भारत की न्याय व्यवस्था में तेजी से डिजिटल बदलाव हो रहा है। तकनीक की मदद से अब नागरिकों, वकीलों, जजों और कोर्ट से जुड़े अधिकारियों के लिए न्यायिक सेवाओं का इस्तेमाल करना पहले की तुलना में आसान हो रहा है।
ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट भारत की न्याय व्यवस्था को आधुनिक और डिजिटल बनाने की एक बड़ी पहल है। इसे कानून एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग और सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी मिलकर लागू कर रहे हैं। इसका उद्देश्य अदालतों में कागजी काम को कम करना और अधिक से अधिक सेवाओं को डिजिटल, पारदर्शी और आम नागरिकों के लिए आसान बनाना है।
ई-कोर्ट्स की शुरुआत अदालतों में कंप्यूटर और डिजिटल सिस्टम उपलब्ध कराने की पहल के रूप में हुई थी। अब इसका दायरा काफी बढ़ गया है। इसके तहत ई-फाइलिंग, ऑनलाइन केस की जानकारी, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई, पुराने न्यायिक रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, ई-सेवा केंद्र, डिजिटल समन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
2026 तक भारत में 660 करोड़ से अधिक पन्नों वाले न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल किया जा चुका है। वहीं, करीब 1.07 करोड़ मामलों की ई-फाइलिंग की गई है और अदालतों में 3.97 करोड़ से अधिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुनवाई हो चुकी हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
भारत जैसे बड़े देश में डिजिटल न्याय व्यवस्था का महत्व और भी अधिक है। कई लोगों को अदालत तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसके अलावा, यात्रा का खर्च, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और जरूरी जानकारी आसानी से उपलब्ध न होना भी आम नागरिकों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।
ई-कोर्ट्स मिशन इन समस्याओं को कम करने की कोशिश कर रहा है। डिजिटल माध्यम से लोग केस की स्थिति देख सकते हैं, जरूरी दस्तावेज ऑनलाइन जमा कर सकते हैं, अदालत की कार्यवाही में दूर से शामिल हो सकते हैं और न्यायिक आदेश व रिकॉर्ड प्राप्त कर सकते हैं।
इस तरह ई-कोर्ट्स मिशन का उद्देश्य केवल अदालतों को डिजिटल बनाना नहीं है। इसका बड़ा लक्ष्य न्याय व्यवस्था को अधिक आसान, तेज, पारदर्शी, कम खर्चीला और आम नागरिकों के लिए सुलभ बनाना है।
ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट भारत में न्याय व्यवस्था को आधुनिक और डिजिटल बनाने की एक राष्ट्रीय पहल है। इसका उद्देश्य सूचना और संचार तकनीक यानी Information and Communication Technology (ICT) की मदद से अदालतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाना और न्यायिक सेवाओं को आम लोगों के लिए अधिक आसान बनाना है।
इस पहल की शुरुआत 2007 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (National e-Governance Plan) के तहत हुई थी। इसका शुरुआती उद्देश्य पारंपरिक और कागज आधारित अदालतों की कार्यप्रणाली को कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक से जोड़ना था। समय के साथ इस परियोजना का दायरा काफी बढ़ गया है।
अब ई-कोर्ट्स मिशन केवल अदालतों में कंप्यूटर लगाने तक सीमित नहीं है। इसके तहत डिजिटल केस मैनेजमेंट, ऑनलाइन नागरिक सेवाएं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई, पेपरलेस कोर्ट और तकनीक की मदद से न्यायिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने पर भी काम किया जा रहा है।
इस परियोजना को अलग-अलग चरणों में लागू किया जा रहा है। इसमें न्याय विभाग, सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी और विभिन्न हाई कोर्ट मिलकर काम कर रहे हैं।
ई-कोर्ट्स मिशन का उद्देश्य केवल अदालतों की जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध कराना नहीं है। इसका लक्ष्य ऐसी न्याय व्यवस्था विकसित करना है जो।
अधिक सुलभ हो।
अधिक पारदर्शी हो।
अधिक प्रभावी और तेज हो।
लोगों के लिए कम खर्चीली हो।
नागरिकों के अनुकूल हो।
कागजी दस्तावेजों पर कम निर्भर हो।
इस वजह से ई-कोर्ट्स मिशन भारत के व्यापक डिजिटल गवर्नेंस और डिजिटल इंडिया अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
भारत की न्याय व्यवस्था में डिजिटल बदलाव एक ही चरण में नहीं हुआ है। यह परिवर्तन धीरे-धीरे अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ा है। इसे मुख्य रूप से तीन चरणों में समझा जा सकता है।
ई-कोर्ट्स परियोजना का पहला चरण 2011 से 2015 के बीच लागू किया गया। इस चरण का मुख्य उद्देश्य अदालतों के लिए जरूरी तकनीकी और डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना था।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस चरण में 14,249 जिला और अधीनस्थ अदालतों को कंप्यूटरीकृत किया गया। इसके अलावा, 13,683 अदालतों में लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) स्थापित किए गए।
करीब 13,672 अदालतों को डिजिटल केस मैनेजमेंट के लिए सॉफ्टवेयर सहायता भी उपलब्ध कराई गई। इस दौरान अदालतों और जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा शुरू करने पर भी काम किया गया।
इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अदालतों को डिजिटल तकनीक के लिए तैयार करना था। बाद में शुरू की गई ऑनलाइन सेवाओं और डिजिटल न्यायिक प्रक्रियाओं के लिए यही तकनीकी आधार बना।
ई-कोर्ट्स परियोजना का दूसरा चरण 2015 से 2023 तक चला। इस चरण में केवल अदालतों को कंप्यूटर से जोड़ने के बजाय नागरिकों और वकीलों के लिए उपयोगी डिजिटल सेवाओं के विस्तार पर अधिक ध्यान दिया गया।
इस दौरान कंप्यूटरीकृत अदालतों की संख्या बढ़कर 18,735 हो गई। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा का भी बड़े स्तर पर विस्तार किया गया।
इसी चरण में कई महत्वपूर्ण डिजिटल सेवाओं को शुरू या मजबूत किया गया। इनमें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG), ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र (e-Sewa Kendras) प्रमुख हैं।
NJDG की मदद से अदालतों से संबंधित महत्वपूर्ण केस डेटा को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया गया। वहीं, ई-फाइलिंग ने वकीलों और पक्षकारों को कई दस्तावेज ऑनलाइन जमा करने की सुविधा दी।
ई-सेवा केंद्रों का उद्देश्य उन लोगों को डिजिटल न्यायिक सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध कराना है जो तकनीक या इंटरनेट का आसानी से इस्तेमाल नहीं कर पाते।
इस चरण में ध्यान धीरे-धीरे अदालत के कर्मचारियों को तकनीक उपलब्ध कराने से आगे बढ़कर नागरिकों और वकीलों को सीधे डिजिटल सेवाएं देने पर केंद्रित हो गया।
ई-कोर्ट्स परियोजना का वर्तमान तीसरा चरण 2023 से 2027 तक चल रहा है। यह पहले के चरणों की तुलना में अधिक व्यापक और महत्वाकांक्षी डिजिटल बदलाव पर केंद्रित है।
सरकार ने इस चरण के लिए लगभग ₹7,210 करोड़ का बजट प्रावधान किया है। इसका उद्देश्य केवल नई अदालतों को डिजिटल बनाना नहीं, बल्कि पुराने न्यायिक रिकॉर्ड और मौजूदा प्रक्रियाओं को भी डिजिटल सिस्टम से जोड़ना है।
इस चरण के तहत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर काम किया जा रहा है।
पुराने और मौजूदा न्यायिक रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और वर्चुअल सुनवाई का विस्तार।
पेपरलेस अदालतों की स्थापना।
ई-सेवा केंद्रों की पहुंच बढ़ाना।
क्लाउड आधारित डिजिटल रिकॉर्ड और डेटा रिपॉजिटरी तैयार करना।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीकों का इस्तेमाल।
Optical Character Recognition (OCR) तकनीक के माध्यम से पुराने दस्तावेजों को डिजिटल और खोज योग्य बनाना।
तीसरे चरण का उद्देश्य केवल मौजूदा कागजी प्रक्रियाओं को डिजिटल रूप में बदलना नहीं है। इसका लक्ष्य न्यायिक प्रशासन की पूरी कार्यप्रणाली को डिजिटल तकनीक के अनुसार अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना है।
इस तरह ई-कोर्ट्स मिशन अब केवल कंप्यूटरीकरण की परियोजना नहीं रह गया है। यह भारत की न्याय व्यवस्था को डिजिटल, पेपरलेस, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित व्यवस्था में बदलने की दिशा में एक व्यापक प्रयास बन चुका है।
भारत की न्याय व्यवस्था में डिजिटल बदलाव अब बड़े स्तर पर दिखाई देने लगा है। उपलब्ध नवीनतम सरकारी आंकड़े बताते हैं कि ई-कोर्ट्स मिशन के तहत अदालतों में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2026 तक।
660.36 करोड़ से अधिक पन्नों वाले न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल किया जा चुका है।
करीब 1.07 करोड़ मामलों की ई-फाइलिंग की जा चुकी है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 3.97 करोड़ से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं।
देशभर में 2,444 ई-सेवा केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं।
11 हाई कोर्ट में अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग की जा रही है।
NSTEP सिस्टम के माध्यम से 7.29 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं को प्रोसेस किया जा चुका है।
करीब 2.11 करोड़ ई-प्रोसेस सफलतापूर्वक लोगों तक पहुंचाए जा चुके हैं।
ये आंकड़े बताते हैं कि न्याय व्यवस्था का डिजिटल बदलाव अब केवल कुछ चुनिंदा या प्रयोगात्मक परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। डिजिटल तकनीक धीरे-धीरे अदालतों के रोजमर्रा के कामकाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है।
ई-कोर्ट्स मिशन के तहत सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल पहलों में से एक नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) है।
NJDG एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों से जुड़े मामलों, आदेशों और फैसलों की जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। नागरिक, वकील, शोधकर्ता और न्यायिक प्रशासन से जुड़े लोग इस जानकारी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
NJDG की मदद से लोग किसी मामले की स्थिति और उससे संबंधित न्यायिक जानकारी को डिजिटल माध्यम से देख सकते हैं। इससे अदालतों से जुड़ी जानकारी के लिए केवल भौतिक रूप से कोर्ट कार्यालय जाने की आवश्यकता कम हो सकती है।
यह प्लेटफॉर्म न्यायिक प्रशासन के लिए भी उपयोगी है। लंबित और निपटाए गए मामलों का डेटा डिजिटल रूप में उपलब्ध होने से प्रशासनिक अधिकारी मामलों की संख्या, काम के दबाव और देरी से जुड़े पैटर्न को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
ई-कोर्ट्स का व्यापक डिजिटल सिस्टम अब बड़ी संख्या में लंबित और निपटाए गए मामलों, अदालती आदेशों और फैसलों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराता है।
न्यायिक जानकारी की यह बढ़ती उपलब्धता पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण है। पारदर्शिता का मतलब केवल जानकारी प्रकाशित करना नहीं है। जरूरी यह भी है कि नागरिक उस जानकारी को आसानी से खोज और समझ सकें।
ई-फाइलिंग ई-कोर्ट्स मिशन से होने वाले महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है।
ई-फाइलिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से वकील और पक्षकार कई प्रकार के कानूनी दस्तावेज, याचिकाएं और आवेदन ऑनलाइन जमा कर सकते हैं। इससे हर काम के लिए अदालत के भौतिक फाइलिंग काउंटर पर जाने की आवश्यकता कम होती है।
ई-फाइलिंग सिस्टम में कई डिजिटल सुविधाएं शामिल हैं, जैसे।
इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर।
ऑनलाइन भुगतान।
दस्तावेज ऑनलाइन जमा करना।
केस मैनेजमेंट से जुड़ी सुविधाएं।
डिजिटल माध्यम से न्यायालयी दस्तावेजों को संभालना।
नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से करीब 1.07 करोड़ मामलों की ई-फाइलिंग की जा चुकी है।
ई-फाइलिंग से यात्रा, कागजी काम और इंतजार में लगने वाला समय कम हो सकता है। इसका फायदा विशेष रूप से उन वकीलों और पक्षकारों को मिल सकता है जिन्हें अपने घर या कार्यालय से दूर स्थित अदालतों में बार-बार जाना पड़ता है।
भारत जैसे विशाल देश में अदालतों तक पहुंचने के लिए कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में अनावश्यक भौतिक यात्राओं को कम करना न्याय तक पहुंच को आसान और कम खर्चीला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अब भारत की डिजिटल न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
जहां कानूनी प्रक्रिया के अनुसार शारीरिक रूप से अदालत में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता, वहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वकील, गवाह, पक्षकार और अन्य संबंधित लोग दूर से सुनवाई में शामिल हो सकते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ई-कोर्ट्स कार्यक्रम के तहत अदालतों में 3.97 करोड़ से अधिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुनवाई हो चुकी हैं।
वर्चुअल सुनवाई उन मामलों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है जहां संबंधित लोग अलग-अलग शहरों में रहते हैं या अदालत तक पहुंचने में काफी समय, पैसा और अन्य संसाधन खर्च होते हैं।
इससे वकीलों और पक्षकारों को हर सुनवाई के लिए लंबी यात्रा करने की जरूरत कुछ मामलों में कम हो सकती है।
हालांकि, वर्चुअल सुनवाई का उद्देश्य हर स्थिति में भौतिक अदालतों को पूरी तरह खत्म करना नहीं है। इसका उद्देश्य एक अतिरिक्त डिजिटल विकल्प उपलब्ध कराना है, जिसका इस्तेमाल संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और मामले की जरूरत के अनुसार किया जा सकता है।
डिजिटल न्याय व्यवस्था तभी सफल हो सकती है, जब आम नागरिक वास्तव में डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल कर सकें। केवल ऑनलाइन सेवाएं शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है। लोगों को इन सेवाओं तक पहुंचने और उनका सही तरीके से उपयोग करने में भी मदद मिलनी चाहिए।
इसी वजह से ई-सेवा केंद्र (e-Sewa Kendras) ई-कोर्ट्स मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
ये केंद्र अदालत परिसरों में बनाए गए सहायता केंद्रों की तरह काम करते हैं। यहां नागरिकों और वकीलों को विभिन्न न्यायिक डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करने में सहायता मिल सकती है।
ई-सेवा केंद्रों के माध्यम से नागरिक और वकील कई प्रकार की सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं।
मामले की स्थिति देखना।
ई-फाइलिंग करना।
प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करना।
ऑनलाइन भुगतान करना।
अदालती फैसले और आदेश देखना।
डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल करना।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल होना।
कानूनी सहायता से जुड़ी जानकारी प्राप्त करना।
ई-कोर्ट्स मोबाइल ऐप डाउनलोड करना।
DD News की 30 जून 2026 की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी आंकड़ों के आधार पर हाई कोर्ट स्तर पर 49 ई-सेवा केंद्र और जिला अदालतों में 2,535 ई-सेवा केंद्र संचालित थे।
हर व्यक्ति के पास तेज इंटरनेट, कंप्यूटर, स्मार्टफोन या डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करने का पर्याप्त अनुभव नहीं होता। कई लोगों को ऑनलाइन कोर्ट सिस्टम को खुद इस्तेमाल करने में परेशानी हो सकती है।
ऐसे लोगों के लिए ई-सेवा केंद्र एक महत्वपूर्ण सहायता व्यवस्था प्रदान करते हैं। इन केंद्रों की मदद से नागरिक डिजिटल न्यायिक सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, भले ही उन्हें ऑनलाइन प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी न हो।
इस तरह ई-सेवा केंद्र तकनीक और नागरिकों के बीच की दूरी कम करने में मदद करते हैं और डिजिटल न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में काम करते हैं।
ई-कोर्ट्स मिशन का डिजिटल बदलाव केवल केस की जानकारी या ऑनलाइन फाइलिंग तक सीमित नहीं है। इसका असर अदालतों द्वारा भेजे जाने वाले समन, नोटिस और अन्य न्यायिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ रहा है।
National Service and Tracking of Electronic Processes (NSTEP) एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक तरीके से न्यायिक प्रक्रियाओं की सेवा और उनकी ट्रैकिंग को बेहतर बनाना है।
NSTEP में मोबाइल और GPS आधारित तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे समन और अन्य न्यायिक दस्तावेजों की डिलीवरी तथा उनकी स्थिति को डिजिटल तरीके से ट्रैक करने में मदद मिलती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, NSTEP के माध्यम से अब तक 7.29 करोड़ ई-प्रोसेस को प्रोसेस किया जा चुका है। इनमें से लगभग 2.11 करोड़ ई-प्रोसेस सफलतापूर्वक डिलीवर किए जा चुके हैं।
डिजिटल ट्रैकिंग से यह पता लगाना आसान हो सकता है कि किसी व्यक्ति को भेजा गया समन या नोटिस सफलतापूर्वक पहुंचा है या नहीं।
इसके अलावा, अगर किसी प्रक्रिया में देरी होती है, तो डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से देरी के संभावित कारणों की पहचान करना आसान हो सकता है।
इस व्यवस्था से कागज आधारित प्रक्रियाओं पर निर्भरता भी कम हो सकती है। इससे अदालतों की कार्यप्रणाली अधिक व्यवस्थित और निगरानी योग्य बन सकती है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि डिजिटल बदलाव केवल जानकारी को ऑनलाइन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य अदालतों की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली को भी अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना है।
न्याय व्यवस्था का डिजिटल बदलाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं है। आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़ी कई अलग-अलग संस्थाओं को भी डिजिटल तकनीक के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
इसी उद्देश्य से Inter-Operable Criminal Justice System (ICJS) विकसित किया गया है।
ICJS का उद्देश्य आपराधिक न्याय व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों के बीच डिजिटल तरीके से जानकारी साझा करने की सुविधा विकसित करना है। इसमें पुलिस, अदालतें, जेल, अभियोजन और फोरेंसिक संस्थान जैसे प्रमुख हिस्से शामिल हैं।
ICJS का आधार “एक डेटा, एक बार एंट्री” की अवधारणा है। इसका मतलब है कि किसी जानकारी को बार-बार अलग-अलग सिस्टम में दर्ज करने की जरूरत कम हो और अधिकृत संस्थाओं के बीच जरूरी जानकारी डिजिटल माध्यम से साझा की जा सके।
यह व्यवस्था निर्धारित डेटा-शेयरिंग नियमों और अधिकृत पहुंच के आधार पर काम करती है।
इस व्यापक डिजिटल व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण सिस्टम शामिल हैं।
Crime and Criminal Tracking Network and Systems (CCTNS)।
e-Courts।
e-Prisons।
e-Prosecution।
e-Forensics।
e-Sakshya।
e-Summons।
अलग-अलग संस्थाओं के सिस्टम आपस में बेहतर तरीके से जुड़े होने पर बार-बार एक ही जानकारी कागज पर दर्ज करने की जरूरत कम हो सकती है।
अधिकृत अधिकारी आवश्यकता के अनुसार संबंधित जानकारी तक डिजिटल माध्यम से पहुंच सकते हैं। इससे जानकारी साझा करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बेहतर हो सकता है।
इस तरह ICJS, ई-कोर्ट्स के व्यापक डिजिटल बदलाव को अदालतों से आगे बढ़ाकर पूरी आपराधिक न्याय व्यवस्था को अधिक कनेक्टेड और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI, ई-कोर्ट्स मिशन के तीसरे चरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभर रहा है।
सरकार ने ई-कोर्ट्स फेज-III परियोजना के तहत भविष्य की तकनीकी जरूरतों के लिए ₹53.57 करोड़ का प्रावधान किया है। इसमें AI और मशीन लर्निंग से जुड़ी पहलों को भी शामिल किया गया है।
कई AI आधारित टूल्स को पहले से विकसित या परीक्षण किया जा रहा है। इनका उद्देश्य न्यायिक कामकाज को आसान और अधिक प्रभावी बनाना है। हालांकि, इन तकनीकों का इस्तेमाल न्यायाधीशों के फैसलों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनके काम में सहायता देने के लिए किया जा रहा है।
Legal Research and Analysis Assistant यानी LegRAA एक ऐसा AI आधारित टूल है जिसे न्यायाधीशों को कानूनी शोध और दस्तावेजों के विश्लेषण में सहायता देने के लिए तैयार किया जा रहा है।
यह टूल संबंधित कानूनी जानकारी खोजने, दस्तावेजों को समझने और जरूरी जानकारी को व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य न्यायिक कार्य को आसान बनाना है।
LegRAA न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को अपने हाथ में लेने के बजाय न्यायाधीशों को बेहतर शोध और विश्लेषण में सहायता प्रदान करने के लिए बनाया गया है। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार न्यायाधीश के पास ही रहता है।
Digital Courts 2.1 का उद्देश्य न्यायाधीशों को मामलों को डिजिटल तरीके से संभालने में सहायता देना है। इसके माध्यम से केस से जुड़े दस्तावेज, याचिकाएं और सबूत एक पेपरलेस डिजिटल वातावरण में उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
इस प्लेटफॉर्म में वॉइस-टू-टेक्स्ट और अनुवाद जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं। ये सुविधाएं आदेश और फैसले तैयार करने में न्यायाधीशों की मदद कर सकती हैं।
इस तरह डिजिटल तकनीक न्यायालयों में कागज पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ जरूरी दस्तावेजों तक तेज और व्यवस्थित पहुंच बनाने में मदद कर सकती है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय, IIT मद्रास के सहयोग से, AI और मशीन लर्निंग आधारित तकनीकों का भी परीक्षण कर रहा है। इन तकनीकों का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दाखिल किए गए दस्तावेजों में मौजूद कमियों की पहचान करने और मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी निकालने के लिए किया जा रहा है।
इस तरह के टूल यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि किसी डिजिटल फाइलिंग में जरूरी जानकारी या दस्तावेजों की कमी तो नहीं है। इससे फाइलों की शुरुआती जांच को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाया जा सकता है।
इन पहलों से यह संकेत मिलता है कि न्याय व्यवस्था में AI का इस्तेमाल फिलहाल सावधानीपूर्वक किया जा रहा है। इसका मुख्य जोर प्रशासनिक कार्यों, कानूनी शोध और दस्तावेजों के विश्लेषण में सहायता देने पर है।
भारत में कई भाषाएं बोली जाती हैं। यह विविधता डिजिटल सरकारी सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती भी है। न्याय व्यवस्था में यह चुनौती और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कानूनी दस्तावेज और फैसले अक्सर जटिल कानूनी भाषा में होते हैं।
इसी कारण ई-कोर्ट्स सिस्टम में अनुवाद तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। इसका उद्देश्य न्यायिक जानकारी को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उसे आसानी से समझ सकें।
eSCR प्लेटफॉर्म के माध्यम से न्यायिक फैसलों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। DD News के अनुसार, मार्च 2025 तक 83,000 से अधिक फैसलों का अनुवाद किया जा चुका था। इनमें 36,000 से अधिक फैसलों का हिंदी में अनुवाद शामिल था।
इस तरह की पहल उन नागरिकों के लिए काफी उपयोगी हो सकती है जिन्हें अंग्रेजी में कानूनी जानकारी पढ़ने और समझने में परेशानी होती है।
न्याय व्यवस्था को वास्तव में नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए केवल डिजिटल तकनीक उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। नागरिकों के लिए उस जानकारी को समझना भी आसान होना चाहिए।
भारतीय भाषाओं में फैसलों और कानूनी जानकारी की उपलब्धता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे नागरिक अपने मामलों और न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़ी जानकारी को अपनी परिचित भाषा में समझने में अधिक सक्षम हो सकते हैं।
भाषा की सुविधा डिजिटल न्याय को केवल तकनीकी बदलाव से आगे ले जाकर आम नागरिकों के लिए अधिक उपयोगी बनाने में मदद करती है।
डिजिटल न्याय के फायदे केवल सुविधा तक सीमित नहीं हैं। ई-कोर्ट्स से जुड़ी डिजिटल सेवाएं न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुलभ, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकती हैं।
हालांकि केवल तकनीक से न्याय व्यवस्था की हर समस्या खत्म नहीं हो सकती, लेकिन डिजिटल सेवाएं नागरिकों, वकीलों और न्यायालयों के बीच बातचीत को अधिक आसान बना सकती हैं।
ऑनलाइन फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वकीलों और पक्षकारों को हर काम के लिए अदालत में व्यक्तिगत रूप से जाने की जरूरत कम हो सकती है।
इससे यात्रा, रहने और अन्य प्रशासनिक खर्चों में कमी आ सकती है। खासकर उन लोगों के लिए यह सुविधा महत्वपूर्ण है जो अपने घर या कार्यालय से काफी दूर स्थित अदालतों से जुड़े मामलों में शामिल हैं।
डिजिटल केस-स्टेटस सिस्टम की मदद से लोग अपने मामलों की स्थिति ऑनलाइन देख सकते हैं। इसके लिए उन्हें बार-बार न्यायालय के कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं रहती।
केस की स्थिति, आदेश और अन्य उपलब्ध जानकारी ऑनलाइन मिलने से समय की बचत हो सकती है और न्यायिक प्रक्रिया को समझना आसान हो सकता है।
ऑनलाइन उपलब्ध केस डेटा, न्यायालय के आदेश और फैसले न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद कर सकते हैं।
जब महत्वपूर्ण न्यायिक जानकारी डिजिटल माध्यम से आसानी से उपलब्ध होती है, तो नागरिक, वकील, शोधकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी मामलों की स्थिति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
पुराने न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने से कागजी दस्तावेजों के खराब होने या नष्ट होने का खतरा कम हो सकता है।
डिजिटल रिकॉर्ड होने से जरूरी दस्तावेजों को खोजने और जरूरत पड़ने पर दोबारा प्राप्त करने की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है।
डिजिटल सिस्टम से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करके न्यायालयों को मामलों की संख्या, लंबित मामलों और कामकाज में आने वाली बाधाओं को समझने में मदद मिल सकती है।
इस तरह के डेटा से न्यायिक प्रशासन को यह पहचानने में सहायता मिल सकती है कि किन क्षेत्रों में अधिक संसाधनों, बेहतर प्रबंधन या अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, ई-कोर्ट्स से जुड़ी डिजिटल सेवाएं न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, तकनीक अकेले न्याय में होने वाली हर देरी और समस्या को समाप्त नहीं कर सकती। न्यायिक सुधार के लिए तकनीकी बदलाव के साथ पर्याप्त संसाधन, बेहतर प्रक्रियाएं और प्रभावी प्रशासन भी जरूरी हैं।
यह समझना जरूरी है कि न्याय व्यवस्था को डिजिटल बनाना और अदालतों में लंबित मामलों की समस्या को खत्म करना दो अलग-अलग बातें हैं।
तकनीक प्रशासनिक देरी को कम कर सकती है, रिकॉर्ड तक पहुंच आसान बना सकती है और अदालतों के बीच संवाद को सरल बना सकती है। लेकिन मामलों के निपटारे की गति कई अन्य बातों पर भी निर्भर करती है। इनमें न्यायाधीशों और अदालत कर्मचारियों की उपलब्धता, न्यायिक बुनियादी ढांचा, वकील, गवाह, जांच प्रक्रिया, सबूत और मामले की जटिलता जैसे कई कारक शामिल हैं।
भारत सरकार का Department of Justice भी यह स्पष्ट कर चुका है कि मामलों का निपटारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और यह कई अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
इसलिए, ई-कोर्ट्स को न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने वाली एक महत्वपूर्ण डिजिटल व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए। इसे न्याय में होने वाली हर तरह की देरी का अकेला समाधान नहीं माना जा सकता।
जैसे-जैसे अदालतों की कार्यप्रणाली डिजिटल होती जा रही है, साइबर सुरक्षा और निजता यानी प्राइवेसी का महत्व भी बढ़ रहा है।
न्यायिक व्यवस्था में बहुत संवेदनशील जानकारी मौजूद होती है। इसमें लोगों की निजी जानकारी, सबूत, कानूनी दस्तावेज, अदालती रिकॉर्ड और आपराधिक मामलों से जुड़ी सूचनाएं शामिल हो सकती हैं।
सरकार ने न्याय व्यवस्था में AI के इस्तेमाल से जुड़ी कुछ चुनौतियों को भी स्वीकार किया है। इनमें AI से होने वाला पक्षपात, अनुवाद में गलतियां, डेटा की गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और AI द्वारा तैयार किए गए परिणामों की मानव स्तर पर जांच की जरूरत शामिल है।
इसलिए न्यायिक क्षेत्र में विकसित किए जा रहे AI टूल्स को न्यायाधीशों की जगह लेने वाली तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि उनके काम में सहायता करने वाले साधन के रूप में देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने ई-कोर्ट्स व्यवस्था में सुरक्षित कनेक्टिविटी, उपयोगकर्ता की पहचान की पुष्टि और प्राइवेसी की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी विशेष व्यवस्थाएं विकसित की हैं।
लोगों का डिजिटल न्याय व्यवस्था पर भरोसा तभी मजबूत होगा, जब तकनीकी विकास के साथ मजबूत सुरक्षा उपाय भी लागू किए जाएं।
ई-कोर्ट्स मिशन का तीसरा चरण वर्ष 2027 तक जारी रहने वाला है।
इस चरण का उद्देश्य केवल पुराने दस्तावेजों को डिजिटल बनाना नहीं है। इसके तहत डिजिटल और पेपरलेस अदालतें, अधिक व्यापक वर्चुअल सुनवाई, क्लाउड आधारित रिकॉर्ड, बेहतर डिजिटल कनेक्टिविटी और विभिन्न न्यायिक प्रणालियों के बीच मजबूत तालमेल विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
इसके साथ ही AI, डेटा एनालिटिक्स और Optical Character Recognition यानी OCR जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ाने की योजना है।
सरकार के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि इस डिजिटल बदलाव की मजबूत नींव पहले ही तैयार हो चुकी है। 660 करोड़ से अधिक पन्नों के न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल बनाया जा चुका है। लाखों मामलों की ई-फाइलिंग हो चुकी है और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से करोड़ों सुनवाई आयोजित की जा चुकी हैं।
अब अगली बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ये तकनीकें भारत की अलग-अलग न्यायिक व्यवस्थाओं में समान रूप से और प्रभावी तरीके से काम करें।
इसके लिए केवल नए सॉफ्टवेयर और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर्याप्त नहीं होंगे। भरोसेमंद इंटरनेट कनेक्टिविटी, साइबर सुरक्षा, न्यायिक कर्मचारियों की ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता और डिजिटल साक्षरता में भी लगातार निवेश करना जरूरी होगा।
ई-कोर्ट्स मिशन तकनीक के माध्यम से भारत की न्याय व्यवस्था को आधुनिक बनाने की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक है। लगभग दो दशकों में यह कार्यक्रम केवल अदालतों को कंप्यूटर से जोड़ने की पहल से आगे बढ़कर एक व्यापक डिजिटल व्यवस्था बन गया है। इसमें ई-फाइलिंग, ऑनलाइन केस की जानकारी, वर्चुअल सुनवाई, इलेक्ट्रॉनिक समन, डिजिटल रिकॉर्ड, नागरिक सहायता केंद्र और AI आधारित न्यायिक टूल्स जैसी सुविधाएं शामिल हो गई हैं।
नवीनतम आंकड़े इस बदलाव के बड़े स्तर को दिखाते हैं। 660 करोड़ से अधिक पन्नों के न्यायिक रिकॉर्ड डिजिटल किए जा चुके हैं। लगभग 1.07 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग हो चुकी हैं। 3.97 करोड़ से अधिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुनवाई आयोजित की जा चुकी हैं और हजारों ई-सेवा केंद्र स्थापित किए गए हैं।
आम नागरिकों के लिए इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तकनीक स्वयं नहीं है, बल्कि वह सुविधा है जो तकनीक उपलब्ध करा सकती है। डिजिटल व्यवस्था से कागजी कार्रवाई पर निर्भरता कम हो सकती है। केस की जानकारी प्राप्त करना आसान हो सकता है। अदालतों तक बार-बार यात्रा करने की जरूरत कम हो सकती है और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है।
हालांकि, डिजिटल बदलाव के साथ मजबूत प्राइवेसी सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, मानव निगरानी और सभी लोगों के लिए समान डिजिटल पहुंच भी जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों के नागरिक, कम डिजिटल जानकारी रखने वाले लोग और कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले व्यक्ति इस बदलाव से पीछे नहीं छूटने चाहिए।
जैसे-जैसे ई-कोर्ट्स मिशन का तीसरा चरण वर्ष 2027 की ओर बढ़ रहा है, भारत की न्याय व्यवस्था तेजी से डिजिटल, डेटा आधारित और नागरिक-केंद्रित प्रणाली की ओर बढ़ रही है। यदि इसे समावेशी और जिम्मेदार तरीके से लागू किया जाता है, तो ई-कोर्ट्स मिशन केवल एक तकनीकी कार्यक्रम नहीं रहेगा। यह भारत में न्याय तक पहुंच को अधिक तेज, पारदर्शी, किफायती और आसान बनाने की मजबूत नींव बन सकता है।