संयुक्त राष्ट्र में विकासशील देशों ने Artificial Intelligence यानी AI के भविष्य और उसके नियम तय करने की प्रक्रिया में अधिक बड़ी भूमिका की मांग की है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के नेताओं ने चिंता जताई कि यदि AI का विकास, नियंत्रण और नियमन मुख्य रूप से अमीर देशों और बड़ी तकनीकी कंपनियों तक सीमित रहा, तो यह तकनीक वैश्विक असमानता को कम करने के बजाय और बढ़ा सकती है।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा United Nations General Assembly के दौरान हुई चर्चाओं में AI को लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की चिंताएं सामने आईं। चर्चा में यह मुद्दा प्रमुख रहा कि AI से मिलने वाले लाभ और इससे पैदा होने वाले जोखिमों का बंटवारा किस तरह होगा। संयुक्त राष्ट्र में हाल ही में AI को लेकर हुई चर्चाओं में तकनीकी क्षेत्र के प्रमुख नेताओं ने भी सरकारों से मिलकर काम करने और AI से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन की अपील की।
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की विदेश मंत्री थेरेसे कायिकवाम्बा वैगनर ने कहा कि विकासशील देशों को ऐसी तकनीकों का केवल उपयोगकर्ता नहीं बनाया जाना चाहिए, जिन्हें कहीं और विकसित किया गया है।
उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को ऐसे मानकों और नियमों को केवल स्वीकार करने वाले देशों की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जिन्हें बनाने में उनकी पर्याप्त भागीदारी नहीं रही है।
वैगनर ने इस बात पर जोर दिया कि 21वीं सदी में तकनीकी बदलावों के कारण पुराने दशकों जैसी आर्थिक असमानताएं दोबारा पैदा नहीं होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि यदि AI की तकनीक और उसके नियम कुछ गिने-चुने देशों या कंपनियों के नियंत्रण में रहते हैं, तो विकासशील देशों की निर्भरता बढ़ सकती है। इससे AI से मिलने वाले आर्थिक और सामाजिक लाभ भी समान रूप से वितरित नहीं हो पाएंगे।
संयुक्त राष्ट्र में AI को लेकर बढ़ती दिलचस्पी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान, जिन्होंने इस वर्ष UN की चर्चा की अध्यक्षता की, ने बताया कि चार वर्ष पहले इस मंच पर केवल पांच देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने AI का मुद्दा उठाया था।
इस वर्ष 128 प्रतिनिधिमंडलों ने AI का उल्लेख किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष के अनुसार, AI अब अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं के केंद्र में आ चुका है।
रहमान ने AI को लेकर उठ रहे सवालों को शासन और जिम्मेदारी से जोड़ते हुए पूछा कि AI को कौन डिजाइन करता है, उसका लाभ किसे मिलता है, उसके जोखिम कौन उठाता है और नुकसान होने पर जवाबदेही किसकी होगी।
यह सवाल केवल तकनीक के विकास तक सीमित नहीं है। AI का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सरकारी सेवाओं और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है। इसलिए इसके नियमों और उपयोग को लेकर अलग-अलग देशों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
AI को लेकर चिंता के साथ इसके संभावित लाभों पर भी चर्चा हुई। World Bank की 2026 की World Development Report के अनुसार, विकासशील देश सही बुनियादी ढांचे, कौशल और संस्थागत व्यवस्था पर तेजी से काम करें तो AI ऐसी विकास गति उपलब्ध करा सकता है, जिसे हासिल करने में पारंपरिक परिस्थितियों में कहीं अधिक समय लग सकता था।
रिपोर्ट के अनुसार, AI विकासशील देशों में डॉक्टरों, कृषि विशेषज्ञों और अन्य कुशल पेशेवरों की कमी को कुछ हद तक पूरा करने में मदद कर सकता है। AI आधारित मौसम पूर्वानुमान किसानों के फैसलों में सहायता कर सकते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं में विशेषज्ञता की पहुंच बढ़ाई जा सकती है।
हालांकि, AI का लाभ उठाने के लिए केवल तकनीक उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। विश्व बैंक ने बिजली, इंटरनेट कनेक्टिविटी, कंप्यूटिंग क्षमता, स्थानीय डेटा और डिजिटल कौशल को महत्वपूर्ण आधार बताया है।
विकासशील देशों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि AI की सुविधाएं तभी व्यापक स्तर पर पहुंच सकती हैं, जब लोगों और संस्थाओं के पास विश्वसनीय इंटरनेट, बिजली और जरूरी डिजिटल कौशल मौजूद हों।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष International Monetary Fund यानी IMF ने जुलाई 2026 में कहा था कि यदि उपयुक्त परिस्थितियां बनाई जाती हैं, तो AI अगले दशक में उप-सहारा अफ्रीका की अर्थव्यवस्था में लगभग 4 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि में योगदान दे सकता है।
हालांकि, IMF के अनुसार मौजूदा तैयारी के स्तर पर संभावित लाभ काफी कम हो सकता है। बिजली, डिजिटल बुनियादी ढांचे, इंटरनेट और तकनीकी कौशल में सुधार AI से मिलने वाले आर्थिक लाभ को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव Antonio Guterres ने AI को लेकर वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने AI की तेजी से बदलती प्रकृति की तुलना जलवायु संकट से की और कहा कि विकासशील देशों को दोनों मुद्दों पर समान आवाज मिलनी चाहिए।
Guterres के अनुसार, जलवायु संकट कभी दूर की चेतावनी जैसा लगता था, लेकिन अब उसका प्रभाव रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है। दूसरी ओर, AI इतनी तेजी से विकसित हुआ है कि इसके निर्माण में शामिल लोगों को भी इसकी गति ने आश्चर्यचकित किया है।
Guterres ने AI और जलवायु संकट को केवल अलग-अलग तकनीकी या पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में देखने के बजाय सत्ता और उसके इस्तेमाल से जोड़कर देखा। उनके अनुसार मुख्य सवाल यह है कि शक्ति किसके पास है, किसे उससे दूर रखा जाता है और उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाता है।
इसी कारण उन्होंने AI से जुड़े जोखिमों से निपटने के लिए अलग-अलग देशों की अलग-अलग कोशिशों के बजाय समन्वित वैश्विक कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया।
संयुक्त राष्ट्र की चर्चाओं में AI के संभावित लाभों के साथ उसके जोखिमों पर भी अलग-अलग विचार सामने आए। OpenAI के CEO Sam Altman और Anthropic के CEO Dario Amodei ने AI के प्रबंधन के लिए सरकारों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने AI से जुड़े कुछ गंभीर जोखिमों की आशंकाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई चिंता बताया और AI की तुलना जलवायु परिवर्तन से करते हुए ऐसी चेतावनियों पर सवाल उठाए।
इससे AI को लेकर वैश्विक स्तर पर मौजूद मतभेद भी सामने आते हैं—एक ओर कुछ विशेषज्ञ मजबूत सुरक्षा उपायों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ नीति-निर्माता AI के विकास और नवाचार को सीमित करने वाली वैश्विक व्यवस्थाओं के प्रति सावधानी बरत रहे हैं।
बेलीज के प्रधानमंत्री John Briceño ने कहा कि यदि AI का सही तरीके से शासन किया जाए, तो यह ज्ञान तक पहुंच बढ़ा सकता है और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार कर सकता है।
लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि खराब तरीके से संचालित AI असमानता बढ़ा सकता है, महत्वपूर्ण प्रणालियों को जोखिम में डाल सकता है और श्रमिकों को प्रभावित कर सकता है। इससे विकासशील देश उन तकनीकों और नियमों पर निर्भर हो सकते हैं जिन्हें दूसरे देशों में तैयार किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र में हुई चर्चा ने AI को लेकर विकासशील देशों की एक प्रमुख चिंता सामने रखी है—AI का भविष्य केवल तकनीकी रूप से शक्तिशाली देशों और बड़ी कंपनियों द्वारा तय नहीं होना चाहिए।
AI में विकासशील देशों के लिए स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, सरकारी सेवाओं और अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने की क्षमता है। लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए बिजली, इंटरनेट, डिजिटल कौशल, स्थानीय डेटा और मजबूत संस्थागत व्यवस्था जरूरी होगी। विश्व बैंक और IMF की हालिया रिपोर्टें भी AI की संभावनाओं के साथ इन बुनियादी जरूरतों पर जोर देती हैं।
इसलिए संयुक्त राष्ट्र में चल रही बहस का केंद्र केवल यह नहीं है कि AI कितना शक्तिशाली बनेगा, बल्कि यह भी है कि इस तकनीक के नियम कौन बनाएगा, इसका लाभ किसे मिलेगा और इससे होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी।