पार्किंसन रोग के बढ़ने के साथ बदलते हैं प्लेटलेट्स के जीन, नई रिसर्च में खुलासा

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03 Nov 2026
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News Synopsis

पार्किंसन रोग एक तंत्रिका संबंधी बीमारी है, जो धीरे-धीरे मस्तिष्क और शरीर की गतिविधियों को प्रभावित करती है। इस बीमारी में मरीजों को चलने-फिरने, शरीर का संतुलन बनाए रखने और मांसपेशियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने में परेशानी हो सकती है। कुछ मरीजों में समय के साथ याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होती है। वैज्ञानिक लगातार ऐसे तरीकों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे बीमारी के बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले बदलावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

इसी दिशा में किए गए एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि पार्किंसन रोग की प्रगति के दौरान खून में मौजूद प्लेटलेट्स में कुछ महत्वपूर्ण आणविक बदलाव दिखाई दे सकते हैं। ये बदलाव बीमारी से जुड़ी जैविक गतिविधियों को समझने में मदद कर सकते हैं। Movement Disorders नामक जर्नल में प्रकाशित इस शोध में एक ऐसे मरीज का अध्ययन किया गया, जिसे कम उम्र में पार्किंसन रोग हुआ था और उसकी बीमारी तेजी से बढ़कर डिमेंशिया तक पहुंच गई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार, प्लेटलेट्स भविष्य में बीमारी से जुड़े बायोमार्कर की खोज के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। हालांकि, इस संभावना की पुष्टि के लिए अभी और बड़े अध्ययनों की आवश्यकता है।

दुर्लभ आनुवंशिक मामले से पार्किंसन रोग को समझने में मिली नई जानकारी (Rare Genetic Case Provides New Insights into Parkinson’s Disease)

शोधकर्ताओं ने स्पेन के एक ऐसे मरीज का अध्ययन किया, जिसे कम उम्र में पार्किंसन रोग का पता चला था। बीमारी बढ़ने के साथ उसकी सोचने-समझने और याद रखने की क्षमता तेजी से प्रभावित हुई और बाद में उसे डिमेंशिया हो गया।

मरीज में पाया गया था SNCA जीन से जुड़ा असामान्य बदलाव (An Unusual Change in the SNCA Gene Was Found)

इस मरीज के जीन में एक विशेष बदलाव पाया गया था। उसके जीनोम के उस हिस्से की तीन प्रतियां मौजूद थीं, जिसमें SNCA जीन शामिल है। सामान्य रूप से इस जीन की भूमिका अल्फा-सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन बनाने के निर्देश देने में होती है।

अल्फा-सिन्यूक्लिन प्रोटीन का संबंध पार्किंसन रोग से है। इस बीमारी से प्रभावित लोगों के मस्तिष्क में यह प्रोटीन असामान्य रूप से जमा हो सकता है। इसके कारण मस्तिष्क की सामान्य गतिविधियां प्रभावित होने की आशंका रहती है।

जर्मन्स ट्रायस आई पुजोल रिसर्च इंस्टीट्यूट, स्पेन और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं के अनुसार, मरीज में पाया गया यह आनुवंशिक बदलाव उसके माता-पिता से विरासत में नहीं मिला था, बल्कि अपने आप विकसित हुआ था। वैज्ञानिक भाषा में इसे डी नोवो (De Novo) बदलाव कहा जाता है।

यह दुर्लभ मामला शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे उन्हें बीमारी के अलग-अलग चरणों में होने वाले आणविक बदलावों का अध्ययन करने का अवसर मिला।

पूरे खून की तुलना में प्लेटलेट्स में दिखे अधिक आणविक बदलाव (Platelets Show More Molecular Changes Than Whole Blood)

शोधकर्ताओं ने मरीज की बीमारी के बढ़ने के दौरान अलग-अलग समय पर उसके खून के नमूनों का विश्लेषण किया। उन्होंने दो अलग-अलग उम्र में उसके जीन की गतिविधियों की तुलना की।

41 और 44 वर्ष की उम्र में किया गया विश्लेषण (Analysis at Ages 41 and 44)

पहला विश्लेषण उस समय किया गया, जब मरीज 41 वर्ष का था और बीमारी शुरुआती चरण में थी। इसके बाद दूसरा विश्लेषण 44 वर्ष की उम्र में किया गया, जब तक उसे डिमेंशिया हो चुका था।

इस दौरान वैज्ञानिकों ने जीन एक्सप्रेशन का अध्ययन किया। जीन एक्सप्रेशन से पता चलता है कि शरीर में कोई विशेष जीन कितना सक्रिय है और वह किन जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभा रहा है।

अध्ययन में सामने आया कि पूरे खून के नमूनों की तुलना में प्लेटलेट्स में बीमारी के बढ़ने से जुड़े कहीं अधिक बदलाव दिखाई दिए। इससे संकेत मिलता है कि प्लेटलेट्स बीमारी के अलग-अलग चरणों से जुड़े आणविक संकेतों को पहचानने के लिए अधिक संवेदनशील स्रोत हो सकते हैं।

प्लेटलेट्स खून में मौजूद बहुत छोटे घटक होते हैं। इनका मुख्य काम रक्तस्राव को रोकने और खून का थक्का बनाने में मदद करना है। हालांकि, इस अध्ययन से पता चलता है कि इनकी भूमिका से जुड़ी आणविक गतिविधियों का उपयोग कुछ बीमारियों के जैविक बदलावों को समझने के लिए भी किया जा सकता है।

माइटोकॉन्ड्रिया और सूजन से जुड़े जीन में मिले बदलाव (Changes Found in Genes Linked to Mitochondria and Inflammation)

शोधकर्ताओं ने ऐसे कई जीन की पहचान की, जिनकी गतिविधियों में बीमारी बढ़ने के साथ बदलाव आया। ये जीन शरीर की कुछ महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े हुए थे।

तीन प्रमुख जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े बदलाव (Changes Linked to Three Key Biological Processes)

अध्ययन में सामने आए बदलाव मुख्य रूप से इन प्रक्रियाओं से संबंधित थे:

  • माइटोकॉन्ड्रिया की गतिविधियां (Mitochondrial Activity): माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं में ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे जुड़े जीन में बदलाव कोशिकाओं की ऊर्जा संबंधी गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

  • प्रोटीन का निर्माण (Protein Synthesis): शरीर में प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया कई जैविक गतिविधियों के लिए जरूरी होती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस प्रक्रिया से जुड़े कुछ जीन की गतिविधियों में भी बदलाव आया।

  • सूजन का नियंत्रण (Inflammation Regulation): शरीर में सूजन से जुड़ी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं से संबंधित जीन में भी बदलाव देखा गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, ये अंतर पार्किंसन रोग के बढ़ने के दौरान शरीर में होने वाली जैविक गतिविधियों के बारे में अतिरिक्त जानकारी देते हैं।

इस अध्ययन की पहली लेखिका सुजाना जिमेनेज-रोमान, जो जर्मन्स ट्रायस आई पुजोल रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रीडॉक्टोरल शोधकर्ता हैं, ने बताया कि इस दुर्लभ मामले ने टीम को समय के साथ बदलते आणविक संकेतों का अध्ययन करने का अवसर दिया। उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि पूरे खून की तुलना में प्लेटलेट्स में अधिक स्पष्ट बदलाव दिखाई दिए। इससे बीमारी से जुड़े आसानी से उपलब्ध बायोमार्कर की खोज में उनकी संभावित उपयोगिता सामने आती है।

सामान्य रूप से होने वाले पार्किंसन रोग के मरीजों पर भी किया गया अध्ययन (Study Also Examines Patients With Sporadic Parkinson’s Disease)

यह समझने के लिए कि क्या दुर्लभ आनुवंशिक मामले में मिले बदलाव दूसरे मरीजों में भी दिखाई देते हैं, शोधकर्ताओं ने एक स्वतंत्र समूह का विश्लेषण किया।

15 मरीजों और 18 स्वस्थ लोगों के नमूनों की तुलना (Comparison of 15 Patients and 18 Healthy Individuals)

इस समूह में कम उम्र में शुरू होने वाले सामान्य पार्किंसन रोग से प्रभावित 15 मरीज और 18 स्वस्थ व्यक्ति शामिल थे। इन मरीजों में दुर्लभ आनुवंशिक बदलाव मौजूद नहीं था।

इस विश्लेषण का उद्देश्य यह पता लगाना था कि पहले मरीज में प्लेटलेट्स से जुड़े जो आणविक बदलाव देखे गए थे, क्या वे सामान्य रूप से होने वाले पार्किंसन रोग में भी मिलते हैं।

शोधकर्ताओं को प्लेटलेट्स के जीन एक्सप्रेशन में कुछ ऐसे अंतर मिले, जो पहले मरीज के अध्ययन के निष्कर्षों से मेल खाते थे। इनमें SNCA RNA के एक प्रकार की अभिव्यक्ति में कमी और प्रोटीन निर्माण से जुड़े दो जीन की गतिविधि में कमी शामिल थी।

हालांकि, जिन विशेष जीन का अध्ययन किया गया था, उनके लिए पूरे खून के नमूनों में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। यह परिणाम प्लेटलेट्स और पूरे खून के नमूनों के बीच अंतर को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण था।

अलग-अलग प्रकार के पार्किंसन रोग में समान जैविक प्रक्रियाओं के संकेत (Findings Suggest Shared Mechanisms in Different Forms of Parkinson’s)

दुर्लभ आनुवंशिक मामले और सामान्य रूप से होने वाले शुरुआती पार्किंसन रोग के मरीजों में कुछ समान आणविक बदलाव मिलना शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि बीमारी के अलग-अलग प्रकारों में कुछ जैविक प्रक्रियाएं समान हो सकती हैं।

जिमेनेज-रोमान के अनुसार, असामान्य आनुवंशिक मामलों का अध्ययन करने से वैज्ञानिकों को ऐसे आणविक तंत्रों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जो दूसरे मरीजों में भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इस तरह के अध्ययन से यह समझने का रास्ता खुल सकता है कि पार्किंसन रोग के बढ़ने के साथ शरीर में कौन-से बदलाव होते हैं और क्या इन बदलावों को खून के नमूनों के माध्यम से पहचाना जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

यह अध्ययन पार्किंसन रोग की प्रगति को समझने में ब्लड प्लेटलेट्स की संभावित भूमिका को सामने लाता है। शोधकर्ताओं ने बीमारी के अलग-अलग चरणों में प्लेटलेट्स के जीन एक्सप्रेशन में बदलाव पहचाने हैं। इसके अलावा, सामान्य रूप से होने वाले शुरुआती पार्किंसन रोग के मरीजों में भी कुछ समान बदलाव देखने को मिले।

ये निष्कर्ष भविष्य में खून पर आधारित बायोमार्कर विकसित करने से जुड़े शोध के लिए उपयोगी आधार बन सकते हैं। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्लेटलेट्स के ये बदलाव बीमारी की प्रगति पर नजर रखने या मरीजों के इलाज में सीधे इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इसके लिए बड़े समूहों पर अध्ययन और आगे की वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
 

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