इंटरनेट आज बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। ऑनलाइन पढ़ाई, शिक्षा से जुड़े प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन गेम्स के जरिए बच्चे सीखते हैं, दूसरों से बात करते हैं और नए लोगों से जुड़ते हैं।
हालांकि, तकनीक के कई फायदे हैं, लेकिन इसके साथ बच्चों के लिए कुछ गंभीर खतरे भी बढ़ रहे हैं। इनमें ऑनलाइन यौन शोषण, दुर्व्यवहार, गलत तरीके से प्रभावित करना, अनजान या अवांछित लोगों का संपर्क और बच्चों की निजी तस्वीरों या जानकारी का गलत इस्तेमाल शामिल है।
हाल ही में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। यूनिसेफ के अनुसार, 21 देशों में 12 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 2 करोड़ बच्चों, यानी सर्वे में शामिल इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लगभग हर पांच में से एक बच्चे ने एक साल के दौरान तकनीक के जरिए होने वाले किसी न किसी तरह के यौन शोषण या दुर्व्यवहार का सामना किया।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि ऐसे कई मामले सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन गेम्स के जरिए सामने आए। चिंता की बात यह है कि बहुत से बच्चे अपने साथ हुई घटना के बारे में किसी को नहीं बताते। डर, शर्म, परेशानी और यह पता न होना कि मदद के लिए किससे संपर्क करें, बच्चों को चुप रहने के लिए मजबूर कर सकता है।
इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य माता-पिता को बच्चों के बढ़ते ऑनलाइन खतरों के बारे में जागरूक करना और यह समझाना है कि वे अपने बच्चों को ऑनलाइन दुर्व्यवहार तथा डिजिटल दुनिया से जुड़े दूसरे खतरों से कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
बच्चों को पूरी तरह इंटरनेट और तकनीक से दूर रखना इसका समाधान नहीं है। इसके बजाय, माता-पिता को यह समझने की जरूरत है कि बच्चे डिजिटल दुनिया में क्या कर रहे हैं और वे इंटरनेट का सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।
इस लेख में यूनिसेफ की रिपोर्ट में बताए गए प्रमुख ऑनलाइन खतरों के बारे में विस्तार से बताया गया है। साथ ही यह समझने की कोशिश की गई है कि बच्चे ऑनलाइन दुर्व्यवहार के बारे में अपने माता-पिता या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताने से क्यों डर सकते हैं।
इसमें यह भी बताया गया है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल बच्चों को नुकसान पहुंचाने के लिए कैसे किया जा सकता है और माता-पिता अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित डिजिटल वातावरण कैसे तैयार कर सकते हैं।
इसके अलावा, यह लेख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़े नए खतरों पर भी ध्यान देता है। आज एआई तेजी से विकसित हो रहा है और इसके गलत इस्तेमाल से बच्चों की तस्वीरों और निजी जानकारी से जुड़े नए खतरे पैदा हो सकते हैं। इसलिए बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए माता-पिता की जागरूकता, सही डिजिटल जानकारी, उचित गोपनीयता सेटिंग और बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करना बहुत जरूरी है।
इस लेख का उद्देश्य माता-पिता और बच्चों में डर पैदा करना नहीं है। इसका मकसद उन्हें जागरूक करना, सावधानी बरतने के तरीके समझाना और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा देना है। हर बच्चे को इंटरनेट का इस्तेमाल सीखने, खेलने और दूसरों से जुड़ने के लिए सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। किसी भी बच्चे को ऑनलाइन डर, दबाव या असुरक्षा महसूस नहीं होनी चाहिए।
माता-पिता अगर ऑनलाइन दुनिया के खतरों को समझें और सही समय पर सही कदम उठाना सीखें, तो वे अपने बच्चों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों को यह भरोसा होना चाहिए कि अगर इंटरनेट पर उनके साथ कुछ गलत होता है, तो वे बिना डरे अपने माता-पिता या किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति से मदद मांग सकते हैं।
माता-पिता के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए केवल उनके स्क्रीन टाइम को कम करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बच्चों से खुलकर बातचीत करना, ऑनलाइन खतरों के बारे में जागरूक होना, डिजिटल दुनिया की सही जानकारी रखना और ऐसा भरोसेमंद रिश्ता बनाना जरूरी है, जिसमें बच्चा किसी भी परेशानी के बारे में बिना डर के अपने माता-पिता से बात कर सके।
यूनिसेफ की “Through Children's Eyes: How Digital Technologies Enable Child Sexual Abuse” नामक रिपोर्ट में बच्चों के ऑनलाइन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी चिंताजनक स्थिति सामने आई है। इस रिपोर्ट में अलग-अलग देशों में किए गए सर्वेक्षणों के आंकड़ों के साथ उन युवाओं के अनुभवों को भी शामिल किया गया है, जिन्होंने बचपन में ऑनलाइन या तकनीक के माध्यम से होने वाले दुर्व्यवहार का सामना किया था।
इस अध्ययन में 21 देशों के करीब 21,000 इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 12 से 17 वर्ष के बच्चों को शामिल किया गया। इसके अलावा, 100 ऐसे युवाओं से विस्तार से बातचीत की गई, जिन्होंने बचपन में किसी न किसी तरह के दुर्व्यवहार का अनुभव किया था। यह अध्ययन Disrupting Harm परियोजना का हिस्सा है, जिसे यूनिसेफ ने ECPAT International और INTERPOL के साथ मिलकर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक साल के दौरान 1.5 करोड़ से अधिक बच्चे अनचाही यौन सामग्री के संपर्क में आए। करीब 90 लाख बच्चों पर यौन बातचीत करने या अपनी तस्वीरें साझा करने का दबाव डाला गया। वहीं लगभग 40 लाख बच्चों की यौन तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना साझा की गईं।
इन आंकड़ों को दुनिया के सभी बच्चों की स्थिति नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस अध्ययन में केवल चुने गए देशों के इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों को शामिल किया गया था। जिन बच्चों के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है, वे इस सर्वेक्षण का हिस्सा नहीं थे। इसके अलावा, बहुत से बच्चे अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में किसी को नहीं बताते। इसलिए यूनिसेफ का मानना है कि वास्तविक संख्या इन आंकड़ों से भी अधिक हो सकती है।
माता-पिता के लिए रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार के मामले सबसे अधिक कहां सामने आ रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 60 प्रतिशत मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े थे। इनमें Facebook, Instagram, Snapchat, TikTok और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। वहीं करीब 14 प्रतिशत मामले ऑनलाइन गेम्स से जुड़े पाए गए।
इसका यह मतलब नहीं है कि इन प्लेटफॉर्म पर मौजूद हर बच्चा खतरे में है या इन कंपनियों को हर घटना के लिए जिम्मेदार माना जाए। इसका मतलब यह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के कुछ फीचर और सुविधाओं का गलत इस्तेमाल बच्चों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, निजी संदेश भेजने की सुविधा, फर्जी खाते, लोगों से सीधे संपर्क करने के विकल्प और कुछ प्रकार की सिफारिश प्रणालियां ऐसे लोगों को बच्चों तक पहुंचने का अवसर दे सकती हैं, जिनका उद्देश्य सही नहीं है।
यूनिसेफ की ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी जानकारी भी बताती है कि अपराधी कई बार पहले बच्चे का विश्वास जीतने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वे धीरे-धीरे बच्चे पर निजी जानकारी या अनुचित तस्वीरें साझा करने का दबाव डाल सकते हैं।
इसलिए माता-पिता के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि “तुम किससे बात कर रहे हो।” उन्हें यह भी समझना चाहिए कि उनका बच्चा कौन-से ऐप इस्तेमाल करता है, उन ऐप में गोपनीयता की कौन-सी सुविधाएं हैं और बच्चे से संपर्क कौन-कौन कर सकता है।
आमतौर पर यह माना जाता है कि इंटरनेट पर बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाला व्यक्ति कोई अनजान व्यक्ति होता है। लेकिन यूनिसेफ की रिपोर्ट इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं मानती है।
अध्ययन में शामिल देशों में 57 प्रतिशत मामलों में वह व्यक्ति बच्चे का परिचित था। इनमें दोस्त, सहपाठी, साथी या परिवार के लोग भी शामिल थे। वहीं करीब 38 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उन्होंने उस व्यक्ति को पहली बार ऑनलाइन देखा या उससे ऑनलाइन संपर्क किया था।
यह जानकारी माता-पिता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी व्यक्ति का परिचित होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता है।
कोई व्यक्ति दोस्त, सहपाठी या ऑनलाइन परिचित बनकर बच्चे का विश्वास जीत सकता है और बाद में उसी भरोसे का गलत फायदा उठा सकता है। इसी तरह, बच्चे का कोई परिचित व्यक्ति भी डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल उसे दबाव में लाने, डराने या परेशान करने के लिए कर सकता है।
इसलिए बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि ऑनलाइन सुरक्षा केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि सामने वाला व्यक्ति अनजान है या परिचित। किसी भी व्यक्ति के गलत व्यवहार, दबाव या अनुचित बातचीत को पहचानना और उसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कोई भी व्यक्ति आसानी से एक नया खाता बना सकता है और दूसरे लोगों को निजी संदेश भेज सकता है। सामान्य परिस्थितियों में ये सुविधाएं लोगों को बातचीत और संपर्क में मदद करती हैं। लेकिन इनका गलत इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि फर्जी खाते और निजी संदेश जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल बच्चों तक पहुंच बनाने के लिए किया जा सकता है। कोई व्यक्ति शुरुआत में सामान्य बातचीत करके बच्चे का विश्वास जीत सकता है। इसके बाद बातचीत धीरे-धीरे ऐसे विषयों की ओर ले जाई जा सकती है, जिससे बच्चा असहज या परेशान महसूस करे।
कई बच्चे तुरंत यह समझ नहीं पाते कि कोई बातचीत सुरक्षित है या नहीं। कुछ बच्चे यह सोचकर भी चुप रह सकते हैं कि अगर उन्होंने माता-पिता को बताया तो उनका फोन छीन लिया जाएगा या उन्हें इंटरनेट इस्तेमाल करने से रोक दिया जाएगा।
इसी कारण माता-पिता को बच्चों में डर पैदा करने के बजाय भरोसे का रिश्ता बनाना चाहिए।
बच्चों को यह विश्वास होना चाहिए कि अगर इंटरनेट पर कोई व्यक्ति उन्हें असहज महसूस कराता है, उन पर दबाव डालता है, अनुचित तस्वीर मांगता है, धमकाता है या किसी बात को गुप्त रखने के लिए कहता है, तो वे बिना डरे किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को बता सकते हैं।
कई माता-पिता ऑनलाइन सुरक्षा को केवल सोशल मीडिया से जोड़कर देखते हैं। लेकिन यूनिसेफ के अध्ययन में सामने आया कि करीब 14 प्रतिशत मामले ऑनलाइन गेम्स से जुड़े थे।
आज के कई ऑनलाइन गेम केवल खेलने तक सीमित नहीं हैं। इनमें वॉयस चैट, टेक्स्ट मैसेज, दोस्त बनाने की सुविधा और दूसरे खिलाड़ियों के साथ लाइव बातचीत जैसी सुविधाएं होती हैं। इससे गेमिंग का अनुभव अधिक सामाजिक और मनोरंजक बन जाता है। लेकिन इसी कारण बच्चे ऐसे लोगों के संपर्क में भी आ सकते हैं, जिन्हें वे वास्तविक जीवन में नहीं जानते।
इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चों को ऑनलाइन गेम खेलने से पूरी तरह रोक दिया जाए। इसके बजाय माता-पिता को यह समझना चाहिए कि उनका बच्चा कौन-सा गेम खेल रहा है और उसमें दूसरे लोगों से संपर्क करने की क्या सुविधाएं हैं।
माता-पिता को इन बातों की जांच करनी चाहिए।
कौन लोग बच्चे को मैसेज या दोस्ती का अनुरोध भेज सकते हैं।
क्या वॉयस चैट को बंद करने की सुविधा उपलब्ध है।
क्या बच्चे की प्रोफाइल दूसरे लोगों को सार्वजनिक रूप से दिखाई देती है।
क्या अनजान लोग बच्चे के साथ बातचीत या गेम में शामिल हो सकते हैं।
बच्चे किसी दूसरे खिलाड़ी को ब्लॉक या रिपोर्ट कैसे कर सकते हैं।
क्या गेम में माता-पिता के लिए सुरक्षा और नियंत्रण की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर ध्यान जरूर देना चाहिए, लेकिन हर ऑनलाइन बातचीत को खतरनाक मानने की जरूरत नहीं है। सही तरीका यह है कि बच्चों को सुरक्षित तरीके से इंटरनेट और गेमिंग का इस्तेमाल करना सिखाया जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे जानते हों कि अगर उन्हें ऑनलाइन किसी व्यक्ति या गतिविधि से डर, परेशानी या असहजता महसूस होती है, तो वे तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति से मदद मांग सकते हैं।
यूनिसेफ की रिपोर्ट में सामने आई सबसे चिंताजनक बातों में से एक यह है कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करने वाले बहुत से बच्चे इस बारे में किसी को नहीं बताते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 40 प्रतिशत से अधिक मामलों की जानकारी बच्चों ने किसी अन्य व्यक्ति को नहीं दी। वहीं, 1 प्रतिशत से भी कम मामलों की सूचना पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं या हेल्पलाइन जैसी संबंधित एजेंसियों को दी गई। बच्चों के चुप रहने की सबसे बड़ी वजहों में से एक यह थी कि उन्हें पता ही नहीं था कि मदद के लिए किसके पास जाएं या किसे अपनी परेशानी बताएं।
माता-पिता के लिए यह बात समझना बहुत जरूरी है।
ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करने वाला बच्चा तुरंत मदद मांगने के लिए आगे नहीं आ सकता है। वह डर, शर्म, उलझन या अपने साथ हुई घटना के लिए खुद को जिम्मेदार समझने के कारण चुप रह सकता है। कुछ बच्चों को यह डर भी हो सकता है कि अगर उन्होंने माता-पिता को बताया तो वे नाराज हो जाएंगे या उनका फोन और इंटरनेट इस्तेमाल करने की सुविधा बंद कर देंगे।
इसलिए माता-पिता को बच्चों को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि मदद मांगने पर उन्हें दोष नहीं दिया जाएगा और न ही उन्हें सजा दी जाएगी।
माता-पिता बच्चों से सरल शब्दों में कह सकते हैं, “अगर इंटरनेट पर कोई भी बात तुम्हें परेशान या असहज करे, तो मुझे जरूर बताना। मैं तुम्हारी मदद करूंगा या करूंगी।”
ऐसा भरोसा बच्चों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। जब बच्चे जानते हैं कि उनके माता-पिता उन्हें डांटने या दोष देने के बजाय उनकी बात सुनेंगे, तो उनके किसी परेशानी के बारे में खुलकर बात करने की संभावना बढ़ सकती है।
तकनीक के जरिए होने वाला यौन शोषण या दुर्व्यवहार केवल इंटरनेट तक सीमित नहीं रहता है। इसका असर बच्चे के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
यूनिसेफ के विश्लेषण के अनुसार, जिन बच्चों ने इस तरह के शोषण या दुर्व्यवहार का सामना किया, उनमें आत्महत्या से जुड़े विचार या व्यवहार सामने आने की संभावना चार गुना अधिक थी। ऐसे बच्चों में खुद को नुकसान पहुंचाने की संभावना भी चार गुना अधिक पाई गई। इसके अलावा, इन बच्चों में चिंता का स्तर अन्य बच्चों की तुलना में लगभग 11 प्रतिशत अंक अधिक था।
कुछ देशों में स्थिति और भी गंभीर पाई गई। यूनिसेफ के अनुसार, मेक्सिको और नॉर्थ मैसेडोनिया में ऑनलाइन दुर्व्यवहार का अनुभव करने वाले बच्चों में आत्महत्या से जुड़े विचार या व्यवहार का जोखिम आठ गुना से अधिक था। वहीं पाकिस्तान में ऐसे बच्चों में खुद को नुकसान पहुंचाने का जोखिम सात गुना से अधिक पाया गया।
हालांकि, इन आंकड़ों का यह अर्थ नहीं है कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करने वाले हर बच्चे पर एक जैसा असर पड़ेगा। हर बच्चे की परिस्थिति और प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। लेकिन ये आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि ऐसी किसी भी घटना को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
माता-पिता, शिक्षक और बच्चों की मदद करने वाली संस्थाओं को बच्चे की बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव भी इस बात का संकेत हो सकता है कि वह किसी परेशानी से गुजर रहा है।
माता-पिता को इन बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।
बच्चा अचानक बहुत शांत या दूसरों से दूर रहने लगे।
वह पहले की तुलना में अधिक चिंतित या परेशान दिखाई दे।
उसकी नींद या रोजमर्रा की दिनचर्या में बदलाव आए।
पढ़ाई या स्कूल के काम में अचानक रुचि कम हो जाए।
वह अपने मोबाइल या कंप्यूटर को लेकर असामान्य रूप से बहुत ज्यादा गोपनीयता बरतने लगे।
वह किसी ऐसे ऐप या ऑनलाइन गतिविधि से अचानक दूर रहने लगे, जिसे वह पहले पसंद करता था।
हालांकि, इन संकेतों का यह मतलब जरूरी नहीं है कि बच्चे के साथ ऑनलाइन दुर्व्यवहार हुआ ही है। लेकिन ऐसे बदलाव माता-पिता के लिए बच्चे से शांत तरीके से बात शुरू करने का एक अवसर हो सकते हैं।
माता-पिता को बच्चे से सवाल पूछते समय गुस्सा या दबाव बनाने के बजाय प्यार और समझदारी से बात करनी चाहिए। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि माता-पिता उसकी बात सुनने और उसकी मदद करने के लिए मौजूद हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
आज एआई की मदद से तस्वीरों, वीडियो और आवाज को पहले की तुलना में कहीं अधिक वास्तविक तरीके से बनाया या बदला जा सकता है। यह तकनीक कई सकारात्मक कामों में उपयोगी है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल बच्चों को नुकसान पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है।
यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि जनरेटिव एआई का इस्तेमाल बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री बनाने या सामान्य तस्वीरों में गलत तरीके से बदलाव करने के लिए किया जा सकता है।
फरवरी 2026 में यूनिसेफ ने 11 देशों में किए गए शोध के आधार पर बताया कि कम से कम 12 लाख बच्चों ने यह बताया कि पिछले एक साल में उनकी तस्वीरों को यौन रूप से आपत्तिजनक डीपफेक सामग्री में बदला गया था।
यह माता-पिता के लिए एक नई और गंभीर चुनौती है। अब किसी बच्चे को नुकसान पहुंचने के लिए यह जरूरी नहीं है कि उसने खुद कोई आपत्तिजनक तस्वीर बनाई या साझा की हो। इंटरनेट पर मौजूद किसी सामान्य तस्वीर को भी कोई व्यक्ति डाउनलोड करके उसका गलत इस्तेमाल कर सकता है।
इसलिए माता-पिता को बच्चों से यह समझाना चाहिए कि इंटरनेट पर तस्वीरें और निजी जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतना जरूरी है। सार्वजनिक रूप से तस्वीरें साझा करने से पहले यह सोचना चाहिए कि उस तस्वीर को कौन देख सकता है और उसका गलत इस्तेमाल किस तरह हो सकता है।
साथ ही बच्चों को यह भी समझाना जरूरी है कि अगर किसी ने उनकी तस्वीर का गलत इस्तेमाल किया है या उसे बदलकर आपत्तिजनक सामग्री बनाई है, तो इसमें बच्चे की कोई गलती नहीं है।
बच्चे को ऐसी स्थिति में छिपने या खुद को दोष देने के बजाय किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति से मदद मांगनी चाहिए।
माता-पिता द्वारा लगाए गए सुरक्षा नियंत्रण और स्क्रीन टाइम की सीमा बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में मदद कर सकते हैं। लेकिन केवल इन उपायों से बच्चों को डिजिटल खतरों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है।
बच्चों को यह भी समझना जरूरी है कि इंटरनेट पर अपनी सुरक्षा कैसे करनी है और किन सीमाओं का ध्यान रखना है।
माता-पिता बच्चों के साथ कुछ आसान नियम साझा कर सकते हैं।
बच्चों को अपना पूरा नाम, स्कूल का नाम, घर का पता, फोन नंबर, पासवर्ड या अपनी सटीक लोकेशन हर किसी के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। किसी ऑनलाइन व्यक्ति के बार-बार पूछने पर भी निजी जानकारी देने से बचना चाहिए।
किसी व्यक्ति की अच्छी प्रोफाइल तस्वीर या दोस्ताना बातचीत से यह साबित नहीं होता कि वह वही व्यक्ति है, जिसका वह दावा कर रहा है। बच्चों को अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।
किसी बातचीत को सार्वजनिक जगह से निजी संदेशों में ले जाने पर दूसरे लोगों के लिए यह देखना मुश्किल हो सकता है कि वहां क्या बातचीत हो रही है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति बच्चे को बार-बार निजी बातचीत करने के लिए कहता है या किसी बात को माता-पिता से छिपाने के लिए कहता है, तो बच्चे को सतर्क हो जाना चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति बच्चे को धमकाता है, डराता है, ब्लैकमेल करता है या किसी काम के लिए दबाव डालता है, तो बच्चे को चुप नहीं रहना चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी भरोसेमंद माता-पिता, शिक्षक या अन्य जिम्मेदार बड़े व्यक्ति से तुरंत मदद मांगनी चाहिए।
बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि डर या धमकी के कारण किसी व्यक्ति की बात मानना समस्या का समाधान नहीं है। मदद मांगना ही सही कदम है।
बच्चों को यह पता होना चाहिए कि सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर किसी परेशान करने वाले व्यक्ति को ब्लॉक और रिपोर्ट कैसे किया जाता है।
अगर कोई व्यक्ति अनुचित संदेश भेजता है, परेशान करता है या बार-बार संपर्क करने की कोशिश करता है, तो बच्चे को उससे बातचीत जारी रखने के बजाय उसे ब्लॉक करने और संबंधित प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट करने की जानकारी होनी चाहिए।
माता-पिता को भी बच्चों के साथ बैठकर उनके इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप और गेम की सुरक्षा सुविधाओं को समझना चाहिए। इससे बच्चों को केवल नियमों का पालन करने के बजाय डिजिटल दुनिया में सुरक्षित और जिम्मेदारी से व्यवहार करना सीखने में मदद मिलेगी।
यूनिसेफ की रिपोर्ट से मिलने वाली सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि बच्चों को ऐसे बड़े लोगों की जरूरत होती है, जिन पर वे भरोसा कर सकें और जो मुश्किल समय में उनका साथ दें।
अगर कोई बच्चा माता-पिता को बताता है कि इंटरनेट पर उसके साथ कुछ गलत या असहज हुआ है, तो सबसे पहली प्रतिक्रिया गुस्सा या बच्चे को दोष देना नहीं होनी चाहिए।
“तुमने उस व्यक्ति से बात ही क्यों की।” या “तुमने वह तस्वीर क्यों भेजी।” जैसे सवाल बच्चे को यह महसूस करा सकते हैं कि गलती उसी की थी। इससे बच्चा आगे किसी परेशानी के बारे में बताने से डर सकता है।
इसके बजाय, माता-पिता को सबसे पहले बच्चे को भरोसा और सुरक्षा का एहसास कराना चाहिए। वे बच्चे से कह सकते हैं।
“अच्छा हुआ तुमने मुझे बताया।”
“तुम्हें डरने या परेशानी महसूस करने की जरूरत नहीं है।”
“हम मिलकर इसका हल निकालेंगे।”
हर स्थिति अलग हो सकती है और माता-पिता को उसी के अनुसार कदम उठाना चाहिए। लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि बच्चे की सुरक्षा और भावनात्मक स्थिति सबसे पहले आती है, सजा या दोष बाद में।
बच्चे को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि इंटरनेट पर उसके साथ कुछ गलत होने पर उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसके माता-पिता उसकी बात सुनेंगे और जरूरत पड़ने पर उसकी मदद करेंगे।
बच्चे अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के बारे में अपने माता-पिता से ज्यादा जानते हैं। अगर माता-पिता को इन ऐप और गेम की जानकारी कम हो, तो बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को समझना मुश्किल हो सकता है।
माता-पिता को तकनीक के विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है। लेकिन उन्हें कम से कम उन ऐप, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन गेम के बारे में बुनियादी जानकारी जरूर होनी चाहिए, जिनका उनका बच्चा नियमित रूप से इस्तेमाल करता है।
माता-पिता को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि किसी ऐप की गोपनीयता सेटिंग कैसे काम करती है। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि बच्चे को कौन मैसेज भेज सकता है, कौन उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज सकता है और किसी परेशान करने वाले व्यक्ति को ब्लॉक या रिपोर्ट कैसे किया जा सकता है।
इसके अलावा, ऐप या गेम की उम्र से जुड़ी शर्तों और माता-पिता के लिए उपलब्ध सुरक्षा नियंत्रणों की जानकारी भी रखना जरूरी है।
यूनिसेफ भी माता-पिता और बच्चों की देखभाल करने वाले लोगों को अपनी डिजिटल समझ बढ़ाने की सलाह देता है। इससे वे बच्चों को ऑनलाइन खतरों को पहचानने और उनसे सुरक्षित रहने में बेहतर तरीके से मदद कर सकते हैं।
एक आसान तरीका यह है कि माता-पिता अपने बच्चों से कहें कि वे उन्हें कोई ऐप या गेम इस्तेमाल करना सिखाएं। बच्चा बता सकता है कि ऐप कैसे काम करता है, कौन लोग उससे संपर्क कर सकते हैं और उसमें सुरक्षा की कौन-कौन सी सुविधाएं हैं।
इस तरह ऑनलाइन सुरक्षा पर बातचीत पूछताछ या निगरानी जैसी नहीं लगेगी। यह माता-पिता और बच्चों के बीच सामान्य और भरोसेमंद बातचीत का हिस्सा बन सकती है।
हर परिवार बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कुछ आसान नियम बना सकता है। इन नियमों का उद्देश्य बच्चों को डराना या उनकी हर ऑनलाइन गतिविधि पर नजर रखना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य उन्हें डिजिटल दुनिया में सुरक्षित और जिम्मेदारी से व्यवहार करना सिखाना होना चाहिए।
परिवार में कुछ ऐसे नियम बनाए जा सकते हैं।
बच्चे बिना डर के अपनी परेशानी बता सकें। अगर इंटरनेट पर कोई ऐसी घटना होती है जिससे बच्चा परेशान या असहज महसूस करता है, तो वह माता-पिता को बिना सजा के डर के बता सके।
पासवर्ड सुरक्षित रखें। बच्चों को अपने पासवर्ड दूसरों के साथ साझा नहीं करने चाहिए। मजबूत पासवर्ड और सुरक्षित लॉगिन की आदत को बढ़ावा देना चाहिए।
ब्लॉक और रिपोर्ट करना सिखाएं। बच्चों को पता होना चाहिए कि किसी परेशान करने वाले खाते या व्यक्ति को कैसे ब्लॉक और रिपोर्ट किया जाता है।
निजी जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा न करें। बच्चों को अपना पता, फोन नंबर, स्कूल की जानकारी, पासवर्ड और सटीक लोकेशन जैसी निजी जानकारी इंटरनेट पर साझा करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।
गोपनीयता सेटिंग की नियमित जांच करें। माता-पिता और बच्चों को समय-समय पर सोशल मीडिया और अन्य ऐप की गोपनीयता सेटिंग देखनी चाहिए।
भरोसेमंद लोगों की पहचान करें। बच्चों को पता होना चाहिए कि अगर माता-पिता उपलब्ध नहीं हैं, तो वे किस भरोसेमंद बड़े व्यक्ति से मदद मांग सकते हैं।
नए ऐप और ऑनलाइन ट्रेंड के बारे में बात करें। माता-पिता को बच्चों से नियमित रूप से नए ऐप, गेम और इंटरनेट पर चल रहे नए ट्रेंड के बारे में बातचीत करनी चाहिए।
ऐसी योजना बनाने का उद्देश्य बच्चे की हर बातचीत पर नजर रखना नहीं है। इसका मकसद बच्चे को इतना जागरूक और आत्मविश्वासी बनाना है कि अगर ऑनलाइन कुछ गलत होता है, तो वह सही समय पर सही कदम उठा सके और मदद मांग सके।
अगर बच्चा बताता है कि इंटरनेट पर किसी व्यक्ति ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया है या उसे किसी तरह परेशान किया है, तो माता-पिता को सबसे पहले शांत रहकर उसकी बात सुननी चाहिए।
बच्चे को तुरंत डांटना, दोष देना या गुस्सा करना स्थिति को और मुश्किल बना सकता है। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि उसने अपने माता-पिता को बताकर सही काम किया है।
घबराकर तुरंत सभी संदेश, खाते या अन्य जानकारी डिलीट न करें। स्थिति के अनुसार, संबंधित खाते का नाम, संदेश, बातचीत की तारीख और अन्य उपलब्ध जानकारी आगे शिकायत करने में उपयोगी हो सकती है।
जरूरत पड़ने पर माता-पिता संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या ऐप पर उपलब्ध रिपोर्ट करने की सुविधा का इस्तेमाल कर सकते हैं। गंभीर मामलों में उचित पेशेवर सहायता या कानून लागू करने वाली एजेंसियों से संपर्क करना भी जरूरी हो सकता है।
अगर बच्चा घटना के बाद बहुत ज्यादा परेशान दिखाई दे, गंभीर मानसिक तनाव में हो या खुद को नुकसान पहुंचाने का तत्काल खतरा दिखाई दे, तो तुरंत पेशेवर और आपातकालीन सहायता लेनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को यह महसूस नहीं कराया जाना चाहिए कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार के लिए वह खुद जिम्मेदार है। गलत व्यवहार की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जिसने बच्चे को नुकसान पहुंचाया है।
यूनिसेफ भी ऐसे भरोसेमंद रिपोर्टिंग और सहायता तंत्र विकसित करने पर जोर देता है, जहां बच्चे बिना डर के अपनी परेशानी बता सकें और उन्हें सुरक्षित तरीके से मदद मिल सके।
माता-पिता के लिए सबसे जरूरी भूमिका केवल बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना नहीं है। उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी ऐसा भरोसेमंद माहौल बनाना है, जिसमें बच्चा किसी भी ऑनलाइन परेशानी के बारे में खुलकर बात कर सके।
जब बच्चे को यह भरोसा होता है कि उसके माता-पिता उसकी बात सुनेंगे, उसे दोष नहीं देंगे और मुश्किल समय में उसका साथ देंगे, तो वह ऑनलाइन खतरों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।
बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने की पूरी जिम्मेदारी केवल माता-पिता और बच्चों पर नहीं डाली जा सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी कंपनियों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
यूनिसेफ ने डिजिटल प्लेटफॉर्म से सुरक्षा को डिजाइन का हिस्सा बनाने की अपील की है। इसका मतलब है कि किसी ऐप या ऑनलाइन सेवा को बनाते समय शुरुआत से ही बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
इसके तहत बच्चों की निजी जानकारी को बेहतर तरीके से सुरक्षित करना, अनजान वयस्कों की ओर से आने वाले अनचाहे संपर्क को सीमित करना, बच्चों के लिए सुरक्षित सुझाव और सामग्री दिखाने वाली प्रणालियां बनाना तथा ऑनलाइन दुर्व्यवहार को पहचानने और उसकी शिकायत करने के बेहतर इंतजाम करना जरूरी है।
टेक्नोलॉजी कंपनियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार की गई आपत्तिजनक सामग्री और ऑनलाइन यौन शोषण के लिए दी जाने वाली धमकियों जैसे नए खतरों से निपटने के लिए भी प्रभावी कदम उठाने होंगे।
यूनिसेफ की 2026 की AI से जुड़ी सलाह में भी बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत उपायों की जरूरत पर जोर दिया गया है। बच्चे अब रोजमर्रा के कई डिजिटल उत्पादों और सेवाओं के जरिए AI तकनीक का इस्तेमाल या सामना कर रहे हैं।
माता-पिता बच्चों को सुरक्षित डिजिटल आदतें अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, लेकिन वे हर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के काम करने के तरीके को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। इसलिए कंपनियों और सरकारों की जिम्मेदारी है कि ऑनलाइन सेवाओं को शुरुआत से ही बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित बनाया जाए।
यूनिसेफ ने सरकारों से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए मजबूत कानून, बेहतर नियम और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था बनाने की भी अपील की है।
टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदल रही है, जबकि कानून और सुरक्षा व्यवस्था को बदलने में काफी समय लग सकता है। AI से तैयार की गई आपत्तिजनक सामग्री और तकनीक के जरिए बच्चों को यौन शोषण की धमकी देने जैसे नए खतरे मौजूदा कानूनों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।
सरकारों को ऐसे कानून बनाने होंगे जो नए डिजिटल खतरों से निपट सकें। इसके साथ ही पुलिस और अन्य कानून लागू करने वाली एजेंसियों को उचित प्रशिक्षण देना, बाल सुरक्षा सेवाओं को मजबूत करना और ऐसी शिकायत व्यवस्था बनाना जरूरी है, जहां बच्चे और परिवार आसानी से मदद ले सकें।
यूनिसेफ का यह भी कहना है कि बच्चों की सुरक्षा केवल बच्चों की अपनी जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। परिवार, स्कूल और पूरा समाज मिलकर ऐसा माहौल बनाने में योगदान दें, जहां बच्चे सुरक्षित महसूस करें और किसी समस्या के सामने आने पर बिना डर के मदद मांग सकें।
यूनिसेफ की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का मतलब केवल उनके मोबाइल फोन का इस्तेमाल सीमित करना नहीं है।
बच्चे पढ़ाई, मनोरंजन, बातचीत और सामाजिक संपर्क के लिए इंटरनेट और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करते रहेंगे। इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि उन्हें इन तकनीकों का सुरक्षित और जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सिखाया जाए।
माता-पिता बच्चों से यह पूछ सकते हैं कि वे कौन-कौन से ऐप इस्तेमाल करते हैं। वे किन लोगों से ऑनलाइन बातचीत करते हैं। क्या कभी किसी व्यक्ति ने इंटरनेट पर उन्हें असहज महसूस कराया है।
बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि अगर ऑनलाइन कुछ गलत या परेशान करने वाला होता है, तो वे किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति से मदद मांग सकते हैं।
माता-पिता को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे किसी संदिग्ध खाते को ब्लॉक करना और उसकी शिकायत करना जानते हों।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे जब अपनी परेशानी बताएं, तो माता-पिता तुरंत उन्हें दोष न दें या गुस्सा न करें।
जब बच्चों को भरोसा होता है कि उनके माता-पिता उनकी बात समझेंगे और उनका साथ देंगे, तो वे ऑनलाइन किसी गलत अनुभव या दुर्व्यवहार के बारे में खुलकर बताने की अधिक संभावना रखते हैं।
यूनिसेफ की नई रिपोर्ट डिजिटल दुनिया में बच्चों के सामने बढ़ते खतरों को लेकर एक गंभीर चेतावनी देती है। 21 देशों में 12 से 17 वर्ष की उम्र के इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले करीब 2 करोड़ बच्चों के एक वर्ष में तकनीक के माध्यम से होने वाले यौन शोषण या दुर्व्यवहार का सामना करने का अनुमान इस समस्या की गंभीरता को दिखाता है।
इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि ऑनलाइन खतरे को लेकर कई आम धारणाएं पूरी तरह सही नहीं हैं। बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाला व्यक्ति हमेशा कोई अनजान व्यक्ति नहीं होता है। सोशल मीडिया ही एकमात्र जोखिम वाली जगह नहीं है। ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म का भी गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा AI जैसी नई तकनीकें डिजिटल नुकसान के नए तरीके पैदा कर रही हैं।
हालांकि, माता-पिता के लिए इस रिपोर्ट का संदेश डर पैदा करने वाला नहीं होना चाहिए।
बच्चों के लिए इंटरनेट जरूरी है। वे शिक्षा, रचनात्मकता, बातचीत और आधुनिक समाज में भागीदारी के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए उन्हें पूरी तरह डिजिटल दुनिया से दूर करना इसका सही समाधान नहीं है।
इसके बजाय बच्चों को जानकारी, निजी सुरक्षा, स्वस्थ सीमाएं, भरोसेमंद बड़ों का सहयोग और सुरक्षित डिजिटल वातावरण देना ज्यादा जरूरी है।
माता-पिता बच्चों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों और ऐप्स के बारे में जानकारी हासिल करके महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें बच्चों से ऑनलाइन खतरों के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए, जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और यह भरोसा दिलाना चाहिए कि किसी समस्या के समय वे बिना डर के मदद मांग सकते हैं।
लेकिन बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल परिवारों तक सीमित नहीं है। टेक्नोलॉजी कंपनियों को अधिक सुरक्षित प्लेटफॉर्म बनाने होंगे। सरकारों को मजबूत कानून और शिकायत व्यवस्था तैयार करनी होगी। स्कूलों को बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में जानकारी देनी होगी। समाज और समुदायों को भी ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां बच्चे किसी दुर्व्यवहार के बारे में बिना डर के बात कर सकें।
हर बच्चे को एक आसान और महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।
अगर इंटरनेट पर कोई चीज आपको असुरक्षित, परेशान या दबाव में महसूस कराती है, तो आप अकेले नहीं हैं और इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को बताएं और मदद मांगें।
बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल दुनिया बनाने के लिए माता-पिता, बच्चे, स्कूल, सरकारें और टेक्नोलॉजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। यूनिसेफ की रिपोर्ट यह साफ संकेत देती है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अब और इंतजार नहीं किया जा सकता है।