भारत में कारोबार और निवेश को आसान बनाने की दिशा में पिछले एक दशक के दौरान राज्यों ने 40,000 से अधिक कारोबारी सुधार लागू किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य कंपनियों के लिए सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाना, अनावश्यक नियमों और अनुपालन का बोझ कम करना तथा घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल कारोबारी माहौल तैयार करना है।
उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) Department for Promotion of Industry and Internal Trade (DPIIT) के अनुसार, गुजरात उन राज्यों में प्रमुख रूप से सामने आया है, जिन्होंने कारोबार से जुड़े सुधारों को लागू करने में तेजी दिखाई है। केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों के जरिए भारत में कारोबारी प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी, सरल और प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही है।
इन सुधारों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत विनिर्माण, स्टार्टअप, तकनीक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। आसान नियम और बेहतर बुनियादी ढांचा कंपनियों को देश में निवेश करने तथा अपनी गतिविधियों का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
कारोबारी सुधारों को लागू करने में बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह कार्यक्रम केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है और कारोबार से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर ध्यान केंद्रित करता है।
इसके तहत कंपनियों को सरकारी मंजूरी लेने, पंजीकरण कराने और विभिन्न नियमों का पालन करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के प्रयास किए गए हैं। अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं को कम करना भी इस सुधार प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है।
सरकार अब नियमन में कमी और कुछ प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर भी जोर दे रही है। इसका उद्देश्य ऐसी छोटी-छोटी प्रक्रियात्मक गलतियों के लिए अत्यधिक दंड और अनुपालन का बोझ कम करना है, जिनसे कारोबार की सामान्य गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
कारोबारी सुधारों का दायरा अब केवल राज्य की राजधानियों या बड़े औद्योगिक केंद्रों तक सीमित रखने के बजाय जिला स्तर तक ले जाने की कोशिश की जा रही है।
इसके लिए डिस्ट्रिक्ट बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान जैसी पहल की जा रही है। इसका उद्देश्य जिलों में कारोबार करने वाले लोगों और कंपनियों के लिए सरकारी सेवाओं तथा नियामकीय प्रक्रियाओं को आसान बनाना है।
यह पहल छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि देश के कई छोटे उद्यम बड़े शहरों और औद्योगिक केंद्रों से बाहर काम करते हैं। स्थानीय स्तर पर बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था उन्हें कारोबार बढ़ाने में मदद कर सकती है।
केवल नियमों को आसान बनाना ही पर्याप्त नहीं है। निवेश और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए मजबूत औद्योगिक बुनियादी ढांचा भी जरूरी है। इसी दिशा में सरकार राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम National Industrial Corridor Development Programme को आगे बढ़ा रही है।
इस कार्यक्रम के तहत 20 से अधिक औद्योगिक टाउनशिप विकसित की जा रही हैं। इन औद्योगिक केंद्रों में बेहतर सड़क, परिवहन, बिजली, लॉजिस्टिक्स और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
इन टाउनशिप के माध्यम से ऐसे औद्योगिक केंद्र तैयार करने की कोशिश की जा रही है जहां कंपनियां अपेक्षाकृत बेहतर सुविधाओं के साथ उत्पादन शुरू कर सकें। इससे निवेश बढ़ने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
भारत में विनिर्माण को मजबूत करने के लिए सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं का भी इस्तेमाल कर रही है।
वर्तमान में PLI योजनाएं 14 क्षेत्रों को कवर करती हैं। इनके माध्यम से कंपनियों को देश में उत्पादन बढ़ाने, निवेश करने और घरेलू विनिर्माण क्षमता विकसित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
राज्य सरकारें भी अपनी औद्योगिक नीतियों, निवेश प्रोत्साहनों और स्थानीय योजनाओं के जरिए केंद्र की पहलों को सहयोग दे रही हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए अधिक आकर्षक विनिर्माण केंद्र बनाना है।
भारत अपने घरेलू उद्योग को मजबूत करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने पर भी ध्यान दे रहा है। इसके लिए विभिन्न देशों और समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए जा रहे हैं।
यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA), ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने से भारतीय कंपनियों को विदेशी बाजारों में बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार तक आसान पहुंच भारतीय निर्माताओं को गुणवत्ता सुधारने, उत्पादकता बढ़ाने और लागत को प्रतिस्पर्धी रखने के लिए भी प्रेरित कर सकती है।
बेहतर व्यापार समझौते और औद्योगिक क्षमता भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद कर सकते हैं।
यदि भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन बढ़ाती हैं, तो वे वैश्विक कंपनियों के लिए आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती हैं। इससे निर्यात और घरेलू विनिर्माण दोनों को लाभ मिलने की संभावना है।
भारत सरकार कारोबार को बढ़ावा देने के साथ-साथ नवाचार और उन्नत तकनीक के क्षेत्र पर भी ध्यान दे रही है।
रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड और फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स जैसी पहलें नई तकनीक विकसित करने वाले स्टार्टअप और उद्यमों को समर्थन देने के लिए बनाई गई हैं।
इन योजनाओं का उद्देश्य अनुसंधान और विकास में निवेश को बढ़ावा देना तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना है। खासतौर पर डीप-टेक जैसे उभरते क्षेत्रों में काम करने वाले स्टार्टअप के लिए वित्तीय और संस्थागत सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (QCI) भी विभिन्न औद्योगिक समूहों के स्तर पर गुणवत्ता और उत्पादकता सुधारने के लिए काम कर रही है।
इसके प्रयासों में बेहतर इनपुट, मानक, परीक्षण व्यवस्था और उत्पादकता को मजबूत करना शामिल है। बेहतर गुणवत्ता व्यवस्था से भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है।
कारोबारी सुधारों और निवेश के अनुकूल माहौल तैयार करने के मामले में गुजरात देश के प्रमुख राज्यों में शामिल हुआ है।
राज्य ने अपनी अर्थव्यवस्था के लिए ₹332.99 लाख करोड़, यानी लगभग 3.50 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। महामारी के वर्षों को छोड़ दें तो गुजरात की अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में लगभग 10-11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है।
राज्य में मजबूत ऋण प्रवाह, वस्तु एवं सेवा कर यानी GST संग्रह में बढ़ोतरी और बिजली की मांग में वृद्धि जैसे संकेतक आर्थिक गतिविधियों की मजबूती की ओर इशारा करते हैं।
हालांकि गुजरात की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत प्रदर्शन कर रही है, लेकिन लंबे समय के आर्थिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए विकास की गति को और बढ़ाना जरूरी होगा।
इसके लिए औद्योगिक बुनियादी ढांचे में सुधार, बेहतर कारोबारी नियम, निवेश नीतियों को अधिक प्रभावी बनाना और विनिर्माण क्षमता का विस्तार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
गुजरात का उदाहरण यह भी दिखाता है कि भारत के राज्यों की भूमिका अब केवल निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं है। वे अपने स्तर पर ऐसा कारोबारी वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जहां कंपनियों को लंबे समय तक काम करने और विस्तार करने की सुविधा मिले।
पिछले दस वर्षों में 40,000 से अधिक कारोबारी सुधारों का लागू होना भारत में कारोबारी वातावरण को बेहतर बनाने के लगातार प्रयास को दर्शाता है।
नियमों को सरल बनाने, अनुपालन का बोझ घटाने, कुछ प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने, औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने, विनिर्माण को प्रोत्साहन देने और नवाचार में निवेश बढ़ाने जैसे कदम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जिला स्तर तक सुधारों का विस्तार होने से छोटे शहरों और कस्बों में कारोबार करने वाले उद्यमियों को भी लाभ मिल सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान होने और निवेश के नए अवसर पैदा होने की संभावना है।
भारत यदि घरेलू और विदेशी निवेश को और आकर्षित करना चाहता है, तो नियामकीय सुधारों के साथ-साथ बुनियादी ढांचे, कौशल, गुणवत्ता, तकनीक और नवाचार पर लगातार काम करना जरूरी होगा।
भारत के कारोबारी माहौल को मजबूत बनाने में केंद्र सरकार की नीतियों के साथ राज्य सरकारों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। कंपनियां निवेश का निर्णय लेते समय स्थानीय नियमों, बुनियादी ढांचे, बिजली, जमीन, लॉजिस्टिक्स और सरकारी सेवाओं की उपलब्धता जैसे कई पहलुओं पर विचार करती हैं।
इसलिए राज्य और जिला स्तर पर सुधारों का प्रभाव निवेशकों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि अलग-अलग राज्यों में प्रक्रियाएं अधिक सरल और पारदर्शी बनती हैं, तो भारत की समग्र निवेश क्षमता को और मजबूती मिल सकती है।
कारोबारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने का सीधा लाभ कंपनियों को मिलने के साथ-साथ रोजगार के अवसरों पर भी पड़ सकता है। नए उद्योग स्थापित होने, मौजूदा कंपनियों के विस्तार और उत्पादन बढ़ने से कुशल तथा अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
औद्योगिक गलियारों, PLI योजनाओं, स्टार्टअप समर्थन और मुक्त व्यापार समझौतों का संयुक्त प्रभाव भारत को उत्पादन और निर्यात के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी केंद्र बनाने में मदद कर सकता है।
भारत में पिछले एक दशक के दौरान लागू किए गए 40,000 से अधिक कारोबारी सुधार देश में कारोबार को आसान और निवेश के लिए अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में एक बड़े प्रयास को दर्शाते हैं। बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान से लेकर जिला स्तर की सुधार योजनाओं तक, सरकार कारोबारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की कोशिश कर रही है।
इसके साथ ही औद्योगिक गलियारों का विकास, 14 क्षेत्रों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, मुक्त व्यापार समझौते, नवाचार और स्टार्टअप के लिए वित्तीय सहायता तथा गुणवत्ता सुधार जैसे कदम भारत की आर्थिक क्षमता को मजबूत करने में योगदान दे सकते हैं।
गुजरात का प्रदर्शन इस बात का उदाहरण है कि राज्य स्तर पर बेहतर नीतियां और कारोबारी माहौल निवेश को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आने वाले वर्षों में यदि नियामकीय सुधारों के साथ बुनियादी ढांचे, कौशल, तकनीक और नवाचार पर भी लगातार ध्यान दिया जाता है, तो भारत अपने घरेलू उद्योग को मजबूत करने के साथ वैश्विक निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति और बेहतर कर सकता है।