भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी की है। इसके तहत अब उन वाहनों के लिए नियामक ढांचा तैयार किया गया है, जिन्हें E100 तक एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर चलने के लिए विशेष रूप से बनाया गया है और प्रमाणित किया गया है। E100 ऐसा ईंधन है, जिसमें लगभग पूरी मात्रा एथेनॉल की होती है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) Ministry of Road Transport and Highways (MoRTH) ने इन संशोधनों के जरिए वाहन वर्गीकरण, ईंधन के मानकों, तकनीकी संदर्भों और उत्सर्जन जांच से जुड़े कुछ नियमों में भी बदलाव किए गए हैं। इसके अलावा, कुछ हल्के पेट्रोल और डीजल वाहनों पर लागू वजन की सीमा 3,000 किलोग्राम से बढ़ाकर 3,500 किलोग्राम कर दी गई है।
यह कदम भारत में वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने और पारंपरिक पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने की व्यापक कोशिशों का हिस्सा है। हालांकि, नए नियमों का अर्थ यह नहीं है कि सभी मौजूदा पेट्रोल वाहन E85 या E100 जैसे अधिक एथेनॉल वाले ईंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए वाहन का उपयुक्त तकनीक से बना होना और संबंधित मानकों के अनुसार प्रमाणित होना जरूरी है।
E100 ऐसे ईंधन को कहा जाता है, जिसमें लगभग 100 प्रतिशत एथेनॉल होता है। सामान्य पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा इससे कम होती है। वहीं, E100 का इस्तेमाल उन वाहनों के लिए किया जाता है, जिन्हें अधिक मात्रा में एथेनॉल वाले ईंधन को सुरक्षित रूप से इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया हो।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसी तकनीक से लैस होते हैं, जो उन्हें पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले मिश्रण पर चलने में सक्षम बनाती है। वाहन की बनावट और प्रमाणन के आधार पर ये E20, E85 और E100 जैसे ईंधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
E20 में 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है, जबकि E85 में एथेनॉल की मात्रा लगभग 85 प्रतिशत होती है। E100 में एथेनॉल की मात्रा लगभग पूरी होती है। इन ईंधनों के बीच अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि हर वाहन का इंजन और ईंधन प्रणाली सभी मिश्रणों के अनुकूल नहीं होती।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नए नियमों के तहत हर पेट्रोल वाहन को अधिक एथेनॉल वाले ईंधन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं मिलती है। E85 और E100 जैसे ईंधन केवल उन्हीं वाहनों के लिए हैं, जिन्हें इनका इस्तेमाल करने के लिए बनाया और प्रमाणित किया गया है।
जो वाहन सामान्य पेट्रोल या E20 के लिए स्वीकृत हैं, उनमें E85 या E100 का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जब तक निर्माता और संबंधित प्रमाणन यह पुष्टि न करें कि वाहन इन ईंधनों के अनुकूल है। गलत ईंधन का इस्तेमाल इंजन के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है और इंजन या ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकता है।
यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल को बढ़ा रहा है। इसके साथ ही ईंधन की अनुकूलता, वाहन सुरक्षा और तकनीकी मानकों का पालन करना भी जरूरी है।
एथेनॉल ईंधन से जुड़े बदलावों के साथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने कुछ हल्के पेट्रोल और डीजल वाहनों के लिए लागू वजन की सीमा भी बढ़ा दी है। पहले यह सीमा 3,000 किलोग्राम थी, जिसे अब बढ़ाकर 3,500 किलोग्राम कर दिया गया है।
संशोधनों में वाहन वर्गीकरण, ईंधन के मानकों और उत्सर्जन जांच से संबंधित तालिकाओं में इस्तेमाल होने वाले तकनीकी संदर्भों को भी अपडेट किया गया है। इन बदलावों का उद्देश्य वाहन तकनीक और ईंधन के नए विकल्पों के विकास के अनुरूप नियमों को बेहतर बनाना है।
हालांकि, वजन सीमा में बदलाव सभी प्रकार के वाहनों पर अपने आप लागू नहीं माना जाना चाहिए। इसका प्रभाव संबंधित वाहन श्रेणी और मंत्रालय की अधिसूचना में दिए गए विशिष्ट प्रावधानों पर निर्भर करेगा। इसलिए वाहन निर्माताओं, परिवहन क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों और वाहन मालिकों के लिए लागू नियमों को समझना जरूरी है।
भारत में एथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच वाहन निर्माता अधिक एथेनॉल वाले ईंधन पर चलने वाले वाहनों के विकास पर ध्यान दे रहे हैं।
जून 2026 में मारुति सुजुकी इंडिया ने वैगनआर फ्लेक्स फ्यूल पेश की। यह यात्री वाहन E20 से लेकर E100 तक के एथेनॉल-पेट्रोल मिश्रण पर चलने के लिए तैयार किया गया है। इसका विकास भारतीय वाहन बाजार में अधिक एथेनॉल वाले ईंधन के अनुकूल यात्री वाहनों को लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक का उद्देश्य वाहन को पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले मिश्रण के अनुसार काम करने में सक्षम बनाना है। इससे भविष्य में वाहन मालिकों को ईंधन के अधिक विकल्प मिल सकते हैं। हालांकि, किसी मॉडल की वास्तविक उपलब्धता और उसके लिए स्वीकृत ईंधन की जानकारी निर्माता की तकनीकी विशेषताओं और नियामक प्रमाणन पर निर्भर करेगी।
टोयोटा मोटर कॉरपोरेशन, टाटा मोटर्स और हुंडई मोटर कंपनी जैसी प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियां भी भारतीय बाजार के लिए फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक और वैकल्पिक ईंधन से जुड़े विकल्पों पर काम कर रही हैं या उनका अध्ययन कर रही हैं।
इन कंपनियों की दिलचस्पी बताती है कि वाहन उद्योग ऊर्जा के नए स्रोतों और सरकारी नीतियों के अनुरूप तकनीक विकसित करने पर ध्यान दे रहा है। हालांकि, किसी वाहन के बाजार में उपलब्ध होने, उसके इस्तेमाल और ईंधन की अनुकूलता की पुष्टि उसके निर्माता की जानकारी और जरूरी प्रमाणन से ही की जानी चाहिए।
भारत आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दे रहा है। देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ा है, जिनके आयात पर खर्च होने वाली रकम व्यापार संतुलन पर भी दबाव डालती है।
E20 पेट्रोल की देशव्यापी शुरुआत भारत के ईंधन मिश्रण कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण कदम रही है। इसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। भविष्य में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के इस्तेमाल से अधिक एथेनॉल वाले ईंधनों को अपनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, बशर्ते ऐसे वाहनों और ईंधन आपूर्ति की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध हो।
एथेनॉल का उत्पादन कृषि से जुड़े कच्चे माल से किया जा सकता है। इससे खेती और ऊर्जा क्षेत्र के बीच संबंध मजबूत होने तथा किसानों के लिए कुछ नए बाजार अवसर बनने की संभावना है। घरेलू स्तर पर एथेनॉल का उत्पादन और इस्तेमाल बढ़ने से ईंधन के स्रोतों में विविधता आ सकती है।
हालांकि, इसके वास्तविक लाभ उत्पादन लागत, कच्चे माल की उपलब्धता, परिवहन और भंडारण व्यवस्था, पर्यावरणीय प्रभाव तथा वाहनों में इसके इस्तेमाल जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करते हैं। इसलिए एथेनॉल को बढ़ावा देने के साथ इसकी आपूर्ति और उत्पादन की पूरी व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है।
दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी बाधाओं, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव और संघर्ष, ने आयातित जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर रहने के जोखिम को उजागर किया है। भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोत विकसित करना दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
इससे पहले सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वाहन उत्सर्जन नियमों में बदलाव के प्रस्ताव रखे थे, ताकि अधिक प्रकार के वैकल्पिक ईंधनों और वाहन तकनीकों को नियमों में शामिल किया जा सके। इन प्रस्तावों में संबंधित वाहन श्रेणियों के लिए E85, E100, B100 बायोडीजल और हाइड्रोजन-CNG के मिश्रित विकल्पों जैसी तकनीकों पर विचार किया गया था।
नए संशोधन वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने की इसी व्यापक दिशा का हिस्सा हैं। हालांकि, इनका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रमाणित वाहन कितनी संख्या में उपलब्ध होते हैं, ईंधन भरने के लिए जरूरी ढांचा कितना विकसित होता है और ग्राहक इस तकनीक को कितनी आसानी से अपनाते हैं।
नए नियम E100 ईंधन पर चलने वाले प्रमाणित वाहनों के लिए रास्ता तैयार करते हैं, लेकिन सामान्य वाहनों में अधिक एथेनॉल वाले ईंधन के इस्तेमाल पर लागू पाबंदियां भी बरकरार रखते हैं।
वाहन मालिकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे अपने वाहन की पुस्तिका, निर्माता की ईंधन संबंधी सलाह और प्रमाणन की जांच करें। केवल नए नियम लागू होने से मौजूदा पेट्रोल वाहन E85 या E100 पर चलने योग्य नहीं हो जाते। यदि कोई वाहन इन ईंधनों के लिए प्रमाणित नहीं है, तो उनका इस्तेमाल इंजन और ईंधन प्रणाली के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
जैसे-जैसे वाहन निर्माता अनुकूल मॉडल विकसित करेंगे और ईंधन आपूर्ति की व्यवस्था बेहतर होगी, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक भारत की परिवहन व्यवस्था में एक अतिरिक्त विकल्प बन सकती है। इससे देश को ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों का इस्तेमाल करने और आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस बदलाव की सफलता के लिए केवल नियमों में संशोधन पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ प्रमाणित वाहनों की उपलब्धता, उचित ईंधन वितरण व्यवस्था, तकनीकी सुरक्षा और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता भी जरूरी होगी। इसलिए वाहन खरीदने या ईंधन बदलने से पहले संबंधित वाहन के लिए स्वीकृत ईंधन की जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए।