दुनिया में बढ़ते तापमान और उससे पैदा हो रहे गंभीर जलवायु संकट के बीच देशों को अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को तत्काल मजबूत करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के आगामी COP31 जलवायु सम्मेलन से पहले हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में देशों से अपील की गई है कि वे वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए उत्सर्जन में तेजी से और लगातार कटौती करें।
फिजी और तुवालु में आयोजित मंत्रिस्तरीय बैठक से जारी बयान में कहा गया कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रखने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए दुनिया को गहरे, तेज और लगातार उत्सर्जन में कमी की आवश्यकता है। बैठक में चेतावनी दी गई कि यदि तापमान कुछ समय के लिए भी इस सीमा से ऊपर जाता है, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की गंभीरता और अवधि को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे।
बैठक में शामिल देशों ने कहा कि दुनिया ऐसे समय में जलवायु संकट का सामना कर रही है जब वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के करीब पहुंच रहा है और मजबूत अल नीनो परिस्थितियां भी देखी जा रही हैं। ऐसे में तापमान में हर छोटी अतिरिक्त वृद्धि भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और तेज कर सकती है।
मंत्रिस्तरीय बैठक के बयान में कहा गया कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक तेज होते जाएंगे। तापमान में एक डिग्री का छोटा-सा अतिरिक्त हिस्सा भी अत्यधिक गर्मी, समुद्र के बढ़ते स्तर और दूसरी चरम मौसमी घटनाओं के खतरे को बढ़ा सकता है।
विशेष रूप से जलवायु के प्रति संवेदनशील समुदायों के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर है। इन समुदायों के पास जलवायु आपदाओं से बचने और उनके बाद खुद को संभालने के लिए सीमित संसाधन होते हैं। तापमान बढ़ने के साथ ऐसे नुकसान की आशंका भी बढ़ती जाती है जिन्हें भविष्य में पूरी तरह वापस ठीक करना मुश्किल या असंभव हो सकता है।
बैठक में स्पष्ट किया गया कि केवल कुछ समय के लिए उत्सर्जन घटाना पर्याप्त नहीं होगा। दुनिया को लंबे समय तक उत्सर्जन में लगातार और पर्याप्त कमी लानी होगी।
इसका सीधा संबंध कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को कम करने, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और ऊर्जा, परिवहन तथा उद्योग जैसे क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन घटाने से है। देशों की वर्तमान जलवायु नीतियों और उनके घोषित लक्ष्यों के बीच अंतर को कम करना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव प्रशांत महासागर के कई छोटे द्वीपीय देशों पर दिखाई दे रहा है। समुद्र का स्तर लगातार बढ़ने से इन देशों के सामने अपने भविष्य और अस्तित्व को लेकर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
तुवालु इसका एक प्रमुख उदाहरण है। नासा के शोधकर्ताओं के अनुसार, 1993 से 2023 के बीच तुवालु के आसपास समुद्र का स्तर लगभग 15 सेंटीमीटर यानी करीब 6 इंच बढ़ा। यह वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हुई है।
समुद्र के बढ़ते स्तर से केवल जमीन के डूबने का खतरा नहीं है। इससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों, कृषि भूमि, पेयजल स्रोतों और बुनियादी ढांचे पर भी दबाव बढ़ता है।
छोटे द्वीपीय देशों के लिए समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उनके पास समुद्र के बढ़ते स्तर से बचने के लिए बड़े पैमाने पर भूमि उपलब्ध नहीं है। कुछ प्रशांत देशों के लिए जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का सवाल बन चुका है।
वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के तहत दुनिया के देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया था।
इसके लिए आधार अवधि 1850 से 1900 के बीच का औसत तापमान माना गया है। इस लक्ष्य का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों को सीमित करना है।
हालांकि, दुनिया वर्तमान में इस लक्ष्य से काफी दूर दिखाई दे रही है। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण संस्था ने पिछले महीने चेतावनी दी थी कि वैश्विक तापमान वृद्धि आने वाले कुछ वर्षों के भीतर 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकती है।
1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को लंबे समय तक पार करना जलवायु संकट के प्रभावों को और गंभीर बना सकता है। इसमें अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा, समुद्र के बढ़ते स्तर और अन्य चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ता खतरा शामिल है।
इसी कारण जलवायु विशेषज्ञ और संवेदनशील देश इस बात पर जोर दे रहे हैं कि तापमान को लक्ष्य से ऊपर जाने से रोकने के लिए उत्सर्जन में तत्काल और बड़े स्तर पर कमी जरूरी है।
COP31 से पहले हुई बैठक में जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के बढ़ते स्तर से पैदा होने वाली एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या पर भी चर्चा हुई। बैठक में अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों की संप्रभुता और समुद्री क्षेत्रों के अधिकारों को बनाए रखने के महत्व की पुष्टि की गई।
समुद्र के बढ़ते स्तर से प्रशांत क्षेत्र की तटरेखाओं का स्वरूप बदल सकता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भविष्य में समुद्री सीमाओं और देशों के अधिकारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण तटरेखाओं में होने वाले बदलाव के बावजूद देशों के मौजूदा अधिकारों और समुद्री क्षेत्रों की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
COP31 संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख जलवायु सम्मेलनों की अगली कड़ी है और इसका आयोजन नवंबर में तुर्की में होना है। इससे पहले होने वाली बैठकें दुनिया के देशों को मुख्य सम्मेलन के लिए अपनी प्राथमिकताएं तय करने और बातचीत की दिशा तैयार करने का अवसर देती हैं।
आमतौर पर COP से पहले होने वाली बैठकों में जलवायु वार्ताकार और सरकारी अधिकारी तकनीकी और नीतिगत मुद्दों पर चर्चा करते हैं। लेकिन इस बार प्रशांत देशों के लिए बढ़ता समुद्र स्तर और उनके अस्तित्व से जुड़े खतरे प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं।
ऑस्ट्रेलिया और उसके प्रशांत साझेदार देश COP31 Pacific Partnership के माध्यम से मिलकर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक जलवायु कार्रवाई में प्रशांत देशों की आवाज और उनके समाधान को अधिक मजबूती से सामने लाना है।
इस साझेदारी के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को भी मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। प्रशांत देशों का मानना है कि जलवायु संकट का सामना करने के लिए वैश्विक स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में उन देशों की परिस्थितियों को विशेष महत्व मिलना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
COP31 से पहले हुई बैठक का संदेश स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मौजूदा प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रखने के लिए देशों को अपने उत्सर्जन में अधिक तेजी से और लंबे समय तक कमी करनी होगी।
विशेष रूप से प्रशांत द्वीपीय देशों की स्थिति दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। तुवालु में समुद्र के स्तर में वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से हुई वृद्धि दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग गंभीरता से पड़ सकता है।
आने वाले समय में COP31 के दौरान देशों पर यह दबाव रहेगा कि वे अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को और मजबूत करें, उत्सर्जन कम करने की गति बढ़ाएं और जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों को सहायता देने के लिए ठोस कदम उठाएं। 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बचाने के लिए अब केवल वादे पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि तेज, निरंतर और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता होगी।