर प्रति बैरल मानी गई है। इसमें यह भी माना गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य मार्च 2027 में फिर से खुल जाएगा और अक्टूबर 2027 तक समुद्री परिवहन की स्थिति युद्ध से पहले जैसी हो जाएगी।
यदि अधिक गंभीर स्थिति में वर्ष 2027 की पहली तिमाही तक तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल पहुंच जाती है, तो वैश्विक विकास दर वर्ष 2026 में 0.2 प्रतिशत अंक और वर्ष 2027 में 0.5 प्रतिशत अंक कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में वर्ष 2027 की महंगाई दर 5.2% तक पहुंचने का अनुमान है।
IMF के अनुसार, AI को तेजी से अपनाने और इस क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश से वर्ष 2029 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 0.6% की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इसका अधिक लाभ अमेरिका और चीन को मिलने की संभावना है।
हालांकि, यदि AI से उत्पादकता में होने वाला सुधार उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा, तो इस क्षेत्र में निवेश तेजी से घट सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी GDP पर सीधे तौर पर 0.8% तक नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। इसका प्रभाव एशिया के उन देशों तक भी पहुंच सकता है, जो तकनीकी उपकरणों का निर्यात करते हैं।
संपत्तियों की कीमतों में गिरावट, वित्तीय स्थितियों का सख्त होना और उपभोग में कमी इस नुकसान को और बढ़ा सकते हैं। IMF के अनुमान के अनुसार, इन सभी प्रभावों के संयुक्त असर से वर्ष 2028 तक वैश्विक उत्पादन 1.1% तक कम हो सकता है।
IMF ने चेतावनी दी है कि खासकर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक कर्ज का ऊंचा स्तर उधारी की लागत बढ़ा सकता है और भविष्य की आर्थिक वृद्धि को सीमित कर सकता है।
संगठन ने सरकारों को वित्तीय भंडार दोबारा मजबूत करने और कर्ज को स्थिर स्तर पर लाने के लिए विश्वसनीय मध्यम अवधि की योजनाएं बनाने की सलाह दी है। यदि सरकारें जरूरी कदम उठाने में देरी करती हैं, तो भविष्य में आने वाले आर्थिक संकटों से निपटने की उनकी क्षमता कमजोर हो सकती है।
IMF की ताजा रिपोर्ट बताती है कि AI से जुड़े निवेश मध्य पूर्व के संघर्ष और ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। इसके बावजूद, विकास का असमान वितरण, महंगाई और बढ़ता सार्वजनिक कर्ज गंभीर चिंताएं बने हुए हैं।
भारत के लिए 7% विकास दर का अनुमान सकारात्मक संकेत है, लेकिन वैश्विक जोखिमों का असर देश पर भी पड़ सकता है। आने वाले वर्षों में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकारों को बेहतर वित्तीय योजना, मजबूत आर्थिक व्यवस्था और संभावित संकटों से निपटने की तैयारी पर ध्यान देना होगा।