ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF और विश्व बैंक में व्यापक सुधारों की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया में बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति दिखाई देनी चाहिए।
जयपुर और मुंबई में हुई बैठकों के बाद जारी संयुक्त बयान में ब्रिक्स के वित्त प्रमुखों ने वित्तीय सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के विस्तार से समूह में विविधता बढ़ी है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसका प्रभाव भी मजबूत हुआ है।
भारत की 2026 की अध्यक्षता में ब्रिक्स वित्तीय सहयोग का दायरा भुगतान व्यवस्था, बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण, कराधान, सीमा शुल्क और वित्तीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों तक बढ़ाया जा रहा है। यह सहयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक टकराव, महंगाई और बढ़ते कर्ज जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
ब्रिक्स वित्त प्रमुखों ने IMF और विश्व बैंक की शासन व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। उनका मानना है कि इन संस्थानों की मौजूदा संरचना वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए बदलावों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती है। उभरते बाजारों और विकासशील देशों का आर्थिक महत्व बढ़ने के बावजूद उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलता है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देश दुनिया की लगभग आधी आबादी, करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लगभग 26 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में समूह का कहना है कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उसकी और अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
ब्रिक्स ने IMF के कोटा बढ़ाने के 16वें सामान्य समीक्षा के तहत लिए गए फैसलों का समर्थन किया है। साथ ही 17वीं समीक्षा के दौरान वास्तविक और सार्थक पुनर्संरेखण की मांग की गई है। इसका उद्देश्य IMF में देशों के आर्थिक योगदान और उनकी प्रतिनिधित्व क्षमता के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करना है।
ब्रिक्स ने विश्व बैंक की हिस्सेदारी की प्रस्तावित समीक्षा को विकासशील देशों के ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व को दूर करने का अवसर बताया है। समूह का मानना है कि विश्व बैंक जैसे संस्थानों में विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति और बढ़ते योगदान के अनुरूप उनकी भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए।
बैठक में ब्रिक्स वित्त प्रमुखों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद कई गंभीर जोखिमों पर भी चर्चा की। भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार का अलग-अलग गुटों में बंटना, संरक्षणवाद, महंगाई, बढ़ता सार्वजनिक और निजी कर्ज तथा वित्तीय कमजोरियां वैश्विक विकास के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं।
ब्रिक्स देशों ने एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि इस तरह के व्यापारिक प्रतिबंध वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और बाजार में असमान परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं।
व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता का असर विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है, क्योंकि इन देशों की आर्थिक वृद्धि काफी हद तक निर्यात, निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी हुई है। इसलिए ब्रिक्स ने अधिक स्थिर, पारदर्शी और संतुलित वैश्विक व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।
ब्रिक्स वित्त प्रमुखों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी NDB की भूमिका को और बढ़ाने का समर्थन किया है। NDB को ब्रिक्स देशों के साथ-साथ ग्लोबल साउथ के अन्य विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए अधिक वित्त उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
ब्रिक्स ने NDB से स्थानीय मुद्राओं में वित्तपोषण को बढ़ाने, वित्त जुटाने के स्रोतों में विविधता लाने और अधिक संसाधन जुटाने की दिशा में काम करने को कहा है। स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण से कुछ परियोजनाओं को विदेशी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम से बचाने में मदद मिल सकती है।
यह पहल ब्रिक्स देशों के बीच वित्तीय सहयोग को मजबूत करने और विकास परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
ब्रिक्स ने बहुपक्षीय गारंटी पहल यानी Multilateral Guarantees Initiative में हुई प्रगति का भी समर्थन किया है। इसका उद्देश्य निजी पूंजी को विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की ओर आकर्षित करना तथा परियोजनाओं की वित्तीय लागत को कम करना है।
गारंटी जैसी व्यवस्थाएं निवेशकों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं। इससे उन परियोजनाओं में भी निजी निवेश आने की संभावना बढ़ सकती है, जहां लंबे समय तक पूंजी की जरूरत होती है और जोखिम अपेक्षाकृत अधिक होता है।
ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंक अपने Contingent Reserve Arrangement यानी आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था को भी मजबूत कर रहे हैं। यह व्यवस्था उन सदस्य देशों के लिए वित्तीय सुरक्षा तंत्र के रूप में काम करती है जिन्हें आर्थिक दबाव या बाहरी वित्तीय संकट के दौरान तरलता की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे सुरक्षा तंत्र का महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब वैश्विक बाजारों में अचानक पूंजी का प्रवाह बदलता है, मुद्रा पर दबाव बढ़ता है या किसी देश को अल्पकालिक वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
ब्रिक्स का वित्तीय सहयोग अब केवल पारंपरिक बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। समूह बीमा, पेंशन, साइबर सुरक्षा और भुगतान निपटान से जुड़े बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा रहा है।
भारत ने GIFT City में एक स्वैच्छिक BRICS Risk Lab स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य वित्तीय जोखिमों को समझने, उनका आकलन करने और सदस्य देशों के बीच जोखिम प्रबंधन से जुड़े अनुभव तथा विशेषज्ञता साझा करने में मदद करना है।
डिजिटल वित्त और सीमा-पार भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच साइबर जोखिम भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं। इसलिए वित्तीय संस्थानों और भुगतान प्रणालियों की सुरक्षा मजबूत करना ब्रिक्स सहयोग का एक अहम हिस्सा बन सकता है।
भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता में वित्तीय सहयोग का विस्तार कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हो रहा है। सीमा-पार भुगतान, स्थानीय मुद्रा में लेनदेन, बुनियादी ढांचा वित्तपोषण, कर सहयोग, सीमा शुल्क और वित्तीय स्थिरता जैसे मुद्दे समूह के एजेंडे में प्रमुख हैं।
ब्रिक्स वित्त प्रमुखों का ताजा रुख यह संकेत देता है कि समूह केवल व्यापार और आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों की मांग को भी आगे बढ़ा रहा है। IMF और विश्व बैंक में अधिक प्रतिनिधित्व, NDB की मजबूत भूमिका और वित्तीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने जैसी पहलें विकासशील देशों की आर्थिक आवाज को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती हैं।
आने वाले समय में ब्रिक्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन प्रस्तावों को व्यावहारिक सहयोग में बदलना होगी। यदि सदस्य देश भुगतान, वित्तपोषण, जोखिम प्रबंधन और स्थानीय मुद्रा आधारित व्यवस्था में प्रभावी प्रगति करते हैं, तो इससे ग्लोबल साउथ के लिए एक अधिक विविध और संतुलित वित्तीय ढांचा तैयार करने में मदद मिल सकती है।