भारत में आयोजित 18वां BRICS शिखर सम्मेलन सफल रहा और इसने अलग-अलग विचार रखने वाले सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में नई दिल्ली की क्षमता को सामने रखा है। अमेरिका स्थित विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने भारत की मेजबानी को सफल बताते हुए कहा कि पहले ही दिन एक विस्तृत संयुक्त घोषणा जारी होना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ और Atlantic Council के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन के अनुसार, नई दिल्ली घोषणा ने न केवल भारत की देशों को एक साथ लाने की क्षमता को दिखाया, बल्कि यह भी संकेत दिया कि BRICS का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है।
भारत ने 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। यह आयोजन भारत की अध्यक्षता में हुआ और इसमें सदस्य देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, आतंकवाद, वैश्विक शासन तथा आर्थिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।
शिखर सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में New Delhi Declaration 2026 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना रहा। घोषणा में व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, आतंकवाद, संघर्षों की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कई मुद्दों को शामिल किया गया है। भारत की अध्यक्षता में 30 शहरों में 400 से अधिक बैठकें और कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें मंत्री, सांसद, अधिकारी, विशेषज्ञ, कारोबारी और अन्य हितधारक शामिल हुए।
कुगेलमैन ने विशेष रूप से इस बात को महत्वपूर्ण माना कि घोषणा शिखर सम्मेलन के पहले ही दिन सामने आ गई। उनके अनुसार, BRICS में शामिल देशों के हित और विदेश नीति के रुख अलग-अलग हैं। इसके बावजूद भारत ने सभी पक्षों के साथ बातचीत करके एक साझा आधार तैयार किया।
उन्होंने कहा कि भारत की मेजबानी को सफल माना जा सकता है क्योंकि इतनी विविधता वाले समूह के बीच एक महत्वपूर्ण संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना आसान काम नहीं था।
BRICS में शामिल देशों के बीच कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अलग-अलग राय है। खासकर पश्चिम एशिया की स्थिति ने इस बार सहमति बनाने की प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बनाया। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के क्षेत्रीय हितों में अंतर होने के बावजूद सदस्य देशों ने ऐसी भाषा पर सहमति बनाई, जिसे सभी स्वीकार कर सकें।
नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई और अधिकतम संयम बरतने तथा विवादों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से हल करने पर जोर दिया गया। नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता की जरूरत को भी महत्व दिया गया।
भारत की कूटनीतिक भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि उसे अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले देशों को एक साझा बयान के लिए साथ लाना था।
माइकल कुगेलमैन ने BRICS की निर्णय प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संगठन की कार्यप्रणाली में सर्वसम्मति महत्वपूर्ण है और किसी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए सदस्य देशों के बीच पर्याप्त साझा समर्थन जरूरी होता है।
उनके अनुसार, भारत इस बार उस स्तर की सहमति हासिल करने में सफल रहा। इसका अर्थ यह है कि BRICS के सदस्य देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे कुछ प्रमुख मुद्दों पर साझा रुख अपनाने के लिए तैयार हुए।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS का विस्तार होने के साथ समूह के भीतर अलग-अलग आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक हित शामिल हुए हैं। ऐसे में सभी सदस्यों को एक साझा घोषणा पर सहमत करना अध्यक्ष देश के लिए बड़ी कूटनीतिक जिम्मेदारी बन जाता है।
नई दिल्ली घोषणा में एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क व्यापार उपायों को लेकर भी चिंता जताई गई है। BRICS देशों का कहना है कि इस तरह के कदम वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं हो सकते।
भारत के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है क्योंकि वह वैश्विक बाजारों तक स्थिर और भरोसेमंद पहुंच चाहता है। बढ़ते व्यापार प्रतिबंधों और संरक्षणवादी नीतियों के बीच BRICS का यह रुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के हितों से जुड़ा हुआ है।
घोषणा में आतंकवाद से मुकाबले, संघर्षों की रोकथाम और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर भी जोर दिया गया है। भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक कार्रवाई की मांग करता रहा है।
नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के मुद्दे को शामिल किया जाना भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे आतंकवाद के खिलाफ सहयोग को BRICS के व्यापक एजेंडे में जगह मिलती है।
माइकल कुगेलमैन ने भारत की इस उपलब्धि को उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका से भी जोड़ा। उनके अनुसार, अलग-अलग हितों वाले देशों के समूह को एक मंच पर लाकर साझा घोषणा जारी करवाना भारत की सहमति बनाने और संवाद कराने की क्षमता को दर्शाता है।
BRICS अब केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। यह वैश्विक व्यापार, विकास, वित्त, तकनीक, ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय शासन से जुड़े विषयों पर चर्चा करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है।
भारत की 2026 की अध्यक्षता के दौरान भी इसी व्यापक सहयोग पर जोर दिया गया। आधिकारिक घोषणा में भारत की अध्यक्षता के तहत 400 से अधिक बैठकों और कार्यक्रमों का उल्लेख किया गया है, जो संगठन के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने की कोशिश को दिखाता है।
नई दिल्ली घोषणा को अपनाना भारत की कूटनीतिक सफलता है, लेकिन वास्तविक चुनौती अब इन सहमतियों को जमीन पर लागू करने की है।
BRICS देशों के बीच व्यापार, स्थानीय मुद्रा में भुगतान, डिजिटल तकनीक, AI, स्वास्थ्य, विकास वित्त और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे क्षेत्रों में कई प्रस्ताव सामने आए हैं। इन पहलों को सफल बनाने के लिए सदस्य देशों के बीच लगातार बातचीत और सहयोग की आवश्यकता होगी।
विश्लेषकों के अनुसार, घोषणा पर सहमति बनना महत्वपूर्ण पहला कदम है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि सदस्य देश भविष्य में इन प्रतिबद्धताओं को कितनी प्रभावी तरीके से लागू करते हैं।
18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर साबित हुई। अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक हितों वाले देशों के बीच नई दिल्ली घोषणा पर सहमति बनना भारत की संवाद और सहमति निर्माण की क्षमता को दर्शाता है।
माइकल कुगेलमैन की टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि भारत केवल BRICS की मेजबानी करने वाला देश नहीं था, बल्कि उसने विभिन्न मतों के बीच साझा आधार तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब इस सफलता को ठोस परिणामों में बदलना BRICS देशों की अगली बड़ी चुनौती होगी।