भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय समिति के 79वें सत्र (RC79) में देश में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या और चिकित्सा शिक्षा के तेजी से हो रहे विस्तार को प्रमुखता से सामने रखा। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने तिमोर-लेस्ते में आयोजित एक मंत्रीस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि सभी लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
WHO RC79 बैठक में खास तौर पर विशेष स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाने और ग्रामीण, दूरदराज तथा स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को दूर करने पर चर्चा हुई। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा Union Minister for Health and Family Welfare J.P. Nadda ने कहा कि सभी लोगों के लिए समान स्वास्थ्य सुविधा सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सा शिक्षा, पेशेवर प्रशिक्षण, स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती, उन्हें सेवाओं में बनाए रखने और लगातार उनके कौशल को विकसित करने में नियमित निवेश जरूरी है।
भारत ने पिछले एक दशक में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में बड़े स्तर पर विस्तार किया है। सरकार के अनुसार, देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 2014 में 387 से बढ़कर अब 858 हो गई है। यानी इस अवधि में मेडिकल कॉलेजों की संख्या में 121 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
इसी तरह, एमबीबीएस सीटों की संख्या भी काफी बढ़ी है। यह संख्या 51,348 से बढ़कर 1,42,464 हो गई है। वहीं, स्नातकोत्तर यानी पीजी मेडिकल सीटों की संख्या 31,185 से बढ़कर 86,287 हो गई है।
सरकार वर्ष 2028-29 तक 10,000 अतिरिक्त स्नातकोत्तर मेडिकल सीटें बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों और चिकित्सा विशेषज्ञताओं में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाना है, जहां अभी भी प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है।
इनमें आपातकालीन चिकित्सा, वृद्धावस्था चिकित्सा, मनोचिकित्सा और पारिवारिक चिकित्सा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन विशेषज्ञताओं में क्षमता बढ़ने से जरूरतमंद मरीजों को अपने क्षेत्र के नजदीक बेहतर और विशेष उपचार मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने की योजना में नर्सिंग शिक्षा को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सरकार मौजूदा मेडिकल कॉलेजों के साथ 157 नए नर्सिंग कॉलेज स्थापित कर रही है।
इन नए संस्थानों से हर साल लगभग 15,700 नए नर्सिंग स्नातक तैयार होने की उम्मीद है। इस पहल का उद्देश्य ऐसे जिलों और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में गुणवत्तापूर्ण नर्सिंग शिक्षा को ज्यादा सुलभ बनाना है, जहां अभी इसकी पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है।
भारत ने 10 महत्वपूर्ण विशेषज्ञ क्षेत्रों में नर्स प्रैक्टिशनर कार्यक्रम भी शुरू किए हैं। इन कार्यक्रमों को राष्ट्रीय नर्सिंग एवं मिडवाइफरी आयोग अधिनियम, 2023 का समर्थन प्राप्त है।
इससे नर्सिंग पेशेवरों को उन्नत प्रशिक्षण और विशेषज्ञ सेवाओं से जोड़ने में मदद मिल सकती है। साथ ही, डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते काम के दबाव को कम करने में भी प्रशिक्षित नर्सिंग कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अन्य प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने पर भी काम कर रहा है। सरकार ने अगले पांच वर्षों में 1 लाख संबद्ध और स्वास्थ्य पेशेवरों को तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय आयोग, जिसे 2021 के कानून के तहत स्थापित किया गया और 2024 में लागू किया गया, देश में इन पेशों के लिए एक व्यवस्थित नियामक ढांचा उपलब्ध कराता है।
यह व्यवस्था 57 संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसायों को शामिल करती है। इससे इन पेशेवरों के प्रशिक्षण और काम के मानकों को बेहतर बनाने के साथ-साथ विशेष स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
भारत में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं भी भौगोलिक दूरी के कारण पैदा होने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जेपी नड्डा ने आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के योगदान को रेखांकित किया, जो जांच, शुरुआती बीमारी की पहचान और जरूरत पड़ने पर मरीजों को आगे रेफर करने सहित व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं।
आयुष्मान आरोग्य शिविर भी उन समुदायों तक जांच और विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श पहुंचाने में मदद कर रहे हैं, जहां लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचना मुश्किल है।
इसके अलावा, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्रथम रेफरल इकाइयों को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि ग्रामीण और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों के लोगों को विशेषज्ञ और रेफरल सेवाएं अपेक्षाकृत नजदीक मिल सकें।
ग्रामीण, दूरदराज और कठिन क्षेत्रों में डॉक्टरों तथा अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए सरकार कई तरह के प्रोत्साहन उपायों पर जोर दे रही है।
इनमें प्रतिस्पर्धी वेतन, कठिन क्षेत्र भत्ता, प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन, विशेषज्ञ सेवा व्यवस्था और निश्चित अवधि की तैनाती शामिल हैं। इन उपायों का उद्देश्य स्वास्थ्य पेशेवरों को कठिन क्षेत्रों में काम करने के लिए प्रोत्साहित करना और वहां उनकी सेवाओं को लंबे समय तक बनाए रखना है।
भारत डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मरीजों और स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच संपर्क को आसान बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। eSanjeevani टेली-कंसल्टेशन यानी दूर बैठे डॉक्टर से चिकित्सकीय सलाह लेने की सुविधा उपलब्ध कराता है।
वहीं, ABHA से जुड़े डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड मरीजों के रेफरल और उनकी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को लगातार उपलब्ध रखने में मदद कर सकते हैं। ये सुविधाएं खास तौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जो ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों में रहते हैं जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों और बड़े अस्पतालों की संख्या सीमित है।
RC79 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन: विशेष स्वास्थ्य सेवाओं में समानता पर डिली घोषणा को अपनाना रहा। WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों ने इस घोषणा को स्वीकार किया।
घोषणा में कहा गया कि स्वास्थ्यकर्मियों की योजना, शिक्षा और वित्तीय निवेश को बदलती स्वास्थ्य जरूरतों, जनसांख्यिकीय बदलावों और आपातकालीन स्थितियों से निपटने की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
इसमें ग्रामीण और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में विशेषज्ञों को आकर्षित करने, उनकी भर्ती करने, तैनात करने और लंबे समय तक सेवाओं में बनाए रखने के लिए बेहतर नीतियां बनाने पर भी जोर दिया गया है।
डिली घोषणा में काम का बंटवारा, मार्गदर्शन, रोटेशन के आधार पर सेवाएं और विशेषज्ञों के अस्थायी दौरे जैसे तरीकों को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसके साथ ही बेहतर रेफरल नेटवर्क और टेली-कंसल्टेशन व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया गया है।
सदस्य देशों ने मोबाइल विशेषज्ञ टीमों, समुदाय आधारित सेवाओं और स्वास्थ्य शिविरों जैसे तरीकों को अपनाने का समर्थन किया। घोषणा में टेलीमेडिसिन, टेली-कंसल्टेशन और AI आधारित चिकित्सकीय तकनीकों के सुरक्षित और समान उपयोग को भी बढ़ावा दिया गया है।
इन सेवाओं में कैंसर, हृदय रोग, चोट और दुर्घटना से जुड़ी चिकित्सा, मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, वृद्धावस्था चिकित्सा और पुनर्वास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।
RC79 सत्र के दौरान भारत को WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के दो पुरस्कार भी मिले। भारत को पिछले एक दशक में मातृ और नवजात टिटनेस के क्षेत्रीय उन्मूलन की स्थिति बनाए रखने के लिए सम्मानित किया गया।
भारत को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से गैर-संचारी रोगों से निपटने के प्रयासों के लिए भी मान्यता मिली। इसमें उच्च रक्तचाप और मधुमेह के उपचार के लिए तय प्रोटोकॉल आधारित राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना शामिल है।
जेपी नड्डा ने इन सम्मानों को स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम हासिल करने में इन कर्मचारियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।
भारत में स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती संख्या, मेडिकल शिक्षा के विस्तार और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को दूर करने में मदद कर रहा है। मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या बढ़ाने से लेकर नर्सिंग तथा संबद्ध स्वास्थ्य सेवाओं में नए अवसर पैदा करने तक, देश स्वास्थ्य क्षेत्र के मानव संसाधन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने, डिजिटल तकनीक का उपयोग करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने से स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक समान और सुलभ बनाने में मदद मिल सकती है। ये प्रयास भारत के साथ-साथ व्यापक स्तर पर सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं